तू जान-ए-पाकी सर-ब-सर ने आब-ओ-ख़ाक ऐ नाज़नीं
तू जान-ए-पाकी सर-ब-सर ने आब-ओ-ख़ाक ऐ नाज़नीं
वल्लाह ज़-जाँ हम पाक-तर रूही फ़िदाक ऐ नाज़नीं
आपका पवित्र अस्तित्व मिट्टी और पानी का साधारण मेल नहीं है,
बल्कि आप सिर से पाँव तक नूरानी और रूहानी पवित्रता का संपूर्ण रूप हैं।ख़ुदा की क़सम, आप तो रूह से भी ज़्यादा पाक और नाज़ुक हैं।
पाकाँ न-दीदः रू-ए-तू जाँ दादः अंदर बू-ए-तू
ईनक ब-गिर्द-ए-कू-ए-तू सद-जान-ए-पाक ऐ नाज़नीं
पाक दिल लोगों ने (अल्लाह के वलियों ने) आपका उज्ज्वल चेहरा नहीं देखा,
बल्कि आपकी खुशबू पर ही अपनी जान निछावर कर दी। और आज भी आपकी गली के चारों ओर सैकड़ों पाक दिल मंडराते रहते हैं।
दारम ज़-ग़म बीमारी-ए-बीमार-ए-ग़म रा यावरी
गर तू कुनी ग़म-ख़्वारी-ए-अज़ ग़म चे बाक ऐ नाज़नीं
मैं इश्क़ की बीमारी में मुब्तला हूँ, इस इश्क़ के मरीज़ की मदद कीजिए।
अगर आप ही दिलजोई करें, ऐ नाज़नीन, तो फिर किसी ग़म का डर नहीं रहता। (क्योंकि ग़मज़दा आशिक़ों के लिएआप से बढ़कर कोई हमदर्द हो ही नहीं सकता)।
'जामी' कि दारद बा-तु ख़ू हरगिज़ न-ताबद अज़ तु रू
गर ख़ुद नेही बर फ़र्क़-ए-ऊ तेग़-ए-हलाक ऐ नाज़नीं
जामी आपसे सच्चा इश्क़ रखता है, वो कभी आपसे मुँह नहीं मोड़ेगा।
भले ही, ऐ महबूब, आप उसके सिर पर हलक़त की तलवार ही क्यों न रख दें। (वो हर हाल मेंआपका वफ़ादार रहेगा)।
- पुस्तक : नग़मातुल उंस फ़ी मजालिसिल क़ुदस (पृष्ठ 260)
- रचनाकार :शाह हिलाल अहमद क़ादरी
- प्रकाशन : दारुल एशा'अत ख़ानक़ाह मुजीबिया (2016)
- संस्करण : First
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