दिल की बेताबी का है ये 'आलम दिल सँभाले सँभलता नहीं है
दिल की बेताबी का है ये 'आलम दिल सँभाले सँभलता नहीं है
क़ैसर रत्नागीरवी
MORE BYक़ैसर रत्नागीरवी
रोचक तथ्य
منقبت در شان غوث پاک شیخ عبدالقادر جیلانی (بغداد-عراق)
दिल की बेताबी का है ये 'आलम दिल सँभाले सँभलता नहीं है
यूँ परेशानियाँ बढ़ रही हैं चैन इक लम्हा मिलता नहीं है
जो तसव्वुर में छाया हुआ है वो निगाहों में नक़्शा नहीं है
रौज़ा-ए-शाह-ए-जीलाँ दिखा दे और कोई तमन्ना नहीं है
हो के अजमेर आया हूँ या-रब मैं ने बग़दाद देखा नहीं है
बात ईमान की कह रहा हूँ कोई माने इसे या न माने
क्या नहीं पाने वालों ने पाया आज तक दर से ग़ौस-उल-वरा के
है ज़माने में हर हर क़दम पे उन के कश्फ़-ओ-करामत के चर्चे
ख़ुश-मुक़द्दर हैं वो आ गया है दामन-ए-ग़ौस हाथों में जिस के
उन को जन्नत की ख़्वाहिश नहीं है उन को दोज़ख़ का खटका नहीं है
मय-कशी जुर्म कहते हो लेकिन मय-कशी की हक़ीक़त को समझो
वाइ'ज़-ए-मोहतरम चुप रहो अब मैं ने पी है मगर तुम न बहको
मेरी बे-होशी पर होश-मंदो तंज़ करने से पहले ये सोचो
बे-ख़ुदी का सबब क्या है मेरी जानना चाहते हो तो सुन लो
क़ादरी जाम मैं ने पिया है जिस का नश्शा उतरता नहीं है
अल-मदद ग़ौस मैं ने पुकारा टल गई सर से 'क़ैसर' हर आफ़त
तजरबा अपना बतला रहा हूँ मुझ पे गुज़री हुई है हक़ीक़त
सिदक़ दिल से उन्हें तुम पुकारो देख लो फिर ये अल्लाह की क़ुद्रत
पूरी हो जाएगी हुक्म-ए-रब से होगी जो भी तुम्हारी ज़रूरत
ग़ौस के दर से वो भी मिलेगा जो मुक़द्दर में लिक्खा नहीं है
Additional information available
Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.
About this sher
rare Unpublished content
This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.