नमी-ख़्वाहम कि मा रा बर सर-ए-अफ़्लाक ब-निशानी
नमी-ख़्वाहम कि मा रा बर सर-ए-अफ़्लाक ब-निशानी
ब-कू-ए-ख़्वेशतन यक-दम ब-रू-ए-ख़ाक ब-निशानी
ऐ दो-आलम के हबीब! मुझे ये इच्छा नहीं है कि आप मुझे किसी ऊँचे और शानदार तख़्त पर बैठाएँ। बस अपनी गली में थोड़ी देर के लिए ज़मीन पर ही बैठा लीजिए।
तकल्लुफ़ बरतरफ़ कुन अज़ मन-ए-मिस्कीं चे अन्देशी
चे बाशद गर ब-बज़्म-ए-ख़ुद मरा बे-बाक ब-निशानी
मैं तो एक बे-सामान और ग़रीब इंसान हूँ, मुझसे आपको क्या डर? तकल्लुफ़ छोड़कर अपनी महफ़िल में आने की इजाज़त दे दीजिए। अगर आप मुझे अपनी महफ़िल में बे-झिझक बैठा लें तो आपका क्या बिगड़ेगा?
चु दुलहा शाद गर्दानी ज़-फ़ैज़-ए-रहमत-ए-'आमत
मबादा 'नस्र' रा बा-ख़ातिर-ए-ग़म-नाक ब-निशानी
जब आप अपनी आम रहमत से सबके दिलों को ख़ुश करते हैं, तो ऐसा न हो कि अपने ‘नस्र’ को ग़मगीन और उदास बैठा छोड़ दें।
- पुस्तक : नग़मातुल उंस फ़ी मजालिसिल क़ुदस (पृष्ठ 318)
- रचनाकार :शाह हिलाल अहमद क़ादरी
- प्रकाशन : दारुल एशा'अत ख़ानक़ाह मुजीबिया (2016)
- संस्करण : First
Additional information available
Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.
About this sher
rare Unpublished content
This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.