अनल-हक़ का कभी बंदा से दा'वा हो नहीं सकता
अनल-हक़ का कभी बंदा से दा'वा हो नहीं सकता
जुदा जब तक रहे क़तरा वो दरिया हो नहीं सकता
दो 'आलम बंदा-ए-बे-दाम हो जाएँ मगर ऐ दिल
सनम का राज़ हर एक पर हुवैदा हो नहीं सकता
हवा-ए-'इश्क़ छू भी जाए जिस के ग़ुंचा-ए-दिल को
ग़लत है कौन कहता है वो रुस्वा हो नहीं सकता
खुला वैसा ही जैसा सोज़-ए-ग़म दिल में छुपाया था
'अजब ये राज़ पिन्हाँ है कि इख़्फ़ा हो नहीं सकता
हो दख़्ल लात-ओ-'उज़्ज़ा किस तरह से ख़ाना-ए-दिल में
हरीम-ए-ख़ालिक़-ए-अकबर कलीसा हो नहीं सकता
तो हो सरगर्म मस्त-ए-नाज़ और ये जाँ न दे बैठे
मिरी जाँ 'फ़रहत'-ए-शैदा से ऐसा हो नहीं सकता
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