Sufinama

कफ़िर-ए-इ’श्क़म मुसलमानी मरा दरकार नीस्त

अमीर ख़ुसरौ

कफ़िर-ए-इ’श्क़म मुसलमानी मरा दरकार नीस्त

अमीर ख़ुसरौ

MORE BYअमीर ख़ुसरौ

    कफ़िर-ए-इ’श्क़म मुसलमानी मरा दरकार नीस्त

    हर रग-ए-मन तार गश्त: हाजत-ए-ज़ुन्नार नीस्त

    मैं इ’श्क़ में काफ़िर हो गया हूँ, मुझे मुस्लमानी दरकार नहीं

    मेरी हर रग धागे की तरह है मुझे अब जनेऊ की ज़रूरत नहीं है

    शाद बाश दिल कि फ़र्दा बर-सर-ए-बाज़ार-ए-इ'श्क़

    वा'दः-ए-क़त्लस्त गरचे वा'दः-ए-दीदार नीस्त

    दिल तू ख़ुश हो जा कि कल बाज़ार-ए-इ’श्क़ में

    क़त्ल की ख़ुश-ख़बरी है, अगरचे दर्शन का वा’दा नहीं है

    मा ग़रीबाँ रा तमाशा-ए-चमन दरकार नीस्त

    दाग़हा-ए-सीन:-ए-मा कम-तर अज़ गुलज़ार नीस्त

    हम ग़रीबों को बाग़ के सैर की ज़रूरत नहीं है

    हमारे सीने के दाग़ बाग़ से हर्गिज़ कमतर नहीं हैं

    ना-ख़ुदा दर कश्ती-ए-मा गर न-बाशद गो म-बाश

    मा ख़ुदा दारेम मा रा ना-ख़ुदा दरकार नीस्त

    अगर हमारी कश्ती का नाख़ुदा (मल्लाह) नहीं है तो हो

    मेरे पास तो ख़ुदा है ही हमें नाख़ुदा की ज़रूरत नहीं

    ख़ल्क़ मी-गोयद कि 'ख़ुसरौ' बुत-परस्ती मी-कुनद

    आरे आरे मी-कुनेम बा ख़ल्क़-ओ-आ'लम कार नीस्त

    लोग कहते हैं कि ‘ख़ुसरौ’ बुत-परस्ती करता है

    हाँ हाँ हम करते हैं दुनिया से कोई मत्लब नहीं

    स्रोत :
    • पुस्तक : नग़्मात-ए-सिमा (पृष्ठ 48)
    • प्रकाशन : नूरुलहसन मौदूदी साबरी (1935)

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