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मन सैद-ए-कस न गर्दम शहबाज़-ए-ला-मकानम

अहमद बल्ख़ी लंगर दरिया

मन सैद-ए-कस न गर्दम शहबाज़-ए-ला-मकानम

अहमद बल्ख़ी लंगर दरिया

MORE BYअहमद बल्ख़ी लंगर दरिया

    मन सैद-ए-कस गर्दम शहबाज़-ए-ला-मकानम

    'अनक़ा-ए-क़ाफ़ हस्तम मतलब ज़-आशियानम

    मैं किसी का शिकार नहीं होंगा, मैं लामकां में परवाज़ करने वाला शाहबाज़ हूँ। मैं 'अंक़ा-ए-क़ाफ़ हूँ, मुझे अपने आशियाने से मतलब है।

    गह बाज़-ओ-गह तदर्रुम अंदर फ़िज़ा-ए-'इश्क़श

    परवानः रूनुमायम गह ईं-ओ-गाह आनम

    मैं उसके फ़िज़ा-ए-इश्क़ में कभी बाज़ हूँ कभी तदरौ (एक ख़ूबसूरत परिंदा) हूँ, परवाने की तरह हूँ, कभी यह हूँ कभी वह हूँ (यानी इश्क़ में बाज़ होता हूँ कभी तदरौ।

    'अहमद' वुजूद-ए-ख़ुद रा शनासद-ओ-न-दानद

    पैदास्त आफ़ताब-ओ-मन ज़र्रः-सान आनम

    अहमद अपने वजूद की हक़ीक़त पहचानता है जानता है। आफ़्ताब अयां

    है और मैं ज़र्रे की तरह उसकी मिलकिय्यत हूँ।

    स्रोत :
    • पुस्तक : नग़मातुल उंस फ़ी मजालिसिल क़ुदस (पृष्ठ 240)
    • रचनाकार :शाह हिलाल अहमद क़ादरी
    • प्रकाशन : दारुल एशा'अत ख़ानक़ाह मुजीबिया (2016)
    • संस्करण : First

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