Sufinama

ईं क़दर मस्तम कि अज़ चश्मम शराब आयद बरूँ

मुल्ला जामी

ईं क़दर मस्तम कि अज़ चश्मम शराब आयद बरूँ

मुल्ला जामी

MORE BYमुल्ला जामी

    ईं क़दर मस्तम कि अज़ चश्मम शराब आयद बरूँ

    वज़ दिल-ए-पुर-हस्रतम बू-ए-कबाब आयद बरूँ

    मैं इतना मस्त हूँ कि मेरी आँखों से शराब उबल रही है

    मेरे दिल की चाहतों से कबाब की ख़ुश्बू रही है

    यार-ए-मन दर नीम-शब गर बे-नक़ाब आयद बरूँ

    ज़ाहिद-ए-सद-साल: अज़ मस्जिद ख़राब आयद बरूँ

    मेरा यार अगर आधी रात को बे-नक़ाब बाहर आता है

    तो सौ साल का धर्म परायण व्यक्ति भी मस्जिद से शराब-ख़ाने तक जाता है

    सुब्ह-दम चू रुख़ नमूदी शुद नमाज़-ए-मन क़ज़ा

    सज्द: कै बाशद रवा चूँ आफ़्ताब आयद बरूँ

    सुब्ह जब तू ने अपना जल्वा दिखाया तो मेरी नमाज़ छूट गई

    क्योंकि सूरज उगने के बा’द छूटी नमाज़ें ही पढ़ी जाती हैं

    गुफ़्तमश बर आ'रिज़त ईं क़तरःहा-ए-ज़ाल: चीस्त

    ज़ेर-ए-लब खन्दीद-ओ-गुफ़्त अज़ गुल गुलाब आयद बरूँ

    मैं ने उस से कहा कि तुम्हारे गालों पर ये बर्फ़ की बूँदें कैसी हैं

    उसने हल्के से मुस्कराकर कहा कि ये बूँदें गुलाब से टपक रही हैं

    क़तर:-ए-दर्द-ए-दिल-ए-'जामी' ब-दरिया दर फ़िगन

    सीन:-सोज़ाँ दिल-तपाँ माही ज़े-आब आयद बरूँ

    ‘जामी’ के दर्द-ए-दिल की बूँद को दरिया में डाल दो

    सीने में जलन, दिल में आग लिए मछली जल से बाहर रही है

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