तौर-हा शुद मुख़्तलिफ़ दौर-ए-ज़मान-ए-दीगर अस्त
तौर-हा शुद मुख़्तलिफ़ दौर-ए-ज़मान-ए-दीगर अस्त
आँ ज़मीं बर्बाद रफ़्त ईं-आसमान-ए-दीगर अस्त
रंग-ढंग बदल गए हैं, ज़माने का दौर भी दूसरा हो गया है,
वो ज़मीन उजड़ चुकी है और ये आसमान कुछ और ही है।
मेहर शुद मफ़क़ूद या ईंं-जा मोहब्बत रस्म नीस्त
या मिज़ाज-ए-मा दिगर शुद या जहान-ए-दीगर अस्त
या तो मोहब्बत की मुहर ही खो गई है, या यहाँ प्यार की रीत नहीं रही,
या मेरा मिज़ाज बदल गया है, या फिर ये दुनिया ही दूसरी हो गई है।
किज़्ब हर कस रा शि'आर-ओ-हर्फ़-ए-हर यक पेचदार
मा नमी-फ़हमेम गोया ईं-ज़बान-ए-दीगर अस्त
झूठ सबका तरीक़ा बन गया है, हर बात टेढ़ी-मेढ़ी है,
हम तो समझ ही नहीं पाते, मानो ये ज़बान ही दूसरी हो।
पुर दर ईं-अय्याम-ए-बे-लुत्फ़ी म-कुन कज़ चंद रोज़
मैल-ए-तब’अम जानिब-ए-ना-मेहरबान-ए-दीगर अस्त
इन बेरुख़ी के दिनों को दर्द से मत भरो,
क्योंकि कुछ दिनों से मेरे दिल की चाह किसी और बे-मेहर की ओर है।
सर-गुज़श्त-ए-मा मुसीबत दीदगान-ए-’इश्क़ रा
क़िस्सः-ए-मजनूँ मदाँ ईं दास्तान-ए-दीगर अस्त
हमने इश्क़ की मुसीबतें झेली हैं, उनकी कहानी को
मजनूँ का क़िस्सा मत समझो, ये दास्तान कुछ और है।
यक दो रोज़े कम-निगाही मस्लहत-ए-दीद-ए-तु नीस्त
चश्म-ए-मन दुम्बालः गिर्द-ए-दिल-सितान-ए-दीगर अस्त
दो-चार दिन तुम्हें कम देखना किसी मजबूरी से नहीं,
मेरी आँख किसी दूसरे दिल लूट लेने वाले के पीछे लगी हुई है।
अज़ दरत इमरोज़-ओ-फ़र्दा मी-रवम हुशियार बाश
सज्दः-ए-मस्तानः बाब-ए-आस्तान-ए-दीगर अस्त
आजकल मैं तुम्हारे दरवाज़े से यूँ ही निकल जाता हूँ, ध्यान रहे,
मस्ती भरा सज्दा अब किसी और दरबार के क़ाबिल है।
तोहमत आलूद-ए-वफ़ाए-दीगराँ दारद मरा
मन हलाकम अज़ ग़मश ऊ दर गुमान-ए-दीगर अस्त
वो मुझे दूसरों से वफ़ा के इल्ज़ाम से बदनाम करता है,
मैं उसके ग़म में मिट रहा हूँ और वो किसी और शक में है।
बर नमी-उफ़्तद अज़ आँ सर कूचः-ए-रस्म-ए-जौर 'मीर'
मन अगर ज़-जाँ शुदम यक-नीम-जान-ए-दीगर अस्त
उस गली से ज़ुल्म की रीत, ‘मीर’ खत्म नहीं होती,
मैं अगर जान से चला जाऊँ, तो कोई और अधमरा वहाँ मौजूद है।
- पुस्तक : दिवान-ए-मीर, फ़ारसी (पृष्ठ 50)
- रचनाकार : अफ़ज़ाल अहमद स्य्येद
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