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दिलम दर हल्क़ः-ए-ज़ुल्फ़त असीर अस्त

नस्र फुलवारवी

दिलम दर हल्क़ः-ए-ज़ुल्फ़त असीर अस्त

नस्र फुलवारवी

MORE BYनस्र फुलवारवी

    दिलम दर हल्क़ः-ए-ज़ुल्फ़त असीर अस्त

    तनम अज़ ज़ो'फ़ चूँ मूयत हक़ीर अस्त

    मेरा दिल तुम्हारी ज़ुल्फ़ों के घेरे में कैद है, और मेरा शरीर कमज़ोरी की वजह से तुम्हारे बाल की तरह पतला हो गया है। (ये इश्क़ की अवस्था का वर्णन है, और संबोधन रसूलुल्लाह की ओर है।)

    ब-सिद्क़-ए-सीनः-ए-बू-बक्र जूयम

    ख़ुलूस-ए-'इश्क़ कू पीरान-ए-पीरस्त

    हज़रत अबू बक्र के सीने में जो सिद्क़ (सच्चाई और निष्ठा) की लहरें उठती हैं, उसी के सदके मैं ख़ालिस इश्क़ की तलाश करता हूँ, क्योंकि वे हमारे पीरों के भी पीर हैं। (यहाँ ‘पीरान-ए-पीर’ कहने का संकेत उस विशेष बात की ओर है कि सिलसिला क़ादिरिया क़मीसिया वारिसिया मुजीबिया के सरदार हज़रत मौलाना सैयद मोहम्मद वारिस रसूलनुमा बनारसी को बारगाह-ए-नबवी से ये इरशाद हुआ था—‘शैख़ुका-अबू-बक्र’, यानी तुम्हारे शैख़-ए-तरीक़त अबू बक्र हैं। इसी आधार पर हज़रत ‘नस्र’ ने हज़रत सिद्दीक़-ए-अकबर रज़ि० को पीरान-ए-पीर कहा है।)

    न-बाशद देव रहज़न दर कमीनम

    'उमर दर किश्वर-ए-दिल चूँ अमीर अस्त

    हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ि० जब दिल के देश के अमीर हैं, तो शैतान जैसा डाकू मेरी घात में नहीं रह सकता, (यानी मुझे नुक़्सान नहीं पहुँचा सकता)।

    ब-'उसमाँ 'इस्मत अज़ हर इस्म ख़्वाहम

    कि पैग़म्बर-ए-मा रा वज़ीर अस्त

    मैं हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ि० के सदक़े मैं हर गुनाह से अपनी हिफ़ाज़त चाहता हूँ, क्योंकि वे हमारे पैग़ंबर के वज़ीर हैं।

    'अली मौला-ए-'आलम शुद दलीलश

    हदीस-ए-मंज़िल-ए-ख़ुम्म-ए-ग़दीर अस्त

    हज़रत अली मुर्तज़ा कर्रमल्लाहु वज्हहु तो सारे जहाँ के मौला हैं। ग़दीर-ए-ख़ुम की हदीस “जिसका मैं मौला हूँ, अली भी उसके मौला हैं” इस बात की गवाह है।

    चिरा 'इरफ़ान-ए-मौरूसी न-याबम

    चु मौलाना-ए-वारिस दस्तगीर अस्त

    मुझे विरासत में मिला हुआ आध्यात्मिक ज्ञान (इरफ़ान-ए-मौरूसी) क्यों प्राप्त हो, जब मौलाना वारिस मेरे मददगार हैं।

    ब-हक़ ब-गुज़ाश्तम हर कार-ए-ख़ुद 'नस्र'

    कि ख़ुश मौला-ए-मा-ओ-ख़ुश नसीर अस्त

    ‘नस्र’! मैंने अपना हर काम हक़ ताला के सुपुर्द कर दिया है। वही सबसे बेहतर मालिक है और वही सबसे अच्छा मददगार है।

    (ये ग़ज़ल दर-अस्ल नबी करीम की प्रशंसा के साथ-साथ ख़ुलफ़ा-ए-राशिदीन की भी प्रशंसा में है और अहल-ए-हक़ सूफ़िया के अक़ीदे की व्याख्या करती है।)

    स्रोत :
    • पुस्तक : नग़मातुल उंस फ़ी मजालिसुल क़ुदस (पृष्ठ 167)
    • रचनाकार : शाह हेलाह अहमद क़ादरी
    • प्रकाशन : दारुल एशा'अत ख़ानक़ाह मुजीबिया (2016)
    • संस्करण : First

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