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है कोई आज़ाद दुनिया में कोई ग़म का असीर

अ‍र्श गयावी

है कोई आज़ाद दुनिया में कोई ग़म का असीर

अ‍र्श गयावी

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    रोचक तथ्य

    مخمس بر اشعارِ قصیدہ عرفی

    है कोई आज़ाद दुनिया में कोई ग़म का असीर

    बादशाह-ए-वक़्त है कोई यहाँ कोई फ़क़ीर

    दी है क़स्साम-ए-अज़ल ने ख़ूब क़िस्मत की नज़ीर

    सुर'अ-ए-अंदेशः रा अफ़्गंद दर दामान-ए-तीर

    'आदत-ए-ख़म्याज़ा दर जेब-ए-कमाल अंदाख़्तः

    तेरी बख़्शिश हम फ़क़ीरों को उढ़ा दे क्यूँ शाल

    फिर उगा देता है तू सब्ज़ा को कर के पाएमाल

    तेरी रहमत के हों सदक़े क्यूँ हम ज़ुल-जलाल

    मुर्ग़-ए-तब' अंदर हवा-ए-मा'सियत कुशूदः-बाल

    अफ़्व तू शाहीन-ए-रहमत रा बर आँ अंदाख़्तः

    सुर्ख़-रू कहना ज़माने में हमेशा ख़ुदा

    बस यही है हम फ़िदायान-ए-जफ़ा की अब दु'आ

    बारहा हम ने शहीदान-ए-वफ़ा से ये सुना

    दर चमन हा-ए-मोहब्बत हर क़दम चूँ कर्बला

    अज़ नसीम-ए-'इश्वः फ़र्श-ए-अर्ग़वाँ अंदाख़्तः

    'अर्श' के लब पर है शिकवा चुप है शम्अ'-ए-अंजुमन

    कोई है महव-ए-फ़ुग़ाँ कोई है मा'ज़ूर-ए-सुख़न

    कश्मकश में मिस्ल-ए-'उर्फ़ी अब हैं शैख़-ओ-बरहमन

    शरअ' गोयद मना' लब कुन 'इश्क़ गोयद नारः-ज़न

    काए तू हम दर राह-ए-'इश्क़-ए-ख़ुद 'इनाँ अंदाख़्तः

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