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मर्हबा ऐ पेक-ए-मुश्ताक़ाँ ब-देह पैग़ाम-ए-दोस्त

हाफ़िज़

मर्हबा ऐ पेक-ए-मुश्ताक़ाँ ब-देह पैग़ाम-ए-दोस्त

हाफ़िज़

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    मर्हबा पेक-ए-मुश्ताक़ाँ ब-देह पैग़ाम-ए-दोस्त

    ता कनम जाँ अज़ सर-ए-रग़बत फ़िदा-ए-नाम-ए-दोस्त

    स्वागत है आशिक़ों के दूत! दोस्त का पैग़ाम सुना दे, ताकि मैं शौक़ से दोस्त के नाम पर अपनी जान क़ुर्बान कर दूँ।

    वालिहः-ओ-शैदास्त दायम हम-चु बुलबुल दर क़फ़स

    तूती-ए-तब’अम ज़-शौक़-ए-शक्कर-ओ-बादाम-ए-दोस्त

    हमेशा दीवाना और आशिक़ है पिंजरे में बुलबुल की तरह, मेरी तबियत का तोता दोस्त के बादाम और शकर के शौक़ में।

    ज़ुल्फ़-ए-ऊ दामस्त-ओ-ख़ालश दानः-ए-आँ-दाम-ओ-मन

    बर उमीद-ए-दान: उफ़्तादम अंदर दाम-ए-दोस्त

    उसकी ज़ुल्फ़ जाल है और उस जाल का दाना उसका तिल है, और मैं उसी दाने की चाह में दोस्त के जाल में फँस गया हूँ।

    सर ज़-मस्ती बर न-गीरद ता ब-सुब्ह-ए-रोज़-ए-हश्र

    हर कि चूँ मन दर अज़ल यक जुर्अः' ख़ुर्द अज़ जाम-ए-दोस्त

    क़यामत के दिन की सुब्ह तक मस्ती से सर नहीं उठा सकता, हर वो शख़्स जिसने मेरी तरह अज़ल में दोस्त के जाम से एक घूँट पी लिया।

    मन नविश्तम नामः-ए-अज़ शर्ह-ए-हाल-ए-ख़ुद वले

    दर्द-ए-सर बाशद नुमूदन बेश अज़ीं इबराम-ए-दोस्त

    मैं ने अपने हाल विस्तार से एक ख़त में लिखा है लेकिन, इस से ज़्यादा बार बार कहना दोस्त के लिए सर दर्द बन जाएगा।

    मैल-ए-मन सू-ए-विसाल-ओ-क़स्द-ए-ऊ सू-ए-फ़िराक़

    तर्क-ए-काम-ए-ख़ुद गिरफ़तम ता बर-आयद काम-ए-दोस्त

    मेरा झुकाव मिलन की ओर है और उसका इरादा जुदाई की तरफ़, मैंने अपना मक़सद छोड़ दिया ताकि दोस्त का मक़सद पूरा हो जाए।

    गर देहद दस्तम कशम दर दीदः हम-चुँ तूतिया

    ख़ाक-ए-राह-ए-काँ मुशर्रफ़ गर्दद अज़ अक़दाम-ए-दोस्त

    अगर मौक़ा मिले तो आँखों में सुर्मे की तरह लगा लूँ, उस रास्ते की धूल को जो दोस्त के क़दमों से पवित्र हुई है।

    'हाफ़िज़' अंदर दर्द-ओ-ग़म मी-सोज़-ओ-बा-दरमाँ म-साज़

    ज़ाँ कि दर्माने न-दारद दर्द-ए-बे-दरमान-ए-दोस्त

    हाफ़िज़! दर्द और ग़म में जलता रह इलाज की कोशिश कर, क्यूँकि दोस्त के ला-इलाज दर्द-ए-सर का कोई इलाज नहीं होता।

    स्रोत :
    • पुस्तक : दीवान-ए-हाफ़िज़ (पृष्ठ 104)
    • रचनाकार :हाफ़िज़ शीराज़ी
    • प्रकाशन : प्रोग्रेसिव बुक्स, लाहाैर
    • पुस्तक : दीवान-ए-हाफ़िज़ (पृष्ठ 98)

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