ऐ हुब्ब-ए-वतन साथ न यूँ सू-ए-नजफ़ जा
रोचक तथ्य
منقبت در شان حضرت علی مرتضیٰ (نجف-عراق)
ऐ हुब्ब-ए-वतन साथ न यूँ सू-ए-नजफ़ जा
हम और तरफ़ जाते हैं तू और तरफ़ जा
चल हिन्द से चल हिन्द से चल हिन्द से ग़ाफ़िल
उठ सू-ए-नजफ़ सू-ए-नजफ़ सू-ए-नजफ़ जा
फँसता है वबालों में 'अबस अख़्तर-ए-ताले'
सरकार से पाएगा शरफ़ बहर-ए-शरफ़ जा
ऐ कुल्फ़त-ए-ग़म बंदा-ए-मौला से न रख काम
बे-फ़ाइदा होती है तिरी 'उम्र-ए-तलफ़ जा
ऐ तल’अत-ए-शह आ तुझे मौला की क़सम आ
ऐ ज़ुल्मत-ए-दिल जा तुझे उस रुख़ का हलफ़ जा
क्यूँ ग़र्क़-ए-अलम है दुर-ए-मक़सूद से मुँह भर
नैसान-ए-करम की तरफ़ ऐ तिश्ना-सदफ़ जा
जीलाँ के शरफ़ हज़रत-ए-मौला के ख़लफ़ हैं
ऐ ना-ख़लफ़ उठ जानिब-ए-ता’ज़ीम-ए-ख़लफ़ जा
तफ़्ज़ील का जूया न हो मौला के विला में
यूँ छोड़ के गौहर को न तू बहर-ए-ख़ज़फ़ जा
कह दे कोई घेरा है बलाओं ने 'हसन' को
ऐ शेर-ए-ख़ुदा बहर-ए-मदद तेग़-ब-कफ़ जा
Additional information available
Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.
About this sher
rare Unpublished content
This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.