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Sufinama

हर चंद तु शाह-ओ-मा गदाएम

जामी

हर चंद तु शाह-ओ-मा गदाएम

जामी

हर चंद तु शाह-ओ-मा गदाएम

दामन-म-फ़शाँ कि मुब्तलाएम

अगर चह आप बादशाह और हम आपके ग़ुलाम हैं,

लेकिन ग़ुलाम जानकर हमसे दामन छुड़ाइए क्योंकि हम आपके इश्क़ में मुब्तला हैं।

ता दाग़-ए-ग़ुलामी तु दारेम

हर जा कि रवेम बादशाहेम

जब हम पर आपकी गुलामी का दाग लग गया है

तो हम जहां भी होंगे बादशाह होंगे (यानि आपकी गुलामी की बुनियाद पर इज़्ज़त और मर्तबे के लायक होंगे)।

अज़ तौक़-ए-सगाँ म-दार महरूम

गर ख़िल'अत-ए-ख़ास रा नशाएम

अगर ख़िल'अत-ए-ख़ास के लायक हम को नहीं समझते हैं

तो कुत्तों के पट्टों से तो महरूम करें (वही हमारे गले में डाल दें तो हमारे लिए ख़िल'अत-ए-ख़ास से कम होगा)।

'जामी' ब-जफ़ा-ओ-जूद ख़ू-गीर

दानी कि दर-ख़ुर वफ़ाएम

जामी! महबूब की जफ़ा का आदी हो जा।

तुझ को मालूम है कि हम लोग उन लोगों में नहीं जिनसे वफ़ा की जाती है (यानि इश्क़ में खुद को इस लायक नहीं समझना चाहिए कि माशूक़ तवज्जोह-ए-ख़ास करे, क्योंकि इश्क़ इन सब बातों से मावरा है। महबूब जो भी सलूक़ करे, जज़्बा-ए-इश्क़ में कमी नहीं होनी चाहिए)।

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हाजी महबूब अ'ली

हाजी महबूब अ'ली

स्रोत :
  • पुस्तक : नग़मातुल उंस फ़ी मजालिसिल क़ुदस (पृष्ठ 244)
  • रचनाकार :शाह हिलाल अहमद क़ादरी
  • प्रकाशन : दारुल एशा'अत ख़ानक़ाह मुजीबिया (2016)
  • संस्करण : First

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