अज़ दहानश कस चे गोयद आँ दहाँ मा'लूम नीस्त
अज़ दहानश कस चे गोयद आँ दहाँ मा'लूम नीस्त
हर्फ़ बिसयार अस्त अम्मा हेच अज़ाँ मा'लूम नीस्त
उसके मुँह के बारे में कोई क्या कहे, वो मुँह समझ में ही नहीं आता।
बहुत-सी बातें हैं, मगर उसके बारे में कुछ भी ठीक-ठीक जाना नहीं जा सकता।
तौर-ओ-तर्ज़-ए-रफ़्तन-ए-अहल-ए-जहानम दाग़ कर्द
'आलमे ब-गुज़श्त अज़ीं राह-ओ-निशाँ मा'लूम नीस्त
दुनिया के लोगों के चले जाने के तौर-तरीक़ों ने मुझे उदास कर दिया है।
एक पूरी दुनिया इस राह से गुज़र गई, और पता ही नहीं चला।
ज़ाँ कमर अज़ मन म-पुर्स ऐ हम-नशीं हर दम कि ऊ
फ़ित्नः बरपा कर्द:-ओ-ख़ुद दरमियाँ मा'लूम नीस्त
ऐ हमनशीं! उस कमर के बारे में मुझसे मत पूछो,
वो हर वक़्त फ़ितना खड़ा कर देती है, और ख़ुद दिखाई ही नहीं देती।
हैफ़ बाशद जब्हः-साई गर न-युफ़तंद इत्तिफ़ाक़
गज़ हुजूम-ए-सज्द:-हा आँ आस्ताँ मा'लूम नीस्त
अफ़्सोस होगा अगर माथा झुकाने का मौक़ा न मिल सका,
क्योंकि सज्दों की भीड़ में वो आस्ताना नज़र ही नहीं आ रहा।
तर्ह-ए-'ऐश अफ़्गन कि अब्र-ए-तर हुजूम मा'लूम नीस्त
मानिए' कम-गश्त या'नी आसमाँ मा'लूम नीस्त
’ऐश का इंतज़ार करो, क्योंकि उमडता बादल जमा हो गया है
एक रुकावट कम हो गई है, यानी अब आसमान दिखाई नहीं देता।
मी-रवद ज़ीं ख़ाक-दाँ ख़ल्क़-ओ-नमी-आयद ब-चश्म
गर्द बिसयार अस्त दर रह कारवाँ मा'लूम नीस्त
इस मिट्टी के ढेर (दुनिया) से लोग चले जा रहे हैं और दिखाई नहीं देते,
रास्ते में इतनी धूल है कि कारवाँ नज़र नहीं आता।
ता चे पेश आमद न-दानम 'मीर' रा दर राह-ए-'इश्क़
रोज़गारे शुद कि हाल-ए-आँ जवाँ मा'लूम नीस्त
‘मीर’ को इश्क़ की राह में क्या पेश आया, ये कोई नहीं जानता,
ज़माना हो गया है कि उस जवान का हाल मालूम नहीं हुआ।
- पुस्तक : दिवान-ए-मीर, फ़ारसी (पृष्ठ 48)
- रचनाकार : अफ़ज़ाल अहमद स्य्येद
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