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पुर-नूर है ज़माना सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

हसन रज़ा बरेलवी

पुर-नूर है ज़माना सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

हसन रज़ा बरेलवी

MORE BYहसन रज़ा बरेलवी

    पुर-नूर है ज़माना सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    पर्दा उठा है किस का सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    जल्वा है हक़ का जल्वा सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    साया ख़ुदा का साया सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    फ़स्ल-ए-बहार आई शक्ल-ए-निगार आई

    गुलज़ार है ज़माना सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    फूलों से बाग़ महके शाख़ों पे मुर्ग़ चहके

    'अह्द-ए-बहार आया सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    पज़मुर्दा हसरतों के सब खेत लहलहाए

    जारी हुआ वो दरिया सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    गिल है चराग़-ए-सरसर गुल से चमन मो'अत्तर

    आया कुछ ऐसा झोंका सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    क़तरा में लाख दरिया गुल में हज़ार गुलशन

    नुशू-ओ-नुमा है क्या क्या सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    जन्नत के हर मकाँ की आईना-बंदियाँ हैं

    आरास्ता है दुनिया सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    दिल जगमगा रहे हैं क़िस्मत चमक उठी है

    फैला नया उजाला सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    चिकटे हुए दिलों के मुद्दत के मेल छूटे

    अब्र-ए-करम वो बरसा सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    बुलबुल का आशियाना छाया गया गुलों से

    क़िस्मत ने रंग बदला सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    अर्ज़-ओ-समा से मंगता दौड़े हैं भीक लेने

    बाँटेगा कौन बाड़ा सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    अनवार की ज़ियाएँ फैली हैं शाम ही से

    रखती है मेहर कैसा सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    मक्का में शाम के घर रौशन हैं हर निगह पर

    चमका है वो उजाला सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    शौकत का दबदबा है हैबत का ज़लज़ला है

    शक़ है मकान-ए-किस्रा सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    ख़ुत्बा हुआ ज़मीं पर सिक्का पड़ा फ़लक पर

    पाया जहाँ ने आक़ा सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    आई नई हुकूमत सिक्का नया चिल्ले गा

    'आलम ने रंग बदला सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    रूह-उल-अमीं ने गाड़ा का'बा की छत पे झंडा

    ता-'अर्श उड़ा फरेरा सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    दोनों जहाँ की शाही ना-कतख़ुदा दुल्हन थी

    पाया दुल्हन ने दुलहा सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    पढ़ते हैं 'अर्श वाले सुनते हैं फ़र्श वाले

    सुल्तान-नौ का ख़ुत्बा सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    चाँदी है मुफ़लिसों की बांदी है ख़ुश-नसीबी

    आया करम का दाता सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    'आलम के दफ़्तरों में तरमीम हो रही है

    बदला है रंग-ए-दुनिया सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    ज़ुल्मत के सब रजिस्टर हर्फ़-ए-ग़लत हुए हैं

    काटा गया सियाहा सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    मुल्क-ए-अज़ल का सरवर सब सरवरों का अफ़सर

    तख़्त-ए-अबद पे बैठा सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    सूखा पड़ा है सावा दरिया हुआ समावा

    है ख़ुश्क-ओ-तर पे क़ब्ज़ा सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    नवाबियाँ सुधारें जारी हैं शाही आईं

    कच्चा हुआ 'इलाक़ा सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    दिन फिर गए हमारे सोते नसीब जागे

    ख़ुर्शीद ही वो चमका सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    क़ुर्बान दो-शंबा तुझ पर हज़ार जुम'ए

    वो फ़ज़्ल तू ने पाया सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    प्यारे रबी’-ए-अव्वल तेरी झलक के सदक़े

    चमका दिया नसीबा सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    वो मेहर मेहर फ़रमा वो माह-ए-'आलम-आरा

    तारों की छाओं आया सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    नौशा बनाओ उन को दूल्हा बनाओ उन को

    है 'अर्श तक ये शोहरा सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    शादी रची हुई है बजते हैं शादियाने

    दूल्हा बना वो दूल्हा सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    महरूम रह जाएँ दिन-रात बरकतों से

    इस वास्ते वो आया सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    'अर्श-ए-'अज़ीम झूमे का'बा ज़मीन चूमे

    आता है 'अर्श वाला सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    हुश्यार हों भिकारी नज़दीक है सवारी

    ये कह रहा है डंका सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    बंदों को ’ऐश-ओ-शादी आ'दा को ना-मुरादी

    कड़कैत का है कड़का सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    तारे ढुलक कर आए कासे कटोरे लाए

    या'नी बटेगा सदक़ा सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    आमद का शोर सुन कर घर आए हैं भिकारी

    घेरे खड़े हैं रस्ता सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    हर जान मुंतज़िर है हर दीदा रह नगर है

    ग़ौग़ा है मर्हबा का सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    जिब्रील सर झुकाए क़ुदसी परे जमाए

    हैं सर्व-ए-क़द सितादा सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    किस दाब किस अदब से किस जोश किस तरब से

    पढ़ते हैं उन का कलिमा सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    हाँ दीन वालो उट्ठो ता'ज़ीम वालो उट्ठो

    आया तुम्हारा मौला सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    उट्ठो हुज़ूर आए शाह-ए-ग़यूर आए

    सुल्तान-ए-दीन-ओ-दुनिया सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    उठो मुलक उठे हैं 'अर्श फ़लक उट्ठै हीं

    करते हैं उन को सज्दा सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    आओ फकीरो आओ मुँह माँगी आस पाओ

    बाब-ए-करीम है वा सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    सूखी ज़बानों आओ जलती जानों आओ

    लहरा रहा है दरिया सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    मुरझाई कलियों आओ कुम्हलाए फूलों आओ

    बरसा करम का झाला सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    तेरी चमक दमक से 'आलम चमक रहा है

    मेरे भी बख़्त चमका सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    तारीक रात ग़म की लाई बला सितम की

    सदक़ा तजल्लियों का सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    लाया है शेर तेरा नूर-ए-ख़ुदा का जल्वा

    दिल कर दे दूध धोया सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

    बाँटा है दो-जहाँ में तू ने ज़िया का बाड़ा

    दे दे 'हसन' का हिस्सा सुब्ह-ए-शब-ए-विलादत

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