है कोई आज़ाद दुनिया में कोई ग़म का असीर
रोचक तथ्य
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है कोई आज़ाद दुनिया में कोई ग़म का असीर
बादशाह-ए-वक़्त है कोई यहाँ कोई फ़क़ीर
दी है क़स्साम-ए-अज़ल ने ख़ूब क़िस्मत की नज़ीर
सुर'अ-ए-अंदेशः रा अफ़्गंद दर दामान-ए-तीर
'आदत-ए-ख़म्याज़ा दर जेब-ए-कमाल अंदाख़्तः
तेरी बख़्शिश हम फ़क़ीरों को उढ़ा दे क्यूँ न शाल
फिर उगा देता है तू सब्ज़ा को कर के पाएमाल
तेरी रहमत के हों सदक़े क्यूँ न हम ऐ ज़ुल-जलाल
मुर्ग़-ए-तब' अंदर हवा-ए-मा'सियत न कुशूदः-बाल
अफ़्व तू शाहीन-ए-रहमत रा बर आँ अंदाख़्तः
सुर्ख़-रू कहना ज़माने में हमेशा ऐ ख़ुदा
बस यही है हम फ़िदायान-ए-जफ़ा की अब दु'आ
बारहा हम ने शहीदान-ए-वफ़ा से ये सुना
दर चमन हा-ए-मोहब्बत हर क़दम चूँ कर्बला
अज़ नसीम-ए-'इश्वः फ़र्श-ए-अर्ग़वाँ अंदाख़्तः
'अर्श' के लब पर है शिकवा चुप है शम्अ'-ए-अंजुमन
कोई है महव-ए-फ़ुग़ाँ कोई है मा'ज़ूर-ए-सुख़न
कश्मकश में मिस्ल-ए-'उर्फ़ी अब हैं शैख़-ओ-बरहमन
शरअ' गोयद मना' लब कुन 'इश्क़ गोयद नारः-ज़न
काए तू हम दर राह-ए-'इश्क़-ए-ख़ुद 'इनाँ अंदाख़्तः
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