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Sufinama

चश्म-ए-नर्गिस निगरानस्त ब-गुलज़ार बिया

शाह अकबर दानापूरी

चश्म-ए-नर्गिस निगरानस्त ब-गुलज़ार बिया

शाह अकबर दानापूरी

चश्म-ए-नर्गिस निगरानस्त ब-गुलज़ार बिया

फ़र्श-ए-राह-ए-तू गुल अन्द गुल-ए-बे-ए-ख़ार बिया

नर्गिस की आँख मुंतज़िर है गुलज़ार में

फूल तुम्हारी राह में फ़र्श-ए-राह हैं, गुल-ए-बेख़ार

हस्त दर ख़्वाब-ए-गिराँ क़िस्मत-ए-ख़्वाबीदः-ए-मन

सर-ए-बालीन-ए-मन ताले'-ए-बेदार बिया

मेरी क़िस्मत गहिरी नींद में है

क़िस्मत को बेदार करने वाले मेरे सिरहाने

मुश्त-ए-ख़ाक-ए-ख़ुदम अंदाख़्तः-अम दर रह-ए-तू

सर-ए-मा ख़ाक-ए-रहत बर सर-ए-रफ़्तार बिया

मैंने अपने वुजूद की ख़ाक को तेरी राह में डाल दिया है

हमारा सर तुम्हारी राह की ख़ाक है उसी पर चल कर

कारवाँ आमद-ओ-आवर्द मता'-ए-कन'आँ

ज़ुलेख़ा चू सरे हस्त ब-बाज़ार बिया

क़ाफ़िला आया और कनआ’न का सामान साथ लाया

ज़ुलेख़ा अगर ख़्वाहिश हो तो बाज़ार में

पेश अज़ीं शम्अ'-ओ-चराग़े तू ब-का'बः म-पसंद

अंदरून-ए-दिलम जल्वा-ए-रुख़्सार बिया

इस शम्अ’ और चिराग़ के होते हुए तू का’बा को पसंद मत कर

जल्वा-ए-रुख़्सार तू मेरे दिल के अंदर

सिहते मी-तलबी दर्द तलब कुन 'अकबर'

पेश-ए-ई'सा नफ़साँ बा-दिल-ए-बीमार बिया

तुम्हें सेहत चाहिए, ’अकबर’ तू दर्द का तलब-गार बन

ई’सा-नफ़्स लोगों के सामने बीमार दिल ले के

स्रोत :
  • पुस्तक : जज़्बात-ए-अकबर (पृष्ठ 2)
  • रचनाकार :शाह अकबर दानापुरी
  • प्रकाशन : आगरा अख़बार प्रेस आगरा (1915)
  • संस्करण : First

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