गाह दर दिल साज़-ओ-गह दर दीद: जा
हर दो जाए तुस्त या-बदरुददुजा
कभी आप दिल में बसते हो और कभी आँखों में,
दोनों ही जगहों पर बस आपही की हुक्मरानी है, ऐ बद्रुद्दुजा।
तूबा आमद क़द्द-ए-तू वक़्त-ए-ख़िराम
गर ख़िरामी सू-ए-मा तूबा लना
चलते हुए आपका क़द कितना संतुलित और ख़ूबसूरत लगता है,
अगर हमारी तरफ़ भी एक क़दम रख दो, तो क्या ही बात हो।
मन न-गोयम बन्द:-ए-ख़्वेशम शुमार
नीस्त हुक्म-ए-बन्द: रा बर पादशाह
मैं य नहीं कहता कि मुझे अपना बंदा समझो,
भला ग़ुलाम कभी बादशाह को हुक्म कैसे दे सकता है।
पर्दा ब-कुशा चूँ नमूदी आँ दो ज़ुल्फ़
ता रुख़त बीनेम बा'द अज़ 'उम्र-हा
पर्दा उठा दो और अपनी ज़ुल्फ़ का दीदार करा दो,
ताकि मैं तुम्हारे हुस्न-ओ-जमाल का दीदार कर सकूँ।
गर सर-ए-'जामी' जुदा-साज़ी ब-तेग़
बेह कि साज़ी ज़ास्तान-ए-ख़ुद जुदा
अगर जामी का सर तलवार से अलग करना ही मक़सूद हो,
तो इससे बेहतर है कि उसे अपनी चौखट से अलग कर दिया जाए।
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