असीरों के मुश्किल-कुशा ग़ौस-ए-आ'ज़म
रोचक तथ्य
منقبت در شان غوث پاک شیخ عبدالقادر جیلانی (بغداد-عراق)
असीरों के मुश्किल-कुशा ग़ौस-ए-आ'ज़म
फ़क़ीरों के हाजत-रवा ग़ौस-ए-आ'ज़म
घिरा है बलाओं में बंदा तुम्हारा
मदद के लिए आओ या ग़ौस-ए-आ'ज़म
तिरे हाथ में हाथ मैं ने दीया है है
तिरे हाथ है लाज या ग़ौस-ए-आ'ज़म
मुरीदों को ख़तरा नहीं बहर-ए-ग़म से
कि बेड़े के हैं ना-ख़ुदा ग़ौस-ए-आ'ज़म
तुम्हीं दुख सुनो अपने आफ़त-ज़दों का
तुम्हीं दर्द की दो दवा ग़ौस-ए-आ'ज़म
भँवर में फँसा है हमारा सफ़ीना
बचा ग़ौस-ए-आ'ज़म बचा ग़ौस-ए-आ'ज़म
जो दुख भर रहा हूँ जो ग़म सह रहा हूँ
कहूँ किस से तेरे सिवा ग़ौस-ए-आ'ज़म
ज़माने के दुख-दर्द की रंज-व-ग़म की
तिरे हाथ में है दवा ग़ौस-ए-आ'ज़म
अगर सल्तनत की हवस है फकीरो
कहो शैइन-लिल्लाह या ग़ौस-ए-आ'ज़म
निकाला है पहले तु डूबे हुओं को
और अब डूबतों को बचा ग़ौस-ए-आ'ज़म
जिसे ख़ल्क़ कहती है प्यारा ख़ुदा का
उसी का है तू लाडला ग़ौस-ए-आ'ज़म
क्या ग़ौर जब ग्यारहवीं बारहवीं में
मु'अम्मा ये हम पर खुला ग़ौस-ए-आ'ज़म
तुम्हीं वस्ल-बे-फ़स्ल है शाह-ए-दीं से
दिया हक़ ने ये मर्तबा ग़ौस-ए-आ'ज़म
फँसा है तबाही में बेड़ा हमारा
सहारा लगा दो ज़रा ग़ौस-ए-आ'ज़म
मशाइख़ जहाँ आएँ बहर-ए-गदाई
वो है तेरी दौलत-सरा ग़ौस-ए-आ'ज़म
मिरी मुश्किलों को भी आसान कीजे
कि हैं आप मुश्किल-कुशा ग़ौस-ए-आ'ज़म
वहाँ सर झुकाते हैं सब ऊँचे ऊँचे
जहाँ है तिरा नक़्श-ए-पा ग़ौस-ए-आ'ज़म
क़सम है कि मुश्किल को मुश्किल न पाया
कहा हम ने जिस वक़्त या ग़ौस-ए-आ'ज़म
मुझे फेर में नफ़्स-ए-काफ़िर ने डाला
बता जाइए रास्ता ग़ौस-ए-आ'ज़म
खिला दे जो मुरझाई कलियाँ दिलों की
चला कोई ऐसी हवा ग़ौस-ए-आ'ज़म
मुझे अपनी उल्फ़त में ऐसा गुमाँ दे
न पाऊँ फिर अपना पता ग़ौस-ए-आ'ज़म
बचा ले ग़ुलामों को मजबूरियों से
कि तू 'अब्द-ए-क़ादिर है ग़ौस-ए-आ'ज़म
दिखा दे ज़रा मेहर-ए-रुख़ की तजल्ली
कि छाई है ग़म की घटा ग़ौस-ए-आ'ज़म
गिराने लगी है मुझे लग़्ज़िश-ए-पा
सँभालो ज़'ईफ़ों को या ग़ौस-ए-आ'ज़म
लिपट जाएँ दामन से उस के हज़ारों
पकड़ ले जो दामन तिरा ग़ौस-ए-आ'ज़म
सरों पर जिसे लेते हैं ताज वाले
तुम्हारा क़दम है वो या ग़ौस-ए-आ'ज़म
दवाए निगाहे 'अताए सख़ाए
कि शुद दर्द-ए-मा रा दवा ग़ौस-ए-आ'ज़म
ज़-हर-रू-ओ-हर-राह रूयम ब-गिर्दाँ
सु-ए-ख़्वेश राहम नुमा ग़ौस-ए-आ'ज़म
असीर-ए-कमंद-ए-हवायम करीमा
ब-बख़शा-ए-बर हाल-ए-मा ग़ौस-ए-आ'ज़म
फ़क़ीर-ए-तु चश्म-ए-करम अज़ तु दारद
निगाहे ब-हाल-ए-गदा ग़ौस-ए-आ'ज़म
गदायम मगर अज़ गदायान-ए-शाहे
कि गोयन्दश अहल-ए-सफ़ा ग़ौस-ए-आ'ज़म
कमर बस्त बर ख़ून-ए-मन नफ़्स-ए-क़ातिल
अग़िस्नी बरा-ए-ख़ुदा ग़ौस-ए-आ'ज़म
अधर में पिया मोरी डोलत है नय्या
कहूँ का से अपनी बिथा ग़ौस-ए-आ'ज़म
बिपत में कटी मोरी सगरी 'उमरिया
करो मो पे अपनी दया ग़ौस-ए-आ'ज़म
भयो दो जो बैकुंठ बग़दाद तो से
कहो मोरी नगरी भी आ ग़ौस-ए-आ'ज़म
कहे किस से जा कर 'हसन' अपने दिल की
सुने कौन तेरे सिवा ग़ौस-ए-आ'ज़म
- पुस्तक : ज़ौक-ए-नात (पृष्ठ 80)
Additional information available
Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.
About this sher
rare Unpublished content
This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.