Font by Mehr Nastaliq Web

नफ़्हः-ए-बाद-ए-यमनम आरज़ूस्त

मुही फुलवारवी

नफ़्हः-ए-बाद-ए-यमनम आरज़ूस्त

मुही फुलवारवी

MORE BYमुही फुलवारवी

    नफ़्हः-ए-बाद-ए-यमनम आरज़ूस्त

    शोरिश-ए-वैस-ए-क़र्नम आरज़ूस्त

    मुझे यमन की हवा के एक झोंके की आरज़ू है। मुझे हज़रत ओवैस क़रनी के इश्क़ की तड़प की चाह है।

    (हज़रत ओवैस क़रनी रज़ि. एक महान ताबई थे, जिनका इश्क़-ए-रसूल बहुत मशहूर है। इसलिए इस शेर में यमन और ओवैस क़रनी का ज़िक्र आया है।)

    आँ-कि बूद ख़यू-तनश रश्क-ए-गुल

    बू-ए-हमाँ गुल-बदनम आरज़ूस्त

    जिस महबूब का सजीला और नूरानी क़द फूलों को भी मात देता है, उसी गुलबदन की ख़ुशबू की मुझे तमन्ना है।

    (यानी रसूलुल्लाह के जिस्म-ए-अतहर की नज़ाकत और पाकीज़गी को फूल से भी बढ़कर बताया गया है।)

    ज़िल्ल-ए-हुमा बाद ब-सर या मबाद

    सायः-ए-सर्व-ओ-समनम आरज़ूस्त

    चाहे मेरे सर पर हुमा का साया हो या हो, मुझे उसकी परवाह नहीं; मुझे तो सर्व और समन के साए की आरज़ू है।

    (सर्व और समन से मुराद ज़ात-ए-रिसालत है। हुमा उस परिंदे को कहते हैं जिसके बारे में मशहूर है कि वो जिसके सर पर साया कर दे, वो बादशाह बन जाता है। लेकिन शाइर को नबवी साये के मुक़ाबले में किसी और साए की चाह नहीं।)

    साक़ी-ओ-जाम अस्त-ओ-गुल-ओ-नव-बहार

    दिलबर-ए-तक़्वा-शिकनम आरज़ूस्त

    साक़ी है, जाम है, फूल हैं और बहार की शुरुआत है ऐसी रूहानी फिज़ा में मुझे उस दिलबर की तमन्ना है जिसका हुस्न कमाल का है।

    (दिलबर से मुराद रसूल-ए-पाक हैं। तक़्वा-शिकन यहाँ सिर्फ़ क़ामिल हुस्न के लिए एक तश्बीह है। वरना नबी करीम के दीदार से तो लोगों के दिलों से कुफ़्र, शिर्क और गुनाहों के असर मिट जाया करते थे।)

    'मुही' अज़ीं तर्ज़-ए-सुख़न-आवरी

    याद-ए-शह बुल-हसनम अरज़ूस्त

    मुही! तुम्हारे इस खास अंदाज़ से मुझे शाह अबुल हसन की याद रही है। (इसी तरह की शैली में हज़रत फ़र्द की भी एक ग़ज़ल है, उसी की तरफ इशारा है।)

    स्रोत :
    • पुस्तक : नग़मातुल उंस फ़ी मजालिसुल क़ुदस (पृष्ठ 172)
    • रचनाकार : शाह हेलाह अहमद क़ादरी
    • प्रकाशन : दारुल एशा'अत ख़ानक़ाह मुजीबिया (2016)
    • संस्करण : First

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY
    बोलिए