तू ने अपना बना कर नज़र फेर ली मेरे दिल का सुकूँ ना-गहाँ लुट गया

तू ने अपना बना कर नज़र फेर ली मेरे दिल का सुकूँ ना-गहाँ लुट गया
अनवर फ़िरोज़पुरी
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तू ने अपना बना कर नज़र फेर ली मेरे दिल का सुकूँ ना-गहाँ लुट गया
मुझ को लूटा तिरे 'इश्क़ ने जान-ए-जाँ मैं तिरे 'इश्क़ में जान-ए-जाँ लुट गया
चंद तिनके फ़क़त मेरी जागीर थे वो भी बाद-ए-ख़िज़ाँ लूट कर ले गई
मैं ने देखा न फ़स्ल-ए-बहारी का मुँह मैं क़फ़स में रहा आशियाँ लुट गया
मैं ने लुटने से पहले ये सोचा कि मैं राज़ की बात ही दिल से कह कर लुटूँ
राज़ की बात तो रह गई राज़ में मुझ से पहले मेरा राज़-दाँ लुट गया
दिल मेरा 'इश्क़-बाज़ी में अंजान था आ गया इक बुत-ए-बेवफ़ा पे यूँही
दिल ने सोचा न समझा न पहचान की उस को लुटना कहाँ था कहाँ लुट गया
मैं ने ख़ुद हो के लुटना गवारा किया समझा तेरी ख़ुशी को मैं अपनी ख़ुशी
मैं ने तेरे इशारों का रक्खा भरम तू ने चाहा जहाँ मैं वहाँ लुट गया
हुस्न वालों ने लूटा कुछ इस वार से होश जाते रहे आबरू छिन गई
मेरे लुटने का 'आलम न कुछ पोछिए मैं सर-ए-कू-ए-हुस्न-ए-बुताँ लुट गया
रह गया मेरे लुटने का ज़िंदा नशा धूम मेरी ज़माने में हर सू मची
वो जगह यादगार-ए-मोहब्बत बनी मैं मोहब्बत की ख़ातिर जहाँ लुट गया
चश्म-ए-साक़ी ने लूटा पिला के नशा कुफ़्र-ओ-ईमाँ की सुध-बुध न मुझ को रही
मैं हूँ 'अनवर' वो रिंद-ए-ख़राबात जो का'बा-ओ-दैर के दरमियाँ लुट गया
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