बर सर-ए-बाम जल्वः देह माह-ए-तमाम-ए-ख़्वेश रा
बर सर-ए-बाम जल्वः देह माह-ए-तमाम-ए-ख़्वेश रा
मतला'-ए-आफ़ताब कुन गोश:-ए-बाम-ए-ख़्वेश रा
(या रसूलुल्लाह) अपने पूर्णिमा के चाँद जैसे उज्ज्वल और प्रकाशमान चेहरे का दर्शन ऊँचाई से कराइए,(क्योंकि देखने की तीव्र तड़प है। जैसे चौदहवीं का चाँद आकाश की ऊँचाई पर होकर देखने वालों को साफ़ दिखाई देता है, वैसे ही अपनी बुलंदी से जल्वा फरमाइए। और अपनी छत (बाम) के कोने को अपने उज्ज्वल चेहरे के सूर्योदय का स्थान बना दीजिए,
(यानी जिस तरह सूरज अपने उदय-स्थान से निकलता है, उसी तरह आप अपनी नुबुव्वत की शान के साथ प्रकट हों, क्योंकि आपके आशिक़ नीचे खड़े, आँखें खोले, दर्शन की आस लगाए हुए हैं। इसमें सूरज और चाँद से समानता भी है और आपके सम्मान व अदब की पूरी मर्यादा भी)।
शुद ब-ग़ुलामी-ए-दरत सर्फ़ः-ए-जवानियम हमः
बहर-ए-ख़ुदा तफ़क़्क़ुदे पीर-ए-ग़ुलाम-ए-ख़्वेश रा
आपकी चौखट की गुलामी में मेरी पूरी जवानी बीत गई (यानी आपके इश्क़ और आपकी पैरवी में)। अल्लाह के लिए इस बूढ़े ग़ुलाम पर दया फरमाइए।
बा-हमः मी-रसद ग़मत क़िस्मत-ए-बंदः हम ब-देह
ख़ास ब-दीगराँ म-कुन रहमत-ए-'आम-ए-ख़्वेश रा
आपकी मोहब्बत का दर्द और आपके इश्क़ की जलन सबको मिल रही है,
इस ग़ुलाम को भी उसका हिस्सा अता कीजिए। अपनी आम रहमत को सिर्फ़ दूसरों तक सीमित न रखिए, (यानी आपकी मोहब्बत का दर्द ही दुनिया और आख़िरत की तमाम परेशानियों की दवा है।
बर तू सलाम मी-कुनम गरचे फ़ुरूद याफ़्तम
बा-शरफ़-ए-जवाब-ए-तू क़दर-ए-सलाम-ए-ख़्वेश रा
मैं आपकी महान सेवा में सलाम पेश करता हूँ, हालाँकि आपके जवाब की शरफ़त के मुक़ाबले मेरा सलाम बहुत ही कम है। (यानी मैं कहाँ इस लाइक़, और मेरा सलाम कहाँ इस योग्य फिर भी सलाम पेश करना अपनी ग़ुलामी और वफ़ादारी का तक़ाज़ा समझता हूँ)।
'जामी'-ए-तिश्नः-लब कि शुद ख़ाक ज़-शौक़ ला'ल-ए-तू
बादः ब-ख़ूर-ओ-बर फ़िशाँ जुरअ':-ए-जाम-ए-ख़्वेश रा
प्यासे होंठों वाला जामी आपके लाल होंठों की चाह में मिट्टी होता जा रहा है
(यानी निर्जीव-सा हो गया है)। अपने जाम से एक घूँट लेकर उस पर छिड़क दीजिए। (लाल होंठों से प्रियतम के सुरख़ होंठ मुराद हैं, और हज़रत जामी ने यही उपमा दी है। इसका अर्थ यही है कि जिस इलाही प्रेम, एकता और मारिफ़त के जाम से आप स्वयं सैराब हुए हैं, उसका बस एक क़तरा यानी आपका जूठा इस पर डाल दीजिए, तो इसे नई ज़िंदगी मिल जाएगी।
- पुस्तक : नग़मातुल उंस फ़ी मजालिसिल क़ुदस (पृष्ठ 134)
- रचनाकार :शाह हिलाल अहमद क़ादरी
- प्रकाशन : दारुल एशा'अत ख़ानक़ाह मुजीबिया (2016)
- संस्करण : First
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