आगे तो 'अज़ीज़ उस से न थे ला'ल-ओ-गुहर भी
आगे तो 'अज़ीज़ उस से न थे ला'ल-ओ-गुहर भी
मिर्ज़ा मोहम्मद अली फ़िदवी
MORE BYमिर्ज़ा मोहम्मद अली फ़िदवी
रोचक तथ्य
بر غزل محمد رفیع سودا
आगे तो 'अज़ीज़ उस से न थे ला'ल-ओ-गुहर भी
इख़्लास किया दिल से तो किया सीधी नज़र भी
तुझ से मुतवक़्क़ा' है तिरा दस्त-ए-निगर भी
गुल फेंके है औरों की तरफ़ और समर भी
ऐ ख़ाना बर-अंदाज़-ए-चमन कुछ तो इधर भी
ये जो कहे कोई उसे है ख़्वाहिश-ए-ज़र न
या ये कि वो रखता है किसी बात का डर न
वल्लाह ग़लत झूट है तोहमत किसी पर न
क्या ज़िद है ख़ुदा जाने मुझ साथ दिगर न
काफ़ी है तसल्ली को मिरे एक नज़र भी
हम-चश्मी का मुक़द्दर है याँ दम कोई मारे
है शमा' तो फ़ानूस में रू-पोश किनारे
मग़रूर है किस बात पर हम भी सुनें प्यारे
ऐ अब्र क़सम है तुझे रोने की हमारे
तुझ चश्म से टपका है कभी लख़्त-ए-जिगर भी
उम्मीद नहीं अब तो ख़ुदा ही उसे फेरे
वो दिन गए थे रोज़ इधर चंद दिनों फेरे
क्यूँ-कर न ज़बाँ ज़द हो शब-ओ-रोज़ ये मेरे
ऐ नाला सद अफ़्सोस जवाँ मरने पे तेरे
पाया न तनिक देखने में और असर भी
हर चंद नहीं मुझ को किसी साथ सरोकार
मैं आप सरापा हूँ गुनाहों में गिरफ़्तार
पर तेरे भले की कहूँ हूँ देख ख़बर-दार
किसी हस्ती-ए-मौहूम पे नाज़ाँ है तु ऐ यार
कभी अपनी शब-ओ-रोज़ की है तुझ को ख़बर भी
जूँ ग़ुंचा अगरचे नज़र आवे कोई ख़ामोश
मुम्किन नहीं हो दिल से तिरी याद फ़रामोश
किस किस की ख़बर दूँ तुझे अहवल के मय-नोश
तन्हा नहीं है ग़म से तिरी शाम-ए-सियह-पोश
रहता है सदा चाक-ए-गरेबान-ए-सहर भी
'फ़िद्वी' से तु सुन अपनी कहे जो तुझे कुछ बात
हम-साया पुकारे है किधर जाए है हैहात
शोरीदगी अच्छी नहीं ये कौन है औक़ात
'सौदा' तिरी फ़रियाद से आँखों में कटी रात
आई है सहर होने को टुक तो कहीं मर भी
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