तु जान-ए-पाके सर-ब-सर ने आब-ओ-ख़ाक ऐ नाज़नीं
तु जान-ए-पाके सर-ब-सर ने आब-ओ-ख़ाक ऐ नाज़नीं
वल्लाह ज़-जाँ हम पाक-तर रूही फ़िदाक ऐ नाज़नीं
ऐ नाज़नीन! तुम्हारी हस्ती पाक और पवित्र है, तुम्हारी रचना मिट्टी और पानी से नहीं हुई है।
ख़ुदा की क़सम! हम तो जान से भी ज़्यादा पाक हैं, मेरी रूह तुम पर क़ुर्बान हो, ऐ नाज़नीन!
पाकाँ न-दीदः रू-ए-तू जाँ दादः अंदर बू-ए-तू
इनक ब-गिर्द-ए-कू-ए-तू सद-जान-ए-पाक ऐ नाज़नीं
ऐ नाज़नीन! पाक दिल लोगों ने तुम्हारा चेहरा देखे बिना ही तुम्हारी ख़ुशबू पर अपनी जान निछावर कर दी है। अब तो तुम्हारी गली के चारों ओर सैकड़ों पाक जानें फ़िदा होने के लिए बेकरार घूम रही हैं।
रफ़्ती ब-गुल-गश्त-ए-चमन गुल दीद लुत्फ़-ए-आँ-बदन
अज़ शौक़-ए-आँ बरख़्वेश्तन ज़द जामः पाक ऐ नाज़नीं
ऐ नाज़नीन! जब तुम बाग़ की सैर को गए और फूलों ने
तुम्हारे जिस्म की नज़ाकत देखी, तो शौक़ में बेक़ाबू होकर अपने वस्त्र तक फाड़ डाले।
गर शुद चु लाल: पैकरम ग़र्क़: ब-ख़ूँ के ग़म ख़ुरम
ईं बस कि बर दिल मी-बरम दाग़त ब-ख़ाक ऐ नाज़नीं
ऐ नाज़नीन! अगर मेरा शरीर लाला (फूल) की तरह ख़ून में डूबा हुआ है,
तो इसका कारण तुम्हारे ग़म का बोझ है। मैं तुम्हारे इश्क़ का दाग़ दिल में लिए फिर रहा हूँ, यहाँ तक कि मिट्टी में मिल गया हूँ।
दारम ज़-ग़म बीमारिए बीमार-ए-ग़म रा यारिये
गर तू कुनी ग़म-ख़्वारिए अज़ ग़म चे बाक ऐ नाज़नीं
ऐ नाज़नीन! मुझे ग़म की बीमारी लग चुकी है,
और मेरे इस ग़म का इलाज़ सिर्फ़ तुम ही हो। अगर तुम ज़रा सी तसल्ली दे दो, तो फिर इस ग़म से डरने की क्या बात रहेगी?
बा आँ कि दर्दम शुद क़वी ख़्वाहम फ़ुग़ानम बश्नवी
तर्सम कि बहर-ए-मन शवी अंदेश:-नाक ऐ नाज़नीं
ऐ नाज़नीन! जामी, जिसका तुमसे दिल-ओ-जान का रिश्ता है,
वो तुमसे कभी मुँह नहीं मोड़ेगा, चाहे तुम ही उसके सिर पर
'जामी' कि दारद बा तु ख़ूँ हर्गिज़ न-ताबद अज़ तु रू
गर ख़ुद नेही बर फ़र्क़-ए-ऊ तेग़-ए-हलाक ऐ नाज़नीं
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