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मोरी सुध-बुध बिसरी ऐ सखियो मैं बोल रही ख़्वाजा ख़्वाजा

फ़ना बुलंदशहरी

मोरी सुध-बुध बिसरी ऐ सखियो मैं बोल रही ख़्वाजा ख़्वाजा

फ़ना बुलंदशहरी

रोचक तथ्य

منقبت در شان غریب نواز خواجہ معین الدین چشتی (اجمیر-راجستھان)

मोरी सुध-बुध बिसरी सखियो मैं बोल रही ख़्वाजा ख़्वाजा

मोरे मन मा बसो 'उसमाँ का कुँवर रट मोहे लगी ख़्वाजा ख़्वाजा

पूछा किसी ने हाल मिरा राह बताई संजर की

इक दर्द लिए बस्ती बस्ती मैं कहती फिरी ख़्वाजा ख़्वाजा

नैया है भँवर में ख़्वाजा पिया पतवार छुटे घबराए जिया

बय्याँ पकड़ मोहे पार लगा मैं डूब रही ख़्वाजा ख़्वाजा

जोगन हूँ तोरी रख लाज मोरी बुलवा ले मोहे अपनी नगरी

दिन रैन पुकारे जान मोरी वलियन के वली ख़्वाजा ख़्वाजा

कर मो पे दया या ख़्वाजा पिया दिखला दे मोहे सुंदर मुखड़ा

दिन रैन पुकारे जान मोरी वलियन के वली ख़्वाजा ख़्वाजा

तू मान 'फ़ना' की बात सखी बन जाएगी बिगड़ी बात सखी

अच्छा है वज़ीफ़ा देख यही कह तू भी सखी ख़्वाजा ख़्वाजा

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