बाग़ जन्नत के हैं बहर-ए-मद्ह-ख़्वान-ए-अहल-ए-बैत
रोचक तथ्य
منقبت در شان حضراتِ اہلِ بیتِ کرام۔
बाग़ जन्नत के हैं बहर-ए-मद्ह-ख़्वान-ए-अहल-ए-बैत
तुम को मुझ़दा नार का ऐ दुश्मनान-ए-अहल-ए-बैत
किस ज़बाँ से हो बयाँ 'इज़्ज़-ओ-शान-ए-अहल-ए-बैत
मद्ह-गोए-मुस्तफ़ा है मद्ह-ख़्वान-ए-अहल-ए-बैत
उन की पाकी का ख़ुदा-ए-पाक करता है बयाँ
आया-ए-ततहीर से ज़ाहिर है शान-ए-अहल-ए-बैत
मुस्तफ़ा 'इज़्ज़त बढ़ाने के लिए ता'ज़ीम दें
है बुलंद इक़बाल तेरा दूदमान-ए-अहल-ए-बैत
उन के घर में बे-इजाज़त जिब्रईल आते नहीं
क़द्र वाले जानते हैं क़द्र-ओ-शान-ए-अहल-ए-बैत
मुस्तफ़ा बाए' ख़रीदार उस का अल्लाह मुश्तरी
ख़ूब चाँदी कर रहा है कारवान-ए-अहल-ए-बैत
रज़्म का मैदाँ बना है जल्वा-गाह-ए-हुस्न-ओ-’इश्क़
कर्बला में हो रहा है इम्तिहान-ए-अहल-ए-बैत
फूल ज़ख़्मों के खिलाए हैं हवा-ए-दोस्त ने
ख़ून से सींचा गया है गुल्सितान-ए-अहल-ए-बैत
हूरें करती हैं ’अरूसान-ए-शहादत का सिंगार
ख़ूब-रू दूल्हा बना है हर जवान-ए-अहल-ए-बैत
हो गई तहक़ीक़-ए-'ईद दीद आब-ए-तेग़ से
अपने रोज़े खोलते हैं साइमान-ए-अहल-ए-बैत
जुमअ' का दिन है किताबें ज़ीस्त की तय कर के आज
खेलते हैं जान पर शहज़ादगान-ए-अहल-ए-बैत
ऐ शबाब-ए-फ़स्ल-ए-गुल ये चल गई कैसी हवा
कट रहा है लहलहाता बोस्तान-ए-अहल-ए-बैत
किस शक़ी की है हुकूमत हाए क्या अंधेर है
दिन-दहाड़े लुट रहा है कारवान-ए-अहल-ए-बैत
ख़ुश्क हो जा ख़ाक हो कर ख़ाक में मिल जा फ़ुरात
ख़ाक तुझ पर देख तो सूखी ज़बान-ए-अहल-ए-बैत
ख़ाक पर 'अब्बास-ओ-'उस्मान-ए-’अलम-बरदार हैं
बे-कसी अब कौन उठाएगा निशान-ए-अहल-ए-बैत
तेरी क़ुदरत जानवर तक आब से सैराब हों
प्यास की शिद्दत में तड़पे बे-ज़बान-ए-अहल-ए-बैत
क़ाफ़िला-सालार मंज़िल को चले हैं सौंप कर
वारिस-ए-बे-वारिसाँ को कारवान-ए-अहल-ए-बैत
फ़ातिमा के लाडले का आख़िरी दीदार है
हश्र का हंगामा बरपा है मियान-ए-अहल-ए-बैत
वक़्त-ए-रुख़्सत कह रहा है ख़ाक में मिलता सुहाग
लो सलाम-ए-आख़िरी ऐ बेवगान-ए-अहल-ए-बैत
अब्र फ़ौज-ए-दुश्मनाँ में ऐ फ़लक यूँ डूब जा
फ़ातिमा का चाँद मेहर-ए-आसमान-ए-अहल-ए-बैत
किस मज़े की लज़्ज़तें हैं आब-ए-तेग़-ए-यार में
ख़ाक-ओ-ख़ूँ में लोटते हैं तिश्नगान-ए-अहल-ए-बैत
बाग़-ए-जन्नत छोड़ कर आए हैं महबूब-ए-ख़ुदा
ऐ ज़हे-क़िस्मत तुम्हारी कुश्तगान-ए-अहल-ए-बैत
हूरें बे-पर्दा निकल आई हैं सर खोले हुए
आज कैसा हश्र है या रब मियान-ए-अहल-ए-बैत
कोई क्यूँ पूछे किसी को क्या ग़रज़ ऐ बे-कसी
आज कैसा है मरीज़-ए-नीम-ए-जान-ए-अहल-ए-बैत
घर लुटाना जान देना कोई तुझ से सीख जाए
जान-ए-’आलम हो फ़िदा ऐ ख़ानदान-ए-अहल-ए-बैत
सर शहीदान-ए-मोहब्बत के हैं नेज़ों पर बुलंद
और ऊँची की ख़ुदा ने क़द्र-ओ-शान-ए-अहल-ए-बैत
दौलत-ए-दीदार पाई पाक-ए-जानें बेच कर
कर्बला में ख़ूब ही चमकी दुकान-ए-अहल-ए-बैत
ज़ख़्म खाने को तो आब-ए-तेग़ पीने को दिया
ख़ूब दा'वत की बुला कर दुश्मनान-ए-अहल-ए-बैत
अपना सौदा बेच कर बाज़ार सूना कर गए
कौन सी बस्ती बसाई ताजिरान-ए-अहल-ए-बैत
अहल-ए-बैत-ए-पाक से गुस्ताख़ियाँ बे-बाकियाँ
ल’नतुल्लाह-ए-’अलैकुम दुश्मना-ए-अहल-ए-बैत
बे-अदब गुस्ताख़-फ़िर्क़ा को सुना दे ऐ 'हसन'
यूँ कहा करते हैं सुन्नी दास्तान-ए-अहल-ए-बैत
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