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लख़्त-ए-दिल हर शब ब-दामानम नमी-दानम चिरा

मीर तक़ी मीर

लख़्त-ए-दिल हर शब ब-दामानम नमी-दानम चिरा

मीर तक़ी मीर

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    लख़्त-ए-दिल हर शब ब-दामानम नमी-दानम चिरा

    हर सहर सर-ए-दर गिरेबानम नमी-दानम चिरा

    हर रात दिल के टेकड़े मेरे दामन में (है) नहीं जानता क्यूँ

    हर सुह्ब मेरा सर मेरे गरेबान में (है) नहीं जानता क्यूँ

    बाब-ए-लुत्फ़श नीस्तम लेकिन चु अज़ रह मी-रसम

    बर दर-ए-ऊ दैर मी-मानम नमी-दानम चिरा

    उस के लुत्फ़ के क़ाबिल नहीं हूँ लेकिन जब राह से पहुँचता हूँ

    उसके दरवाज़े पर देर तक (खड़ा) रहता हूँ, नहीं जानता क्यूँ

    चारः-ए-मन दिलरुबा याँ जुमलः मी-दानंद लेक

    कस नमी-गोयम कि मी-दानम नमी-दानम चिरा

    सारे दिलबर मेरा इलाज जानते हैं लेकिन

    कोई नहीं कहता कि मैं जानता हूँ, नहीं जानता क्यूँ

    ने अज़ाँ सू रंजिशे ने पेचिशे ने काविशे

    ख़ुद-ब-ख़ुद ख़ातिर परेशानम नमी-दानम चिरा

    उस तरफ़ से कोई रंजिश, कोई उलझन, कोई ख़लिश

    ख़ुद ब-ख़ुद परेशान हूँ, नहीं जानता क्यूँ

    बा-वुजूद-ए-ना-उमीदी गिर्यः चूँ सर मी-कुनम

    मी-रसद दिल ब-मिझ़गानम नमी-दानम चिरा

    ना-उमीदी के बावुजूद जब रोना शुरू करता हूँ

    दिल मेरी पलकों तक जाता है, नहीं जानता क्यूँ

    ग़ुरूर-ए-हुस्न-ए-दारद ज़ीं सबब पर्दाश नीस्त

    मन कि ज़ब्त-ए-ख़्वेश न-तवानम नमी-दानम चिरा

    उसे हुस्न पर ग़ुरूर है और इस वजह से उसको पर्वा नहीं है

    मैं नहीं जानता कि मैं क्यूँ ख़ुद को सँभाल नहीं सकता

    गिर्यः-ए-मन गरचे मी-दानम न-दारद हासिले

    बाज़ सुब्ह-ओ-शाम गिर्यानम नमी-दानम चिरा

    गरचे मैं जानता हूँ कि मेरे रोने का कोई हासिल नहीं है

    फिर भी सुब्ह-ओ-शाम रोता हूँ, नहीं जानता क्यूँ

    मैल-ए-ऊ इम्काँ न-दारद सू-ए-'आशिक़ वीं कि मन

    बा-हज़ाराँ नाम मी-ख़्वानम नमी-दानम चिरा

    आशिक़ की तरफ़ उसका मायल होना इम्कान नहीं रखता और ये कि मैं

    उसे हज़ारों नाम से पुकारता हूँ, नहीं जानता क्यूँ

    मुद्दते शुद 'मीर' मिझ़गानश ज़-मन बर्गश्तः-अस्त

    ख़ार ख़ारे हस्त बा-जानम नमी-दानम चिरा

    मुद्दत हुई है ‘मीर’ उसकी नज़र मुझसे फिरी हुई हैं

    मेरी जान को बे-चैनी है, नहीं जानता क्यूँ

    स्रोत :
    • पुस्तक : दिवान-ए-मीर, फ़ारसी (पृष्ठ 10)
    • रचनाकार : अफ़ज़ाल अहमद स्य्येद

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