Font by Mehr Nastaliq Web

या-रसूलल्लाह ब-दरगाहत पनाह आवुर्दः-अम

कमाल

या-रसूलल्लाह ब-दरगाहत पनाह आवुर्दः-अम

कमाल

MORE BYकमाल

    या-रसूलल्लाह ब-दरगाहत पनाह आवुर्दः-अम

    हम-चु काह-ए-'आजिज़म कोह-ए-गुनाह आवुर्दः-अम

    अल्लाह के रसूल मैं आपकी दरगाह में पनाह लेने आया हूँ

    हक़ीर घास की तरह गुनाहों का पहाड़ साथ लाया हूँ

    गैर-ए-तू मलजा-ओ-मावा नीस्त दर हर दो-सरा

    रहम कुन या-सय्यदी हाल-ए-तबाह आवुर्दः-अम

    दोनों जहान में आपके ‘अलावा मेरा कोई ठिकाना नहीं है

    मेरे सरदार रहम कीजिए में तबाह-हाल आया हूँ

    गरचे 'इस्याँ बे-'अदद अम्मा नज़र बर रहमतत

    आय:-ए-ला-तक़्नतू बर ख़ुद गवाह आवुर्दः-अम

    गुनाह गरचे बे-शुमार है मगर आपकी रहमत पर नज़र है

    ला-तक़्नतू की आयत को अपने ऊपर गवाह बना कर लाया हूँ

    जुज़ तु दीगर दस्त-गीरम नीस्त दर दुनिया-ओ-दीं

    बा-हज़ाराँ इंफ़ि'आले रू-सियाह आवुर्दः-अम

    दीन-ओ-दुनिया में आपके ‘अलावा मेरा कोई और दस्तगीर नहीं है

    हज़ारों शर्मिंदगी और रू-सियाही अपने साथ लिए आया हूँ

    चार चीज़ आवुर्दः-अम शाहा कि दर गंज-ए-तु नीस्त

    बे-कसी-ओ-ना-कसी 'इज्ज़-ओ-गुनाह आवुर्दः-अम

    बादशाह मैं ऐसी चार चीज़ें लाया हूँ जो आपके खज़ाने में नहीं है

    मैं बे-किसी, ना-कसी, ‘इज्ज़ और गुनाह लेता आया हूँ

    अज़ जमाल-ए-ख़ुद मुशर्रफ़ कुन कि ता याबम शरफ़

    ईं 'कमाल'-ए-आरज़ू दर बारगाह आवुर्दः-अम

    अपने जमाल से मुशर्रफ़ कीजिए ताकि मुझे शरफ़ हासिल हो

    मैं ये आरज़ू आपकी बारगाह में लेता आया हूँ

    स्रोत :
    • पुस्तक : नग़्मात-ए-सिमा (पृष्ठ 220)
    • प्रकाशन : नूरुलहसन मौदूदी साबरी (1935)

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY
    बोलिए