ऐ दरत हाजत-रवा-ए-मा हमः
ऐ दरत हाजत-रवा-ए-मा हमः
ज़ात-ए-तू रहमत बरा-ए-मा हमः
ऐ वो ज़ात, जिनके दर से हम सबकी ज़रूरतें पूरी होती हैं। आपकी हस्ती हम सबके लिए रहमत है।
मा हमः रा चूँ न-बाशद 'इश्क़-ए-तू
'आशिक़-ए-रूयत ख़ुदा-ए-मा हमः
हम आपसे मोहब्बत कैसे न करें? आपका आशिक़ तो हमारा ख़ुदा भी है (यानी अल्लाह ता’ला भी आपसे बेहद मोहब्बत करता है। (यहाँ ‘आशिक़’ का मतलब है कि वो आप पर अपनी ख़ास मोहब्बत और करम फ़रमाता है।)
ता-कि रंजूरान-ए-हिज्रानेम हस्त
कू-ए-तू दारुश्शिफ़ा-ए-मा हमः
कब तक हम आपके हिज्र में बीमार रहें? आपकी गली तो हमारे लिए दारुश्शिफ़ा (शिफ़ा देने की जगह) है।
सद चु 'नस्र' मी-कुश-ओ-अज़ आँ ग़म म-ख़ूर
यक निगहत ख़ूँ-बहा-ए-मा हमः
‘नस्र’ जैसे सैकड़ों लोग अगर आपके इश्क़ में जान दे बैठें यानी आपके इश्क़ में कुर्बान हो जाएँ (यहाँ क़त्ल की निस्बत आपकी तरफ़ ब-हैसियत-ए-माशूक़ है) आप ग़म न करें (यानी आप फ़िक्र न करें कि आपके इश्क़ में इतने लोग हलाक हो गए) आपकी एक निगाह, हम सब लोगों के ख़ून की क़ीमत है।
- पुस्तक : नग़मातुल उंस फ़ी मजालिसिल क़ुदस (पृष्ठ 288)
- रचनाकार :शाह हिलाल अहमद क़ादरी
- प्रकाशन : दारुल एशा'अत ख़ानक़ाह मुजीबिया (2016)
- संस्करण : First
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