लख़्त-ए-दिल हर शब ब-दामानम नमी-दानम चिरा
लख़्त-ए-दिल हर शब ब-दामानम नमी-दानम चिरा
हर सहर सर-ए-दर गिरेबानम नमी-दानम चिरा
हर रात दिल के टेकड़े मेरे दामन में (है) नहीं जानता क्यूँ
हर सुह्ब मेरा सर मेरे गरेबान में (है) नहीं जानता क्यूँ
बाब-ए-लुत्फ़श नीस्तम लेकिन चु अज़ रह मी-रसम
बर दर-ए-ऊ दैर मी-मानम नमी-दानम चिरा
उस के लुत्फ़ के क़ाबिल नहीं हूँ लेकिन जब राह से पहुँचता हूँ
उसके दरवाज़े पर देर तक (खड़ा) रहता हूँ, नहीं जानता क्यूँ
चारः-ए-मन दिलरुबा याँ जुमलः मी-दानंद लेक
कस नमी-गोयम कि मी-दानम नमी-दानम चिरा
सारे दिलबर मेरा इलाज जानते हैं लेकिन
कोई नहीं कहता कि मैं जानता हूँ, नहीं जानता क्यूँ
ने अज़ाँ सू रंजिशे ने पेचिशे ने काविशे
ख़ुद-ब-ख़ुद ख़ातिर परेशानम नमी-दानम चिरा
उस तरफ़ से न कोई रंजिश, न कोई उलझन, न कोई ख़लिश
ख़ुद ब-ख़ुद परेशान हूँ, नहीं जानता क्यूँ
बा-वुजूद-ए-ना-उमीदी गिर्यः चूँ सर मी-कुनम
मी-रसद दिल ब-मिझ़गानम नमी-दानम चिरा
ना-उमीदी के बावुजूद जब रोना शुरू करता हूँ
दिल मेरी पलकों तक आ जाता है, नहीं जानता क्यूँ
ऊ ग़ुरूर-ए-हुस्न-ए-दारद ज़ीं सबब पर्दाश नीस्त
मन कि ज़ब्त-ए-ख़्वेश न-तवानम नमी-दानम चिरा
उसे हुस्न पर ग़ुरूर है और इस वजह से उसको पर्वा नहीं है
मैं नहीं जानता कि मैं क्यूँ ख़ुद को सँभाल नहीं सकता
गिर्यः-ए-मन गरचे मी-दानम न-दारद हासिले
बाज़ सुब्ह-ओ-शाम गिर्यानम नमी-दानम चिरा
गरचे मैं जानता हूँ कि मेरे रोने का कोई हासिल नहीं है
फिर भी सुब्ह-ओ-शाम रोता हूँ, नहीं जानता क्यूँ
मैल-ए-ऊ इम्काँ न-दारद सू-ए-'आशिक़ वीं कि मन
बा-हज़ाराँ नाम मी-ख़्वानम नमी-दानम चिरा
आशिक़ की तरफ़ उसका मायल होना इम्कान नहीं रखता और ये कि मैं
उसे हज़ारों नाम से पुकारता हूँ, नहीं जानता क्यूँ
मुद्दते शुद 'मीर' मिझ़गानश ज़-मन बर्गश्तः-अस्त
ख़ार ख़ारे हस्त बा-जानम नमी-दानम चिरा
मुद्दत हुई है ‘मीर’ उसकी नज़र मुझसे फिरी हुई हैं
मेरी जान को बे-चैनी है, नहीं जानता क्यूँ
- पुस्तक : दिवान-ए-मीर, फ़ारसी (पृष्ठ 10)
- रचनाकार : अफ़ज़ाल अहमद स्य्येद
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