मर्हबा नूर-ए-ख़ुदा ज़ात-ए-मुतह्हर मर्हबा
मर्हबा नूर-ए-ख़ुदा ज़ात-ए-मुतह्हर मर्हबा
मर्हबा शाह-ए-शहाँ साक़ी-ए-कौसर मर्हबा
ऐ ख़ुदा के नूर, पाक और रौशन ज़ात आपकी क्या शान है, ऐ बादशाहों के बादशाह साक़ी-ए-कौसर आपका क्या कहना।
आफ़रीं ऐ तकिया-गाह-ए-'अर्श-ए-आ'ला आफ़रीं
मर्हबा ज़ात-ए-तु बरतर हर पयम्बर मर्हबा
आपका क्या कहना ऐ ईश्वर के सिंहासन के सहारे, आपका क्या कहना आपकी ज़ात हर नबी से बुलंद है।
मर्हबा कान-ए-नुबुव्वत बहर-ए-रहमत आफ़रीं
मर्हबा नूर-ए-ख़ुदा ख़िल्क़त के रहबर मर्हबा
आप नुबूवत का ख़ज़ाना और रहमत का समुंदर हैं, आप ख़ुदा का नूर और दुनिया के रहनुमा हैं ।
हब्बज़ा मोहर-ए-नबुव्वत शान-ए-आ'ला हब्बज़ा
मर्हबा ख़ैर-उल-वरा नूर-ए-सरासर मर्हबा
नुबूवत की मुहर कितनी अज़ीम और क़ाबिल-ए-तारीफ़ है, आप तमाम इंसानों में सबसे बेहतर हैं और संपूर्ण प्रकाश हैं आपकी क्या शान है।
आफ़रीं दरिया-ए-बख़्शिश नूर-ए-ख़ालिक़ आफ़रीं
मर्हबा ऐ मुस्तफ़ा बरतर पयम्बर मर्हबा
आपका क्या कहना आप बख़्शिश का दरिया और ख़ालिक़ के नूर का मज़हर हैं, ऐ मुस्तफ़ा आप सब नबियों से अफ़ज़ल हैं आपकी क्या शान है।
हब्बज़ा ऐ ज़ेब-ए-बख़्श 'अर्श-ए-आ'ज़म हब्बज़ा
मर्हबा माह-ए-शराफ़त जिस्म-ए-अतहर मर्हबा
आपकी क्या शान है ऐ ईश्वर के सिंहासन के सौन्दर्य, आप शराफ़त का चमकता हुआ चाँद और पाकीज़गी का कामिल पैकर हैं आपका क्या कहना।
बाइ'स-ए-ईजाद-ए-'आलम ज़ात-ए-अक़्दस है तेरी
मर्हबा महबूब-ए-यकता हक़ के दिलबर मर्हबा
सारे संसार की उत्पत्ति आपके पवित्र व्यक्तित्व के सबब से है, ऐ ख़ुदा के महबूब और यक़्ता महबूब स्वागतम।
आफ़रीं कान-ए-शराफ़त बहर-ए-रहमत आफ़रीं
मर्हबा महबूब-ए-हक़ नबियों के सरवर मर्हबा
आप धन्य हैं आप शराफ़त का ख़ज़ाना और रहमत का समुंदर हैं,
ऐ ख़ुदा के महबूब नबियों के सरदार स्वागतम।
हब्बज़ा ऐ दुर्रतुत्ताज-ए-रसूलाँ हब्बज़ा
मर्हबा ऐ रहनमाए हर पयम्बर मर्हबा
आपकी क्या शान है ऐ रसूलों के सर का ताज, आप ही हर नबी के रहनुमा हैं आपका क्या कहना।
आफ़रीं ऐ नूर-ए-चश्म-ए-जुमला-मुर्सल आफ़रीं
मर्हबा हूर-ओ-मलक ग़िल्माँ के अफ़सर मर्हबा
आपका क्या कहना है आप तमाम रसूलों की आँखों की ठंडक हैं, आप फ़रिश्तों और ग़ुलामों के सरदार हैं आप धन्य हैं।
हब्बज़ा पुश्त-ओ-पनाह-ए-ख़ल्क़-ए-बे-कस हब्बज़ा
मर्हबा ग़म-ख़्वार-ए-उम्मत रोज़-ए-महशर मर्हबा
आप धन्य हैं बेसहारा लोगों की पनाह हैं और क़यामत के दिन क़ौम के हमदर्द हैं, आपका क्या कहना है।
जिस ने देखी ये ग़ज़ल 'मुख़्लिस' की ख़ुश हो कर कहा
मर्हबा ऐ ना'त-गो यक्ता सुख़नवर मर्हबा
जिसने मुख़लिस की ये ग़ज़ल देखी ख़ुश हो कर कहा, वाह ऐ नात-ख़्वाँ बेमिसाल शायर तुम्हारा क्या कहना।
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