दीवान:-अम अज़ ज़ुल्फ़-ए-समन बू-ए-मोहम्मद
दीवान:-अम अज़ ज़ुल्फ़-ए-समन बू-ए-मोहम्मद
सौदा ज़द:-अम अज़ सर-ए-गेसू-ए-मोहम्मद
मैं हज़रत मोहम्मद की ज़ुल्फ़ों से उठने वाली समन-सी ख़ुशबू का दीवाना हूँ, मैं हज़रत मोहम्मद के ख़याल-ए-गेसू में मदहोश और बे-क़रार हूँ।
वीरानः-ओ-सहरा नकुशायद दिलम ऐ 'इश्क़
ब-गुज़ार कि मायम-ओ-सर कू-ए-मोहम्मद
ऐ इश्क़! मेरे दिल को वीराने और सहरा में भी सुकून नहीं मिलता, मुझे यूँ ही छोड़ दे कि मैं रहूँ और सामने हज़रत मोहम्मद की गली हो।
हर चंद ब-तशरीफ़-ए-जमालश न-रसीदेम
चूँ वेस न-दारेम ब-जुज़ हू-ए-मोहम्मद
हालाँकि मैं उनके रू-ए-जमाल के दीदार से मुशर्रफ़ नहीं हुआ, मगर हज़रत ओवैस क़रनी की तरह मुझे उनकी मोहब्बत तो नसीब है।
ख़ुश ताले' आँ गोश:-नशीं हरम-ए-'इश्क़
दिल-बस्तः ब-ताक़ ख़म-ए-अब्रू-ए-मोहम्मद
ख़ुश-नसीब है हरम-ए-इश्क़ का वो गोशा-नशीं, जो हज़रत मोहम्मद के ख़म-ए-अब्रू के मेहराब से दिल लगाए बैठा है।
अज़ ज़ुल्मत-ए-'इस्याँ चे ग़म ऐ 'फ़र्द' ब-महशर
ताबान-ए-शफ़ा'अत चु शवद रू-ए-मोहम्मद
ज़ुल्मत-ए-इस्याँ के महशर में मुझे क्या ग़म है ऐ फ़र्द, जब शफ़ाअत के लिए हज़रत मोहम्मद का रू-ए-मुनव्वर रौशन है।
- पुस्तक : नग़मातुल उंस फ़ी मजालिसिल क़ुदस (पृष्ठ 198)
- रचनाकार : शाह हेलाह अहमद क़ादरी
- प्रकाशन : दारुल एशा'अत ख़ानक़ाह मुजीबिया (2016)
- संस्करण : First
Additional information available
Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.
About this sher
rare Unpublished content
This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.