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Ratankuvari Bai

Dohe of Ratankuvari Bai

भये मगन सब प्रेम रस, भूलि गए निज देह ।

लघु दीरघ वै नारि नर, सुमिरत श्याम-सनेह ।।

कहत परस्पर युवति मिलि, लै लै कर अँकवार ।

प्रीतम आये का सखी, तन साजहु श्रृंगार ।।

इक आई आनँद उमंगि, प्यारिहिं देत बधाय ।

प्राणनाथ सुखदैन इहँ, मोहन उतरे आय ।।

तहँ राधा की कछु दशा, वर्णत आवे नाहि ।।

मलिन वेष भूषण रहित, बिवस रहित तन माहिं ।।

कबहुँ झुरावत बिरह-वश, पीत वरण ह्वै जाय ।

कबहूँ व्यापत अरुणता, प्रेम-मगन मुद छाय ।।

कान्ह कान्ह कबहूँ कहत, कबहुँ रटत निज नाम ।

मौन साधि रहि जात जब, श्रमित होत अति बाम ।।

चख चितवत जित तित हरी, श्रवण मुरलि धुनि-लीन ।

श्याम बास बसि नाक मणि, रूप पयोनिधि मीन ।।

तन मध धन गृह जनन की, नेकहु सुधि तिहिं नाहिं ।

चितवत काहू नहिं दृगन, लगन लगी उर माहिं ।।

बरन बरन बर तंबुवन, दीन्हो तान वितान ।

अति फूले फूले फिरत, डेरा परत न जान ।।

जबते मथुरा तन चितै, तजि ब्रज-जन यदुनाथ ।

विरह बिथा बृज में बढ़ी, तहँ सब भये अनाथ ।।

प्रिय तीरथ कुरुखेत सब, आये ग्रहण नहान ।

यदुपति राधा गोप गण, नन्दादिक वृषभान ।।

गोप एक नट-भेष सजि, आयो बीच बजार ।

तहँ खरभर लशकर पर्यो, सो अति रह्यो निहार ।।

इक यादव हँसिके कह्यो, कहाँ तुम्हारो बास ।

अति सुन्दर तन छवि बनी, नाम कहहु परकास ।।

तब उनहू कहि तुम कहहु, काके सँग कित ठाउँ ।

द्वारावति-पति कटक यह, कह्यो यदुव निज नाउँ ।।

सुनत द्वारका नाम तिहि, लियो विरह उर छाय ।

हा नँद-नंदन कन्त कहि, गयो ग्वाल मुरझाय ।।

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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