दर वफ़ा-ए-इश्क़-ए-तू मशहूर-ए-ख़ूबानम चु शम्अ'
दर वफ़ा-ए-'इश्क़-ए-तू मशहूर-ए-ख़ूबानम चु शम्अ'
शब-नशीन-ए-कू-ए-सरबाज़ान-ओ-रिंदानम चु शम्अ'
मैं हसीनों की महफ़िल में शमा की तरह तेरे इश्क़ की वफ़ादारी में मशहूर हूँ।
मैं शमा की तरह सर की बाज़ी लगाने वाला और रिंदों की गली में सारी रात बैठने वाला हूँ।
रिश्त:-ए-सब्रम ब-मिक़्राज़-ए-ग़मत ब-बुरीदः शुद
हम-चुनाँ दर आतिश-ए-हिज्र-ए-तु सोज़ानम चु शम्अ'
मेरे सब्र का धागा तेरे ग़म की क़ैंची से कट गया है, तेरे हिज्र की आग में उसी तरह मैं शमा की तरह जल रहा हूँ।
सरफ़राज़म कुन शबे अज़ वस्ल-ए-ख़ुद ऐ माह-रू
ता-मुनव्वर गर्दद अज़ दीदारत ऐवानम चु शम्अ'
ऐ चाँद-से चेहरे वाले! किसी रात अपने वस्ल से मुझे कामयाब कर,
ताकि शमा की तरह तेरे दीदार से मेरा घर रौशन हो जाए।
हम-चु सुब्हम यक-नफ़स बाक़ीस्त ब-दीदार-ए-तू
चेहरः ब-नुमा दिल-बरा ता जाँ बयफ़शानम चु शम्अ'
तेरे दीदार के बिना मेरा बस एक साँस बाक़ी है, ऐ सुब्ह की तरह!
ऐ दिलबर, चेहरा दिखा दे, ताकि शमा की तरह जान क़ुर्बान कर दूँ।
आतिश-ए-मेहर-ए-तुरा 'हाफ़िज़' 'अजब दर सर-गिरफ़्त
आतिश-ए-दिल के ब-आब-ए-दीद: ब-निशानम चू शम्अ'
तेरे इश्क़ की आग हाफ़िज़ के सर में अजीब तरह से लग गई है,
शमा की तरह दिल की इस आग को आँखों के पानी से भला कब बुझा सकता हूँ?
- पुस्तक : दीवान-ए-हाफ़िज़ (पृष्ठ 269)
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