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ऐ वाज़ेह-ए-वज़्ज़ुहा जबीनत

जामी

ऐ वाज़ेह-ए-वज़्ज़ुहा जबीनत

जामी

MORE BYजामी

    वाज़ेह-ए-वज़्ज़ुहा जबीनत

    वल्लैल नक़ाब-ए-’अंबरीनत

    आप, जिनकी पेशानी ‘वज़्ज़ुहा’ को ज़ाहिर करती है,

    और ‘वल्लैल’ आपकी खुशबूदार नक़ाब है।

    ताहा रक़मे ज़-आस्तानत

    यासीन ’अलमे बर आस्तीनत

    ‘ताहा’ आपकी ज़िंदगी की कहानी का एक पन्ना है,

    और ‘यासीन’ आपकी आस्तीन का एक रौशन पैग़ाम है।

    जन्नत असरे ज़-फैज़-ए-मेहरत

    दोज़ख़ शररे ज़-ज़ुल्फ़-ए-कीनत

    जन्नत आपकी दया और कृपा की एक निशानी है,

    और जहन्नम आपके क्रोध की गर्मी की बस एक चिंगारी है।

    असरार-ए-वुजूद रा कमाही

    दीद:-ए-नज़रे खूदा-ए-बीनत

    वुजूद के सारे राज़ अस्ल शक्ल में सिर्फ़ आपकी दूर दर्शी निगाहों ने देखे हैं।

    पेश-ए-तू सिपहर चूँ ज़मीं पस्त

    'आलम हम: रूए बर ज़मीनत

    आपके सामने आसमान भी ज़मीन की तरह झुका हुआ है,

    और आपकी धरती पर सारा जहाँ सर झुकाता है।

    तू साहिब-ए-काना कुंतो कंज़न

    आ'यान-ए-रुसुल क़राज़:-ए-चीनत

    आप ही ‘कुन्तु कन्ज़न’ के मालिक हैं,

    बाक़ी सारे पैग़ंबर और वली आपके दामन के कण चुनने वाले हैं।

    चूँ बर तू ख़ुदा आफ़रीं गुफ़्त

    'जामी' चे सज़ा-ए-आफ़रीनत

    जब ख़ुदा ने ही आपकी प्रशंसा की है,

    तो फिर जामी की क्या औक़ात कि वो आपकी प्रशंसा कर सके।

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