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दो-’आलम ब-काकुल गिरफ़्तार दारी

अज़ीज़ सफ़ीपुरी

दो-’आलम ब-काकुल गिरफ़्तार दारी

अज़ीज़ सफ़ीपुरी

MORE BYअज़ीज़ सफ़ीपुरी

    दो-'आलम ब-काकुल गिरफ़्तार दारी

    ब-हर मू हज़ाराँ सियाहकार दारी

    (या रसूल अल्लाह!) आप दोनों जहाँ को अपनी जुल्फ़ों में क़ैद किए रहते हैं, आपकी हर एक लट में हज़ारों काले-करतूत वाले (गुनहगार) बँधे हुए रहते हैं (यानि दोनों आलम आपकी जुल्फ़ों में गिरफ़्तार हैं और आपकी हर ज़रा-सी लट में हज़ारों गुनहगार उम्मती बँधे रहते हैं)।

    ज़-सर ता-ब-पा रहमते या मोहम्मद

    नज़र जानिब-ए-हर गुनहगार दारी

    मुहम्मद! आप सर से पैर तक सिर्फ़ रहमत ही रहमत हैं, हर गुनहगार की ओर मेहरबानी की नज़र रखते हैं।

    दो अबरू-ए-ख़म चूँ दो शमशीर-ए-'उर्यां

    दो चश्म-ए-फ़ुसूँ-साज़-ओ-'अय्यार दारी

    आपकी दोनों तिर्छी भौंहें नंगी तलवार की तरह हैं, और आपकी दोनों आँखें जादू करने वाली हैं (यानी आप के चश्म-ओ-अब्रू की ऐसी बेपनाह कशिश है कि कोई इस से बच नहीं पाता, जो काफ़िर या मुशरिक हो उसका कुफ़्र-ओ-शिर्क मिट जाता है, और जो मोमिन हो वह तो अपना दिल-ओ-जाँ ही निछावर कर देता है)।

    'अज़ीज़' अल्लाह-अल्लाह कि अज़ कुफ़्र-ए-'इश्क़श

    निहाँ दर तह-ए-ख़िर्क़ः ज़ुन्नार दारी

    अल्लाह, अल्लाह! अज़ीज़! यह भी तो उन्हीं के इश्क़ का इनकार है कि तुम ख़िरक़े के अंदर ज़ुन्नार छिपाए फिरते हो (यानि रिया करते हो)।

    स्रोत :
    • पुस्तक : नग़मातुल उंस फ़ी मजालिसिल क़ुदस (पृष्ठ 327)
    • रचनाकार :शाह हिलाल अहमद क़ादरी
    • प्रकाशन : दारुल एशा'अत ख़ानक़ाह मुजीबिया (2016)
    • संस्करण : First

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