छेले बाँके यार पे मोरा जिया लूटा जाए है
छेले बाँके यार पे मोरा जिया लूटा जाए है
इफ़्तिख़ार-उल-हक़ बिस्मिल
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छेले बाँके यार पे मोरा जिया लूटा जाए है
तन-मन वारूँ उस पे अपना जी में ये ही आए है
नैन कटारी चमकाए और तीर पलक दिखलाए है
बाल की लट काली नागिन झपट के काटे खाए है
बाँकी छब और तिरछी चितवन चाल क़यामत ढाए है
क़हर-ए-ख़ुदा अंदाज़-ए-कमर है बात में सौ बल खाए
पीत की आग भड़क गई घट में तन-मन सुलगा जाए है
बस्ती ही में जी लगता और जंगल ही न सुहाए है
हिज्र की ताब नहीं है मोहन वस्ल से अब इंकार न कर
अपने चाहने वाले को कोई इतना भी तरसाए है
माना हम ने ये कि हसीं हैं एक से बेहतर एक बहुत
लेकिन एक वही सांवलिया हमरे मन का भाए भाए है
मरने को तयार हूँ मैं बिस्मिल्लाह कर ज़ब्ह मुझे
बाँके छेले यार अगर तू तेग़-ए-जफ़ा चमकाए है
'बिस्मिल' ख़ूब समझते हैं हम कि तुम उन पर मरते हो
लेकिन वो भी तुम से अपनी लाग कभी जतलाए है
- पुस्तक : Kalam-e-Bismil (पृष्ठ 122)
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