Font by Mehr Nastaliq Web

गाह दर दिल साज़-ओ-गह दर दीद: जा

जामी

गाह दर दिल साज़-ओ-गह दर दीद: जा

जामी

MORE BYजामी

    गाह दर दिल साज़-ओ-गह दर दीद: जा

    हर दो जाए तुस्त या-बदरुददुजा

    कभी आप दिल में बसते हो और कभी आँखों में,

    दोनों ही जगहों पर बस आपही की हुक्मरानी है, बद्रुद्दुजा।

    तूबा आमद क़द्द-ए-तू वक़्त-ए-ख़िराम

    गर ख़िरामी सू-ए-मा तूबा लना

    चलते हुए आपका क़द कितना संतुलित और ख़ूबसूरत लगता है,

    अगर हमारी तरफ़ भी एक क़दम रख दो, तो क्या ही बात हो।

    मन न-गोयम बन्द:-ए-ख़्वेशम शुमार

    नीस्त हुक्म-ए-बन्द: रा बर पादशाह

    मैं नहीं कहता कि मुझे अपना बंदा समझो,

    भला ग़ुलाम कभी बादशाह को हुक्म कैसे दे सकता है।

    पर्दा ब-कुशा चूँ नमूदी आँ दो ज़ुल्फ़

    ता रुख़त बीनेम बा'द अज़ 'उम्र-हा

    पर्दा उठा दो और अपनी ज़ुल्फ़ का दीदार करा दो,

    ताकि मैं तुम्हारे हुस्न-ओ-जमाल का दीदार कर सकूँ।

    गर सर-ए-'जामी' जुदा-साज़ी ब-तेग़

    बेह कि साज़ी ज़ास्तान-ए-ख़ुद जुदा

    अगर जामी का सर तलवार से अलग करना ही मक़सूद हो,

    तो इससे बेहतर है कि उसे अपनी चौखट से अलग कर दिया जाए।

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY
    बोलिए