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क़द बदा मशहदु मौलाई अनीख़ू जमली

जामी

क़द बदा मशहदु मौलाई अनीख़ू जमली

जामी

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    क़द बदा मशहदु मौलाई अनीख़ू जमली

    कि मुशाहिद शुद अज़ाँ मशहदम अनवार-ए-जली

    मेरे मौला का मशहद प्रकट हो गया है। लोगो! मेरा ऊँट यहीं बिठा दो،

    क्योंकि इस मशहद के अनवार मेरे सामने ज़ाहिर हो रहे हैं। (अब ऊँट पर सवार रहना अदब के ख़िलाफ़ है। यहाँ ‘मशहद’ से मुराद हज़रत अली मुर्तज़ा कर्रमल्लाहु वज्हु का रौज़ा-ए-मुबारक है)।

    रूयश-ए-आँ मज़हर-ए-साफ़ीस्त कि दर सूरत-ए-अस्ल

    आशकार अस्त अज़ू 'अक्स-ए-जमाल-ए-अज़ली

    उनका चेहरा हज़रत (अली का रुख़-ए-अनवर) बिल्कुल साफ़ आईना है,

    जिसमें हक़ीक़त में अज़ली जमाल, (यानी अल्लाह के (नूर का जल्वा) दिखाई देता है। यूँ समझिए कि हज़रत अली का चेहरा उस शुद्ध शीशे की तरह है जिसमें रब्बानी अनवार की परछाईं नज़र आती है)।

    ज़िंदः-ए-'इश्क़ मुर्द: अस्त मीरद हरगिज़

    ला-यज़ाली बुवद ईं ज़िंदगी-ए-लम-यज़ली

    जो शख़्स इश्क़-ए-इलाही के साथ जीता है, वो मरता है और कभी मरेगा। ये ज़िंदगी हमेशा रहने वाली है, कभी मिटने वाली नहीं। (यानी जिसका दिल इश्क़-ए-ख़ुदा से ज़िंदा है, उसकी ज़िंदगी फ़ना के क़ाबिल नहीं होती)।

    'जामी' अज़ क़ाफ़िलः-सालार-ए-रह-ए-'इश्क़ तुरा

    गर ब-पुर्संद कि आँ कीस्त 'अली गोए 'अली

    जामी! अगर लोग इश्क़-ए-इलाही के क़ाफ़िले के रहनुमा के बारे में पूछें

    कि वो कौन है, तो साफ़ कह देना वो अली हैं, अली।

    स्रोत :
    • पुस्तक : नग़मातुल उंस फ़ी मजालिसिल क़ुदस (पृष्ठ 299)
    • रचनाकार :शाह हिलाल अहमद क़ादरी
    • प्रकाशन : दारुल एशा'अत ख़ानक़ाह मुजीबिया (2016)
    • संस्करण : First

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