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रोज़े कि ’आसियान-ए-उमम रा निदा कुनंद

फ़र्द फुलवारवी

रोज़े कि ’आसियान-ए-उमम रा निदा कुनंद

फ़र्द फुलवारवी

MORE BYफ़र्द फुलवारवी

    रोचक तथ्य

    1.از بہر پاس خاطر اولاد فاطمہ آنانکہ خاک را بہ نظر کیمیا کنند 2. آنانکہ حل عقدۂ مشکل کنند کاش آیا بود کہ گوشۂ چشمے بہ ما کنند (ان دونوں اشعار کا دوسرا مصرعہ حافظ کا ہے)۔

    रोज़े कि 'आसियान-ए-उमम रा निदा कुनंद

    आँ-हा निगाह सू-ए-रसूल-ए-ख़ुदा कुनंद

    जिस दिन उम्मत के गुनहगारों को पुकारा जाएगा, तो सबकी निगाहें रसूल-ए-ख़ुदा पर होंगी, और हर कोई उनके क़दमों पर अपनी जान निछावर करने में फ़ख़्र महसूस करेगा।

    गोयन्द आँ शहे तु कि शाहाँ बरा-ए-फ़ख़्र

    जाँ रा ब-ख़ाक-ए-पा-ए-सगानत फ़िदा कुनंद

    लोग कहेंगे कि आप तो ऐसे बादशाह हैं कि सारे बादशाह भी आपके कुत्तों की ख़ाक-ए-क़दम पर अपनी जान क़ुर्बान करने में फ़ख़्र समझते हैं।

    हाँ वक़्त-ए-'आजिज़ीस्त ख़ुदा रा शिफ़ा'अते

    आँ-कि ख़ाक-ए-पा-ए-तुरा तूतिया कुनंद

    हाँ ये बड़ी आज़िज़ी और बेबसी का समय है, ख़ुदा के वास्ते शिफ़ाअत फ़रमाइए। आपकी वो शान है कि लोग आपकी ख़ाक-ए-पा को आँखों का सुर्मा बनाते हैं।

    रहमे ब-हाल-ए-ख़स्तः-दिलाँ कुन कि जुर्म-हा

    तर्सम ब-पेश हज़रात ईज़िद चहा कुनंद

    टूटे हुए दिलों पर रहम फ़रमाइए। मुझे डर है कि मेरे तमाम गुनाह

    ख़ुदा-ए-पाक के सामने मुझे बहुत शर्मिंदा कर देंगे।

    दारम बसे गुनाह-ओ-न दारेम ता'अते

    बाशद कि लुत्फ़-हा-ए-तु कारम रवा कुनंद

    हमारे गुनाह बहुत हैं और इबादत बहुत कम। अगर आपकी मेहरबानियाँ हो जाएँ तो हमारे सारे काम सँवर जाएँ।

    मा दाद-ख़्वाह आमदः-ऐम 'उज़्र मा पज़ीर

    सज्द: बरदरत हमः शाह-ओ-गदा कुनंद

    हम फ़रियाद लेकर हाज़िर हुए हैं, हमारा उज़्र क़ुबूल फ़रमाइए।

    आपके दर पर तो बादशाह और ग़रीब सब सज्दा-रेज़ होते हैं, यानी सभी आपके मोहताज हैं।

    दस्तम ब-गीर-ओ-पेश-ए-ख़ुदा 'उज़्र मा पज़ीर

    आरज़ू-ए-ख़ाक-ए-दरत अंबिया कुनंद

    मेरी दस्तगीरी फ़रमाइए और ख़ुदा के यहाँ मेरी मोआफ़ी क़ुबूल कराइए।

    आपकी ख़ाक-ए-दर की तमन्ना तो अंबिया भी करते हैं।

    अज़ बहर-ए-पास ख़ातिर-ए-औलाद-ए-फ़ातिमा

    नाँकि ख़ाक रा ब-नज़र कीमिया कुनंद

    या रसूलुल्लाह औलाद-ए-फ़ातिमा के वास्ते तवज्जोह फ़रमाइए,

    क्यूँकि हम वही लोग हैं जिनकी नज़र से ख़ाक भी कीमिया बन जाती है।

    नाँकि हल्ल-ए-'उक़्दः-ए-मुश्किल कुनंद काश

    आया बुवद कि गोशः-ए-चश्मे ब-मा कुनंद

    जो लोग मुश्किल गिरहें खोल देते हैं, काश वो (रसूलुल्लाह)

    हम पर भी एक निगाह-ए-करम फ़रमा दें।

    बाशद कि अज़ 'इनायत-ओ-अल्ताफ़ 'फ़र्द' रा

    अज़ दाम शर्मसारी-ओ-ख़जलत रिहा कुनंद

    काश! आप अपनी लुत्फ़-ओ-इनायत से हमें शर्मिंदगी और नदामत से

    नजात अता फ़रमा दें।

    स्रोत :
    • पुस्तक : बिहार की फ़ारससी शाइ’री के फ़रोग़ में शो’रा-ए-फुलवारी का हिस्सा (पृष्ठ 57)
    • रचनाकार : मोहम्मद रिज़वानुल्लाह
    • प्रकाशन : पाकीज़ा ऑफ़सेट प्रेस, मोहम्मदपुर, शाह गंज़, पटना (2007)
    • संस्करण : First
    • पुस्तक : नग़मातुल उंस फ़ी मजालिसिल क़ुदस (पृष्ठ 190)
    • रचनाकार :शाह हिलाल अहमद क़ादरी
    • प्रकाशन : दारुल एशा'अत ख़ानक़ाह मुजीबिया (2016)
    • संस्करण : First

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