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क़िस्सा चहार दर्वेश

अमीर ख़ुसरौ

क़िस्सा चहार दर्वेश

अमीर ख़ुसरौ

MORE BYअमीर ख़ुसरौ

    रोचक तथ्य

    तर्जुमा मीर अम्मन देहलवी

    अब क़िस्सा शुरू करता हूँ- ज़रा कान धरकर सुनो और मुन्सिफ़ी करो! चार दर्वेश की सैर में यूँ लिखा है और कहने वाले ने कहा है कि रोम के मुल्क़ में कोई शहंशाह था। नौशेरवाँ की-सी अ'दालत और हातिम की सी दरियादिली उसकी ज़ात में थी। उसका नाम आज़ादबख़्त और राजधानी क़ुस्तुनतुनिया थी जिसे अब इस्तंबोल कहते हैं। उसके वक़्त में रेआ'या आबाद, ख़ज़ाना भरा हुआ, लश्कर ख़ुश-हाल, ग़रीब संतुष्ट, ऐसे चैन से गुज़र करते और खुशी से रहते कि हर एक के घर में दिन ई'द और रात शब-ए-बरात थी। जितने चोर-चकार, जेबकतरे, उठाईगीरे और दग़ाबाज़ थे सबको नेस्त-नाबूद करके मुल्क-भर में नाम-ओ-निशान उनका रखा था। सारी रात दरवाज़े घरों के बन्द होते और दुकानें बाज़ारों की खुली रहतीं। राही मुसाफ़िर जंगल मैदान में सोना उछालते चले जाते। कोई पूछता कि “तुम्हारे मुँह में कै दाँत हैं और कहाँ जाते हो?”

    उस बादशाह के अमल में हज़ारों शहर थे और कई सुल्तान नाल-बन्दे देते थे। ऐसी बड़ी सल्तनत होने पर भी एक घड़ी अपने दिल को ख़ुदा की याद और बन्दगी से ग़ाफ़िल करता। आराम दुनिया का जो चाहिये, सब मौजूद था। लेकिन बेटा, जो ज़िन्दगानी का फल है, उसकी क़िस्मत के बाग़ में था। इसलिये अक्सर फ़िक्रमन्द रहता और पाँचों वक़्त की नमाज़ के बाद अपने करीम से कहता कि “ऐ अल्लाह, मुझ आजिज़ को तूने अपनी मेहरबानी से सब कुछ दिया। लेकिन एक इस अंधेरे घर का दिया दिया। यही अरमान जी में बाक़ी है कि मेरा नामलेवा और पानीदेवा कोई नहीं। तेरी क़ुदरत के ख़ज़ाने में सब कुछ मौजूद है। एक बेटा जीता-जागता मुझे दे तो मेरा नाम और मेरी सल्तनत का निशान बाक़ी रहे!”

    इसी उम्मीद में बादशाह की उ'म्र चालीस बरस की हो गई। एक दिन शीशमहल में नमाज़ पढ़कर वज़ीफ़ा पढ़ रहे थे। यकबारगी आईने की तरफ़ जो ख़याल किया तो देखा कि उसके सिर के बाल सफ़ेद हो चले हैं। यह देखकर बादशाह की आँखें भर आईं, उसने ठंडी सांस भरी! फिर उसने दिल में सोचा- “अफ़्सोस! तूने इतनी उ'म्र नाहक़ बर्बाद की और दुनिया की लालच में एक ज़माने को ज़ेर-ओ-ज़बर किया। इतना मुल्क जो लिया अब तेरे किस काम आवेगा? आख़िर यह सारा माल-असबाब कोई दूसरा उड़ा देगा। तुझे तो पैग़ाम मौत का चुका। अगर कोई दिन जिये भी तो बदन की ताक़त कम होगी। मा'लूम यही होता है कि तेरी तक़दीर में नहीं लिखा है कि वारिस छत्र और तख़्त का पैदा हो। आख़िर एक रोज़ मरना है और सब कुछ छोड़ जाना है। इसीलिये यही बेहतर है कि तू ही इसे छोड़ दे और बाक़ी ज़िन्दगी अपने ख़ालिक़ की याद में काट।”

    यह बात अपने दिल में ठहराकर, पाईं बाग़ में जाकर उन्होंने सब मुजराइयों को जवाब दे दिया। बादशाह ने फ़रमाया कि “कोई आज से मेरे पास आवे, सब दीवान-ए-आ'म में आया-जाया करें और अपने काम में मुस्तइ'द रहें।” यह कहकर आप एक मकान में जा बैठे और जानमाज़ बिछाकर इ'बादत में मशग़ूल हुए। सिवा रोने और आह भरने के कुछ काम था। इसी तरह बादशाह आज़ादबख़्त को कई दिन गुज़रे। शाम को रोज़ा खोलने के वक़्त एक छुहारा खाते और तीन घूँट पानी पीते और तमाम दिन-रात जानमाज़ पर पड़े रहते। इस बात का बाहर चर्चा फैला। रफ़्ता-रफ़्ता सारे मुल्क में ख़बर फैल गई कि बादशाह ने बादशाहत से हाथ खींचकर गोशानशीनी इख़्तियार की। चारों तरफ़ दुश्मनों और फ़साद करने वालों ने सिर उठाया और क़दम अपनी हद से बढ़ाया। जिसने चाहा मुल्क दबा लिया और सरकशी शुरू कर दी। जहाँ कहीं हाकिम थे उनके हुक्म में ख़लल पैदा होने लगा। हर-एक सूबे से बदअ'मली की अ'र्ज़ी हुज़ूर में पहुँची। दरबारी अमीर जितने थे, जमा' हुए और सलाह-मसलहत करने लगे।

    आख़िर यह तज्वीज़ ठहरी कि नवाब वज़ीर अक़्लमन्द और होशियार है, वह बादशाह को नज़दीक से जानता है, और बादशाह को उस पर भरोसा भी है। दर्जे में वज़ीर सबसे बड़ा है। उसकी ख़िदमत में चलें। देखें वह क्या मुनासिब जानकर कहता है!

    सब अमीर और दरबारी मिलकर वज़ीर के पास आए और कहा- “बादशाह की यह सूरत और मुल्क की यह हक़ीक़त! अगर चन्द रोज़ और ग़फ़लत हुई तो इतनी मेहनत से लिया हुआ मुल्क, मुफ़्त में जाता रहेगा? फिर हाथ आना बहुत मुश्किल है।”

    वज़ीर पुराना नमकहलाल था, जैसा उसका नाम ख़िरदमन्द था वैसा ही वह अक़्लमन्द था। यह हाल सुनकर बोला, “अगरचे बादशाह ने अपने हुजू़र में आने को मनअ’ किया है, लेकिन तुम चलो, मैं भी चलता हूँ। ख़ुदा करे बादशाह की मर्ज़ी आवे और अपने सामने बुलावे।” यह कहकर सबको अपने साथ दीवान-ए-आ'म तलक लाया और उनको वहां छोड़कर ख़ुद दीवान-ए-ख़ास में आया और एक ख़िदमतगार के ज़रिये बादशाह की ख़िदमत में कहला भेजा कि, “यह पुराना ग़ुलाम हाज़िर है। कई दिनों से जमाल-ए-जहाँआरा नहीं देखा, उम्मीदवार हूँ कि एक नज़र देख कर क़दमबोसी (चरण स्पर्श) करूँ तो ख़ातिर जमा' हो।” यह अ’र्ज़ वज़ीर की बादशाह ने सुनी और चूँकि वह जानते थे कि वज़ीर पुराना ख़ैरख़्वाह है, उसकी होशियारी और जाँ निसारी की वजह से अक्सर बात उसकी मानते थे, इसीलिये बादशाह ने कुछ सोच कर फ़रमाया- “खि़रदमन्द को बुला लो।”

    बारे जब वज़ीर को हाज़िरी की इजाज़त मिली, वह बादशाह के हुज़ूर में आया, आदाब बजा लाया, और दस्त बस्ता (हाथ बाँधे हुये) खड़ा रहा। देखा कि बादशाह की अ'जीब सूरत बन गई है, ज़ार-ज़ार रोने और दुबलापे से आँखों में हल्क़े पड़ गये हैं और चेहरा ज़र्द हो गया है।

    खि़रदमन्द को ताब रही। बेइख़्तियार दौड़कर क़दमों पर जा गिरा। बादशाह ने हाथ से सिर उसका उठाया और फ़रमाया, “लो, मुझे देखा, ख़ातिर जमा' हुई? अब जाओ। ज़्यादा मुझे सताओ, तुम हुकूमत करो।”

    ख़िरदमन्द यह सुन कर डाढ़ मारकर रोया और उसने अ'र्ज़ किया- “ग़ुलाम को आपके सदक़े और आपकी सलामती और इक़बाल से हमेशा बादशाही मुयस्सर है। लेकिन जहाँपनाह की यकायक इस तरह की गोशानशीनी से सारे मुल्क में तहलका पड़ गया है और अंजाम इसका अच्छा नहीं। यह क्या ख़याल मिज़ाज-ए-मुबारक में आया? अगर अपने घर के पले इस मौरूसी ग़ुलाम को भी इस राज़ में शरीक करें, तो बेहतर है। जो कुछ मेरी नाचीज़ अक़्ल में आयेगा, अ’र्ज़ करूँगा। ग़ुलामों को जो इज्ज़तें दी गई हैं वे इसी दिन के लिए कि बादशाह ऐ'श-ओ-आराम करें और नमक पर पलने वाले मुल्क की तदबीर में रहें।ख़ुदा-न-ख़्वास्ता अगर मिज़ाज-ए-आ'ली में कोई फ़िक्र है तो ये शाही ग़ुलाम किस दिन काम आयेंगे?”

    बादशाह ने कहा- “तू सच कहता है। पर जो फ़िक्र मेरे जी के अन्दर है, सो तदबीर के बाहर है! सुन ख़िरदमन्द! मेरी सारी ज़िन्दगी इसी मुल्कगीरी (मुल्क जीतने) के दर्द-ए-सर में कटी, अब ये सिन-ओ-साल हुआ। आगे मौत बाक़ी है सो उसका भी पैग़ाम आया कि सियाह बाल सफ़ेद हो चले। कहावत है कि सारी रात सोये अब सुब्ह को भी जागें? अब तलक एक बेटा पैदा हुआ जो मेरी ख़ातिर जमा' होती। इसलिए दिल सख़्त उदास हुआ और मैं सब कुछ छोड़ बैठा। जिसका जी चाहे मुल्क ले या माल ले, मुझे कुछ काम नहीं। बल्कि कोई दिन में ये इरादा रखता हूँ कि सब छोड़-छाड़ जंगल और पहाड़ों में निकल जाऊँ और मुँह अपना किसी को दिखाऊँ, और इसी तरह यह चन्द रोज़ की ज़िन्दगी बसर करूँ। अगर कोई मकान अच्छा लगा तो वहाँ बैठकर बन्दगी अपने मा'बूद (विधाता) की बजा लाऊँगा। शायद परलोक ठीक हो जाय। और, दुनिया को तो खू़ब देखा कुछ मज़ा आया।” इतनी बात कहकर और एक आह भर कर बादशाह चुप हुए।

    खि़रदमन्द उनके बाप का वज़ीर था। जब यह शाहज़ादे थे, तब से मुहब्बत रखता था। इसके अ'लावा अक़्लमन्द और उनका भला चाहने वाला था, कहने लगा, “ख़ुदा के दरबार से नाउम्मीद होना हरगिज़ मुनासिब नहीं। जिसने अस्सी हज़ार आ'लम को एक हुक्म में पैदा किया, आपको औलाद देना उसके नज़दीक क्या बड़ी बात है? क़िबला-ए-आ'लम! इस ग़लत ख़याल को दिल से दूर कर दें नहीं तो तमाम आ'लम दरहम-बरहम हो जाएगा। यह सल्तनत (राज्य) किस-किस मेहनत और मशक़्क़त से आपके बुज़ुर्गों ने और आपने पैदा की है? वह एक ज़रा में हाथ से निकल जाएगी और बेख़बरी से मुल्क़ वीरान हो जायेगा। ख़ुदा-न-ख़्वास्ता बदनामी हासिल होगी। इसके बाद फिर क़यामत के दिन इसकी पूछ-ताझ होगी कि तुझे बादशाह बनाकर अपने बन्दों को तेरे हवाले किया और तूने हमारी मेहरबानी से निराश होकर रई'यत को हैरान, परेशान किया। इस सवाल का क्या जवाब देंगे? फिर इ'बादत (आराधना) भी उस दिन काम आएगी। इस वास्ते कि आदमी का दिल ख़ुदा का घर है और बादशाह फ़क़त इंसाफ़ के वास्ते पूछे जाएँगे। ग़ुलाम की बेअदबी माफ़ हो, घर से निकल जाना और जंगल-जंगल फिरना काम जोगियों और फ़क़ीरों का है कि बादशाहों का। तुम अपने लायक़ काम करो, ख़ुदा की याद और बन्दगी जंगल-पहाड़ पर मुनहसिर नहीं, आपने यह शेर सुना होगा-

    ख़ुदा इस पास, ये ढूँढे जंगल में-

    ढिंढोरा शहर में लड़का बग़ल में!

    अगर मुन्सिफ़ी फ़रमाइये और इस नाचीज़ की अ’र्ज़ क़ुबूल कीजिए तो बेहतर यूँ है कि जहांपनाह हर दम और हर घड़ी ध्यान अपना ख़ुदा की तरफ़ लगाकर दुआ’' मांगा करें। उसकी दरगाह से कोई महरूम नहीं रहा। आप दिन को मुल्क का बन्दोबस्त, इंसाफ़, अ'दालत ग़रीब-ग़ुर्बा की फ़रमाएँ, तो ख़ुदा के बन्दे, जहांपनाह के साए में अमन, चैन और ख़ुशी की ज़िन्दगी गुज़ारें। रात को इ'बादत कीजिए और दरूद पैग़म्बर की पाक रूह को भेजकर, गोशानशीन फ़क़ीरों और दर्वेशों की मदद लीजिए और रोज़ बिना मां-बाप के बच्चों, मुहताजों, ग़रीब कुनबे वालों और रांड़-बेवाओं में खाना बँटवाइए। ऐसे अच्छे कामों और नेक नीयती की बरकत से, ख़ुदा चाहेगा तो पूरी उम्मीद है कि आपके दिल के मक़्सद और मतलब पूरे हों और जिस बात के वास्ते मिज़ाज-ए-आ'ली को इतनी परेशानी है, वह आर्ज़ू भी पूरी हो जाय। परवरदिगार की इ'नायत पर नज़र रखिए जो एक दम में जो चाहता है, सो करता है।” बारे ख़िरदमन्द वज़ीर के इस तरह अ’र्ज़-मा'रूज़ करने से आज़ादबख़्त के दिल को कुछ ढारस बंधी। फ़रमाया, “अच्छा, तू जो कहता है, भला, यह भी कर देखें। आगे जो अल्लाह की मर्ज़ी है, सो होगा।”

    जब बादशाह के दिल को तसल्ली हुई, तब वज़ीर से पूछा कि, “और सब अमीर-ओ-दबीर क्या करते हैं और किस तरह हैं?”

    उसने अ'र्ज़ किया कि, “सब अमीर-ओ-दबीर क़िबला-ए-आ'लम के जान-ओ-माल की दुआ’ करते हैं। आपकी फ़िक्र से सब हैरानो-परेशान हो हो रहे हैं। जमाल-ए-मुबारक अपना दिखाइये तो सबकी ख़ातिरजमा' होवे। चुनांचे सब इस वक़्त दीवान-ए-आ’म में हाज़िर हैं।”

    यह सुनकर बादशाह ने हुक़्म किया, “इंशाअल्लाह कल दरबार करूँगा, सबको कह दो हाज़िर रहें।” ख़िरदमन्द यह वा'दा सुनकर ख़ुश हुआ और दोनों हाथ उटाकर दुआ’' दी कि, “जब तलक यह ज़मीन-ओ-आसमान अपनी जगह पर हैं हुज़ूर का ताज-ओ-तख़्त क़ायम रहे!” और हुज़ूर से रुख़्सत होकर ख़ुशी-ख़ुशी बाहर निकला औऱ यह ख़ुशख़बरी सब अमीरों से कही। सब अमीर हंसी-ख़ुशी घर को गए। सारे शहर में आनन्द की लहर दौड़ गई। प्रजा मगन हुई कि कल बादशाह दरबार-ए-आ'म करेगा। सुब्ह को सब ख़ानाज़ाद आ'ला-अदना, छोटे-बड़े सब अमीर-ओ-दबीर अपने-अपने पाये और मर्तबे पर आकर खड़े हुए और जलवा-ए-बादशाही का इन्तज़ार करने लगे।

    जब पहर दिन चढ़ा, यकबारगी पर्दा उठा और बादशाह ने बरामद होकर तख़्त-ए-मुबारक पर जुलूस फ़रमाया, नौबतख़ाने में शादियाने बजने लगे, सभों ने मुबारकबादी की नज़रें भेंट कीं औऱ मुजरेगाह में तस्लीमात और कोरनिशात बजा लाए। अपने-अपने पाये और मर्तबे के मुताबिक़ हर-एक को इज्ज़त मिली। सब के दिल को ख़ुशी और चैन नसीब हुआ। जब दोपहर हुई दरबार बरख़ास्त हुआ। महल के अन्दर दाख़िल हुये और ख़ासा नोश फ़रमा के (भोजन करके) ख़्वाबगाह में आराम किया। उस दिन से बादशाह ने यह दस्तूर बना लिया कि हमेशा सुब्ह को दरबार करना और तीसरे पहर किताब का शग़्ल या वज़ीफ़ा पढ़ना और ख़ुदा की बारगाह में तोबा इस्तिग़फ़ार करके अपने मतलब की दुआ’ मांगना।

    एक रोज़ किताब में भी लिखा देखा कि, “अगर किसी शख़्स को ग़म या फ़िक्र ऐसी हो कि उसका इलाज तदबीर से हो सके तो चाहिए कि तक़दीर के हवाले करे और आप गोरिस्तान की तरफ़ रुजूअ' करे और पैग़म्बर के तुफ़ैल में दरूद उनकी रूह को बख़्शे और ख़ुद को नेस्त-नाबूद समझकर दिल को दुनिया की ग़फ़लत से हुशियार रखे और इबरत से रो दे और ख़ुदा की क़ुदरत को देखे कि मुझसे पहले कैसे-कैसे मुल्क और खज़ाने वाले इस ज़मीन पर पैदा हुये? लेकिन आसमान ने सब को अपनी गर्दिश में लाकर मिटा दिया।

    अब जो देखिए सिवाय एख मिट्टी के ढेर के उनका कुछ निशान बाक़ी नहीं रहा और सब दुनिया की दौलत, घर-बार, आल-औलाद, आश्ना-दोस्त, नौकर-चाकर, हाथी-घोड़े छोड़कर अकेले पड़े हैं। यह सब उनके कुछ काम आया, बल्कि अब कोई नाम भी नहीं जानता कि ये कौन थे और क़ब्र के अन्दर का हाल मा'लूम नहीं कि (कीड़े-मकोड़े, च्यूँटे, साँप उनकी खा गए) उनपर क्या बीती और खु़दा से कैसी बनी। यह सारी बातें दिल में सोचकर सारी दुनिया को पीखने का खेल जाने, तब उसके दिल का गुंचा हमेशा शगुफ़्ता रहेगा, किसी हालत में पज़मुर्दा होगा।” यह नसीहत जब किताब में पढ़ी, बादशाह को ख़िरदमन्द वज़ीर का कहना याद आया और दोनों को मुताबिक़ पाया। यह शौक़ हुआ कि इस पर अमल करूँ। लेकिन सवार होकर और भीड़-भाड़ को लेकर बादशाहों की तरह से जाना और फिरना मुनासिब नहीं। बेहतर यह है कि लिबास बदल कर रात को अकेले मक़बरों में या किसी गोशानशीन मर्द-ए-ख़ुदा की ख़िदमत में जाया करूँ रात जागकर गुज़ारूँ। शायद इन मर्दों के वसीले से दुनिया की मुराद और आक़बत की निजात मयस्सर हो।

    यह बात दिल में ठानकर, एक रोज़ रात को मोटे-झोटे कपड़े पहनकर कुछ अशर्फ़ी रुपये लेकर चुपके से क़िले से बाहर निकले और मैदान की राह ली। जाते-जाते एक क़ब्रिस्तान में पहुँचे, निहायत सिद्क़-दिल से दरूद पढ़ रहे थे और उस वक़्त तेज हवा चल रही थी, बल्कि आंधी कहना चाहिये। एख बारगी बादशाह को दूर से एक शो'ला-सा नज़र आया कि सुब्ह के तारे की तरह रौशन है। उसने अपने दिल में ख़याल किया कि इस आँधी और अँधेरे में यह रौशनी किसी हिकमत से ख़ाली नहीं या यह तिलिस्म है कि अगर फिटकिरी और गन्धक को चराग़ की बत्ती के आस-पास छिड़क दीजिए तो कैसी ही हवा चले चराग़ गुल होगा। या किसी वली का चराग़ है जो जलता है। जो कुछ हो, सो हो। चलकर देखा चाहिये। शायद इस शम्अ' के नूर से मेरे घर का चिराग़ भी रौशन हो और दिल की मुराद मिले। यह नीयत करके उस तरफ़ को चले। जब नज़दीक पहुँचे, देखा कि चार फ़कीर बेनवा कफ़नियाँ गले में डाले और सर ज़ानू पर धरे, बेहोशी के आ'लम में बैठे हैं और उनका यह आ'लम है जैसे कोई मुसाफ़िर अपने मुल्क और क़ौम से बिछड़कर, बेकसी और मुफ़्लिसी के रंज-ओ-ग़म में गिरफ़्तार होकर हैरान हो जाता है। इसी तरह ये चारो नक़्श-ए-दीवार हो रहे हैं और एक चिराग़ पत्थर पर धरा टिमटिमा रहा है। हरगिज़ हवा उसको नहीं लगती-गोया फ़ानूस उसकी आसमान बना है जो बेख़तरे जलता है!

    आज़ाद बख़्त की देखते ही यक़ीन आया कि यक़ीनन तेरी आर्ज़ू इन मुर्दान-ए- ख़ुदा के क़दम की बरकत से पूरी होगी और तेरी उम्मीद का सूखा दरख़्त उनकी तवज्हजोह से हरा होकर फलेगा। इनकी ख़िदमत में चलकर अपना हाल कह और मज्लिस का शरीक हो जा। शायद तुझ पर रहम खाकर दुआ’ करें जो ख़ुदा क़ुबूल कर ले।

    यह इरादा करके, उसने चाहा कि क़दम आगे धरे, वहीं अक़्ल ने समझाया कि ‘ऐ बेवक़ूफ! जल्दी कर, ज़रा देख ले, तुझे क्या मा'लूम है कि ये कौन हैं और कहाँ से आए हैं? और किधर को जाते हैं? क्या मा'लूम ये देव हैं या राक्षस जो आदमी की सूरत बनाकर आपस में मिल बैठे हैं। किसी तरह भी जल्दी करना और इनके दरमियान मुख़िल होना ठीक नहीं। अभी एक कोने में छुपकर इन दर्वेशों की हक़ीक़त जानना चाहिये।

    आख़िर बादशाह ने यही किया कि उस मकान के एक कोने में चुपका जा बैठा। किसी को उसके आने की आहट और ख़बर हुई। अपना ध्यान उनकी तरफ़ लगाया कि देखें आपस में क्या बातचीत करते हैं। इत्ताफ़ाक़न एक फ़कीर को छींक आई, उसने ख़ुदा का शुक्र अदा किया और तीनों क़लन्दर उसकी आवाज़ से चौंक पड़े। चिराग़ को उकसाया। ठेर तो रौशन था ही, उसके बाद अपने-अपने बिस्तरों पर हुक़्क़े भरकर पीने लगे।

    एक उन आज़ादों में से बोला, “ऐ यारान-ए-हमदर्द और रफ़ीक़ान-ए-जहाँगर्द! हम चार सूरतें आसमान की गर्दिश से, और लैल-ओ-नहार के इन्क़लाब से दर-ब-दर और ख़ाक-ब-सर एक मुद्दत फिरीं। ख़ुदा का शुक्र है कि मुक़द्दर की मदद से और क़िस्मत की यावरी से आज इस मक़ाम पर बाहम मुलाक़ात हुई। और कल का हाल कुछ मा'लूम नहीं कि क्या पेश आवे, एक-साथ रहें या जुदा-जुदा हो जावें। रात बड़ी पहाड़ होती है। अभी से पड़ रहना ठीक नहीं। इससे यह बेहतर है कि हर एक अपनी-अपनी सरगुज़िश्त- जो इस दुनिया में जिस पर बीती हो (शर्त यह है कि झूठ उसमें कौड़ी भर हो!) बयान करे तो बातों में रात कट जाय, जब थोड़ी रात बाक़ी रहे तब लोट-पोट रहेंगे।”

    सभी ने कहा, “या हादी! जो कुछ इर्शाद होता है हमने क़ुबूल किया। पहले आप ही अपना हाल, जो आपने देखा है, शुरु कीजिये तो हम उससे फ़ायदा उठाएँ।”

    सैर पहले दर्वेश की

    पहला दर्वेश दो ज़ानू होकर बैठा और अपनी सैर का क़िस्सा इस तरह कहने लगा- “ऐ ख़ुदा के बन्दो, ज़रा इधर तवज्हजो करो और इस बे-सर-ओ-पा का हाल सुनो।

    यह सरगुज़िश्त मेरी ज़रा कान धर सुनो।

    मुझको फ़लक ने कर दिया ज़ेरो-ज़बर सुनो।

    जो कुछ कि पेश आई है शिद्दत मेरे तईं-

    उसका बयान करता हूँ तुम सर-बसर सुनो!

    यारो। मेरी जन्म-भूमि और बुज़ुर्गों का वतन मुल्क यमन है। इस नाचीज़ का बाप ख़्वाजा अहमद नाम का बड़ा सौदागर था। उस वक़्त का कोई महाजन या व्यापारी उनके बराबर था। कई शहरों में कोठियाँ और गुमाश्ते लेन-देन के वास्ते मुक़र्रेर थे और लाखों रुपये नक़्द और मुल्क-मुल्क की जिन्स घर में पहले से मौजूद थी। उनके यहाँ दो बच्चे पैदा हुए। एक तो यही फ़कीर जो सैली कफ़नी पहने हुए मुर्शिदों की हुज़ूरी में हाज़िर आज बोलता है और दूसरी एक बहन जिसकी वालिद साहब क़िबला ने शादी अपने जीते-जी शहर के एक सौदागर बच्चे से कर दी थी। वह अपनी सुसराल में रहती थी। गरज़ जिसके घर में इतनी दौलत और एक लड़का हो, उसके लाड़ृ-प्यार का क्या ठिकाना है? मुझ फ़कीर ने बड़े चाव-चोज़ से माँ-बाप के साए में परवरिश पाई और पढ़ना-लिखना, सिपहगरी का कस्बोफ़ुन-सौदागरी का बहीखाता और रोज़नामा सीखने लगा। चौदह बरस निहायत खुशी और बेफ़िक्री में गुज़रे। दुनिया का अन्देशा दिल में आया। यक-बयक एक साल के अन्दर ही माँ-बाप परलोक सिधारे।

    अ'जब तरह का ग़म हुआ जिसका बयान नहीं कर सकता। यकबारगी यतीम हो गया। सर पर कोई बड़ा-बूढ़ा रहा। इस मुसीबत-ए-नागहानी से रात-दिन रोया करता। खाना-पीना छूट गया। चालीस दिन ज्यूँ-त्यूँ करके कटे। चेहलुम में अपने बेगाने, छोटे-बड़े सब जमा' हुए। जब फ़ातिहा से फ़राग़त हुई, सबने फ़क़ीर को बाप की पगड़ी बँधवाई और समझाया, “दुनिया में सबके माँ-बाप मरते आए हैं। और ख़ुद भी एक रोज़ मरना है। पस, सब्र करो, और अपने घर को देखो। अब बाप की जगह तुम सरदार हुये, अपने कारोबार और लेन-देन से हुशियार रहो।” तसल्ली देकर वे रुख़्सत हुए। गुमाश्ते, कारोबारी, नौकर-चाकर जितने थे आकर हाज़िर हुए, नज़रें दीं और बोले, “कोठी, नक़्द औऱ जिन्स अपनी नज़र-ए-मुबारक से देख लीजिये।”

    यकबारगी जो इस बे-इन्तहा दौलत पर निगाह पड़ी, आँखें खुल गईं। दीवानख़ाने की तैयारी का हुक्म दिया। फ़र्राशों ने फ़र्श-फ़ुरूश बिछाकर छत, पर्दे, चिलमनें शानदार लगा दीं और अच्छे-अच्छे ख़िदमतगारों-दीदार नौकर रखे। सरकार से ज़र्क़-बर्क़ पोशाकें बनवादीं। फ़क़ीर मसनद पर तकिया लगाकर बैठा। वैसे ही आदमी गुण्डे-माँकड़े, मुफ़्त खाने-पीने वाले, झूठे खु़शामदी आकर आश्ना हुए और मुसाहिब बने। उनसे आठ पहर सोहबत रहने लगी। हर-कहीं की बातें और ज़टलें, वाही-तबाही इधर-उधर की करते, और कहते, “इस जवानी के आ'लम में केतकी की शराब या गुल-ए-गुलाब खिंचवाइये। नाज़नीन मा'शूक़ों को बुलवाकर उनके साथ पीजिये और ऐ'श कीजिये।”

    ग़रज़ आदमी का शैतान आदमी है। हर दम के कहने सुनने से अपना भी मिज़ाज बहक गया। शराब, नाच और जुए का चर्चा शुरू हुआ। फिर तो यह नौबत पहुँची कि सौदागरी भूलकर तमाशबीनी और लेने-देने का सौदा हुआ। अपने नौकरों और साथियों ने जब यह ग़फ़लत देखी, तो जो जिसके हाथ पड़ा, अलग किया। गोया लूट मचा दी। यहाँ कुछ ख़बर थी कि कितना रुपया ख़र्च होता है, कहाँ से आता है, और किधर को जाता है! माल-ए-मुफ्त, दिल-ए बेरहम! इस फ़ुज़ूल ख़र्ची के आगे, अगर क़ारून का ख़ज़ाना होता तो वह भी वफ़ा करता। कई बरस के अर्से में यकबारगी यह हालत हुई कि फ़क़त टोपी और लँगोटी बाक़ी रही। दोस्त-आश्ना जो दाँतकाटी रोटी खाते थे और चमचा भर खू़न अपना हर बात में ज़बान से निसार करते थे, काफ़ूर हो गए। बल्कि राह-बाट में अगर भेंट-मुलाक़ात हो जाती, तो आँखें चुराकर, मुँह फेर लेते। और नौकर चाकर, ख़िदमतगार, बहेलिये, ढलइत, ख़ासबर्दार, सब छोड़कर किनारे लगे। कोई बात पूछने वाला रहा, जो कहे, “यह तुम्हारा क्या हाल हुआ है?” सिवाय ग़म और अफ़्सोस के कोई रफ़ीक़ रहा।

    अब दमड़ी की ठड्डियाँ मुयस्सर नहीं, जो चबाकर पानी पियूँ। दो-तीन फ़ाक़े, कड़ाके खींचे। भूक की ताब ला सका। लाचार बेहयाई का बुर्क़ा मुँह पर डालकर यह क़स्द किया कि बहन के पास चलूँ। लेकिन यह शर्म दिल में आती थी कि बाप के मरने के बाद बहने से कुछ सुलूक किया, ख़त लिखा, बल्कि उसने जो ख़त मातमपुर्सी और इश्तियाक़ के लिखे उनका भी जवाब इस ख़्वाब-ए-ख़रगोश में भेजा। इस शर्मिन्दगी से जी तो चाहता था पर सिवाए उस घर के कोई ठिकाना नज़र में ठहरा। ज्यूँ-त्यूँ पा-पियादा, ख़ाली हाथ, गिरता-पड़ता हज़ार मेहनत से कई मंज़िलें काटकर बहन के शहर में जाकर, उसके मकान पर पहुँचा। उस माँजाई ने मेरा यह हाल देखकर बलाएँ लीं और गले मिलाकर बहुत रोई। तेल-माश और काले टके मुझपर से सदक़े किये। कहने लगी, “अगरचे मुलाक़ात से दिल बहुत ख़ुश हुआ लेकिन भइया तेरी ये क्या सूरत बनी है?”

    इसका जवाब मैं कुछ दे सका। आँखों में आँसू डबडबाकर चुपका हो रहा। बहन ने जल्दी-जल्दी अच्छी पोशाक सिलवाकर हम्माम में भेजा। नहा-धोकर वह कपड़े पहने। एक मकान अपने पास बहुत अच्छा, शानदार मेरे रहने को दिया। सुब्ह को, बहुत सी चीज़ें, जैसे हलवा सोहन, पिस्तामग़ज़ी, नाश्ते को और तीसरे पहर मेवे ख़ुश्क-ओ-तर, फल-फलारी मँगवाकर अपने सामने खिलाकर जाती। सब तरह ख़ातिरदारी करती। मैंने वैसी तकलीफ़ के बाद जो यह आराम पाया, ख़ुदा की दर्गाह में हज़ार-हज़ार शुक्र बजा लाया। कई महीने इस फ़राग़त से गुज़रे कि पाँव तनहाई से बाहर रखा।

    एक दिन वह बहन जो माँ की तरह मेरी ख़ातिर करती थी, कहने लगी, “ऐ वीरान! तू मेरी आंखों की पुतली और माँ-बाप की मुई मिट्टी की निशानी है। तेरे आने से मेरा कलेजा ठंडा हुआ। जब तुझे देखती हूँ, बाग़-बाग़ होती हूँ। तूने मुझे निहाल किया। लेकिन मर्दों को ख़ुदा ने क़माने के लिए पैदा किया है, घर में बैठा रहना उनको लाज़िम नहीं। जो मर्द निखट्टू होकर घर सेता है, उसकी क़द्र नहीं। ख़ासकर इस शहर के आदमी छोटे-बड़े बेसबब तुम्हारे रहने पर कहेंगे, अपने बाप की दौलते-दुनिया खो-खाकर बहनोई के टुकड़ों पर पड़ा। यह निहायत बेग़ैरती और मेरी तुम्हारी हँसाई और मां-बाप के नाम को लाज लगने का सबब है, नहीं तो अपने चमड़े की जूतियां बनाकर तुझे पहनाऊँ और कलेजे में डाल रखूँ। अब यह सलाह है कि सफ़र का इरादा करो। ख़ुदा चाहे तो दिन फिरें और इस परेशानी और मुफ़्लिसी के बदले इत्मीनान और ख़ुशी हासिल हो।”

    यह बात सुनकर मुझे भी ग़ैरत आई, उसकी सलाह पसन्द की। जवाब दिया, “अच्छआ अब तुम मां की जगह हो, जो कहो, सो करूँ।”

    उसने मेरी मर्ज़ीं पाकर घर में जाके पचास तोड़े अशर्फ़ी के, असील लौंडियों के हाथों में लिवाकर मेरे आगे ला रखे और बोली, “एक क़ाफ़िला सौदागरों का दमिश्क़ को जाता है। तुम इन रुपयों से तिजारत की जिन्स खरीद करो, और एक ईमानदार ताजिर के हवाले करके दस्तावेज़ी पक़्की लिखवा लो और ख़ुद भी दमिश्क की तरफ रवाना हो जाओ। वहां जब ख़ैरियत से जा पहुँचो, अपने माल और नफ़ा समझ बूझ लो या आप बेचो?” मैं वह नक़्द लेकर बाज़ार में गया और सौदागरी का सामान ख़रीद कर एक बड़े सौदागर के सुपुर्द किया। लिखा-पढ़ी से ख़ातिरजमा' कर ली। वह ताजिर दरिया के राह से जहाज़ पर सवार होकर रवाना हुआ। मुझ फ़क़ीर ने खुश्की की राह चलने की तैयारी की। जब रुख़्सत होने लगा, बहन ने एक सिरी पाओ भारी और एक घोड़ा जड़ाऊ साज़ के साथ दिया और मिठाई पकवान एक ख़ासदान में भर कर हरने से लटका दिया और छागल पानी की शिकारबन्द में बंधवा दी, इमाम ज़ामिन का रूपया मेरे बाज़ू पर बांधा। दही का टीका माथे पर लगाकर, आंसू पीकर बोली, “सिधारो, तुम्हें ख़ुदा को सौंपा। पीठ दिखाये जाते हो, इसी तरह जल्द अपना मुँह भी दिखाइयो।” मैंने फ़ातिहा खै़र की पढ़कर कहा, “तुम्हारा भी अल्लाह हाफ़िज है, मैंने क़ुबूल किया।” वहां से निकल कर घोड़े पर सवार हुआ और ख़ुदा का भरोसा करके दो मंज़िल की एक मंज़िल करता हुआ दमिश्क़ के पास जा पहुँचा।

    ग़रज़ जब शहर के दरवाज़े पर गया, तो बहुत रात जा चुकी थी। दरबान और निगहबानों ने दरवाज़ा बन्द कर लिया था। मैंने बहुत मिन्नत की कि, “मुसाफ़िर हूँ, दूर से धावा मारे आता हूँ, अगर किबाड़ खोल दो, तो शहर में जाकर दाने-घास का आराम पाऊँ।”

    अन्दर से घुड़ककर बोले, “इस वक़्त दरवाज़ा खोलने का हुक्म नहीं, क्यों इतनी रात गये तुम आये?”

    जब मैंने साफ़ जवाब सुना, शहर-पनाह की दीवार के तले घोड़े पर से उतर कर ज़ीनपोश बिछाकर बैठा। जागने की ख़ातिर इधर-उधर टहलने लगा। जिस वक़्त आधी रात इधर, और आधी रात उधर हुई, सुनसान हो गया। देखता क्या हूँ कि एक सन्दूक़ क़िले की दीवार से नीचे चला आता है। यह देखकर मैं अचम्भे में हुआ कि यह क्या तिलिस्म है? शायद खु़दा ने मेरी परेशानी हैरानी पर रहम खाकर ग़ैब के ख़ज़ाने से इनायत किया। जब वह संदूक़ ज़मीन पर ठहरा, डरते डरते मैं पास गया। देखा तो काठ का सन्दूक़ है लालच से उसे खोला। एक मा'शूक़ खू़बसूरत, कामिनी सी औ’रत (जिसके देखने से होश जाता रहे!) घायल, लहू में तर-बतर आँखें बन्द किये पड़ी कुलबुलाती है, धीरे-धीरे होंठ हिलते हैं औऱ यह आवाज़ मुँह से निकलती है, “ऐ कम्बख़्त बेवफ़ा, ज़ालिम पुरजफ़ा! बदला इस भलाई और मुहब्बत का यही था जो तूने किया? भला एक ज़ख़्म और लगा, मैंने अपना तेरा इंसाफ़ खु़दा को सौंपा।” यह कहकर उसी बेहोशी के आ'लम में दुपट्टे का आंचल मुँह पर ले लिया, मेरी तरफ़ ध्यान किया।

    फ़क़ीर उसको देखकर और यह बात सुनकर सुन्न हो गया। जी में आया, ‘किसी बेहया ज़ालिम ने क्यों ऐसी नाजनी को ज़ख़्मी किया? क्या उसके दिल में आया, और हाथ इस पर क्यों कर चलाया, इसके दिल में तो मुहब्बत अब तलक बाक़ी है, जो इस जांकनी की हालत में उसको याद करती है।’ मैं आप-ही-आप यह कह रहा था कि आवाज़ उसके कान में गई। एक मर्तबा-कपड़ा मुँह से सरकाकर मुझको देखा। जिस वक़्त उसकी निगाहें मेरी नज़रों से लड़ीं, मुझे ग़श आने और जी सनसनाने लगा। बड़ी कोशिश से अपने को सँभाला, और हिम्मत करके पूछा, “सच कहो, तुम कौन हो और यह क्या माजरा है? अगर बयान करो तो मेरे दिल को तसल्ली हो।” यह सुनकर, अगरचे ताक़त बोलने की थी, उसने धीरे से कहा, “शुक्र है। मेरी हालत जख़्मों के मारे ऐसी हो रही है। क्या ख़ाक बोलूँ? कोई दम की मेहमान हूँ। जब मेरी जान निकल जाय तो ख़ुदा के वास्ते जवाँमर्दी करके मुझ बदबख़्त को किसी जगह गाड़ दीजियो, तो भले बुरे की जबान से छुटकारा पाऊँ और तुझे सवाब हो।” इतना बोलकर चुप हुई।

    रात को मुझसे कुछ तदबीर हो सकी। वह सन्दूक़ अपने पास उठा लाया और घड़ियाँ गिनने लगा कि कब इतनी रात तमाम हो तो सवेरे शहर जाकर जो-कुछ इलाज उसका हो सके अपने भरसक करूँ। वह थोड़ी रात ऐसी पहाड़ हो गई कि दिल घबरा गया। बारे ख़ुदा-ख़ुदा करके जब सुब्ह नज़दीक हुई, मुर्ग़ बोला, आदमियों की आवाज़ आने लगी। मैंने सवेरे की नमाज़ पढ़कर सन्दूक़ को खोजी में कसा और ज्यों ही शहर का दरवाज़ा खुला, मैं शहर में दाख़िल हुआ। हर-एक आदमी औऱ दूकानदार से हवेली किराये की तलाश करने लगा। ढूँढ़ते-ढूँढ़ते एक नया खुशक़ता, फ़राग़त का मकान भाड़े पर लेकर जा उतरा। पहले उस मा'शूक़ को सन्दूक़ से निकालकर रुई के पहलों पर मुलायम बिछौना करके एक कोने में लिटाया और एतबारी आदमी वहाँ छोड़कर मैं जर्राह की तलाश में निकला। हर-एक से पूछता फिरता था कि इस शहर में कारीगर जर्राह कौन है, और कहां रहता है? एक शख़्स ने कहा, “एक हज्जाम जर्राही के कस्ब और हकीमी के फ़न में पक्का है, और इस काम में तो निपट पक्का है। अगर मुर्द को उसके पास ले जाओ, ख़ुदा के हुक्म से ऐसी तदबीर करे कि एक बार वह भी जी उठे। वह उस मुहल्ले में रहता है और ईसा नाम है।”

    मैं यह ख़ुशख़बरी सुन बेइख़्तियाचला। तलाश करते-करते पते से उसके दरवाज़े पर पहुँचा। एक आदमी को जिसकी डाढ़ी सफ़ेद थी, दरवाज़े पर बैठा देखा। वहाँ कई आदमी मरहम की तैयारी के लिए कुछ पीस-पास रहे थे। फ़क़ीर ने मारे खु़शामद के अदब से सलाम किया और कहा, “मैं तुम्हारा नाम और खू़बियाँ सुनकर आया हूँ। माजरा यह है कि मैं अपने मुल्क से तिजारत के लिए चला। प्रेम के कारण क़बीले (परिवार) को भी साथ लिया। जब इस शहर के नज़दीक़ आया और थोड़ी दूर रहा था कि शाम पड़ गई। अनदेखे मुल्क में रात को चलना मुनासिब जाना। मैदान में एक दरख़्त के तले उतर पड़ा। पिछले पहल डाकू आया। जो कुछ माल-असबाब पाया लूट लिया। गहने की लालच से उसने बीवी को भी घायल किया। मुझसे कुछ हो सका। रात जो बाक़ी थी, ज्यों-त्यों कर काटी। सवेरे ही शहर आकर एक मकान किराये पर लिया। उनको वहाँ रखकर मैं तुम्हारे पास दौड़ा आया हूँ। खु़दा ने तुम्हें यह कमाल दिया है। इस मुसाफ़िर पर मेहरबानी करो। ग़रीबखाने पर तशरीफ़ ले चलो, उसको देखो। अगर उसकी ज़िन्दगी हुई तो तुम्हें बड़ा जस होगा और मैं सारी उम्र गु़लामी करूँगा।”

    ईसा जर्राह बहुत रहमदिल और ईश्वर-भक्त था। मेरी ग़रीबी की बातों पर तरस खाकर हवेली तक आया। ज़ख़्मों को देखते ही मेरी तसल्ली की। बोला कि, “ख़ुदा की मेहरबानी से इस बीबी के ज़ख़्म चालीस दिन में भर आवेंगे और सेहत का ग़ुस्ल करवा दूँगा।”

    ग़रज़ उस मर्द-ए-ख़ुदा ने सब ज़ख़्मों को नीम के पानी से धो-धाकर साफ़ किया, जो टाँके के लायक़ पाए उनको सिया, बाक़ी घावों पर अपने खीसे से एक डिबिया निकालकर कितनों में पट्टी रखी और कितनों पर फाहे चढ़ाकर पट्टी से बाँध दिया, और निहायत मुहब्बत से कहा, “मैं दोनों वक़्त आया करूँगा। तू ख़बरदार रहियो। ऐसी हरकत करे जो टांके टूट जाएँ। ग़िज़ा के बजाए मुर्ग़ का शोरबा इसके हलक़ में चुवाइयो और अक्सर अर्क़-ए-बेद-मुश्क गुलाब के साथ दिया कीजो, जो ताक़त रहे।” यह कहकर उसने विदा चाही। मैंने बहुत मिन्नत की और हाथ जोड़कर कहा, “तुम्हारे तशफ़्फ़ी देने से मेरी भी ज़िन्दगी हुई, नहीं तो सिवाए मरने के कुछ सूझता था। ख़ुदा तुम्हें सलामत रखे।”

    उसे इत्र-पान देकर रुख़्सत किया। मैं रात-दिन उस परी की सेवा में हाज़िर रहता, आराम अपने ऊपर हराम किया, ख़ुदा की दरगाह से रोज़-रोज़ उसके चंगे होने की दुआ’ मांगता।

    इत्ताफ़ाक़ से वह सौदागर भी पहुँचा और मेरा अमानत का माल मेरे हवाले किया। मैंने उसे औने-पौने बेच डाला और दवा-इलाज में ख़र्च करने लगा। वह जर्राह हमेशा आता-जाता। थोड़े अर्से में सब ज़ख़्म भरकर अंगूर कर लाए। कई दिन बाद उसने सेहत का ग़ुस्ल किया। अ'जब तरह की ख़ुशी हासिल हुई। ख़िलअ'तऔर अशर्फ़ियाँ ईसा हज्जाम के आगे धरीं और उस परी को कलफ़दार फ़र्श बिछाकर मसनद पर बिठाया। फ़क़ीर ग़रीबों को बहुत-सी ख़ैर-ख़ैरात की। उस दिन गोया सात मुल्कों की बादशाहत इस फ़क़ीर के हाथ लगी और उस परी का रंग सेहत पाने से ऐसा निखरा कि मुखड़ा सूरज की तरह चमकने और कुन्दन की तरह दमकने लगा। नज़र की मजाल थी जो उसके रूप पर ठहरे। यह फ़क़ीर तन-मन-धन से उसके हुक्म में हाज़िर रहता, जो फ़रमाती सो बजा लाता। वह अपने रूप के अभिमान और सरदारी के दिमाग़ से जो मेरी तरफ़ देखती तो फ़रमाती, “ख़बरदार, अगर तुझे हमारी ख़ातिर मंज़ूर है तो हरगिज़ हमारी बात में दम मारियो। जो हम कहें बिला-उ’ज़्र किये जाइयो। अपना किसी बात में दख़ल करियो, नहीं तो पछताओगे।” उसकी बज़ा से यह मा'लूम होता था कि हक़ मेरी ख़िदमत गुज़ारी और फ़रमाबरदारी का उसे मंज़ूर है। फ़क़ीर भी उसकी बेमर्ज़ी एक काम करता। उसका हर हुक्म सर आँखों पर रखता।

    एक मुद्दत इसी तरह कटी। उसने जो फ़रमाइश की, वैसे ही मैंने लाकर हाज़िर की। इस फ़क़ीर के पास जो कुछ जिन्स और नक़्द मूल और नफ़े का था, सब सर्फ़ हुआ। उस बेगाने मुल्क में कौन एतबार करे जो क़र्ज़-दाम काम चले? आख़िर रोज़मर्रा के ख़र्च की तकलीफ़ होने लगी। इससे दिल बहुत घबराया, फ़िक्र से दुबला होता चला, चेहरे का रंग कलझवां हो गया। लेकिन किसमें कहूँ? जो कुछ दिल पर गुज़री सो गुज़री, ‘क़ह्र-ए--दर्वेश बर जान-ए-दर्वेश!’

    एक दिन उस परी ने अपनी समझ से मा'लूम करके कहा, “ऐ फ़लाने! तेरी ख़िदमतों का हक़ हमारे जी में पत्थर की लकीर की तरह है। पर इसका एवज़ हमसे तन से नहीं हो सकता। अगर ज़रूरी ख़र्च के वास्ते कुछ ज़रूरत हो, तो अपने मन में चिन्ता कर। एक टुकड़ा काग़ज़ और दवात-क़लम हाज़िर कर।”

    मैंने तब मा'लूम किया कि यह किसी मुल्क की राजकुमारी है जो इस दिल-ओ-दिमाग़ से बातचीत करती है। फ़ौरन क़लमदान आगे रख दिया। उस नाज़नी ने एक रुक़्क़ा अपने ख़ास दस्तख़त से लिखकर मेरे हवाले किया और कहा, “क़िले के पास त्रिपोलिया है। वहाँ उस कूचे में एक बड़ी-सी हवेली है। उस मकान के मालिक का नाम शैदी बहार है। तू जाकर इस रुक़्क़े को उसके पास पहुँचा दे।”

    यह फ़क़ीर उसके फ़र्माने के मुताबिक़ उसके नाम-ओ-निशान पर मंज़िल-ए-मक़्सूद तक जा पहुँचा, दरबान की ज़बानी ख़त का हाल कहला भेजा। वैसे ही एक हब्शी जवान खू़बसूरत, एक फेंटा तरहदार सजाए हुए, बाहर निकल आया। अगरचे रंग सांवला था, पर गोया तमाम नमक से भरा हुआ। मेरे हाथ से ख़त ले लिया। बोला, कुछ पूछा। उन्हीं क़दमों फिर अन्दर चला गया। थोड़ी देर में ग्यारह क़िश्तियाँ गु़लामों के सर पर धरे बाहर आया। कहा, “इस जवान के साथ जाकर चौगोशे पहुँचा दो।”

    मैं भी सलाम करके विदा हुआ। अपने मकान में आया। आदमियों को दरवाज़े के बाहर से रुख़्सत किया। दो क़िश्तियां अमानत उस परी की हुजूरी में ले गया। उसने देखकर यह फ़र्माया, “यह ग्यारह क़िश्तियाँ अशर्फ़ीयों की ले और खर्च में ला, खु़दा देने वाला है।”

    फ़क़ीर इस नक़्द को लेकर ज़रूरत की मद में ख़र्च करने लगा। अगरचे ख़ातिरजमा' हुई पर दिल में यह खटक रही, या इलाही! यह क्या सूरत है? बगैर पूछे-गछे इतना माल, बिना जान-पहचान अजनबी ने एक पुरज़े काग़ज पर मेरे हवाले किया! अगर उस परी से यह भेद पूछूँ तो उसने पहले ही मनअ’' कर रखा था। मारे डर के दम नहीं मार सकता था।

    आठ दिन के बाद वह मा'शूक़ा मुझसे मुख़ातिब हुई कि, “ख़ुदा ने आदमी को इंसानियत का लिबास दिया है कि फटे, मैला हो। अगरचे पुराने कपड़े से उसकी आदमीयत में फ़र्क़ नहीं आता, पर देखने में, दुनिया वालों की नज़रों में वह एतबार नहीं पाता। दो तोड़े अशर्फ़ियों के साथ लेकर चौक के चौराहे पर यूसुफ़ सौदागर की दूकान पर जा और कुछ क़ीमती जवाहिर और दो ज़र्क़-बर्क़ ख़िलअ'त मोल ले आ।”

    यह सुनते ही यह फ़क़ीर सवार होकर उसकी दूकान पर गया, देखा एक ख़ूबसूरत जवान ज़ाफ़रानी जोड़ा पहने गद्दी पर बैठा है और उसका यह आ'लम है कि एक आ'लम देखने के लिए दुकान से बाज़ार तक खड़ा है। मेरा शौक़ भी बढ़ गया औऱ नज़दीक जाकर सलाम करके बैठा और जिन-जिन चीजों की ज़रूरत थी, तलब की। मेरी बातचीत उस शहर के रहने वालों की सी थी। उस जवान ने गर्मजोशी से कहा, “जो साहब को चाहिये, मौजूद है। लेकिन यह फ़र्माइये, किस मुल्क से आना हुआ? और इस अजनबी शहर में आने का क्या सबब है? अगर इस हक़ीक़त से बाख़बर कीजिये तो ख़ास मेहरबानी होगी।”

    मुझे अपना हाल ज़ाहिर करना मंजूर था। कुछ बात बनाकर, और जवाहिर, पोशाक लेकर और क़ीमत उसकी देकर चलने की इजाज़त चाही। उस जवान ने रूखे-फीके होकर कहा, “ऐ साहब! अगर तुमको ऐसी ही बेरुख़ी करनी थीं तो पहले दोस्ती इतनी गर्मी से करने की क्या ज़रूरत थी? भले आदमियों में साहब-सलामत का बड़ा लिहाज़ होता है।” यह बात इस मज़े और अंदाज से कही गई कि बेइख़्तियार दिल को भाई और बेमुरव्वत होकर वहां से उठना, इन्सानियत नहीं मा'लूम हुआ और उसकी ख़ातिर फिर बैठ गया और बोला, “तुम्हारा फ़र्माना सर आँखों पर, मैं हाज़िर हूँ!”

    इतना कहने से बहुत खु़श हुआ, हँसकर कहने लगा, “अगर आज के दिन ग़रीबख़ाने पर तशरीफ़ लाने की मेहरबानी कीजिये तो आपकी बदौलत ख़ुशी की मज्लिस जमाकर दो-चार घड़ी दिल बहलावें और कुछ ख़ाने-पीने का शग़्ल एक-साथ बैठकर करें।” इस फ़क़ीर ने उस परी को कभी अकेला छोड़ा था। उसकी तन्हाई याद करके कई बहाने और उ’ज़्र किये। पर उस नौजवान ने हरगिज़ माना। आख़िर वा'दा उन चीज़ों को पहुँचाकर मेरे फिर आने का लेकर, और क़सम खिलाकर उसने मुझे चलने की इजाज़त दी। मैं दूकान से उठकर जवाहिर और ख़िलअ'तें उस परी के पास लाया। उसने जवाहिर की क़ीमत और जौहरी की हक़ीक़त पूछी। मैंने सारा हाल मोल-तोल का और अपनी बेहद मेहमानी होने का कह सुनाया। वह फ़र्माने लगी, “आदमी को अपना क़ौल-क़रार पूरा करना वाजिब है। हमें खु़दा की निगहबानी में छोड़कर अपना वा'दा पूरा करो। दा'वत क़ुबूल करना पैग़म्बर की सुन्नत है।”

    तब मैंने कहा, “मेरा दिल चाहता नहीं कि तुम्हें अकेला छोड़कर जाऊँ। पर हुक्म यूँ होता है तो लाचार जाता हूँ। जब तलक आऊँगा, दिल यहीं लगा रहेगा।” यह कह कर फिर उस जौहरी की दूकान पर गया। वह मोंढे पर बैठा मेरा इन्तज़ार खींच रहा था। देखते ही बोला, “आओ मेहरबान, बड़ी राह दिखाई।”

    वहीं उठकर मेरा हाथ पकड़ लिया और चला। जाते-जाते एक बाग़ में ले गया। वह बड़ी बहार का बाग़ था। हौज़ और नहरों में फ़व्वारे छूटते थे। मेवे तरह-तरह के फल रहे थे। हर एक दरख़्त मारे बोझ के झूम रहा था। रंग-बिरंग के पक्षी उन पर बैठे चहचहे कर रहे थे। और हर आ'लीशान मकान में सुथरा फ़र्श बिछा था। हम वहाँ नहर के किनारे पर बंगले में जाकर बैठे। एक दम के बाद आप उठकर चला गया। फिर दूसरी मा'क़ूल पोशाक पहनकर आया। मैंने देखकर कहा, “सुब्हानल्लाह! नज़र लगे।”

    यह सुनकर मुस्कराया और बोला, “मुनासिब यह है कि साहब भी अपना लिबास बदल डालें।” उसकी ख़ातिर मैं ने भी दूसरे कपड़े पहने। उस जवान ने बड़ी टीप-टाप से तैयारी दा'वत की और सामान ख़ुशी का जैसा चाहिये मौजूद किया और फ़क़ीर से मुहब्बत गर्म करके मज़े की बातें करने लगा। इतने में साक़ी प्याला, सुराही बिल्लौर का लेकर हाज़िर हुआ और गज़क कई क़िस्म की लाके रखी, नमकदान चुन दिये और शराब का दौर शुरू हो गया। जब दो जाम की नौबत पहुँची, चार लड़के अमरद खू़बसूरत ज़ुल्फ़ें खोले हुए मज्लिस में आए और गाने-बजाने लगे। यह आ'लम और ऐसा समाँ बँधा कि अगर तानसेन उस घड़ी होता, तो अपनी तान भूल जाता औऱ बैजू बावरा सुनकर बावला हो जाता। इस मज़े में यकबारगी वह जवान आँसू भर लाया। दो-चार क़तरे बेइख़्तियार निकल पड़े और मुझसे बोला, “अब हमारी-तुम्हारी दोस्ती जानी हुई और दिल का का भेद दोस्तों से छिपाना किसी मज़हब में दुरुस्त नहीं। एक बात बेतकल्लुफ़ी से दोस्ती के भरोसे पर कहता हूँ। अगर हुक्म करो तो अपनी मा'शूक़ा को बुलवाकर इस मज्लिस में अपने दिल की तसल्ली करूँ? उसकी जुदाई से दिल नहीं लगता।”

    यह बात उसने ऐसी उत्सुकता से कही कि बग़ैर देखे-भाले इस फ़क़ीर का दिल भी उसे देखने को चाहने लगा। मैंने कहा, “मुझे तुम्हारी ख़ुशी चाहिये। इससे क्या बेहतर? सच है मा'शूक़ बिन कुछ अच्छा नहीं लगता।”

    उस जवान ने चिलमन की तरफ़ इशारा किया। वैसे ही एक औ’रत काली-कलूटी भुतनी-सी जिसे देखने से ही इंसान बेअजल मर जावे, वह उस जवान के पास बैठी। मैं उसे देखने से डर गया। दिल में कहा, “यही बला महबूबा ऐसे परीज़ाद नौजवान की है, जिसकी इतनी तारीफ़, और जिसके लिए इतना शौक़ वह ज़ाहिर कर रहा था!” मैं लाहौल पढ़कर चुप ही रहा। उसी आ'लम में तीन दिन-रात मजलिस शराब और राग-रंग की जमी रही। चौथी रात को नशे और नींद का ज़ोर हुआ और बेइख़्तियार बेख़बर सो गया। जब सुब्ह हुई, उस जवान ने जगाया, और बदन टूटने और ख़ुमार के आ'लम में कई प्याले पिलाकर अपनी मा'शूक़ा से कहा, “अब ज़ियादा तकलीफ़ मेहमान को देनी मुनासिब नहीं।”

    दोनों हाथ पकड़ कर उठे। मैंने इजाज़त मांगी। ख़ुशी-ख़ुशी उसने इजाज़त दी। तब मैंने जल्द अपने पुराने कपड़े पहन लिये और अपने घर की राह ली और अपनी परी की ख़िदमत में जा हाज़िर हुआ। मगर ऐसा इत्तिफ़ाक़ कभू हुआ था कि उसे अकेला छोड़कर रात कहीं गुज़ारी हो। इस तीन दिन की ग़ैर हाज़िरी पर निहायत शर्मिन्दा होकर उ’ज़्र किया और दा'वत का क़िस्सा और उसके इजाज़त देने का सारा हाल कह सुनाया। वह एक ज़माने की अक़्लमन्द थी। मुस्कराकर बोली, “क्या हर्ज है, अगर एक दोस्त की ख़ातिर रहना हुआ? हमने मुआ'फ़ किया, तेरा क्या क़ुसूर है? जब आदमी किसी के घर जाता है, तब उसकी मर्ज़ी से फिर आता है। लेकिन यह मुफ़्त की मेहमानियां खा-पीकर चुपके हो रहोगे या इसका बदला भी उतारोगे। अब यह लाज़िम है कि जाकर उस सौदागर के बेटे को ले आओ और उससे दुगनी ख़ातिर-मदारात करो। सामान, इंतिज़ाम की कुछ फ़िक्र नहीं। ख़ुदा की मेहरबानी से एक दम में सब इंतिज़ाम हो जावेगा और बड़ी शान से दा'वत की यह मज्लिस रौनक़ पावेगी।”

    मैं उसका हुक्म पाकर जौहरी के पास गया और कहा, “तुम्हारा फ़र्माना तो मैं सर-आँखों से बजा लाया। अब तुम भी मेहरबानी करके मेरी अ’र्ज़ क़ुबूल करो।”

    उसने कहा, “मैं जान-ओ-दिल से हाज़िर हूँ।”

    तब मैंने कहा, “अगर इस बन्दे के घर तशरीफ़ ले चलो तो ऐ'न ग़रीबनवाज़ी हो।” उस जवान ने बहुत उ’ज़्र और हीले किये, पर मैंने पिंड छोड़ा, जब तलक वह राज़ी हुआ। साथ ही उसको अपने मकान पर ले चला। लेकिन राह में यही फ़िक्र करता था कि अगर आज अपना बस चलता तो इसकी ऐसी ख़ातिर-तवाज़ों करता कि यह भी ख़ुश होता। अब मैं इसे लिये जाता हूँ, देखिये क्या इत्तिफ़ाक़ होता है।

    इसी हैस-बैस में घर के नज़दीक पहुँचा तो क्या देखता हूँ कि दरवाज़े पर धूम-धाम हो रही है। गलियारे में झाड़ू देकर छिड़काव किया गया है। यसावल और असाबदार खड़े हैं। मैं हैरान हुआ, लेकिन अपना घर जानकर अन्दर क़दम रखा। देखा तो तमाम हवेली में जा-बजा हर मकान के लायक़ फ़र्श बिछा है और मसनदें लगी हैं। पानदान, गुलाबपाश, इत्रदान, पीकदान, चंगेरें, नर्गिसदान क़रीने से धरे हैं। ताक़ों में रंगतरे, कँवले, नारंगियाँ और गुलाबियां रंग-बिरंग की चुनीहैं। एक तरफ़ रंगीन बर्क़ की टट्टियों में चिराग़ों की बहार है। एक तरफ़ झाड़ और सर्व कँवल के रौशन हैं और तमाम दालान और शहनशीनों में सोने के शम्अ-दानों पर क़ाफू़री शम्एँ चढ़ी हुई हैं और जड़ाऊ फ़ानूसें ऊपर धरी हैं। सब आदमी अपने-अपने ओहदों पर मुस्तइद हैं। बावर्चीख़ाने में देगें ठनठना रही हैं। आबदारख़ाने की वैसी ही तैयारी है। कोरी-कोरी ठिलियाँ रुपे की घड़ौंचियों पर साफ़ियों और मुझेरों से ढँकी रखी हैं। आगे चौकी पर डोंगे पर डोंगे कटोरे, थाली के साथ सरपोश धरे, बर्फ़ के आबख़ोरे लग रहे हैं और शोरे की सुराहियाँ हिल रही हैं।

    ग़रज़ सब शाही सामान मौजूद है और कंचिनियां, भांड, भगतिये, कलावन्त, क़व्वाल, अच्छी पोशाक पहने, साज़ के सुर मिलाए हाज़िर हैं।

    फ़कीर ने उस जवान को ले जाकर मसनद पर बिठाया और दिल में हैरान था, कि ‘या इलाही! इतने समय में यह सब तैयारी क्यों कर हुई?’ हर तरफ़ देखता फिरता था लेकिन उस परी का निशान कहीं पाया। इसी खोज में एक मर्तबा बावर्चीख़ाने की तरफ़ जा निकला। देखता हूँ तो वह नाज़नीन, गले में कुर्ती, पाँव में तहपोशी, बिना गहने-पाते सादी बनी हुई है-

    नहीं मुहताज ज़ेवर का जिसे खूबी ख़ुदा ने दी,

    कि जैसे ख़ुशनुमा लगता है चाँद बिन गहना।

    यह बेचारी दा'वत की ख़बरगीरी में लगी हुई है हर-एक खाने की ताकीद कर रही है कि, “ख़बरदार खाना मज़ेदार हो और नमक-पानी, बू-बास दुरुस्त रहे!” इस मेहनत से उसका गुलाब सा बदन पसीने-पसीने हो रहा है।

    मैं पास जाकर सदक़े हुआ और इस समझ और लियाक़त को सराहकर दुआ’यें देने लगा। यह ख़ुशामद सुनकर, त्यौरी चढ़ाकर वह बोली, “आदमी से ऐसे-ऐसे काम होते हैं कि फ़रिश्ते की मजला नहीं। मैंने ऐसा क्या किया है, जो तू इतना हैरान हो रहा है? बस, बहुती सी बाते मुझे अच्छी नहीं लगती। भला, कह तो, यह कौन सी आदमीयत है कि मेहमान को अकेला बिठाकर इधर-उधर पड़ा फिरे? वह अपने जी में क्या कहता होगा? जल्द जा, मज्लिस में बैठकर मेहमान की ख़ातिरदारी कर और उसकी मा'शूक़ा को भी बुलवाकर उसके पास बिठला।”

    यह सुनते ही मैं उस जवान के पास गया, गर्म जोशी से उसका स्वागत करने लगा। इतने में दो खू़बसूरत गु़लाम सुराही और जड़ाऊ जाम लिए रू-ब-रू आये और शराब पिलाने लगे। उसी समय मैंने उस जवान से कहा, “मैं सब तरह मुख़्लिस और ख़ादिम हूँ। बेहतर यह है कि वह रूपवती जिसकी तरफ़ साहब का दिल है, तशरीफ़ लावे, तो बड़ी बात है। अगर फ़रमाओ तो आदमी बुलावे की ख़ातिर जावे।”

    इस फ़क़ीर ने लाचार मेहमान का इस्तिक़बाल करके निहायत तपाक से उस जवान के बराबर ला बिठाया। जवान उसे देखते ही ऐसा खु़श हुआ जैसे दुनिया की नेमत मिली। वह भुतनी भी उस जवान परीज़ाद के गले लिपट गई। सच-मुच ऐसा तमाशा हुआ जैसे चौदहवीं चाँद को गहन लगता है। मज्लिस में जितने आदमी थे, अपनी-अपनी उंगलियाँ दांतो तले दाबने लगे कि क्या कोई बला उस जवान पर गई! सब की निगाह उसी तरफ़ थी। मज्लिस का तमाशा भूलकर सभी उसका तमाशा देखने लगे। एक शख़्स किनारे से बोला, “इश्क़ और अक़्ल में ज़िद है। जो कुछ अक़्ल में आवे, यह काफ़िर इश्क़ कर दिखावे। लैला को मजनूँ की आंखों से देखो।”

    सभों ने कहा, “सच, यही बात है।”

    यह फ़क़ीर उसके हुक्म के मुताबिक़ मेहमानदारी में हाज़िर था। हरचन्द वह नौजवान अपने साथ खाने-पीने पर मजबूरर करता था। पर मैं हरगिज़ उस परी के डर के मारे अपना दिल खाने-पीने या सैर तमाशे की तरफ़ लगाता था और मेहमानदारी का बहाना करके उनमें शामिल होता था। इसी हालत में तीन दिन और तीन रातें गुज़रीं। चौथी रात वह नौजवान निहायत जोश से बुलाकर कहने लगा, “अब हम भी रुख़्सत होंगे। तुम्हारी ख़ातिर अपना सब कारोबार छोड़-छाड़कर तीन दिन से तुम्हारी ख़िदमत में हाज़िर है। तुम भी तो हमारे पास एकदम बैठकर हमारा दिल खु़श करो।”

    मैंने अपने जी में ख़याल किया कि अगर इस वक़्त इसका कहना नहीं मानता तो दुखी होगा। इस वास्ते नये दोस्त और मेहमान की ख़ातिर रखनी ज़रूरी है। तब यह कहा, “साहब का हुक्म बजा लाना मंज़ूर है!”

    इस बात को सुनते ही उस जवान ने प्याला सामने किया और मैंने पी लिया। फिर तो ऐसा दौर चला कि थोड़ी देर में सब आदमी मज्लिस की हालत से बेख़बर हो गए।

    जब सुब्ह हुई और सूरज कुछ ऊपर चढ़ा, तो मेरी आँख खुली। मैंने देखा कि वह तैयारी है, वह मज्लिस, परी। फ़क़त ख़ाली हवेली पड़ी है। मगर एक कोने में एक कम्बल लपेटा हुआ रखा है। जो उसको खोल कर देखा तो वह जवान और उसकी रखेल दोनों के सर कटे पड़े हैं।

    यह हालत देखते ही हवास जाते रहे। अक़्ल कुछ काम नहीं करती थी कि यह क्या था और क्या हुआ? हैरानी से हर तरफ़ तक रहा था। इतने में एक ख़्वाजासरा, जिसे दावत के इंतिज़ाम में देखा था, नज़र पड़ा। मुझे उसके देखने से कुछ तसल्ली हुई। इस वारदात का हाल पूछा। उसने जवाब दिया, “तुझे इस बात की खोज करने से क्या हासिल, जो तू पूछता है?”

    मैंने भी अपने दिल में ग़ौर किया, “सच तो कहता है।” फिर ज़रा तअम्मुल करके मैं बोला, “ख़ैर, कहो, भला यह तो बताओ कि वह मा'शूक़ा किस मकान में है?”

    तब उसने कहा, “जो मैं जानता हूँ सो कह दूँगा, लेकिन तुझ जैसे अक़्लमन्द आदमी ने हुज़ूर की मर्ज़ी बग़ैर दो-दिन की दोस्ती पर बेधड़क, बेतकल्लुफ़ होकर शराब पीना शुरु कर दिया, यह क्या मतलब रखता है?”

    मैं उसकी नसीहत सुनकर अपनी हरकत पर बहुत लज्जित हुआ। बारे महल्ली ने मेहरबान होकर उस परी के मकान का निशान बताया और मुझे रुख़्सत किया। मैं उस फ़साद की तोहमत से अलग हुआ। मैं उस परी से मिलने की उत्सुकता में घबराया हुआ, गिरता-पड़ता, ढूँढ़ता-खोजता शाम के वक़्त उस कूचे में उसी पते पर जा पहुँचा और दरवाज़े के नज़दीक सारी रात इन्तज़ार में काटी। किसी के आने-जाने की आहट मिली और किसी ने मेरा हाल पूछा। उसी बेकसी की हालत में सुब्ह हो गई। जब सूरज निकला, उस मकान के कोठे की एक खिड़की से वह चन्द्रमुखी मेरी तरफ देखने लगी। उस वक़्त जो ख़ुशी का आ'लम मुझ पर गुज़रा, दिल ही जानता है। मैंने खु़दा का शुक्र अदा किया।

    इतने में एक खोजे ने मेरे पास आकर कहा, “उस मस्जिद में तू जाकर बैठ, शायद तेरा मतलब उसी जगह पूरा हो और तू अपने दिल की मुराद पावे।” मैं उसके कहने से वहाँ से उठकर मस्जिद में चला गया, लेकिन आंखें दरवाज़ें की तरफ़ लगी हुई थीं कि देखिए ग़ैब के पर्दे से क्या ज़ाहिर होता है? जैसे रोज़ा रखने वाला सारे दिन शाम होने का इंतिज़ार करता है, मैंने भी दो दिन वैसी ही बेक़रारी में काटे। बारे जिस-तिस तरह से शाम हुई और दिन पहाड़-सा छाती से टला। यकबारगी वही ख़्वाजासरा, जिसने उस परी के मकान का पता बताया था, मस्जिद में आया, और मग़रिब की नमाज़ पढ़कर मेरे पास आया। उस मेहरबान ने, जो सारे भेद जानता था, निहायत तसल्ली देकर मेरा हाथ पकड़ लिया और अपने साथ ले गया। रफ़्ता-रफ़्ता एक बाग़ीचे में मुझे बिठाकर कहा, “जब तक तुम्हारी आशा पूरी हो यहाँ रहो।” और वह रुख़्सत होकर शायद मेरा हाल उस परी के हुज़ूर में कहने गया। मैं उस बाग़ के फूलों की बहार और चाँदनी का आ'लम, हौज़, नहरों में फ़व्वारे, सावन भादों के उछलने का तमाशा देख रहा था। लेकिन जब फूलों को देखता तो उस गुलबदन का ख़याल आता। जब चांद पर नज़र पड़ती तब उस चन्द्रमुखी का मुखड़ा याद करता। उस के बग़ैर मेरी आंखों में सब बहार कांटे की तरह थी।

    बारे ख़ुदा ने उस के दिल को मेहरबान किया। एक दम के बाद वह परी दरवाज़े से चौदहवीं के चाँद की तरह बनाव-सिंगार किये, पेशवाज बादले की, संजाफ़ के मोतियों का दुर्र दामन में टँका हुआ था और सर पर ओढ़नी जिसमें आंचल पल्लू लहर गोखरू लगा हुआ था, सर-से-पांव तक मोतियों में जड़ी रविश पर आकर खड़ी हुई। उसके आने से, नए सिरे से तर-ओ-ताज़गी उस बाग़ को और फ़क़ीर के दिल को हुई। एक दम इधर-उधर सैर करके शहनशीन में मसनद पर तकिया लगाकर बैठी।

    मैं दौड़कर जैसे परवाना शम्अ' के गिर्द फिरता है उसके सदक़े हुआ और ग़ुलाम की तरह दोनों हाथ जोड़कर खड़ा हुआ। इतने में वह ख़ोजा मेरी ख़ातिर सिफ़ारिश में अ’र्ज़ करने लगा। मैंने उसी खोज़े से कहा, “बन्दा गुनहगार और क़ुसूरवार है। जो-कुछ सज़ा मेरे लायक़ ठहरे, दी जाय।” परी चूँकि बेहद नाख़ुश थी, बददिमाग़ी से बोली कि, “अब इसके हक़ में यही भला है कि सौ तोड़े अशर्फ़ी के लेवे और अपना असबाब दुरुस्त करके वतन को सिधारे।”

    मैं यह बात सुनते ही काठ हो गया और सूख गया कि अगर कोई मेरे बदन को काटे, तो एक बूँद लहू की निकले। तमाम दुनिया आँखों के आगे अँधेरी लगने लगी। एक नामुरादी की आह बेइख़्तियार जिगर से निकली। आँसू भी टपकने लगे। सिवाए ख़ुदा की ज़ात के, उस वक़्त किसी से कोई आस रही। बिल्कुल निराश होकर सिर्फ़ इतना बोला, “भला, ज़रा अपने दिल में ग़ौर फ़रमाइये, अगर मुझ कमनसीब को दुनिया का लालच होता तो अपना जान-ओ-माल हुज़ूर में खोता। क्या यकबारगी ख़िदमतगुज़ारी और जाँनिसारी का हक़ दुनिया से उठ गया, जो मुझ कमबख़्त से आप इतनी नाराज़ हैं। ख़ैर, अब मुझे ज़िन्दगी से कोई काम नहीं। मा'शूक़ की बेवफ़ाई से बेचारे नीमजाँ आ'शिक़ का निबाह नहीं होता।”

    यह सुनकर, तीखी होकर, त्योरी चढ़ाकर गुस्से से बोली, “ख़ूब, तो आप हमारे आ'शिक़ हैं! मेंढकीं को भी ज़ुकाम हुआ? बेवक़ूफ! अपने हौस्ले से ज़्यादा बातें बनाना हवाई क़िला बनाना है। छोटा मुँह बड़ी बात। बस, चुप रह! यह निकम्मी बात मत कर। अगर किसी और ने ऐसी बेमतलब बात की होती तो, परवरदिगार की क़सम, उसकी बोटियाँ कटवाकर चीलों को बाँटती। पर क्या करूँ? तेरी ख़िदमत याद आती है। अब इसी में भलाई है कि अपनी राह ले। तेरी क़िस्मत का दाना-पानी हमारी सरकार में यहीं तलक था।”

    फिर मैंने रोते-बिसूरते कहा, “अगर मेरी तक़दीर में यही लिखा है कि अपने दिल के मक़सद को पहुँचू और जंगल-पहाड़ में सर टकराता फिरूँ तो लाचार हूँ।”

    इस बात से भी दिक़ होकर कहने लगी, “मुझे ये फुसहँदे, चोंचले और रहस्य की बातें पसन्द नहीं। इन इशारों की बातों के जो लायक़ हो, उसी से जाकर कर।” फिर उसी गु़स्से के आ'लम में उठकर अपने दौलतख़ाने को चली। मैंने बहुतेरा अपना सर पटका, उसने कोई ध्यान दिया। लाचार मैं भी वहां से उदास और ना-उमीद होकर निकला।

    गरज़ चालीस दिन तक यही नौबत रही। जब शहर की कूचा-गर्दी से उकताया, जंगल में निकल जाता। फिर शहर की गलियों में दीवाना-सा आता। दिन को खाता, रात को सोता। जैसे धोबी का कुत्ता, घर का घाट का। इन्सान की ज़िन्दगी खाने-पीने से है। आदमी अनाज का कीड़ा है। बदन में ताक़त बिल्कुल रही, अपाहिज होकर उसी मस्जिद की दीवार तले जा पड़ा कि एक दिन वही ख़्वाजासरा जुमे की नमाज़ पढ़ने आया। मेरे पास से होकर गुज़रा मैं कमज़ोरी के आ'लम में यह शे'र आहिस्ता से पढ़ रहा था-

    इस दर्द-ए-दिल से मौत हो या दिल को ताब हो।

    क़िस्मत में जो लिखा हो इलाही शिताब हो।

    अगरचे, ज़ाहिर में मेरी सूरत बिल्कुल बदल गई थी, चेहरे की शक़्ल ऐसी बनी थी कि जिसने मुझे पहले देखा था वह भी पहचान सकता था कि यही वह आदमी है, लेकिन उस ख़्वाजा ने मेरी दर्दभरी आवाज़ सुनकर, मेरी तरफ़ ध्यान किया और मुझे ग़ौर से देखकर अफ़्सोस करने लगा और मेहरबानी करके मेरी ओर मुख़ातिब हुआ कि, “आख़िर यह हालत अपनी कर डाली।”

    मैंने कहा, “अब तो जो हुआ, सो हुआ। माल से भी हाज़िर था, जान भी सदक़े की। उसकी ख़ुशी यूँ ही तो क्या करूँ?”

    यह सुनकर एक ख़िदमतगार मेरे पास छोड़कर वह मस्जिद में गया। नमाज़ और ख़ुतबे से फ़ारिग़ होकर जब बाहर निकला मुझे एक मेयाने में डालकर अपने साथ उस बेपर्वा परी की ख़िदमत में ले जाकर चिक़ से बाहर बिठाया। अगरचे मेरे चेहरे की रौनक़ कुछ बाक़ी रही थी, पर मुद्दत तलक रात-दिन उस परी के पास रहने का इत्तिफ़ाक़ हुआ था! फिर भी जान-बूझकर बेगानी होकर वह पूछने लगी, “यह कौन है?” उस आदमी ने कहा, “यह वही कमबख़्त बदनसीब है जो हुज़ूर की ख़फ़गी और ग़ुस्से में पड़ा था। उसी सबब से इसकी यह सूरत बनी है। इश्क़ की आग से जला जाता है। हरचन्द उस आग को आँसुओं के पानी से बुझाना चाहता है, पर वह दूनी भड़कती है। कुछ फ़ायदा नहीं। इसके अ'लावा अपने क़ुसूर के पछतावे से मरा जाता है।”

    परी ने ठिठोली से फ़रमाया, “क्यों झूठ बकता है? बहुत दिन हुए, उसके वतन पहुँचने की ख़बर, मुझे ख़बरदारों ने दी है। ख़ुदा जाने यह कौन है और तू किसका ज़िक्र करता है?” उस दम ख़्वासासरा ने हाथ जोड़कर अ’र्ज़ किया, “अगर जान से अमां पाऊँ तो तो अ’र्ज़ करूँ।” परी ने फ़रमाया, “तेरी जान तुझे बख़्शी।”

    ख़ोजा बोला, “आप की ज़ात क़द्रदान है। ख़ुदा के वास्ते चिलमन को दर्मियान से उठवाकर ज़रा पहचानिये और इसकी बेकसी की हालत पर रहम कीजिये। किसी का हक़ पहचानना अच्छा नहीं। अब इसके हाल पर जो कुछ तरस खाइये, बजा है। इससे सवाब होगा। इससे ज़ियादा कहना अदब से बाहर होगा। जो मिज़ाज-ए-मुबारक में आवे, वही बेहतर है।”

    इतना कहने पर मुस्कराकर फ़रमाया, “भला कोई हो, उसे दारुश्शफ़ा में रखो। जब भला-चंगा होता तब इसके हाल की पुर्सिश की जाएगी।” ख़ोजा ने कहा, “अगर अपने दस्त-ए-ख़ास से इस पर गुलाब छिड़किये और ज़बान से कुछ फ़रमाइये तो इसको अपने जीने का भरोसा बँधे। नाउमीदी बुरी चीज़ है। दुनिया उमीद पर क़ायम है।” इस पर उस परी ने कुछ कहा।

    यह सवाल जवाब सुनकर मैं भी अपने जी से उकता रहा था। निधड़क बोल उठा, “अब इस तौर की ज़िन्दगी को दिल नहीं चाहता। पाँव तो क़ब्र में लटका चुका हूँ। मेरा इलाज राजकुमारी के हाथ में है, करें या करें। बारे दिलों पर क़ुदरत रखने वाले ने उस पत्थरदिल को नर्म किया। मेहरबान होकर फ़र्माया, जल्द शाही हक़ीमों को हाज़िर करो।”

    इस हुक्म के साथ ही हकीम आकर जमा' हुए। नब्ज़ देखकर बहुत ग़ौर किया। आख़िर तश्ख़ीस यह ठहरी कि ये शख़्स कहीं आ'शिक़ हुआ। सिवाय मा'शूक़ से वस्ल (संयोग) के इसका कोई इलाज नहीं। जिस वक़्त वह मिले, ये सेहत पावे। जब हकीमों की ज़बानी भी मेरा मर्ज़ यही साबित हुआ, उसने हुक्म दिया, “इस नौजवान को गर्माबे में ले जाओ। नहलाकर, ख़ासी पोशाक पहनाकर हुज़ूर में ले आओ।”

    यह हुक्म मिलते ही मुझे बाहर ले गए। हम्माम करवाकर, अच्छे कपड़े पहनाकर उस परी की ख़िदमत में हाज़िर किया। तब वह नाज़नीन तपाक से बोली, “तूने मुझे बैठे-बिठाए नाहक़ बदनाम और रुसवा किया। अब और क्या किया चाहता है? जो तेरे दिल में है, साफ़-साफ़ बयान कर।”

    फ़क़ीरों! उस वक़्त यह आ'लम हुआ कि ऐसा लगता था कि मैं ख़ुशी के मारे मर जाऊँगा। ऐसा फूला कि जामे में समाता था। सूरत-शक्ल बदल गई। ख़ुदा का शुक्र किया और उससे कहा, “इस दम सारी हकीमी आप पर ख़त्म हुई कि मुझ-से मुर्दे को एक बात में ज़िन्दा किया। देखो तो, उस वक़्त से इस वक़्त तक मेरे हाल में कितना फ़र्क़ हो गया?” यह कहकर तीन बार उसके गिर्द फिरा और सामने आकर खड़ा हुआ। उसने कहा, “हुज़ूर से यह हुक्म होता है कि जो तेरे जी में है, सो कह!”

    “बन्दे के लिये सात मुल्कों की बादशाहत से ज़ियादा यह है कि ग़रीबनवाज़ी करके इस आ'जिज़ को क़ुबूल कीजिये और अपनी क़दमबोसी से सरफ़राज़ी दीजिये।”

    एक लम्हा तो वह मेरी बात सुनकर ग़ोते में गई, फिर कनखियों से देखकर कहा, “बैठो, तुमने ख़िदमत और वफ़ादारी ऐसी ही की है, जो-कुछ कहो सो फबती है और अपने दिल पर भी नक़्श है। ख़ैर, हमने क़ुबूल किया!”

    उसी दिन अच्छी साअ'त और शुभ लगन में चुपके-चुपके क़ाज़ी ने निकाह पढा दिया और इतनी मेहनत और आफ़त के बाद खु़दा ने यह दिन दिखाया कि मैंने अपने दिल की मुराद पाई। लेकिन दिल में जैसी आर्ज़ू उस परी से हम बिस्तर होने की थी वैसी ही जी में बेकली उस अ'जीब वारदात को मा]लूम करने की भी थी, क्योंकि आज तक मैं यह समझ सकता था कि यह परी कौन है? और वह साँवला, सजीला हब्शी कौन है जिसने काग़ज़ के एक पुर्ज़े पर इतनी अशर्फ़ियों के बदरे मेरे हवाले किये थे? और बादशाहों के लायक़ दा'वत की तैयारी एक ही पहर में क्यों कर हुई? और वे दोनों बेगुनाह उस मज्लिस में क्यों मारे गए और बावजूद ख़िदमतगुज़ारी और नाज़बर्दारी के, मेरे साथ ख़फ़्गी और ग़ुस्से का सबब क्या हुआ? ग़रज़ इसी वास्ते निकाह की रस्म हो जाने के आठ दिन बाद भी संयोग का इरादा किया, रात को साथ सोता, दिन को यँहीं उठ खड़ा होता।

    एक दिन ग़ुस्ल करने के लिये मैंने एक ख़व्वास को कहा कि, “थोड़ा पानी गर्म कर दे तो मैं नहाऊँ।” मल्का मुस्कराकर बोली, “किस बिरते पर तित्ता पानी?” मैं खामोश हो रहा। लेकिन वह परी मेरी हरकत से हैरान हुई। यहाँ तक कि एक रोज़ बोली, “तुम भी अ'जब आदमी हो, या इतने गर्म या ठंडे, इसको क्या कहते हैं? अगर तुम में इतनी ताक़त थी तो क्यों ऐसी कच्ची हवस पकाई?”

    उस वक़्त मैंने बेधड़क कहा, “ऐ, जानी मुन्सिफ़ी शर्त है। आदमी को चाहिये कि इंसाफ़ से चूके।”

    बोली, “अब क्या इंसाफ़ रह गया है? जो कुछ होना था, सो हो चुका।”

    मैंने कहा, “वाक़ई बड़ी आर्ज़ू और मुराद मेरी यही थी, सो मुझे मिली। लेकिन मेरा दिल दुबिधे में है और दो दिली आदमी की ख़ातिर परेशान रखती है। उससे कुछ नहीं हो सकता। वह इंसानियत से खारिज हो जाता है। मैंने अपने दिल में क़ौल किया था कि इस निकाह के बाद (जो सही मा'नों में दिल की शादी है) बाज़ी-बाज़ी बातें, (जो ख़याल में नहीं आतीं और नहीं खुलतीं) हुज़ूर से पूछूँगा ताकि ज़ुबान-ए-मुबारक से बयान उसका सुनूँ तो जी को तस्कीन हो।”

    उस परी ने चीं-बजबीं होकर कहा, “क्या खूब! अभी से भूल गए! याद करो, बारहा हमने कहा है कि हमारे काम में हरगिज़ दख़ल दीजियो और किसी बात में ए'तिराज़ कीजियो। मा'मूल के खिलाफ़ यह बेअदबी करना क्या लाज़िम है?”

    फ़क़ीर ने हँसकर कहा, “जैसे और बेअदबियाँ माफ़ करने का हुक्म है, एक यह भी सही?”

    वह परी नज़रें बदलकर आग-बबूला बन गई और बोली, “अब तू बहुत सर चढ़ा! जा अपना काम कर, इन बातों से तुझे क्या फ़ायदा होगा?”

    मैं ने कहा, “दुनिया में अपने बदन की शर्म सबसे ज़ियादा होती है। लेकिन एक दूसरे का वाक़िफ़कार हो जाता है। पस, जब ऐसी चीज़ों पर्वा रखी तो और कौन सा भेद छिपाने लायक़ है?”

    मेरे इस रहस्य को वह परी अपनी सूझ-बूझ से मा'लूम करके कहने लगी, “यह सच बात है। पर जी में यह सोच आता है कि अगर मुझ निगोड़ी का राज़ फाश हो तो बड़ी क़मायत मचे।”

    मैं बोला, “यह क्या ज़िक्र है? बन्दे की तरफ़ से यह ख़याल दिल में लाओ और ख़ुशी से सारी कैफ़ियत जो बीती है, फ़रमाओ। हरगिज़ मैं दिल से ज़बान तक लाऊँगा। किसी के कान पड़े क्या मजाल है?” जब उसने यह देखा कि अब सिवाय कहने के इस अज़ीज़ से छुटकारा नहीं तो लाचार होकर बोली, “इन बातों को कहने में बहुत-सी ख़राबियाँ हैं। तू ख़्वाह-मख़्वाह दरपै हुआ। ख़ैर, तेरी ख़ातिर अज़ीज़ है, इसलिये अपनी सरगुज़िश्त बयान करती हूँ। तुझे भी उसको पोशीदा रखना ज़रूरी है। ख़बर शर्त!”

    ग़रज़ बहुत-सी ताकीद करके कहने लगी कि मैं बदबख़्त मुल्क दमिश्क़ के सुल्तान की बेटी हूँ और वह सारे सुल्तानों से बड़ा बादशाह है। सिवाय मेरे कोई लड़का-बाला उसके यहाँ नहीं हुआ। जिस दिन से पैदा हुई, माँ-बाप के साए में नाज़-ओ-नेअ'म और ख़ुशख़ुर्रमी से पली। जब होश आया, अपने दिल को ख़ूबसूरतीं और नाज़नीनों के साथ लगाया। चुनाँचे सुथरी-सुथरी परीज़ाद हमजोली अमीरज़ादियाँ मुसाहिबत में और अच्छी-अच्छी क़ुबूल सूरत हमउम्र ख़्वासें सहेलियाँ ख़िदमत में रहती थीं। तमाशा-नाच और राग-रंग का हमेशा देखा करतीं, दुनिया के भले-बुरे से कुछ सरोकार था। अपनी बेफ़िक्री के आ'लम को देखकर सिवाय ख़ुदा के शुक्र के कुछ मुँह से निकलता था।

    इत्तिफ़ाक़न तबीअ'त ऐसी बेमज़ा हुई कि किसी की भावे, नख़ुशी की मज्लिस खुश आवे। सौदाई सा मिज़ाज हो गया, दिल उदास और हैरान, किसी की सूरत अच्छी लगे, बात कहने-सुनने को जी चाहे। मेरी यह हालत देखकर दाई-ददा, छूछूअंगा, सब की सब फ़िक्र में पड़ गईं और क़दम पर गिरने लगीं। यही नमकहलाल ख़्वाजासरा बहुत पहले से मेरा राज़ादर और वाक़िफ़कार है। इससे कोई बात छुपी नहीं। मेरी वहशत देखकर बोला कि अगर राजकुमारी थोड़ा सा शर्बत वर्क़ुल-ख़याल का पी लिया करें तो मुम्किन है कि तबिअ'त बहाल हो जाय और मिज़ाज में ठंडक आवे। उसके इस तरह कहने से मुझे भी शौक़ हुआ। तब मैंने फ़रमाया, ‘जल्द हाज़िर कर।’

    ख़ोजा बाहर गया और एक सुराही उसी शर्बत की तकल्लुफ़ से बनाकर बर्फ़ में लगाकर लड़के के हाथ लिवाकर आया और जो कुछ फ़ायदा बयान किया था, वैसी ही देखा। उसी वक़्त उस ख़िदमत के इनआ’म में एक भारी ख़िलअ'त ख़ोजे को इनायत की और हुक्म किया कि, “एक सुराही हमेशा इसी वक़्त हाज़िर किया कर।” उस दिन से यह दस्तूर हो गया कि ख़्वाजासरा सुराही उसी छोकरे के साथ लिवा लावे और बन्दी पी जावे। जब उसका नशा शुरू होता तो उसकी लहर में उस लड़के से ठट्टा, मज़ाक करके दिल बहलाती थी। वह भी जब ढीठ हुआ, तब अच्छी-अच्छी मीठी-मीठी बातें करने लगा और अचम्भे की नक़लें करने लगा, बल्कि आह-ओ-ज़ारी भी भरने लगा और सिसकियाँ भी लेने लगा। सूरत तो उसकी तरहदार, लायक़ देखने के थी। बेइख्तियार जी चाहने लगा। मैं दिल के शौक़ से और अटखेलियों के ज़ौक़ से हर-रोज़ इनआ’म बख़्शिश देने लगी। पर वह कम्बख़्त उन्हीं कपड़ों में जो महेशा से पहन रहा था, हुज़ूर में आता, बल्कि वह लिबास भी मैला-कुचैला हो जाता।”

    “एक दिन पूछा कि ‘तुझे सरकार से इतना-कुछ मिला, पर तूने अपनी सूरत वैसी की वैसी ही परेशान रखी। क्या सबब है? वे रुपये कहां ख़र्च किये या जमा' कर रखे?’ लड़के ने यह ख़ातिरदारी की बातें जो सुनीं और मुझे हाल-पुर्सां पाया तो आंसू डबडबाकर कहने लगा, ‘जो कुछ आप ने इस ग़ुलाम को इनायत किया, सब उस्ताद ने ले लिया। मुझे एक पैसा नहीं दिया। कहां से दूसरे कपड़े बनवाऊं जो पहनकर हुज़ूर में आऊँ? इसमें मेरा क़ुसूर नहीं, मैं लाचार हूँ।’ उसके इस ग़रीबी के कहने पर तरस आया। उसी वक़्त ख़्वाजासरा से फ़रमाया कि ‘आज से इस लड़के को अपनी सुहबत में तर्बियत कर और अच्छा लिबास तैयार करवाकर पहना और लौंडों में बेफ़ायदा खेलने-कूदने दे। बल्कि अपनी ख़ुशी यह है कि हुज़ूर की ख़िदमत के लायक़ आदाब सीखे और हाज़िर रहे।’ ख़्वाजासरा मेरे फ़रमाने के मुआफ़िक़ हुक्म बजा लाया और मेरी मर्ज़ी जो उधर देखी उसकी निहायत ख़बरगीरी करने लगा।

    थोड़े दिनों में फ़राग़त पाने और अच्छा खाने-पीने से उसका रंग-रौगन कुछ-का-कुछ हो गया और केंचुली सी डाल दी। मैं अपने दिल को हरचन्द संभालती पर उस काफ़िर की सूरत जी में ऐसी बसी कि यही जी चाहता कि मारे प्यार के उसे कलेजे में डाल रखें और अपनी आँखों से एक पल जुदा करूँ।

    आख़िर उसको मुसाहिबत में दाख़िल किया और तरह-ब-तरह की ख़िलअ'तें और रंग-बिरंग के जवाहिरात उसे पहनाकर देखा करती। वारे उसके नज़दीक रहने से आँखों को सुख, और कलेजे को ठंडक हुई। हर दम उसकी ख़ातिरदारी करती, आख़िर को मेरी हालत यहाँ तक पहुँची कि अगर एक दम को कुछ ज़रूरी काम को मेरे सामने से हट जाता तो चैन आता।

    कई बरस के बाद जब वह बालिग़ हुआ, मसें भीगने लगीं, छब-तख़्ती दुरुस्त हुई तब उसका चर्चा बाहर दरबारियों में होने लगा। दरबान, खन्ने, बारीदार, यसावल और चोबदार उसको महल के अन्दर आने-जाने से मनअ’' करने लगे। आख़िर उसका आना-जाना बन्द हुआ। मुझे उसके बग़ैर कल पड़ती थी, वक़्त एक दम पहाड़ सा गुज़रता। जब यह हाल नाउमीदी का सुना, ऐसी बहदवास हो गई गोया मुझ पर क़यामत टूटी और यह हालत हुई कि कुछ कह सकती हूँ। कुछ बस नहीं चल सकता, इलाही क्या करूँ।

    मुझे अ'जब तरह का क़लक़ हुआ और मारे बेक़रारी के उसी ख़ोजे को जो मेरा भेदी था, बुलाकर कहा, “मुझे उस लड़के का ख़याल और उसकी परवरिश मंज़ूर है। इस वक़्त की मस्लहत यह है कि एक हज़ार अशर्फ़ी पूँजी देकर चौक के चौराहे पर दुकान जौहरी की करवा दो जिससे तिजारत करके उसके नफ़े से अपनी गुज़र फ़राग़त से कर लिया करे और मेरे महल के क़रीब एक हवेली अच्छे नक़्शे की उसके रहने के लिये बनवा दो। लौंडी-गु़लाम, नौकर-चाकर जो ज़रूर हों, मोल लेकर और तनख़्वाह मुक़र्रर करके उसके पास रखवा दो कि किसी तरह बेआराम हो।”

    उस ख़्वाजासरा ने उसके रहने-सहने औऱ जौहरी का काम करने और तिजारत की सब तैयारी कर दी। थोड़े अर्से में उसकी दूकान ऐसी चमकी और ऐसी तरक़्क़ी हुई कि जो क़ीमती और शानदार ख़िलअ'तें और क़ीमती जवाहिरात, बादशाह की सरकार में और अमीरों के यहाँ दरकार होते, उसी के यहाँ मिलते। आहिस्ता-आहिस्ता यह दुकान ऐसी जमी कि जो तोहफ़ा हर एक मुल्क़ का चाहिये, वहीं मिले। सब जौहरियों का रोज़गार उसके आगे मन्दा हो गया। गरज़ उस शहर में उसकी बराबरी कोई कर सकता बल्कि किसी मुल्क में कोई वैसा था।

    उस कारोबार में उसने तो लाखों रुपये कमाए। पर जुदाई उसकी रोज-बरोज़ मेरे तन-बदन का नुक़सान करने लगी। कोई तदबीर बन आई कि उसको देखकर अपने दिल की तसल्ली करूँ। सलाह की ख़ातिर उसी वाक़िफ़कार महल्ली (ख़ोजे) को बुलाया और कहा, “कोई ऐसी सूरत बन नहीं आती कि ज़रा उसकी सूरत देखूं और अपने दिल को सब्र दूँ मगर एक उपाय यह है कि एक सुरंग उस हवेली से खुदवा कर महल में मिलवा दो। हुक्म करते ही थोड़े दिनों में ऐसी नक़ब तैयार हुई कि सांझ होते ही चुपके ही वह ख़्वाजासरा उस जवान को उसी राह से ले आता। तमाम रात शराब-ओ-कबाब और ऐ’श-ओ-इशरत में कटती। मैं उस से मिलने से आराम पाती, वह मेरे देखने से खु़श होता। जब सुब्ह का तारा निकलता और मोअज़्ज़िन अज़ान देता, महल्ली उसी राह से उस जवान को उसके घर पहुंचा देता। इन बातों से सिवाय उस ख़ोजे के और दो दाइयों के (जिन्होंने मुझे दूध पियाला और पाला था) चौथा आदमी कोई वाक़िफ़ था।

    मुद्दत तलक इस तरह से गुज़री। एक रोज़ यह इत्तिफ़ाक़ हुआ कि हस्ब-मामूल ख़्वाजासरा उसको बुलाने गया। देखा तो वह जवान फ़िक्रमन्द सा चुपका बैठा है। महल्ली ने पूछा, “आज ख़ैर तो है, क्यों ऐसे रंजीदा हो रहे हो? चलो, हुज़ूर ने याद फ़रमाया है।”

    उसने हरगिज़ कुछ जवाब दिया, ज़बान हिलाई। ख़्वाजासरा अपना-सा मुँह लेकर अकेला फिर आया और उसका हाल अ'र्ज़ किया। मुझे जो शैतान ने ख़राब किया, उस पर भी मुहब्बत उसकी दिल से भूली। अगर यह जानती कि उस नमकहराम बेवफ़ा की इश्क़ और चाह आख़िर को बदनाम और रुस्वा करेगी और इज्ज़त, लाज सब ठिकाने लगेगी, तो उसी दम उस काम से बाज़ आती और तौबा करती। फिर उसका नाम लेती, अपना दिल उस बेहया को देती। पर होना तो यूँ था, इसलिए उसकी बेजा हरकत को ख़ातिर में लाई और उसके आने को मा'शूक़ों का चोंचला और नाज़ समझा। उसका नतीजा यह देखा कि इस सरगुज़िश्त से बग़ैर देखे-भाले तू भी वाक़िफ़ हुआ। नहीं तो मैं कहां और तू कहां? ख़ैर हो हुआ, सो हुआ। इसकी ख़रदिमाग़ी पर ख़याल करो।

    दोबारा मैंने ख़ोजे के हाथ पैग़ाम भेजा कि “अगर तू इस वक़्त नहीं आवेगा तो मैं किसी किसी ढब से वहीं आती हूँ। लेकिन मेरे आने में बड़ी क़बाहत है। अगर यह राज़ फ़ाश हुआ तो तेरे हक़ में बहुत बुरा है। तब ऐसा काम कर जिसमें सिवाय रुस्वाई के और कुछ फल मिले। बेहतर यही है कि जल्द चला आ, नहीं तो मुझे पहुँचा जान। जब यह सन्देसा गया और मेरा निपट इश्तियाक़ देखा, भोंडी सी सूरत बनाए हुए नाज़-नख़रे से आया।

    जब मेरे पास बैठा तब मैंने उससे पूँछा कि, “आज रुकावट और खफ़्गी का क्या सबब है? इतनी शोख़ी और गुस्ताख़ी तूने कभी की थी। हमेशा बिला-उ’ज़्र हाज़िर होता था।”

    तब उसने कहा, “मैं गुमनअ’म ग़रीब हुज़ूर की तवज्हजोह से, और आप की मेहरबानी के सबब इस हैसियत को पहुँचा। बहुत आराम से ज़िन्दगी कटती है। आप के जान-ओ-माल को दुआ’' करता हूँ। यह कु़सूर राजकुमारी के मा'फ़ करने के भरोसे पर मुझ से हुआ। मुआ'फ़ी का उम्मीदवार हूँ।”

    मैं जो जान-ओ-दिल से उसे चाहती थी। उसकी बनावट की बातों को मान लिया और शरारत पर नज़र की। बल्कि फिर दिल्दारी से पूछा, “क्या तुझ को ऐसी मुश्किल पेश आई जो ऐसा परेशान हो रहा है। उसको अ’र्ज़ कर, उसकी भी तदबीर हो जाएगी।”

    ग़रज़ उसने अपनी ख़ाकसारी की राह से यही कहा, “मुझ को सब मुश्किल है, आप के सामने सब आसान है।” आख़िर उसकी बातों के ढंग से और बतकहाव से यह खुला कि एक बाग़, निहायत सरसब्ज़ और इमारत आ'ली, हौज़, तालाब कुईं पुख़्ता समेत, उस की हवेली के नज़दीक बीच शहर में बिकाऊ है, और उसी बाग़ के साथ एक लौंडी भी, जो गायन और संगीत में ख़ूब सलीक़ा रखती है। ये दोनों एक-साथ बिक रहे हैं अकेला बाग़, अकेली लौंडी, जैसे ऊंट के गले में बिल्ली। जो कोई वह बाग़ ले, कनीज़ की क़ीमत भी दे और तमाशा यह है कि बाग़ का मोल पांच हज़ार रुपये और उस बांदी का पांच लाख। मुझ नाचीज़ से इतनी बड़ी रक़म का बन्दोबस्त नहीं हो सकता।

    मैं ने उसके दिल में उनकी ख़रीदारी का बहुत बेइख़्तियार शौक़ पाया और इसी वास्ते, उसके मन में उलझन और दिल में परेशानी थी। वाबजूदे कि वह मेरे रू-बरू बैठा था, उसका चेहरा उतरा हुआ और जी उदास था। मुझे तो हर घड़ी और पल उसकी ख़ातिरदारी मंज़ूर थी। उसी वक़्त ख़्वाजासरा को मैं ने हुक्म दिया कि, “कल सुब्ह को उस बाग़ की क़ीमत लौंडी समेत चुकाकर, क़िबाला बाग़ का और ख़त कनीज़ का लिखवाकर इस शख़्स के हवाले करो और मालिक को नक़्द क़ीमत शाही खज़ाने से दिलवा दो।”

    इस हुक्म के सुनते ही वह जवान आदाब बजा लाया और उसके मुँह पर रौनक़ गई। सारी रात उसी क़ायदे से जैसे हमेशा गुज़रती थी, हँसी-खुशी से कटी। ख़ोजे ने मेरे कहने के मुताबिक़ उस बाग़ को और लौंडी को ख़रीद दिया। फिर वह जवान हस्ब-मा'मूल रात को आया-जाया करता।

    एक रोज़ बहार के मौसम में जब कि मकान भी दिलचस्प था, बदली उँमड़ रही थी, फुहारें पड़ रही थीं, बिजली भी कौंद रही और हवा नर्म-नर्म बहती थी। ग़रज़ अ'जब कैफ़ियत उस दम थी। जैसे ही रंग-बिरंग के हबाब और गुलाबियाँ ताक़ पर चुनी हुई नज़र पड़ी, दिल ललचाया कि एक घूँट लूँ, जब दो-तीन प्यालों की नौबत पहुँची, वैसे ही उस नए ख़रीदे हुए बाग़ का ख़याल गुज़रा। मेरा शौक़ बढ़ा कि इस आ'लम में कुछ देर वहाँ की सैर किया चाहिये।

    कमबख़्ती जो आवे, ऊँट चढ़े, कुत्ता काटे। बैठे-बिठाए जो दिल में यह समाई तो एक दाई को साथ लेकर सुरंग की राह से उस जवान के मकान को गई और वहाँ से बाग़ की तरफ़ चली। देखा तो सचमुच बाग़ की बहार स्वर्ग की बराबरी कर रही है। बारिश के क़तरे जो दरख़्तों के सरसब्ज़ पत्तों पर पड़े हैं, तो गोया ज़मुर्रद की पटरियों पर मोती जड़े हैं, और उस बदली में फूलों की सुर्ख़ी ऐसी लगती है जैसे शाम को धनुष फूली हो और नहरें लबालब, आईने के फ़र्श की तरह नज़र आती हैं, और मौजें लहराती हैं!

    गरज़ उस बाग़ में हर तरफ़ सैर करती फिरती थी कि दिन ढल गया, शाम की सियाही ज़ाहिर हुई। इतने में वह जवान एक रविश पर नज़र आया और मुझे देखकर बहुत अधब और गर्मजोशी से आगे बढ़के मेरे हाथ को अपने हाथ पर धरकर बारादरी की तरफ ले चला। जब मैं वहाँ गई तो वहाँ के आ'लम ने सारे बाग़ की क़ैफ़ियत को दिल से भुला दिया। रोशनी का यह ठाठ था, कि जा-बजा सर्व-चिराग़ाँ, कँवल और फ़ानूसें रौशन थीं और फ़ानूस-ए-ख़याल और शम्अ'-ए- मजलिस हैरान कि शब-ए-बरात चाँदनी और चिराग़ों के बावजूद उसके आगे अँधेरी लगती। एक तरफ़ आतिशबाज़ी, फुलझड़ी, अनार दाऊदी, भुचनिया, मरबारीद, महताबी हवाई चर्ख़ी, हथ-फूल, जाही, जूही, पटाखें, सितारे छुटते थे।

    इस अर्से में बादल फट गया और चाँद निकल आया, बिलकुल जैसे नाफ़रमानी जोड़ा पहने हुये कोई मा'शूक़ नज़र आता है। समाँ बँध गया, चाँदनी छिटकते ही जवान ने कहा कि, “अब चलकर बाग़ के बालाख़ाने पर बैठिये।”

    मैं ऐसी अहमक़ हो गई थी कि जो वह निगोड़ा कहता, सो मान लेती। अब यह नाच नचाया कि मुझको ऊपर ले गया। वह कोठा ऐसा बुलन्द था कि तमाम शहर और बाज़ार के चिराग़ उसके नीचे वाले बाग़ में शामिल मा'लूम होते थे।

    मैं उस जवान के गले में बाँह डाले हुए खु़शी के आ'लम में बैठी थी। इतने में एक बेस्वा, निहायत-भोंडी-सी, ‘सूरत शकल चूल्हे में से निकल,’ शराब का शीशा हाथ में लिये हुए पहुँची। मुझे उस वक़्त उसका आना बहुत बुरा लगा और उसकी सूरत देखने से दिल में हौल उठी।

    तब मैंने घबराकर जवान से पूछा, “यह बला कौन है? तूने कहाँ से पैदा की?” वह जवान हाथ बाँधकर कहने लगा कि, “यह वही लौंडी है, जो इस बाग़ के साथ हुज़ूर की इनायत से ख़रीद हुई।”

    मैंने मा'लूम किया कि इस अहमक़ ने बड़ी ख़्वाहिश से इसको लिया है, शायद इसका दिल उस पर मायल है। इसी वजह से पेच-ओ-ताब खाकर चुपकी हो रही।

    लेकिन दिल उसी वक़्त से मुकद्दर हो गया, नाख़ुशी मिज़ाज पर छा गई, तिस पर क़यामत उस ऐसे-तैसे ने यह की कि साक़ी उस बेशर्म को बनाया। उस वक़्त मैं अपना लहू पीती थी और जैसे तूती को कोई कव्वे के साथ एक पिंजरे में बन्द करता है, जाने की फ़ुर्सत पाती थी और बैठने को जी चाहता था।

    क़िस्सा मुख़्तसर वह बूँद-की-बूँद ऐसी शराब थी, जिसके पीने से आदमी हैवान हो जावे। उसने दो चार जाम पै-दरपै उसी तेज़ पानी के, जवान को दिये और आधा प्याला जवान की मिन्नत से मैंने ज़हरमार किया। आख़िर वह बेहया भी बदमस्त होकर उस मरदूद से बेहूदा अदाएं करने लगी और वह चिबिल्ला भी नशे में बेलिहाज़ हो चला और नामा'क़ूल हरकतें करने लगा।

    मुझे ऐसी ग़ैरत आई कि अगर उस वक़्त ज़मीन फटे तो मैं समा जाऊँ। लेकिन उसकी दोस्ती के कारण, मैं उस पर भी चुप रही।

    पर वह तो असल का पाजी था, मेरे इस दरगुज़र करने को समझा। नशे की लहर में और भी दो प्याले चढ़ा गया कि रहता-सहता होश जो था, वह भी गुम हुआ और मेरी तरफ़ से बिल्कुल धड़का जी से उठा दिया। उस बेवफ़ा में वफ़ा उस बेहया में हया। जैसी रूह वैसे फ़रिश्ते। मेरी उस वक़्त यह हालत थी कि ऊसर चौके डोमनी गावे, ताल बेताल अपने-ऊपर ला'नत करती थी कि ‘क्यों तूँ यहाँ आई जिसकी यह सज़ा पाई?’

    आख़िर कहाँ तक सहूँ? मेरे सर से पांव तक आग लग गई और अंगारों पर लोटने लगी। इस ग़ुस्से और तैश में यह कहावत ‘बैल कूदा कूदे कौन, यह तमाशा देखे कौन!’ कहती हुई वहां से उठी।

    उस शराबी ने अपनी ख़राबी दिल में सोची कि अगर राजकुमारी इस वक़्त नाख़ुश हुई तो कल मेरा क्या हाल होगा और सुब्ह को क्या क़यामत मचेगी? अब यह बेहतर है कि राजकुमारी को मार डालूं। यह इरादा उस ग़ैबानी की सालह से जी में ठहराकर, गले में पटका डालकर मेरे पांव पर गिर पड़ा और पगड़ी सिर से उतारकर मिन्नत-ओ-ज़ारी करने लगा।

    मेरा दिल तो उस पर लट्टू हो रहा था, जिधर लिये फिरता था। चक्की की तरह उसके इख़्तियार में थी। जो कहता था सो करती थी। ज्यूँ-त्यूँ फुसला-बहलाकर फिर बिठलाया और उसी शराब-ए-दो आतशा के दो-चार प्याले आप भी पिये और मुझे भी पिलाए। एक तो ग़ुस्से के मारे जल-भुनकर कबाब हो रही थी, दूसरे ऐसी शराब थी कि जल्द बेहोश हो गई। कुछ हवास बाक़ी रहे। तब उस बेरहम, नमकहराम, कट्टर, संग-दिल ने तलवार से मुझे घायल किया, बल्कि अपनी दानिस्त में मार चुका। उस दम मेरी आंख खुली तो मुँह से यही निकला, “ख़ैर जैसा हमने किया वैसा पाया, लेकिन तू ख़ुद को मेरे ख़ून-ए-नाहक़ से बाचइयो-

    मबादा हो कोई ज़ालिम तेरा गरीबांगीर।

    मेरे लहू को तो दामन से धो, हुआ सो हुआ।।

    किसी से यह भेद ज़ाहिर कीजियो, हमने तो तुझसे जान तक दरगुज़र की। इसपर उसको ख़ुदा के हवाले करके मेरा जी डूब गया। मुझे अपनी सुध-बुध कुछ रही।

    शायद उस क़साई ने मुझे मुर्दा ख़याल करके क़िले की दीवार के तले लटका दिया। सो, तूने देखा, मैं किसी का बुरा चाहती थी। लेकिन ये ख़राबियां क़िस्मत में लिखी थीं। मिटती नहीं कर्म की रेखा। इन आंखों के सबब यह कुछ देखा, अगर खूबसूरतों के देखने का दिल में शौक़ होता तो वो बदबख़्त तेरे गले का तौक़ होता। अल्लाह ने यह काम किया कि तुझको वहां पहुँचा दिया और सबब मेरी ज़िन्दगी का किया। अब हया जी में आती है कि ये रुसवाइयां उठाकर ख़ुद को जीता रखूँ, या किसी को मुँह दिखाऊँ? पर क्या करूँ, मरने का इख़्तियार अपने हाथ में नहीं, ख़ुदा ने मारकर फिर जिलाया, आगे देखिये क़िस्मत में क्या लिखा है।

    ज़ाहिर में तो तेरी दौड़-धूप और ख़िदमत काम आई, जो वैसे ज़ख़्मों से शिफ़ा पाई। तूने जान-ओ-माल से मेरी ख़ातिर की और जो कुछ अपनी बिसात थी हाज़िर किया। उन दिनों तुझे बेख़र्च और परेशान देखकर वो रुक़्क़ा शैदी बहार को (जो मेरा ख़जांची है) लिखा, उसमें यही मज़मून था कि मैं ख़ैर-ओ-आ’फ़ियत से अब फ़लाने मकान में हूँ और मुझ बदक़िस्मत की ख़बर वालिदा-ए-शरीफ़ा की ख़िदमत में पहुँचाइयो।

    उसने तेरे साथ दो किश्तियां नक़्द की खर्च की ख़ातिर भेज दीं औऱ जब तुझे ख़िलअ'त और जवाहिरात खरीदने को यूसुफ़ सौदागर-बच्चे की दुकान को भेजा, मुझे यह भरोसा था कि वह कम-हौसला हर-एक से जल्द आश्ना हो बैठता है, तुझे भी अजनबी जानकर, मुमकिन है कि दोस्ती करने के लिए इतराकर दा’वत और ज़ियाफ़त करेगा। सो मेरा अन्दाज़ा ठीक निकला। जो कुछ मेरे दिल में ख़याल आया था, उसने वैसा ही किया। तू जब उससे कौ-ओ-क़रार फिर आने का करके मेरे पास आया, और मेहमानी का हाल और उसका बज़िद होना, तूने मुझे यह सब बताया, मैं दिल में खुश हुई कि जब तू उसके घर जाकर ख़ाये-पियेगा, तब अगर तू भी उसको मेहमानी की ख़ातिर बुलाएगा तो वो दौड़ा चला आएगा। इसलिए, मैंने तुझे जल्द रुख़्सत किया। तीन दिन पीछे, जब तू वहाँ से फ़राग़त करके आया और मेरे रू-बरू ग़ैरहाज़िरी का उ’ज़्र करने लगा, मैंने तेरी तसल्ली के लिए कहा, “कुछ हर्ज नहीं, जब उसने इजाज़त दी, तब तू आया। लेकिन बेशर्मी अच्छी नहीं कि दूसरे का एहसान अपने सर पर रखिए और उसका बदला कीजिए। अब तू भी जाकर उससे यहाँ आने की दा’वत दे और अपने साथ ही साथ ले आ।” जब तू उसके घर गया तब मैंने देखा कि यहाँ कुछ असबाब मेहमानदारी का तैयार नहीं। अगर वह जाये तो क्या करूँ? लेकिन हमारे मुल्क में पुराने ज़माने से बादशाहों का यह दस्तूर है कि आठ महीने मुल्की और माली कारोबार के वास्ते मुल्कगीरी में बाहर रहते हैं और चार महीने बरसात के मौसम में क़िला-ए-मुबारक में जुलूस फ़रमाते हैं। उन दिनों दो-चार महीने से बादशाह मुझ बदबख़्त के बन्दोबस्त की ख़ातिर मुल्क में तशरीफ़ ले गये थे।

    जब तक तू उस जवान को साथ लेकर आवे कि शैदी बहार ने मेरा हाल बादशाह की ख़िदमत में (जो मुझ नापाक की वालिदा हैं) अ’र्ज़ किया, फिर मैं अपने क़ुसूर और गुनाह से शर्मिन्दा होकर उनके रू-बरू जाकर खड़ी हुई और जो हाल था, सब बयान कर दिया।

    अगरचे उन्होंने दूरअन्देशी और ममता के कारण मेरे ग़ायब होने की खबर छुपा रखी थी कि ख़ुदा जाने इसका अंजाम क्या हो, अभी यह रुस्वाई ज़ाहिर करना ठीक नहीं। इसीलिए मेरे ऐ’बों को उन्होंने अपने पेट में रख छोड़ा था। लेकिन मेरी तलाश में थीं। जब उन्होंने मुझे उस हालत में देखा और सब हाल सुना, आंख में आँसू भर लाईं और फ़रमाया कि, “ऐ कम्बख़्त नाशुदनी! तूने जान-बूझकर बादशाह का नाम-ओ-निशान सारा खोया। हज़ार अफ़्सोस! और अपनी ज़िन्दगी से भी हाथ धोया। काश कि तेरे एवज़ मैं पत्थर जनती तो सब्र आता। अब भी तौबा कर। जो क़िस्मत में था, सो हुआ अब आगे क्या करेगी? जिएगी या मरेगी?”

    मैं ने निहायत शर्मिन्दगी से कहा, “मुझ बेहया के नसीबों में यही लिखा था जो इस बदनामी और ख़राबी में ऐसी-ऐसी आफ़तों से बचकर जीती हूँ। इससे मरना ही भला था। अगरचे कलंक का टीका मेरे माथे पर लगा पर ऐसा काम नहीं किया जिसमें मां-बाप के नाम को ऐ’ब लगे।”

    मैं ने कहा, “अब यह बड़ा दुःख है कि वे दोनों बेहया मेरे हाथ से बच जावें, और आपस में रंग-रलियाँ मनअ’वें और मैं उनके हाथों से यह सब कुछ देखूँ और अफ़्सोस है कि मुझसे कुछ हो सके। ये उमीदवार हूँ कि ख़ानसामाँ को हुक्म हो तो दा’वत का सामान अच्छी तरह इस कमबख़्त के मकान पर तैयार करे तो मैं दा’वत के बहाने से उन दोनों बदबख़्तों को बुलवाकर उनके करतूत की सज़ा दूँ और अपना बदला लूँ। जिस तरह उसने मुझ पर हाथ छोड़ा और घायल किया, मैं भी दोनों के पुर्ज़े-पुर्ज़े करूँ, तब मेरा कलेजा ठंडा हो। नहीं तो इस ग़ुस्से की आग से फुँक रही हूँ। आख़िर जल-वलकर भूभल हो जाऊँगी।”

    यह सुनकर अम्माँ ने आत्मा के दर्द से मेहरबान होकर ,मेरी ऐ’बपोशी की और दा’वत का सारा इंतिज़ाम, इसी ख़्वाजासरा के साथ जो मेरा राज़दार था, कर दिया। सब अपने-अनपे कारख़ाने में आकर हाज़िर हुए। शाम के वक़्त तू उस मुये को लेकर आया, और बाद में तूने उसे भी बुलवाया।

    जब वह भी आई और मज्लिस जमी, शराब पीकर सब बदमस्त और बेहोश हुए और उनके साथ तू भी मस्त होकर मुर्दा-सा पड़ गया, मैंने एक हथियारबंद औ’रत को हुक्म दिया, “उन दोनों का सर तलवार से काट डाल।”

    उसने उसी वक़्त एक दम में तलवार निकाल कर उन दोनों का सिर काट डाला और बदन लाल कर दिया। तुझ पर ग़ुस्से का कारण यह था कि मैंने तुझे दा’वत की इजाज़त दी थी, कि दो-दिन की दोस्ती पर भरोसा करके साथ शराब पीने की। तेरी यह हिमाक़त मुझे पसन्द आई। इस वास्ते कि जब तू पीकर बेहोश हुआ तब दोस्ती की उमीद तुझसे क्या रही? पर तेरी ख़िदमत के हक़ ऐसे ऐसे मेरी गर्दन पर हैं कि जो तुझसे ऐसी हरकत होती है, तो मुआ'फ़ करती हूँ।”

    “ले, मैंने अपनी हक़ीक़त शुरू से आख़िर तक कह सुनाई। अभ भी दिल में कुछ और हवस बाक़ी है? जैसे मैंने तेरी ख़ातिर करके तेरे कहने को हर तरह से क़ुबूल किया, तू भी मेरे कहने पर उसी सूरत से अमल कर। वक़्त की सलाह यही है कि अब इस शहर में रहना मेरे और तेरे हक़ में भला नहीं। आगे तू मालिक है!”

    या माबूदल्लाह! शहज़ादी तो इतना फ़र्मा कर चुप हो रही और यह फ़क़ीर तो दिल-ओ-जान से उसके हुक्म को हर चीज़ पर मुक़द्दम जानता था और उसकी मुहब्बत के जाल में फंसा था। मैं बोला, “जो मर्ज़ी-ए-मुबारक में आवे, सो बेहतर है। यह ग़ुलाम बे-उ’ज़्र बजा लावेगा।” जब राजकुमारी ने मुझे अपना पूरा फ़र्मां-बरदार और ख़िदमत-गुज़ार समझा, तो कहा कि, “दो घोड़े चालाक और जाँबाज़ जो चलने में हवा से बातें करें, बादशाह के ख़ास अस्तबल से मँगवा कर तैयार रख।” मैंने वैसे ही परीज़ाद चार गुर्दे के घोड़े चुनकर ज़ीन बँधवाकर मँगवाए। जब थोड़ी-सी रात बाक़ी रही राजकुमारी मर्दाना लिबास पहनकर और पाँचों हथियार बाँधकर एक घोड़े पर सवार हुई और दूसरे घोड़े पर मैं असलहा सजाकर चढ़ बैठा और एक तरफ की राह ली।

    जब रात तमाम हुई और सवेरा होने लगा, तब हम एक पोखर के किनारे पहुँचे। उतर कर मुँह-हाथ धोया। जल्दी-जल्दी कुछ नाश्ता करके फिर सवार होकर चले। कभी मल्का कुछ -कुछ बातें करती और यूँ कहती कि, “हमने तेरी ख़ातिर, शर्म-हया, मुल्क-माल, माँ-बाप सब छोड़ा। ऐसा हो कि तू भी उस ज़ालिम, बेवफ़ा की तरह सुलूक करे!”

    कभी मैं कुछ हाल इधर-उधर का राह कटने के लिए कहता और उसकी बात का भी जवाब देता, “राजकुमारी, सब आदमी एक-से नहीं होते। उस पाजी के नुत्फ़े में कुछ ख़लल होगा जो उससे ऐसी हरकत हुई और मैंने तो जान-ओ-दिल तुम पर सदक़े किया और तुमने मुझे हर तरह इज़्ज़त बख़्शी। अब मैं बन्दा बग़ैर दामों का हूँ। मेरे चमड़े की जूतियाँ अगर बनवाकर पहनो तो मैं आह करूँ।”

    ऐसी-ऐसी बातें आपस में होती थीं और रात-दिन चलने से काम था। कभी जो थकन के कारण नहीं उतरते तो जंगल में पशु-पक्षी शिकार करते, हलाल करके नमकदान से नून निकाल चक़माक़ से आग झाड़ भून-भानकर खा लेते और घोड़ों को छोड़ देते। वे अपने मुँह से घास-पात चर-चुगकर अपना पेट भर लेते।

    एक रोज़ एक चटियल मैदान में जा निकले कि जहाँ बस्ती का नाम था और आदमी की सूरत नज़र आती थी। उस पर भी राजकुमारी के साथ रहने की वजह से दिन ईद और रात शब-ए-बरात मा’लूम होती थी। जाते-जाते अनचित एक दरिया (कि जिसके देखने से कलेजा पानी हो) राह में मिला। किनारे पर जो खड़े होकर देखा तो जहाँ तलक निगाह ने काम किया, पानी ही पानी था। कुछ थल बेड़ा पाया। या इलाही! अब इस समुन्दर से क्योंकर पार उतरें? एक दम इसी सोच में खड़ा रहा। आखिर दिल में यह लहर आई कि मल्का को यहीं बिठाकर मैं नाव-निवाज़ी की तलाश में जाऊँ। जब तलक असबाब गुज़ारे का हाथ आवे, उस समय तक वह नाज़नीन भी आराम पा ले।

    तब मैंने कहा, “रानी! अगर हुक्म हो तो घाट-बाट इस दरिया का देखूँ!”

    फ़र्माने लगी, “मैं बहुत थक गई हूँ और भूखी-प्यासी हो रही हूँ। मैं ज़रा दम ले लूँ, जब तक तू पार चलने की कुछ तदबीर कर।”

    उस जगह एक दरख़्त पीपल का था, बड़ा छत्तर बाँधे हुए कि अगर हज़ार सवार आएँ तो धूप और बारिश में उसके तले आराम पाएँ। वहाँ उसको बिठाकर मैं चला और चारो तरफ़ देखता था कि कहीं भी ज़मीन या दरिया पर निशान इंसान का पाऊँ। बहुतेरा सर मारा पर कहीं पाया। आख़िर मायूस होकर वहाँ से फिर आया तो उस परी को पेड़ के नीचे पाया। उस वक़्त की हालत क्या कहूँ कि होश जाता रहा। दीवाना-बावला हो गया। कभी दरख़्त पर चढ़ जाता, और डाल-डाल, पात-पात फिरता। कभी हाथ-पाँव छोड़कर ज़मीन में गिरता और उस दरख़्त की जड़ के आस-पास सदक़े होता, कभी चिंघाड़ मारकर अपनी बेबसी पर रोता। कभी पच्छिम से पूरब को दौड़ा जाता, कभी उत्तर से दक्खिन को फिर आता। ग़रज़ बहुतेरीख़ा छानी लेकिन उस नायाब मोती की निशानी पाई। जब मेरा कुछ बस चला, तब रोता और ख़ाक सर पर उड़ाता हुआ हर-कहीं तलाश करने लगा।

    दिल में यह ख़याल आया कि कोई जिन उस परी को उठाकर ले गया और मुझे यह दाग़ दे गया, या उसके मुल्क से कोई उसके पीछे चला आया था, उस वक़्त अकेला पाकर उसे शाम की तरफ़ ले उड़ा। ऐसे ख़यालों से घबराकर कपड़े-वपड़े फेंक-फाँक दिये। नंगा-मंगा फ़क़ीर बनकर शाम के मुल्क में सवेरे से शाम तक ढूँढ़ता फिरता और रात को वहीं पड़ रहता।

    सारा जहान रौंद मारा, पर अपनी राजकुमारी का नाम-ओ-निशान किसी से सुना, उसके ग़ायब होने का सबब मा’लूम हुआ। तब दिल में यह आया कि जब उस जान का तूने कुछ पता पाया तो अब जीना भी बेकार है। किसी जंगल में एक पहाड़ नज़र आया, तब उस पर चढ़ गया और यह इरादा किया कि अपने को गिरा दूँ कि एक दम में सर-मुँह पत्थरों से टकराते-टकराते फूट जाएगा तो ऐसी मुसीबत से जी छूट जायेगा।

    यह दिल में कहकर चाहता था कि अपने को गिराऊँ बल्कि पाँव भी उठ चुके थे कि किसी ने मेरा हाथ पकड़ लिया। इतने में होश गया, देखता हूँ तो एक सब्ज़पोश सवार मुँह पर नक़ाब डाले, मुझसे फ़र्माता है, “क्यों तू अपने मरने का इरादा करता है? ख़ुदा की मेहरबानी से नाउमीद होना कुफ़्र है। जब तलक साँस है, तब तलक आस है! अब थोड़े दिनों में रोम के मुल्क में तीन दरवेश तेरी तरह के ऐसी ही मुसीबत में फँसे हुए और ऐसे ही तमाशे देखे हुए, तुझसे मुलाक़ात करेंगे वहाँ के बादशाह का नाम आज़ादबख़्त है। उसके सामने भी एक बड़ी मुश्किल है, जब वह भी तुम चारों फ़क़ीरों से मिलेगा तो हर-एक के दिल का मतलब और मुराद जो भी है वह उसे बख़ूबी हासिल होगी।”

    मैंने रकाब पकड़कर बोसा दिया और कहा, “ऐ ख़ुदा के वली! तुम्हारे इतने ही फ़र्माने से मेरे बेक़रार दिल को तसल्ली हुई। लेकिन ख़ुदा के वास्ते ये फ़रमाइये कि आप कौन हैं और इस्म-ए-शरीफ़ (शुभ नाम) क्या है?” तब उन्होंने फ़रमाया कि मुर्तज़ा अली मेरा नाम है और मेरा यही काम है कि जिसको जो कठिन मुश्किल पेश आये मैं उसको आसान कर दूँ।

    इतना फ़र्माकर नज़रों से ओझल हो गये। बारे, इस फ़कीर ने अपने मौला मुश्किलकुशा की बशारत से ख़ातिरजमा’ होकर क़ुस्तुनतुनिया चलने का इरादा किया। राह में जो कुछ मुसीबतें क़िस्मत में किली थीं खींचता हुआ, उस राजकुमारी की मुलाक़ात के भरोसे कपर ख़ुदा की मेहरबानी से यहाँ तक पहुँचा और अपनी ख़ुशनसीबी से तुम्हारी ख़िदमत में बैठने की इज़्ज़त मिली। तुम लोगों से मुलाक़ात तो हुई और बाहम सुहबत और बात-चीत मुयस्सर हुई। अब चाहिये कि बादशाह आज़ाद बख़्त से भी मुलाक़ात और जान-पहचान हो।

    उसके बाद यक़ीनन हम पाँचों अपने दिली मक़्सद तक पहुँचेंगे। तुम भी दुआ’' माँगो और आमीन कहो। या हादी! इस परेशान और मुसीबत के मारे की यह सरगुज़िश्त थी जो तुम दर्वेशों की हुज़ूरी में कह सुनाई। अब आगे देखिए कि कब इस मेहनत और ग़म के बाद हमें बादशाहज़ादी से मिलने की ख़ुशी नसीब हो। आज़ादबख़्त चुपका छुपा हुआ ध्यान लगाये पहले दर्वेश का हाल सुनकर खुश हुआ। फिर दूसरे दर्वेश का हला सुनने लगा!

    सैर दूसरे दर्वेश की

    जब दूसरे दर्वेश के कहने की बारी आई, तो वह चार-ज़ानू हो बैठा और बोला,

    यारो! इस फ़क़ीर का टुक माजरा सुनो।

    मैं इब्तिदा से कहता हूँ ता इंतिहा सुनो।

    जिसका इलाज कर नहीं सकता कोई हकीम।

    हैगा हमारा दर्द निपट लादवा सुनो।

    फ़क़ीरों! यह नाचीज़ मुल्क़ फ़ारस का बादशाहज़ादा है। हर फ़न के आदमी वहाँ पैदा होते हैं। चुनांचे ‘इस्फ़हान’ निस्फ़ जहान मशहूर है। सातों मुल्कों में उसकी बराबरी करने वाला कोई दूसरा मुल्क नहीं क्योंकि उस देश का ग्रह सूर्य है और वह सातों ग्रहों में सबसे बड़ा है। आब-ओ-हवा वहाँ की अच्छी और लोग समझदार और सलीक़ा रखने वाले होते हैं। मेरे क़िबलागाह (पिता) ने (जो उस मुल्क के बादशाह थे) लड़कपन से क़ायदे और सरकारी क़ानून की तर्बियत करने के वास्ते बड़े-बड़े अक़्लमंद उस्ताद हर-एक इल्म और कस्ब के चुनकर मेरी ता’लीम के लिये मुक़र्रर किये थे, ताकि मैं हर तरह की कामिल (पूरी) ता’लीम पाकर क़ाबिल बनूँ। ख़ुदा के फ़ज़्ल से चौदह बरस के सिन-ओ-साल में सब इल्म से माहिर हुआ। बातचीत का ढंग-मा’क़ूल उठने-बैठने का तरीक़ा सराहनीय, और जो-कुछ भी बादशाहों के लायक़ और दरकार है, सब हासिल किया। और रात-दिन यही शौक़ था कि क़ाबिलों की सुहबत में हर-एक मुल्क के क़िस्से, और बहारदुर नामवर बादशाहों का हाल सुनाऊँ।

    एक दिन एक अक़्लमन्द मुसाहिब ने, जो दुनिया देखा और तारीख से अच्छी तरह वाकिफ़ था, यह ज़िक्र किया कि अगरचे आदमी की ज़िन्दगी का कुछ भरोसा नहीं, लेकिन अक्सर वस्फ़ (गुण) ऐसे हैं कि उनके सबब इंसान का नाम क़यामत तक लोगों की ज़बानों पर बख़ूबी चला जायेगा।

    मैंने कहा कि, “अगर उसका थोड़ा हाल मुफ़स्सल बयान करो तो मैं भी सुनूँ और उस पर अमल करूँ।”

    तब वह हातिमताई का हाल इस तरह बयान करने लगा कि हातिमताई के वक़्त में एक बादशाह अ’रब में नोफ़िल नाम का था। हातिम की शोहरत के कारण उसे हातिम से बड़ी दुश्मनी हुई, और वह बहुत सा लश्कर और फ़ौज जमा’ करके लड़ाई की ख़ातिर चढ़ आया। हातिम तो ख़ुदा तरस और नेक मर्द था। उसने यह समझा कि अगर मैं भी जंग की तैयारी करूँ तो ख़ुदा के बन्दे मारे जायेंगे और बड़ी ख़ूँरेज़ी होगी और उसका अ’ज़ाब मेरे नाम लिखा जायेगा। यह बात सोचकर तन-तनहा अपनी जान लेकर एक पहाड़ की खोह में जा छुपा। जब हातिम के ग़ायब होने की ख़बर नोफ़िल को मा’लूम हुई उसने हातिम का सब असबाब, घर-बार क़ुर्क किया और मुनादी करवा दी कि जो कोई ढूँढ-ढूँढ कर हातिम को पकड़ लावे पाँच सौ अशर्फ़ी बादशाह की सरकार से इनआ'म पावे। यह सुनकर सबको लालच आया और वे हातिम की खोज करने लगे।

    एक दिन एक बूढ़ा और बुढ़िया, दो-तीन छोटे-छोटे बच्चे साथ लिये हुए लकड़ियाँ तोड़ने के वास्ते उस खोह के पास पहुँचे जहाँ हातिम छुपा हुआ था। उस जंगल से वे लकड़ियाँ चुनने लगे। बुढ़िया बोली कि, “अगर हमारे दिन कुछ भले आते तो हम हातिम को कहीं देख पाते और पकड़कर नोफ़िल के पास ले जाते तो वह पाँच सौ अशर्फ़ी देता और हम आराम से खाते, इस दुःख-धन्धे से छूट जाते।”

    बूढ़े ने कहा, “क्या टर-टर करती है? हमारी क़िस्मत में यही लिखा है कि रोज़ लकड़ियाँ तोड़ें और सर पर धरकर बाज़ार में बेचें। तब नून-रोटी मुयस्सर आवे या एक रोज़ जंगल से बांध ले जावे। ले, अपना काम कर, हमारे हाथ हातिम काहे को आवेगा और कब बादशाह इतने रूपे दिलावेगा?” औ’रत ने ठंडी साँस भरी और चुपकी हो रही।

    उन दोनों की बाते हातिम ने सुनीं। उसने सोचा कि यह बात इंसानियत और मुरव्वत से बाहर है कि वह अपने को छुपाए और अपनी जान बचाए और उन दोनों बेचारों को उनका मतलब हासिल हो। सच है कि अगर आदमी में रहम नहीं तो वह इन्सान नहीं और जिसके जी में दर्द नहीं, वह क़साई है।

    दर्दे दिल के वास्ते पैदा किया इन्सान को।

    वर्ना ताअ'त के लिये कुछ कम थे कर्र-ओ-बयाँ

    ग़रज़ हातिम की जवाँमर्दी ने यह गवारा किया कि अपने कानों से सुनकर वह चुपका हो रहे। वैसे ही बाहर निकल आया और उस बूढ़े से कहा, “ऐ अज़ीज़, हातिम मैं ही हूँ। मुझे नोफ़िल के पास ले चल। वह मुझे देखेगा और जो कुछ रुपये देने का इक़रार किया है, तुझे देगा।”

    उस बूढ़े ने कहा कि यह सच है कि इस सूरत में भलाई और बहबूदी मेरी है, लेकन क्या जाने वह तुझसे क्या सुलूक करे? अगर मार डाले तो मैं क्या करूँ? यह मुझसे हरगिज़ हो सकेगा कि तुझको अपनी लालच की ख़ातिर दुश्मन के हवाले करूँ। वह माल कितने दिन खाऊँगा और कब तलक जिऊँगा? आख़िर मर जाऊँगा, तब ख़ुदा को क्या जवाब दूँगा?”

    हातिम ने बहुतेरी मिन्नत की कि, “मुझे ले चल। मैं अपनी ख़ुशी से कहता हूँ। मैं हमेशा इसी आर्ज़ू में रहता हूँ कि मेरा जान-ओ-माल किसी के काम आवे तो बेहतर है।” लेकिन वह बूढ़ा किसी तरह राज़ी हुआ कि हातिम को ले जावे और इनआ'म पावे।

    आख़िर लाचार होकर हातिम ने कहा, “अगर तू मुझे यूँ नहीं ले जाता तो मैं आप से आप बादशाह के पास जाकर कहता हूँ कि इस बूढ़े ने मुझे जंगल में एक पहाड़ की खोह में छुपा रखा था।”

    वह बूँढ़ा हँसा और बोला, “या नसीब, यह तो भलाई के बदले बुराई मिली।” इसी सवा-ओ-जवाब में और आदमी भी पहुँचे। भीड़ लग गई। उन्होंने मा’लूम किया कि हातिम यही है, तुरन्त पकड़ लिया और उसे बादशाह के पास ले चले। वह बूढ़ा भी अफ़्सोस करता हुआ पीछे-पीछे साथ हो लिया। जब हातिम को नोफ़िल के रू-बरू ले गए, उसने पूछा, “इसको कौन पकड़ लाया?” एक बदज़ात, संगदिल बोला कि, “ऐसा काम सिवाय हमारे कौन कर सकता है? यह फ़त्ह हमारे नाम है। हमने अर्श पर झण्डा गाड़ा है।”

    एक औऱ लनतरानी वाला डींग मारने लगा कि, “मैं कई दिन से दौड़-धूप कर जंगल सेपकड़ लाया हूँ। मेरी मेहनत पर नज़र कीजिये, और जो क़रार है, सो दीजिये।”

    इसी तरह अशर्फ़ियों की लालच से हर-कोई कहता था कि यह काम मुझसे हुआ। वह बूढ़ा चुपका एक कोने में लगा हुआ, सब की शोख़ियाँ सुन रहा था और हातिम की ख़ातिर खड़ा रोता था। जब अपनी-अपनी दिलावरी और मर्दानगी सब कह चुके तब हातिम ने बादशाह से कहा, “अगर सच बात पूछो तो वह यह है कि वह बूढ़ा जो सबसे अलग खड़ा है, मुझको लाया है। अगर क़याफ़ा पहचानते हो तो मा’लूम कर लो और मेरे पकड़ने की ख़ातिर जो क़ौल किया है, उसे पूरा करो, क्योंकि आदमी के सारे डील में ज़बान हलाल है, मर्द को चाहिये जो कहे सो करे, नहीं तो जीभ तो हैवान को भी ख़ुदा ने दी है, फिर हैवान और इंसान में क्या फर्क़ है?”

    नोफ़िल ने उस बूढ़े लकड़हारे को पास बुलाकर पूछा, “सच कह, अस्ल क्या है? हातिम को कौन पकड़ लाया?” उस बेचारे ने सर से पाँव तक जो गुज़रा था, सच-सच कह सुनाया और कहा कि, “हातिम मेरी ख़ातिर आप-से-आप चला आया है।”

    नोफ़िल हातिम की यह हिम्मत सुनकर हैरत में गया। “वाह! तेरी सख़ावत कि अपनी जान का ख़तरा भी किया!”

    उसने हुक्म दिया कि, “जितने आदमी भी हातिम को पकड़ लाने का झूठा दा’वा करते थे, उनकी टुंडियाँ कसकर पाँच सौ अशर्फ़ी के बदले पाँच-पाँच सौ जूतियाँ उनके सर पर लगाओ कि उनकी भी जान निकल पड़े।” यह हुक्म सुनते ही तड़-तड़ जूतियाँ पड़ने लगीं और एक दम में उनके सर गंजे हो गए। सच है, झूठ बोलना ऐसा ही गुनाह है कि कोई गुनाह उसके बराबर नहीं पहुँचता। ख़ुदा सबको इस बला से बचाए रखे। बहुत-से आदमी झूठ-मूठ बके जाते हैं लेकिन आज़माइश के वक़्त सज़ा पाते हैं।

    ग़रज़ उन सब को उनके मुवाफ़िक़ इनआ’म देकर नोफ़िल ने अपने दिल में ख़याल किया कि हातिम ऐसे शख़्स से जिससे एक आ’लम का भला होता है और जो मुहताज़ों की ख़ातिर अपनी जान देने में उ’ज़्र नहीं करता, और जो ख़ुदा की राह में सर-से-पैर तक हाज़िर है, ऐसे आदमी से दुश्मनी रखना और उसे नुक़सान पहुँचाने के बारे में सोचना आदमीयत और जवाँमर्दी से दूर है। उसी वक़्त उसने हातिम का हाथ बड़ी दोस्ती और गर्मजोशी से पकड़ लिया, और कहा, “क्यों हो, जब ऐसे हो तब ऐसे हो।” उसने बड़ी इज्ज़त और तवज्जोह करके पास बिठलाया और हातिम का मुल्क, अमलाक, और माल-असबाब जो कुछ ज़ब्त किया था, उसी वक़्त छोड़ दिया और नये सिरे से तय क़बीले की सरदारी उसे दी और उस बूढ़े को पाँच सौ अशर्फ़ियाँ अपने ख़जाने से दिलवा दीं। वह दुआ’’ देता हुआ चला गया।

    जब मैंने हातिम का यह सुना, जी में ग़ैरत आई और यह ख़याल गुज़रा कि हातिम तो फ़क़त अपनी क़ौम का रईस था जिसने सख़ावत की वजह से यह नाम पैदा किया कि आज तलक मशहूर है। मैं ख़ुदा के हुक्म से सारे ईरान का बादशाह हूँ और अगर इस नेमत से महरूम रहूँ तो बड़ा अफ़्सोस है। वाक़ई, दुनिया में दान और देने से बड़ा कोई काम नहीं। इस वास्ते कि आदमी जो कुछ इस दुनिया में देता है उसका एवज़ दुनिया में लाता है। अगर कोई एक दाना बोता है तो उससे कितना कुछ पैदा होता है? यह बात दिल में ठहराकर मीर-ए-इमारत को बुलवाकर हुक्म किया कि जल्द शहर के बाहर एक आ’लीशान मकान बनवाओ, जिसके चालीस दरवाज़ें बहुत बुलन्द और निहायत कुशादा हों। थोड़े अ’र्से में ही, वैसी ही वसीअ' इमारत, जैसा दिल चाहता था, बनकर तैयार हुई और उस मकान में हर रोज़, हर वक़्त सवेरे से शाम तक मुहताज़ों और बेकसों को रुपये, अशर्फ़ियाँ देता और जो कोई जिस चीज़ का सवाल करता, मैं उसे मालामाल करता।

    ग़रज़ चालीसों दरवाज़ें से ज़रूरतमन्द आते और जो चाहते, सो ले जाते।

    एक रोज़ का यह ज़िक्र है कि एक फ़कीर सामने के दरवाज़े से आया, और सवाल किया। मैंने एक अशर्फी दी, फिर वही दूसरे दरवाज़ें से होकर आया, दो अशर्फियाँ माँगीं। मैंने पहचानकर दर-गुज़र किया और दो अशर्फ़ियाँ दीं। इसी तरह उसने हर-एक दरवाज़े से आना और एक अशर्फ़ी बढ़ाना शुरू कर दिया और मैं भी जान-बूझकर अनजान हुआ उसके सवाल के मुवाफ़िक़ देता गया। आख़िर चालीसवें दरवाज़ें की राह से आकर चालीस अशर्फ़ियाँ माँगी, वह भी मैंने दिलवा दीं। इतना कुछ लेकर वह दर्वेश फिर पहले दरवाज़ें से घुस आया और सवाल किया, मुझे बहुत बुरा मा'लूम हुआ। मैंने कहा, “सुन! लालची! तू कैसा फ़कीर है कि हरगिज़ फ़क़्र के तीनों अक्षरों से भी वाक़िफ़ नहीं? फ़कीर का अमल उन पर होना चाहिये।”

    फ़क़ीर बोला, “भला सख़ी तुम्हीं बताओ।”

    मैंने कहा, “फ़ा’’ से फ़ाक़ा ; क़ाफ़ से क़नाअ'त और ‘रा’ से रियाज़त है। जिसमें ये बातें हों वह फ़क़ीर नहीं। इतना जो तुझे मिला है, उसको खा-पीकर आइयो, औऱ जो मांगोगे ले जाइयो। यह ख़ैरात ज़रूरत पूरी करने के वास्ते है, कि जमा’ करने के लिए। लालची! चालीस दरवाज़ों से तूने एक अशर्फ़ी से चालसी अशर्फ़ियाँ तक लीं। उसका हिसाब तो कर कि रिवड़ी के फेर की तरह कितनी अशर्फ़ियाँ हुईं। और उस पर भी, लालच फिर तुझे पहले दरवाज़े से ले आई। इतना माल जमा’ करके क्या करेगा? फ़क़ीर को चाहिए कि एक रोज़ की फ़िक्र करे, और दूसरे दिन फिर नई रोज़ी। देने वाला दाता मौजूद है। अब हया और शर्म कर और सब्र-ओ-क़नाअत से काम ले। ये कैसी फ़क़ीरी है, जो तुझे तेरे मुर्शिद (गुरु) ने बताई है?”

    वह फ़क़ीर मेरी बात सुनकर ख़फ़ा और बददिमाग़ हुआ और जितना मुझसे लेकर जमा’ किया था, सब ज़मीन पर डाल दिया और बोला, “बस, बाबा! इतने गर्म मत हो। अपनी कायनात लेकर रख छोड़ो। फिर सख़ावत का नाम मत लीजो। सख़ी होना बहुत मुश्किल है। तुम सख़ावत का बोझ नहीं उठा सकते। इस मंज़िल को कब पहुँचोगे? अभी दिल्ली दूर है। सख़ी के भी तीन अक्षर हैं, पहले उन पर अमल करो।”

    तब मैं डरा और कहा, “भला दाता! इसका मतलब मुझे समझाओ।”

    वह कहने लगा, “‘सीन’ से समाई, ‘ख़ा’ से ख़ौफ़-ए-इलाही और ‘या’ से याद रखना अपनी पैदाइश और मरने को, जब तलक इतना हो ले, तू सख़ावत का नाम ले और सख़ी का यह दर्जा है कि अगर बदकार हो तब भी ख़ुदा का दोस्त है। इस फ़क़ीर ने बहुत मुल्कों की सैर की है लेकिन सिवाय बसरे की बादशाहज़ादी के कोई सख़ी देखने में आया। सख़ावत का जामा’ ख़ुदा ने उसी औ’रत के लिये बनाया है। और सब नाम चाहते हैं पर वैसा काम नहीं करते।”

    यह सुनकर मैंने बहुत मिन्नत की और क़स्मे दी कि, “मेरा क़ुसूर मुआ'फ़ करो और जो चाहिये सो लो।”

    पर उसने मेरा दिया हरगिज़ लिया और यह बात कहता हुआ चला गया कि, “अब अगर तू अपनी सारी बादशाहत मुझे दे तो उस पर भी थूकूँ और धर मारूँ।”

    वह तो चला गया पर बसरे की बादशाहज़ादी की तारीफ़ सुनने से दिल बेकल हुआ। किसी तरह कल थी। अब यह आर्ज़ू हुई कि किसी सूरत से बसरे चलकर उसको देखा चाहिये।

    इसी अर्से में बादशाह ने वफ़ात पाई और तख़्त पर मैं बैठा। सल्तनत मिली पर वह ख़याल गया। वज़ीरों और अमीरों से जो हुकूमत के ख़ास और अहम थे, मैंने सलाह ली कि, “मैं बसरे का सफ़र करना चाहता हूँ तुम अपने काम से मुस्तइद रहो। अगर ज़िन्दगी है, तो सफ़र की उम्र थोड़ी होती है। जल्द वापस आता हूँ।” पर कोई मेरे जाने पर राज़ी हुआ। लाचार, दिल तो उदास हो रहा था।

    एक दिन बग़ैर सब के कहे-सुने चुपके से अपने अक़्लमन्द वज़ीर को बुलाया और उसे अपना कुल्ली वकील और मुख़्तार बनाया और हुकूमत का कर्ता-धर्ता मुक़र्रर किया। फिर मैंने गेरुवा वस्त्र पहनकर, फ़क़ीरी भेस करके अकेले बसरे की राह ली। थोड़े दिनों में उसकी सरहद में जा पहुँचा। तब से यह तमाशा देखने लगा कि जहाँ रात को जाकर ठहरता, उसकी मल्का के नौकर-चाकर स्वागत करके एक अच्छे मकान में उतारते और जितना इन्तज़ाम ख़ातिरदारी और दा'वत का होता है, बख़ूबी मौजूद करते और ख़िदमत में सारी रात हाथ बांधे खड़े रहते। दूसरे दिन दूसरी मंज़िल में यही सूरत पेश आती। इस आराम से महीनों की राह तय की। आख़िर बसरे में दाख़िल हुआ, उसी वक़्त एक खूबसूरत जवान, अच्छे लिबास में अच्छी तबीअ’त वाला, मुरव्वतदार, जिसकी अक़्लमन्दी उसकी सूरत से ज़ाहिर थी, मेरे पास आया और बड़ी मीठी ज़बान से कहने लगा कि, “मैं फ़क़ीरों का ख़ादिम हूँ। हमेशा इसी तलाश में रहता हूँ कि जो कोई मुसाफ़िर, फ़क़ीर या दुनियादार इस शहर में आवे, मेरे घर की शोभा बढ़ावे, सिवाए एक मकान के यहाँ परदेसी के रहने की दूसरी जगह नहीं है। आप तशरीफ़ ले चलिये और उस मक़ाम की रौनक़ बढ़ाइये और मुझे इज़्ज़त बख़्शिए ।”

    मैंने पूछा, “साहब, आपका इस्म-ए-शरीफ़ क्या है?”

    बोला, “इस गुमनअ’म को बेदारबख़्त कहते हैं।” उसकी ख़ूबी देखकर और मीठी बातें सुनकर मैं उसके साथ चला और मकान उसके में गया। देखा तो एक आ’लीशान इमारत शाही इंतिज़ाम के साथ तैयार है। एक दालान में उसने ले जा कर बिठाया और गर्म पानी मँगवाकर हाथ-पाँव धुलवाए और दस्तर-ख़्वान बिछवाकर मुझ तन-तनहा के रू-बरू बकावल ने एक तोरे का तोरा चुन दिया, चार मश्क़ाब (थाल), एक में यख़्नी-पुलाव, दूसरी में क़ोर्मा-पुलाव, तीसरी में मुतंजन-पुलाव और चौथी में कू-कू पुलाव और एक क़ाब ज़र्दे की और कई तरह के क़लिये, दोप्याज़ा, नरगिसा, बादामी, रोग़न जोश और रोटियां कई क़िस्म की, बाक़रख़्वानी तिनकी, शीरमाल, गावदीदा, गावज़बान, नान-ए-नेमत, पराठे और कबाब क़ोफ़्ते के, तिक्के के, मुर्ग़ के, ख़ागीना, मल्ग़ोबा, शबदेग, दमपुख़्त, हलीम, हरबसा, समोसे बर्क़ी, क़ुबूली, फ़िनीं शीर-बिरंज, मलाई, हल्वा, फ़ालूदा, पनपत्ता, नमश, आब-ए-शोरा साक़-ए-उरूस, लूज़ियात, मुरब्बा, अचारदान, दही की क़ुल्फ़ियाँ, ये सारी नेमतें देखकर रूह भर गई। जब एक-एक निवाला हर-एक से लिया पेट भी भर गया, तब हाथ खाने से खींचा।

    उस शख़्स ने कहा, कि “साहब ने क्या खाया? खाना तो सब अमानत धरा है। बेतकल्लुफ़ और नोश-ए-जान फ़रमाइये।”

    मैंने कहा, “खाने में शर्म क्या है? ख़ुदा तुम्हारा घर आबाद रखे। जो कुछ मेरे पेट में समाया, सो मैंने खाया और इसके ज़ाएक़े की क्या तारीफ़ करूँ? अब तक ज़बान चाटता हूँ और जो डकार आती है तो मुअत्तर! लो, अब बस करो।” जब दस्तरख़्वान उठा, ज़ेर-अन्दाज़ काशानी मख़मल का बिछाकर, चिलमनी और सोने का लोटा लाकर ख़ुशबूदार बेसनदान में से बेसन देकर गर्म पानी से मेरे हाथ धुलाए। फिर जड़ाऊ पानदान में गिलौरियां सोने की पखरोटों में बँधी हुई और चौघरों में खिलौरियाँ और चिकनी सुपारियां और लौंग इलाइचियां, रूपे के वर्क़ों में मँढी हुई लाकर रखीं। जब मैं पानी पीने को माँगता, तब सुराही बर्फ़ में लबी हुई, आबदार ले आता। जब तक शाम हुई, फ़ानूसों में काफ़ूरी शमएँ रौशन हुई, वह अज़ीज़ बैठा हुआ बातें करता रहा। जब एक पहर रात गई, बोला, “अब इस छपरखट में आराम कीजिये!”

    मैंने कहा, “ऐ साहब! हम फ़क़ीरों को एक बोरिया मृगछाला बिस्तर के लिए बहुत है। ख़ुदा ने यह तुम दुनियादारों के वास्ते बनाया है।”

    कहने लगा, “यह सब असबाब दर्वेशों की ख़ातिर है, कुछ मेरा माल नहीं।” उसके ज़िद करने से, उन बिछौनों पर, जो फूलों की सेज से भी नर्म थे, जाकर लेटा। दोनों पट्टियों की तरफ़ गुलदान और चंगेरें फूलों की चुनी हुई थीं, और ऊद, सोज़ और लखलखे रौशन थे। जिधर की करवट लेता, दिमाग़ मुअत्तर हो जाता। इस आ’लम में मैं सो रहा।

    जब सुबह हुई नाश्ते को भी बादाम, पिस्ते, अंगूर, इंजीर, नाशपाती, अनार, किशमिश छुहारे और मेवे का शर्बत ला हाज़िर किया। इसी तरह से तीन दिन-रात रहा। चौथे रोज़ मैंने चलने की इजाज़त चाही। हाथ जोड़कर कहने लगा, “शायद इस गुनहगार से आप की ख़िदमतगारी में कोई क़ुसूर हुआ, जिसके कारण आप का मिज़ाज मुकद्दर हुआ।”

    मैंने हैरान होकर कहा, “ख़ुदा के लिये बताओ कि यह क्या क़िस्सा है? लेकिन मेहमानी की शर्त सिर्फ़ तीन दिन तक है, सो मैं रहा, ज्यादा रनहा अच्छा नहीं और, इसके अलावा यह फ़क़ीर सैर के वास्ते निकला है। अगर एक ही जगह रह जाय तो मुनासिब नहीं। इसीलिए यह फ़क़ीर इजाज़त चाहता है, नहीं तो तुम्हारी, ख़ूबियाँ ऐसी नहीं जो तुम से अलग होने को जी चाहे।”

    तब वह बोला, “जैसी मर्ज़ी, लेकिन एक घड़ी तो ठहरिए कि बादशाहज़ादी के हुज़ूर में जाकर अ’र्ज़ करूँ, और तुम जो जाना चाहते हो, तो जो कुछ असबाब ओढ़ने-बिछाने का, और खाने के बासन, रुपे सोने के, और जड़ाऊ, इस मेहमानख़ाने में हैं, यह सब तुम्हारा माल है, उसके साथ ले जाने की ख़ातिर जो फ़रमाओ तदबीर की जाय।”

    मैंने कहा, “लाहौल पढ़ो, हम फ़क़ीर हुए, भाट हुए। अगर यही लालच दिल में होती तो फ़क़ीर काहे को होते? दुनियादारी क्या बुरी थी?”

    उस अ’ज़ीज़ ने कहा, “अगर यह हाल मल्का सुने तो ख़ुदा जाने मुझे इस ख़िदमत से हटाकर, क्या सुलूक करे। अगर तुम्हें ऐसी ही लापर्वाही है तो इन सब को एक कोठरी में अमानत बन्द करके दरवाज़े पर मुहर लगा दो, फिर जो चाहो सो कीजियो।”

    मैं क़ुबूल करता था। लाचार यही सलाह ठहरी कि सब असबाब बन्द करके क़ुफ़्ल लगा दिया जाय। अब मैं चलने की इजाज़त का इंतिज़ार करने लगा। इतने में एक मो'तबर ख़्वाजासरा सर पर सरपेच, और गोशपेच, कमर में बन्दी बाँधे, एक जड़ाऊ सोने का असा हाथ में लिए उसके साथ कई ख़िदमतगार मा'क़ूल ओहदे लिए हुए, इस शान-ओ-शौकत से मेरे नज़दीक आया, ऐसी मेहरबानी और नर्मी से बातचीत करने लगा कि जिसका बयान नहीं कर सकता। फिर बोला कि, “ऐ मियाँ, अगर तवज्जोह और मेहरबानी करके इस मुश्ताक के ग़रीबख़ाने को अपने क़दम की बर्कत से रौनक़ बख़्शो तो ख़ास मेहरबानी और ग़रीबनवाज़ी होगी। अगर शाहज़ादी सुने कि कोई मुसाफ़िर यहाँ आया था, उसकी ख़ातिर-मदारात किसी ने की, और वह यूँ ही चला गया, उस वक़्त ख़ुदा जाने मुझपर क्या आफ़त ढाये और कैसी क़यामत उठावे। शायद जान दूभर हो जाय।” मैंने इन बातों को माना, तब वह ख़्वाह-मख़्वाह मिन्नतें करके मुझे एक और हवेली (जो पहले मकान से बेहतर थीं) ले गया। उसी पहले मेज़बान की तरह तीन दिन-रात दोनों वक़्त वैसे ही खाने, और सुब्ह और तीसरे पहर शर्बत पिलाए, और मेवे खिलाये, और चाँदी और सोने के बासन, फ़र्श वग़ैरह, और असबाब जो-कुछ वहाँ था, मुझसे कहने लगा, “इन सब के तुम मालिक मुख़्तार हो, जो चाहो, सो करो।”

    मैं यह बातें सुनकर हैरान हुआ और चाहा कि किसी किसी तरह यहाँ से रुख़्सत होकर भागूँ। मेरे चेहरे को देखकर वह महल्ली बोला, “ऐ ख़ुदा के बन्दे! जो तेरा मतलब या आर्ज़ू हो, सो मुझसे कह, तो मल्का के हुज़ूर में जाकर अ’र्ज़ करूँ।”

    मैंने कहा, “मैं फ़क़ीरी के लिबास में हूँ, दुनिया का माल क्या मांगूँ जो तुम बग़ैर मांगे देते हो, और मैं इंकार करता हूँ!” तब वह कहने लगा कि दुनिया की लालच किसी के जी से नहीं गई।

    किसी कवि ने यह कविता कही है-

    नख बिन कटा देखे, सीस भारी जटा देखे

    जोगी कनफटा देखे, छार लागे तन में।

    मौनी अनबोल देखे, सेवड़ा सिर छोल देखे

    करत कलोल देखे, वन खन्डी बन में।

    वीर देखे सूर देखे, सब गुनी और कूर देखे

    माया के पूर देखे, भूले रहे धन में।

    आदि अन्त सुखी देखे, जनम ही के दुखी देखे

    पर वह देखे, जिनके लोभ नहीं मन में।

    मैंने यह सुनकर जवाब दिया कि, “यह सच है। पर मैं कुछ नहीं चाहता। अगर फ़रमाओ तो एक रुक़्क़ा, मुहरबन्द अपने मतलब का लिखकर दूँ जो मल्का के हुज़ूर में पहुँचा दो, तो बड़ी मेहरबानी होगी। अगर ऐसा करोगे तो गोया तमाम दुनिया का माल मुझको दोगे।”

    वह बोला, “आपका हुक्म सर आँखों पर, इसमें क्या हर्ज है।”

    मैंने एक रुक़्क़ा लिखा, पहले ख़ुदा का शुक्र, फिर अपना हाल कि, ‘यह ख़ुदा का बन्दा, कई रोज़ से इस शहर में आया हुआ है, और आप की सरकार से हर तरह की ख़बरगीरी होती है। जैसी ख़ूबियाँ और नेकनामियाँ, मल्का की सुनकर देखने का शौक़ हुआ था उससे चारगुना ज्यादा ही पाया। अब आप के ख़िदमतगार यह कहते हैं कि जो मतलब और तमन्ना तेरी हो, सो ज़ाहिर कर, इस वास्ते बेझिझक जो दिल की आर्ज़ू है सो अ’र्ज़ करता हूँ कि मैं दुनिया के माल का मुहताज नहीं। अपने मुल्क का मैं भी बादशाह हूँ! यहाँ तलक आना, और मुसीबत उठाना सिर्फ़ आपको देखने के शौक़ की वजह से हुआ, जो तन-तनहा इस सूरत से पहुँचा हूँ। अब उमीद है कि हुज़ूर की तवज्जोह से यह नाचीज़ अपने दिल की मुराद की पहुँचे, तो बड़ा अच्छा होगा। आगे जो आप की मर्ज़ी में आवे। लेकिन अगर यह मेरी नाचीज़ दरख़्वास्त क़ुबूल होगी, तो यह फ़क़ीर इसी तरह ख़ाक छानता रहेगा, और इस बेक़रार जान को आपके इश्क़ में निछावर करेगा। मजनूँ और फ़रहाद की तरह जंगल या पहाड़ पर जाकर मर रहेगा।’

    यही आर्ज़ू लिखकर उस ख़ोजे को दिया, उसने मेरा रुक़्क़ा बादशाहज़ादी तलक पहुंचाया। कुछ देर बाद फिर आया और मुझे बुलाया, और अपने साथ महल की डेवढ़ी पर ले गया। वहाँ जाकर देखा, तो एक बूढ़ी-सी औ’रत , देखने में क़ाबिल, सुनहरी कुर्सी पर गहना-पाता पहने बैठी है और कई ख़ोजे, खिदमतगार, भड़कीला लिबास पहने हुए, हाथ बाँधे सामने खड़े हैं। मैं उसे पुरानी ख़ास मुख़्तार समझकर आदर के लिए अपना हाथ सर तक ले गया। उस मामा ने बड़ी मेहरबानी से सलाम किया और हुक्म दिया, आओ बैठो, बड़ा अच्छा हुआ कि तुम आये। तुम्ही ने मल्का से मिलने का शौक़ अपने रुक़्क़े में ज़ाहिर किया था?” मैं शर्म से चुप हो रहा, और सर नीचा करके बैठ गया।

    कुछ देर के बाद बोली, “ऐ जवान, बादशाहज़ादी ने सलाम कहा है और फ़रमाया है कि मुझे शौहर करने में ऐ’ब नहीं। तुम ने मेरे लिए दर्ख़्वास्त की, लेकिन अपनी बादशाहत का बयान करना, और इस फ़क़ीरी में अपने को बादशाह समझना और उसका घमण्ड करना बेजा है। इस वास्ते कि सब आदमी आपस में दरअस्ल एक हैं। लेकिन इस्लाम धर्म की बड़ाई अपनी जगह पर है। और, मैं भी एक मुद्दत से शादी करने की ख़्वाहिश रखती हूँ। जैसे तुम दुनिया की दौलत से लापर्वाह हो, मुझको भी ख़ुदा ने इतना माल दिया है जिसका कुछ हिसाब नहीं, पर एक शर्त है कि पहले महर अदा कर दो, और शाहज़ादी की महर एक बात है जो तुमसे हो सके।”

    मैंने कहा कि “मैं हर तरह हाज़िर हूँ, जान-माल किसी तरह भी पीछे नहीं रहूँगा, वह बात क्या है, कहो तो मैं भी सुनूँ।”

    तब उसने कहा, “आज के दिन रह जाओ, तो कल तुम्हें बता दूँगी।”

    मैंने ख़ुशी से मंज़ूर कर लिया और रुख़्सत होकर बाहर गया।

    दिन गुज़र गाय, जब शाम हुई तो मुझे एक ख़्वाजासरा महल में बुलाकर ले गया। जाकर देखा तो बड़े बड़े आलिम और फ़ाज़िल हैं। मैं भी उसी जल्से में जाकर बैठा, कि इतने में दस्तरख़्वान बिछाया गया और तरह-तरह के खाने मीठे और नमकीन लगाए गए। वे सब खाने लगे और मुझे भी इसरार करके शामिल कर लिया। जब खाने से फ़ुर्सत हुई तो एक दाई अन्दर से आई और बोली कि, “बहरावर कहां है, उसे बुलाओ।” यसावलों ने वैसे ही उसे हाज़िर किया। उसकी सूरत मर्दों-जैसी थी और कमर में बहुत-सी सोने-चाँदी की कुंजियाँ लटकाये हुए था। मुझको सलाम करके मेरे पास आकर बैठा और वही दाई कहने लगी कि, “ऐ बहरावर! तूने जो कुछ देखा है, तफ़सील से बयान कर।”

    बहरावर ने यह क़िस्सा कहना शुरू किया और मुझसे मुख़ातिब होकर बोला, ‘ए अज़ीज़? हमारी राजकुमारी की सरकार में हज़ारों ग़ुलाम हैं जो सौदागरी के काम पर लगे हुए हैं, उनमें से मैं भी एक घर का पला मा’मूली नौकर हूँ। शाहज़ादी उनको हर मुल्क की तरफ़ लाखों रुपयों का सामान और जिन्स देकर भेजती है। जब वे वहाँ से वापस आते हैं, तो उनसे उस देश का हाल, अपनी हुज़ूर में पूछती हैं और सुनती है।

    एक बार ऐसा इत्तिफ़ाक़ हुआ कि यह ग़ुलाम तिज़ारत के लिये चला और शहर ‘नीमरोज़’ पहुँचा। वहाँ के रहने वालों को देखा कि सबका लिबास सियाह है और वे हर वक़्त आह भरते हैं और फ़रियाद करते हैं। ऐसा मा'लूम होता था कि उन पर कोई बड़ी मुसीबत पड़ी है। मैं जिससे पूछता, कोई मेरे सवाल का जवाब देता। इसी हैरत में कई रोज़ गुज़रे। एक दिन जैसे ही सुब्ह हुई, सारे आदमी छोटे-बड़े, लड़के-बूढ़े, ग़रीब-अमीर शहर बाहर चले और एक मैदान में जाकर जमा’ हुए। इस मुल्क का बादशाह भी सब अमीरों को साथ लेकर सवार हुआ और वहाँ गया। सब बराबर क़तार बाँधकर खड़े हुए।

    मैं भी उनके दरमियान खड़ा तमाशा देखता था। पर यह मा’लूम होता था कि वे सब किसी का इंतिज़ार कर रहे हैं। एक घड़ी के अर्से में दूर से एक जवान, परीज़ाद, ख़ूब-सूरत, पन्द्रह-सोलह बरस के सिन-ओ-साल का ग़ुल और शोर करता हुआ और जिसके मुँह से कफ़ जारी, ज़र्द बैल की सवारी, एक हाथ में कुछ लिये हुए, मजमे के सामने आया और अपने बैल पर से उतरा। एक हाथ में नाथ और एक हाथ में नंगी तलवार। घुटने तोड़ कर बैठा, एक फूल-सा ख़ूब-सूरत, जवान उसके साथ था, उसको उस जवान ने वह चीज़ जो हाथ में थी, दे दी। वह यतीम उसे लेकर एक सिरे से हर-एक को दिखाता जाता था, लेकिन हालत यह थी कि जो कोई देखता था, बेइख़्तियार रो पड़ता था। इसी तरह सब को दिखाता हुआ और रुलाता हुआ सबके सामने होकर अपने मालिक के पास वापस चला गया।

    उसके जाते ही वह जवान उठा और उस ग़ुलाम का सर तलवार से काटकर और सवार होकर जिधर से आया था, उधर ही को चला गया। सब खड़े देखते रहे, जब वह नज़रों से ग़ायब हुआ, लोग शहर की तरफ़ वापस चले।

    मैं हर-एक से इस मा’मले की हक़ीक़त पूछता था, बल्कि रुपयों की लालच देता और ख़ुशामद मिन्नत करता कि मुझे बता दो कि जवान कौन है और उसने यह क्या हर्कत की और कहाँ से आया और कहाँ गया। लेकिन हरगिज़ किसी ने बताया और कुछ मेरी समझ में आया। यह अ’जूबा देखकर जब मैं यहाँ आया और मल्का के रू-बरू मैंने वाक़िआ' बयान किया, तब से राजकुमारी भी हैरान हो रही है और उसकी छान-बीन के लिये उतावली हो रही है। इसीलिये उसने यही अपना महर मुक़र्रर किया है कि जो उस अ'जूबी की पूरी और सही ख़बर लावे, उसी को वह पसन्द करेगी और वही सारे मुल्क-माल और मल्का का मालिक होगा।

    यह सारा क़िस्सा तुमने सुना, अब अपने दिल में सोच लो कि अगर तुम उस जवान की ख़बर ला सकते हो तो मुल्क ‘नीमरोज़’ जाने का इरादा करो औऱ जल्द रवाना हो जाओ, नहीं तो इन्कार करके अपने घर की राह लो।

    मैं ने जवाब दिया कि, “अगर ख़ुदा ने चाहा तो जल्द-से-जल्द उसका हाल शुरू से आख़िर तक मा’लूम करके बादशाहज़ादी के पास आता हूँ और कामयाब होता हूँ। और अगर मेरी क़िस्मत ही ख़राब है तो इसका कोई इलाज नहीं। लेकिन मल्का इसका वा’दा करें कि अपनी बात से फिरेंगी। और सच पूछो तो एक बात का खटका बार-बार मेरे दिल में पैदा होता है। अगर मल्का ग़रीबनवाज़ी और मुसाफ़िरपर्वरी से अपने हुज़ूर में बुलाएँ और पर्दे के बाहर बिठाएँ और मेरी गुज़ारिश अपने कानों से सुनें, और उसका जवाब अपनी ज़बान से फ़र्माएँ, तो मुझे इत्मीनान हो और मुझसे सब कुछ हो सके।” यह बात मामा ने उस ख़ूब-सूरत राजकुमारी से अ’र्ज़ की, उसने मेरी बात की क़द्रदानी की और हुक्म दिया, “उन्हें बुला लो।”

    दाई फिर बाहर आई और मुझे अपने साथ राजकुमारी के महल में ले गई। देखता क्या हूँ कि दोनों तरफ़ क़तार में, हाथ बाँधे हुए सहेलियाँ लौंडियाँ, ख़्वासें और शाही महल में पहरा देने वाली हथियार-बन्द औरतें, तुर्किनियां, हब्शिनियां, उज़बेकिनियां, कश्मीरिनियां, जवाहिर में जड़ी ओहदे लिये खड़ी है। इन्दर का अखाड़ा कहूँ या परियों का उतारा। बे इख़्तियार एक आह बेख़ुदी से ज़बान तक आई, और कलेजा धड़कने लगा, पर मैंने कोशिश करके अपने को सँभाला। उनको देखता-भालता और सैर करता आगे चला। लेकिन पांव सौ-सौ मन के हो गए। जिसको देखूँ फिर जी चाहे कि आगे जाऊँ। एक तरफ़ चिलमन पड़ी थी और जड़ाऊ मोढ़ा रखा हुआ था, और सन्दल की एक चौकी भी बिछी थी। दाई ने मुझे बैठने का इशारा किया। मोढ़े पर बैठ गया और वह चौकी पर और मुझसे बोली कि अब जो-कुछ कहना है जी-भर के कहो।

    मैंने मल्का की ख़ूबियों की, उसके इंसाफ़ की, उसके दान देने की तारीफ़ की। फिर मैंने कहा, “जब से मैं इस मुल्क़ की सरहद में आय़ा हर शहर में यही देखा कि जगह-जगह मुसाफ़िरख़ाने और ऊँची-ऊँची इमारतें बनी हुई हैं और हर-एक ओहदे पर आदमी मुक़र्रर हैं, जो मुसाफ़िरों और मुहताज़ों की ख़बरगीरी करते हैं। मैं ने भी तीन-तीन दिन हर मक़ाम पर गुज़ारे और, चौथे रोज़ जब रुख़्सत होने लगा तब भी किसी ने ख़ुशी से कहा कि जाओ। और जितना सामान उस मकान में होता, शतरंजी, चाँदनी, क़ालीने, सीतलपाटी, मंगल कोटी, दीवारगीरी, छत के पर्दे, चिलमनें, सायबान, नमगीरे, छपरखट, ग़िलाफ़ समेत, तोशक लिहाफ़ समेत, बालापोश, सोजबन्द चादर, तकिये, तकैनी, गुल तकिये, गुल मसनद, गाव तकिये, देग, देगची, पतीला-पतीली, तवाक़, रकाबी वादिये, तश्तरी, चमचे, बकावली, कफ़गीरी, तआमबख़्श, सरपोश, सेनी, ख़्वानपोश, तोरापोश, आबख़ोरे, वजरे, सुराही, लगन, पानदान, चौघड़े, चंगेर, गुलाबपाश, ऊदसोज़, आफ़ताबा, चिलमची, सब मेरे हवाले करता कि यह सब माल तुम्हारा है, चाहो तो अभी ले जाओ वर्ना एक कोठरी में बन्द करके अपनी मुहर लगा दो, जब तुम्हारी ख़ुशी हो वापस आकर ले जाना। मैंने ऐसा ही किया। पर यह हैरत है कि जब मुझ तनहा फ़क़ीर से यह सुलूक हुआ तो ऐसे हज़ारों ग़रीब आपके मुल्क में आते-जाते रहते होंगे। सो अगर इसी तरह हर-एक की मेहमानदारी होती होगी तो बेहिसाब रुपया ख़र्च होता होगा, इतनी दौलत ख़र्च के लिए, कहां से और कैसे आती होगी, इस तरह को क़ारून का ख़ज़ाना हो तो भी पूरा पड़े और अगर मल्का की सल्तनत देखिये तो ज़ाहिर में उसकी आमदनी सिर्फ़ बावर्चीख़ाने का ख़र्च भी संभाल पाती होगी। दूसरे ख़र्चों का तो ज़िक्र ही क्या। इसका हाल मल्का की ज़बान से सुनूँ तो इत्मीनान हो, और मुल्क ‘नीमरोज़’ के सफ़र का इरादा करूँ और ज्यूँ-ज्यूँ वहां पहुँचूं, फिर सब हाल मा’लूम करके अगर ज़िन्दगी होगी, तो मल्का कि ख़िदमत में हाज़िर हूँगा और अपने दिल की मुराद पाऊंगा।”

    यह सुनकर मल्का ने ख़ुद अपनी ज़बान से कहा कि, “ऐ जवान अगर तुझे यह हाल मा’लूम करने की तमन्ना है तो आज के दिन भी ठहर, शाम को तुझे अपने हुज़ूर में तलब करके जो-कुछ हाल इस घटने वाले धन का है, पूरा-पूरा और सही-सही कह दूँगी।”

    मैं यह तसल्ली पाकर, उसी जगह लौट आया जहां मैं ठहरा था और इंतिज़ार करने लगा कि कब शाम हो और मेरा मतलब पूरा हो। इतने में ख़्वाजासरा कई चौगोशे, तोरापोश, भुइयों के सर पर धरे आकर मौजूद हुआ और बोला, “सरकार ने ख़ास खाना भेजा है, उसको खा लीजिये।” जिस वक़्त मेरे सामने खाना खोला गया, बू-बास से दिमाग़ मुअत्तर हुआ और रूह भर गई। जितना खा सका, खा लिया, बाक़ी उन सभों को दे दिया और शुक्रिया कहला भेजा। जब तमाम दिन का थका हुआ मुसाफ़िर गिरता-पड़ता अपने महल में दाख़िल हुआ और चाँद अपने हमजोलियों के साथ अपने दीवानख़ाने में आकर बैठा, उस वक़्त दाई आई और मुझसे बोली, “चलो, राजकुमारी ने याद फ़रमाया है।”

    मैं उसके साथ हो लिया। वह मुझको ख़ल्वत-ए-ख़ास में ले गई। रौशनी का यह आ'लम था कि वहां शब-ए-क़द्र की क़द्र थी और बादशाही फ़र्श पर ऐसी मसनद लगी हुई, जिस में जवाहिरात टँके हुए थे, जड़ाऊ तकिया लगा हुआ और उस पर एक शामियाना मोतियों की झालर का जड़ाऊ खम्भों पर खड़ा हुआ और मसनद के सामने जावहिरात के दरख़्त, फूल-पात लगे हुये (जैसे कि बिलकुल क़ुदरती हों, सोने की क्यारियों में जमे हुए) और दोनों तरफ़, दाहने और बायें शागिर्द-पेशे, और मुजराई हाथ-बांधे अदब के साथ, आंखें नीचे किये हुए हाज़िर थे। नर्तकियाँ और गायिकाओं साज़ों के सुर मिलाए इंतिज़ार में खड़ी थीं। यह समाँ और यह तैयारी, औऱ यह ठाठ देखकर अक़्ल ठिकाने रही।

    दाई से मैंने यह पूछा, “दिन की यह ज़ेबाइश और रात की यह आराइश, ऐसी कि दिन को ईद रात को शब-ए-बरात कहना चाहिये। शायद दुनिया के सात मुल्कों के बादशाह को भी यह ऐ’श मुयस्सर होगा। क्या हमेशा यही सूरत रहती है?”

    दाई कहने लगी कि, “हमारी रानी का जितना कारख़ाना तुमने देखा, यह सारा-का-सारा हमेशा इसी सूरत बना रहता है, इसमें कोई कमी नहीं होती, बल्कि यह बढ़ता जाता है। तुम यहाँ बैठो, रानी दूसरे मकान में तशरीफ़ रखती हैं, मैं जाकर ख़बर कर दूँ।”

    दाई यह कहकर गई, और कुछ ही देर में पलट आई, और कहने लगी, “चलो हुज़ूर में।”

    मैं उस मकान में जाते ही भौचक्का रह गया। यह मा’लूम हुआ कि दरवाज़ा कहाँ और दीवार किधर है, इस वास्ते कि चारों तरफ पूरे-क़द के हलब्बी आईने लगे हुए थें। उनकी परदाज़ों में हीरे और मोती लड़े थे। एक का अ’क्स एक में नज़र आता तो यह मा’लूम होता कि जवाहिर का सारा मकान है। एक तरफ़ पर्दा पड़ा था। उसके पीछे मल्का बैठी थीं। वह दाई पर्दे से लगकर बैठी और उसने मुझे भी बैठने को कहा। उसके बाद मल्का के हुक्म से दाई इस तरह बयान करने लगी कि, “ऐ अक़्लमंद जवान सुन! इस मुल्क का सुल्तान बड़ा बादशाह था, उसके घर में सात बेटियां पैदा हुई। एक रोज़ बादशाह ने जश्न किया, और सातों लड़कियाँ सोलह-सिंगार, बारह अभरन, बाल-बाल गज मोती पिरो कर उसके हुज़ूर में खड़ी थी, सुल्तान के जी में कुछ आया तो बेटियों की तरफ़ देखकर फ़र्माया, “अगर तुम्हारा बाप बादशाह होता, तो तुम्हें मल्का और बादशाहज़ादी कौन कहता? ख़ुदा का शुक्र अदा करो कि राजकुमारी कहलाती हो। तुम्हारी यह सारी इज़्ज़त मेरे दम से है।”

    छः लड़कियाँ एक ज़बान होकर बोलीं कि, “जहाँपनाह जो फ़र्माते हैं, बजा है और आपकी सलामती में ही हमारी भलाई है!” लेकिन हमारी मल्का जो सब बहनों से छोटी थीं, पर अक़्ल और समझ में उस उ'म्र में भी अपनी सब बहनों से बड़ी थीं, यह चुपकी खड़ी रहीं और बहनों की बाचतीच में शामिल हुई। इस वास्ते कि ऐसी बात कहना मज़हब के ख़िलाफ था।

    बादशाह ने ग़ुस्से की नज़र से उनकी तरफ़ देखा और कहा, “क्यों बेटी, तुम कुछ बोली, इसका क्या सबब है?”

    तब मल्का ने अपने दोनों हाथ रूमाल से बांधकर अ'र्ज़ किया कि “अगर जानबख़्शी हो, और क़ुसूर माफ़ हो तो यह लौंडी अपने दिल की बात अ'र्ज़ करे।”

    हुक्म हुआ, “कह! कह! क्या कहती है?” मल्का ने कहा, “क़िबला-ए- आ’लम! आपने सुना है कि सच्ची बात कड़वी लगती है, सो इस वक़्त मैं अपनी ज़िन्दगी से हाथ धोकर अ’र्ज़ करती हूँ और जो-कुछ मेरी क़िस्मत में लिखने वाले ने लिखा है, उसका मिटाने वाला कोई नहीं, वह किसी तरह नहीं टलने का-

    ख़्वाह तुम पाँव घिसो, कि रखो सर बसजूद!

    बात पेशानी की जो कुछ है सो पेश आती है!

    “जिस ताक़त वाले बादशाह ने आप को बादशाह बनाया, उसी ने मुझे भी बादशाहज़ादी कहलवाया। उसकी क़ुदरत के कारख़ाने में किसी का इख़्तियार नहीं चलता। आप की ज़ात हमारी वली-ए-नेमत और क़िबला-ओ-काबा है। आप के मुबारक क़दम की ख़ाक को अगर सुर्मा बनाऊँ तो बजा है। मगर नसीब हर-एक का हर-एक के साथ है।”

    बादशाह को यह सुनकर ग़ुस्सा आया और यह जवाब उसके दिल को बहुत बुरा मा’लूम हुआ। बेज़ार होकर बादशाह ने फ़र्माया, “छोटा मुँह बड़ी बात! अब इसकी यही सज़ा है कि गहना-पाता जो कुछ इसके हाथ और गले में है, सब उतार लो औऱ एक मियाने में चढ़ाकर ऐसे जंगल में फेंक आओ, जहाँ आदमी-आदमज़ाद का नाम-ओ-निशान हो। देखा जाय कि इसके नसीबों में क्या लिखा है?”

    बादशाह के हुक्म के मुताबिक़, आधी रात में, और ऐसी रात जो घोर अंधेरी थी, मल्का को, जो निरे भौरे-भौरे में पली थी और जिसने सिवाय अपने महल के दूसरी जगह देखी थी, उसे मुँह से जाकर एक ऐसे मैदान में जहाँ परिन्दा पर मारता था, इंसान का तो ज़िक्र ही क्या, छोड़कर चले आये।

    मल्का के दिल पर अ’जब हालत गुज़रती थी कि एक दम में क्या था, और क्या हो गया? फिर अपने ख़ुदा के हुज़ूर में शुक्र अदा करतीं और कहतीं, तू ऐसा ही बेनियाज़ है जो चाहा सो किया, और जो चाहता है सो करता है, और जो चाहेगा सो करेगा। जब तलक नथनों में दम है, तुमसे नाउमीद नहीं होती।”

    इसी खटके में आँख लग गई। जिस वक़्त सुब्ह होने को आई, मल्का की आँख खुल गई। मल्का ने पुकारा, “वज़ू को पानी लाना।” फिर यकबारगी रात की बातचीत याद आई, कि तू कहाँ और यह बात कहाँ? यह कहकर उठकर तयम्मुम किया, और नमाज़ शुक्र की पढ़ी। अज़ीज़! मल्का की इस हालत के सुनने से छाती फटती है, उस भोले-भाले जी से पूछा चाहिए कि क्या कहता होगा।

    ग़रज़ उस मयाने में बैठी हुई, ख़ुदा से लौ लगाए हुए थीं और यह कविता उस दम पढ़ती थीं-

    जब दाँत थे तब दूध दियौ, जब दाँत दिये काह अन्न देहैं।

    जो जल में, थल में पंछी, पशु की सुध लेत सो तेरी भी लेहै।

    काहे को सोच करे मन मूरख, सोच करे कुछ हाथ अइ है।

    जान को देत, अजान को देत, जहान को देत सो तोको भी दइ है।

    सच है, जब कुछ बन नहीं आता, तब ख़ुदा याद आता है। नहीं तो, अपनी-अपनी तदबीर में हर-एक लुक़मान और बू अली सीना है। अब ख़ुदा के कारख़ाने का तमाशा सुनो। इसी तरह तीन दिन-रात साफ़ गुज़र गए कि मल्का के मुँह में एक खील भी उड़कर गई। वह फूल-सा बदन सूख कर काँटा हो गया और वह रंग जो कुन्दन-सा दमकता था, हल्दी-सा बन गया। मुँह में फेफड़ी बन गई, आंखें पथरा गई। मगर सिर्फ़ दम अटक रहा था ओर वह आता-जाता था। जब तलक-साँस, तब तलक आस!

    चौथे रोज़ सुब्ह को एक दर्वेश, खिज़्र की सी सूरत, नूरानी चेहरा, रौशन दिल, वहाँ आया।

    मल्का को उस हालत में देखकर बोला, ‘ऐ बेटी, अगरचे बाप बादशाह है, लेकिन तेरी क़िस्मत में यह भी था। अब इस फ़क़ीर बूढ़े को अपना नौकर समझ और अपने पैदा करने वाले का ध्यान रख। ख़ुदा जो करेगा, अच्छा करेगा।’ और फ़क़ीर के कश्कोल में जो टुकड़े भीख के मौजूद थे, मल्का के सामने रखे और पानी की तलाश में फिरने लगे। देखा तो एक कुआँ तो है पर डोल-रस्सी कहाँ जिससे पानी भरे! थोड़े पत्ते दरख़्त से तोड़कर दोना बनाया और अपनी पगड़ी खोलकर उसमें बांध कर निकाला ओर मल्का को कुछ खिलाया-पिलाया। बारे उसे कुछ होश आया और मर्द-ए-ख़ुदा ने बेबस और बेकस जानकर बड़ी तसल्ली दी औऱ ढारस दी और ख़ुद भी रोने लगा। मल्का ने जब उसकी हमदर्दी और दिलदारी देखी तब उनकी तबीअ’त भी कुछ बहाल हुई। उस दिन से उस बूढ़े आदमी ने यह दस्तूर बना लिया कि सुब्ह को भीख मांगने के लिए निकल जाता, जो टुकड़ा-पार्चा पाता मल्का के पास ले आता और खिलाता।

    इस तरह थोड़े दिन गुज़रे। एक दिन मल्का ने सर में तेल डालने और कंघी-चोटी करने का इरादा किया, जैसे ही मुबाफ़ खोला, चुटले में से एक मोती का दाना गोल, आबदार निकल पड़ा। मल्का ने उस दर्वेश को दिया और कहा शहर में इस को बेच लाओ। वह फ़क़ीर उस मोती को बेचकर उसकी क़ीमत राजकुमारी के पास ले आया। तब मल्का ने हुक्म दिया कि एक मकान गुज़र के लायक इस जगह बनाओ।

    फ़क़ीर ने कहा, “ऐ बेटी, दीवार की नींव खोद कर थोड़ी सी मिट्टी जमा करो। एक दिन मैं पानी लाकर, गारा बनाकर घर की बुनियाद दुरुस्त कर दूँगा।”

    मल्का ने उसके कहने से मिट्टी खोदनी शुरू की। जब एक गज गहरा गड्ढा खुद गया तो ज़मीन के नीचे से दरवाज़ा दिखाई दिया, और मल्का ने उस दर को साफ़ किया। एक बड़ा घड़ा जवाहिरात और अशर्फियों से भरा हुआ दिखाई दिया। मल्का ने पाँच-चार मुट्ठी अशर्फ़ियों को लेकर, फिर दरवाज़ा बन्द कर दिया और मिट्टी देकर ऊपर से बराबर कर दिया। इतने में फ़क़ीर आया। मल्का ने उससे फ़र्माया कि, “राज और मे’मार, कारीगर और अपने काम के उस्ताद और मज़दूर जल्द से जल्द बुलाओ जो इस मकान पर एक बादशाही शान की इमारत बनाई जाय और इसके साथ-साथ शहर-पनाह और क़िला, बाग़, बावली और एक मुसाफ़िरख़ाना जो अपनी मिसाल रखता हो, यह सारी चीज़ें जल्द तैयार करें, लेकिन पहले उनका नक़्शा एक कागज़ पर तैयार करें, ओर मेरे सामने लावें, जिसे पसन्द किया जा सके।”

    फक़ीर ने ऐसे ही कारीगर, मिस्तरी, अपने काम के माहिर लाकर हाज़िर किये। बादशाहज़ादी के फ़र्माने के मुताबिक़ इमारत बनना शुरू हो गई, और हर काम के लिये नौकर-चाकर रखे गए। उस आ’लीशान इमारत की तैयारी की ख़बर धीरे-धीरे बादशाह (जो मल्का के पिता थे) तक भी पहुँची। यह सुनकर बादशाह को बड़ा तअ'ज्जुब हुआ औऱ हर एक से पूछा कि “यह कौन शख़्स है, जिसने ये महल बनवाने शुरू किये हैं?” उसके हाल से कोई वाक़िफ़ था, जो अ’र्ज़ करता। सभों ने कानों पर हाथ रखे हम में से कोई गुलाम नहीं जानता कि इस को बनवाने वाला कौन है? तब बादशाह ने एक अमीर को भेजा और पैग़ाम दिया कि, “मैं इन मकानों को देखने को आना चाहता हूँ और यह भी मा’लूम नहीं कि तुम कहाँ की राजकुमारी हो, और किस ख़ानदान से हो। मुझे यह सारी बातें जानने की ख़्वाहिश है।”

    जैसे ही मल्का ने यह ख़ुशखबरी सुनी, दिल में बहुत ख़ुश हुई, और उसने यह अ’र्ज़ी लिखी कि, “जहाँपनाह सलामत? हुज़ूर के ग़रीबख़ाने की तरफ़ तशरीफ़ लाने की ख़बर सुनकर निहायत ख़ुशी हासिल हुई, और इस नाचीज़ की इज़्ज़त बढ़ने का सबब हुई। वाह रे नसीब उस मकान का, जहाँ आप के मुबारक क़दमों के निशान पड़े, और जहाँ के रहने वालों पर आप की मुबारक छाप पड़े, और वह दोनों आप की तवज्ज्जोह से सर बुलन्द होवें। यह लौंड़ी उमीदवार है कि कल जुमेरात का मुबारक दिन है, और मेरे लिए यह दिन नौरोज़ से भी बेहतर है। आप की ज़ात सूरत के समान है, आप यहाँ तशरीफ़ लाकर अपनी रौशनी से इस नाचीज़ ज़र्रे को इज़्ज़त और मर्तबा बख़्शिए और जो कुछ इस लौंडी को मुयस्सर हो सके, नोश फ़रमाइये। यह ख़ास ग़रीबनवाज़ी और मुसाफ़िरपर्वरी होगी। ज़्यादा अदब और लिहाज़ की वजह से नहीं लिख सकती।” मल्का ने उस पैग़ामबर को भी ख़ातिर-तवाज़ो करके रुख़्सत किया।

    बादशाह ने अ[र्ज़ी पढ़ी और कहला भेजा कि, “हमने तुम्हारी दा’वत क़ुबूल की, ज़रूर आवेंगे।” मल्का ने नौकरों और कारिन्दों को हुक्म दिया कि दा’वत का इंतिज़ाम इस सलीक़े से हो कि बादशाह देख कर और खाकर खुश हो और छोटे बड़े जो बादशाह की रकाब में आवें, सब खा-पीकर खुश होकर जावें।

    मल्का के फ़र्माने और ताकीद करने से, सब क़िस्म के खाने, सलोने और मीठे इस ज़ायक़े के तैयार हुए कि अगर ब्राह्मण की बेटी खाती तो कलमा पढ़ती। जब शाम हुई, बादशाह मुंडे तख़्त पर सवार होकर मल्का के मकान की तरफ़ तशरीफ़ लाए और मल्का अपनी ख़ास- ख़ास सहेलियों को लेकर स्वागत के वास्ते चलीं। जैसे ही मल्का की नज़र तख़्त पर पड़ी, उसने इतने अदब के साथ मुजरा अ’र्ज़ किया कि यह क़ायदा देखकर बादशाह को और भी हैरत हुई। उसी अन्दाज़ से जल्वा करके बादशाह को सोने के तख़्त पर ला बिठाया। मल्का ने सवा लाख रुपये का चबूतरा तैयार करवा रखा था और एक सौ किश्ती जवाहिर, अशर्फ़ी और पश्मीना और नूरबाक़ी, तिलाबाफ़ी और ज़र्दोज़ी की लगा रखी थी और दो सजे हुए हाथी और दस इराक़ी और यमनी साज़-रास से सुसज्जित घोड़े बादशाह को भेंट किये और ख़ुद दोनों हाथ बाँधे सामने खड़ी रही। बादशाह ने बड़ी मेहरबानी से पूछा कि, “तुम किस मुल्क की राजकुमारी हो और यहाँ किस तरह आना हुआ?”

    मल्का ने आदाब बजा लाकर अ’र्ज़ किया कि, “यह लौंडी वही गुनाहगार है जो जहाँपनाह के ग़ुस्से की वजह से इस जंगल में पहुँची और यह सब तमाशे ख़ुदा के हैं जो आप देखते हैं।” यह सुनते ही बादशाह के लहू ने जोश मारा। उसने उठकर राजकुमारी को मुहब्बत से गले लगा लिया और हाथ पकड़कर अपने तख़्त के पास कुर्सी बिछवाकर बैठने का हुक्म दिया। लेकिन बादशाह हैरान और तअ’ज्जुब में बैठे थे। बादशाह ने फ़र्माया कि बेगम को कहो कि राजकुमारियों को अपने साथ लेकर जल्द आवें। जब वे सब आईं तो बहनों ने पहिचाना, ख़ूब गले मिलकर रोई और शुक्र किया। मल्का ने अपनी माँ और छहों बहनों के सामने इतनी नक़दी, सोना और जवाहिर रखे कि सारे आ’लम का ख़ज़ाना उसके पासंग में चढ़े। फिर बादशाह ने सबको साथ बिठाकर खाना खाया।

    जब तलक बादशाह जीते रहे, इसी तरह गुज़री। कभी-कभी आप आते और कभी मल्का को भी अपने साथ महलों में ले जाते। जब बादशाह परलोक सिधारे तब इस मुल्क की बादशाहत मल्का को मिली क्योंकि सिवाय इनके कोई दूसरा इस काम के लायक़ था।

    “ऐ अज़ीज़ ! यही सरगुज़िश्त मल्का की है जो तूने सुनी। इससे ज़ाहिर होता है कि ख़ुदा की दी हुई दौलत में हरगिज़ कमी नहीं होती, लेकिन आदमी की नीयत साफ़ होनी चाहिये। ऐसे धन को जितना ख़र्च करो, उतनी ही उसमें बरकत होती है।

    ख़ुदा की क़ुदरत पर तअ’ज्जुब करना किसी मज़हब में जायज़ नहीं।”

    दाई ने यह बात पूरी कह कर कहा कि, “अब अगर वहाँ जाने और वहाँ की ख़बर लाने का दिल में पूरा इरादा रखते हो, तो जल्द रवाना हो जाओ।”

    मैंने कहा, “इसी वक़्त जाता हूँ और ख़ुदा चाहेगा तो जल्द वापस आता हूँ।” और आख़िर वहाँ से रुख़्सत होकर ख़ुदा की मेहरबानी पर नज़र रख कर उस दिशा में चल पड़ा।

    एक बरस के अ’र्से में हर तरह की कठिनाइयाँ झेलता हुआ, शहर ‘नीमरोज़’ में जा पहुँचा और देखा कि जितने आदमी हज़ारी और बज़ारी वहाँ नज़र पड़े, सब काले कपड़े पहने हुए थे। जैसा हाल सुना था वैसा अपनी आँखों से देखा। कई दिनों के बाद चाँद रात हुई। पहली तारीख़ को उस शहर के सारे लोग, छोटे-बड़े, लड़के-बाले, अमीर-बादशाह, औ’रत -मर्द एक मैदान में जमा’ हुये। मैं भी अपनी हालत में हैरान परेशान, अपने माल-मुल्क से दूर, फ़क़ीर की सूरत बनाए हुए उसी भीड़ के साथ खड़ा तमाशा देखता था कि देखिए आज क्या होता है? इतने में, एक जवान, बैल पर सवार, मुँह में कफ़ भरे जोश-ख़रोश करता हुआ जंगल से बाहर निकला। मैं, जो इतनी मुसीबत उठाकर उसका हाल जानने के लिए गया था, उसे देखते ही हवास खोल कर हैरान खड़ा रह गया।

    वह जवान मर्द अपने पुराने क़ायदे पर जो काम किया करता था, करके वापस चला गया और शहर की ख़िल्क़त शहर की तरफ़ पलट पड़ी। जब मुझे होश आय़ा, तब मैं पछताया कि यह तुझसे क्या हरकत हुई। महीना भर फिर राह देखनी पड़ी। और मैंने उस महीने को रोज़े के महीने की तरह एक-एक दिन गिनकर काटा।

    बारे दूसरी चाँद-रात आई। मेरे लिए जैसे ईद हो गई। पहले की तरह फिर बादशाह आम जनता के साथ, वहीं जाकर इकट्ठे हुए। तब मैंने अपने दिल में मज़बूत इरादा कर लिया कि अब की बार, जो हो सो हो, इस अ'जीब मामले को मा'लूम किया चाहिये।

    अचानक अपने दस्तूर के मुताबिक़ वही जवान ज़र्द बैल पर सवार, उस पर ज़ीन बाँधे पहुँचा और उतरकर घुटने मोड़ कर बैठा। एक हाथ में नंगी तलवार और एक हाथ में बैल की नाथ पकड़ी और मर्तबान ग़ुलाम को दिया।

    ग़ुलाम मर्तबान हर-एक को दिखाकर ले गया। आदमी उसे देख कर रोने लगा। उस जवान ने मर्तबान फोड़ा और ग़ुलाम को एक तलवार ऐसी मारी कि उसका सर अलग हो गया और आप सवार होकर मुड़ा।

    मैं उसके पीछे-पीछे तेज़ क़दम उठा कर चलने लगा। शहर के आदमियों ने मेरा हाथ पकड़ा और कहा कि, “यह क्या करता है? क्यों जान-बूझ कर मरता है? अगर ऐसा तेरा दम नाम में आया है तो बहुतेरे तरीक़े मरने के हैं, मर रहियो।”

    हरचन्द मैंने मिन्नत की और ज़ोर भी किया कि किसी सूरत से उनके हाथ से छूटूँ, पर छुटकारा हुआ। दो-चार आदमी लिपट गए और पकड़े हुए बस्ती की तरफ़ ले आये। अ’जब तरह के क़लफ़ में फिर महीना-भर गुज़रा।

    जब वह महीना भी ख़त्म हुआ और चाँद-रात आई, सुब्ह से उसी सूरत से वहाँ सारा आ’लम इकट्ठा होने लगा। मैं सबसे अलग नमाज़ के वक़्त उठकर आगे ही जंगल में जो उस जवान के रास्ते में था, घुस कर छुप रहा कि वहाँ तो कोई मेरी राह नहीं रोकेगा। वह जवान उसी क़ायदे से आया और वही हरकतें करके सवार हुआ और वापस चला।

    मैंने उस का पीछा किया और दौड़ता-धूपता साथ हो लिया। उस जवान ने आहट से मा’लूम किया कि कोई चला आता है। यक बारगी बाग मोड़ कर एक ना’रा मारा और मुझे घुड़का। तलवार खींच कर वह मेरे सर पर पहुँचा। चाहता था कि हमला करे। मैंने निहायत अदब से झुक कर सलाम किया और दोनों हाथ बाँध कर खड़ा रह गया। वह क़ायदा और तौर-तरीक़ा जानने वाला जवान बोला, “ऐ फ़क़ीर! तू नाहक़ मारा गया होता, पर बच गया। तेरी ज़िन्दगी कुछ बाक़ी है। जा, कहाँ आता है?” और जड़ाऊ खंजर मोतियों का और आवेज़ा लगा हुआ, कमर से निकाल कर मेरे आगे फेंका और कहा, “इस वक़्त मेरे पास नक़्द कुछ मौजूद नहीं, जो तुझे दूँ। इसको बादशाह के पास ले जा। जो तू मांगेगा, मिलेगा।” उसका ऐसा डर और ऐसा रो'ब मुझ पर छाया, बोलने की क़ुदरत, चलने की ताक़त, मेरी घिग्घी बंध गई, पांव भारी हो गए।

    इतना कहकर वह ग़ाज़ी मर्द ना'रा भरता हुआ चला। मैंने दिल में कहा कि जो कुछ होगा देखा जाएगा। अब यहाँ रह जाना तेरे हक़ में बुरा है। फिर ऐसा मौक़ा मिलेगा। अपनी जान से हाथ-धो कर मैं भी रवाना हुआ। फिर वह मुड़ा और बड़े ग़ुस्से से मुझे डांटा और यक़ीनन इरादा मेरे क़ल्त का किया। मैं ने सर झुका दिया और क़स्म दी कि, “ऐ रुस्तम-ए-ज़माँ। ऐसी तलवार मार कि साफ़ दो टुकड़े हो जाऊँ। एक तस्मा बाक़ी रहे और मैं इस परेशानी और तबाही से छूट जाऊँ। मैंने अपना ख़ून माफ़ किया।”

    वह बोला कि, “ऐ शैतान की सूरत! क्यों अपना ख़ून नाहक़ मेरी गर्दन पर चढ़ाता है और मुझे गुनाहगार बनाता है? जा, अपनी राह ले। क्या जान भारी पड़ी है?”

    मैंने उसका कहना माना और क़दम आगे धरा। फिर उसने जान-बूझकर आना कानी दी और मैं पीछे लग लिया। जाते-जाते दो कोस झाड़ी जंगल तय किया। एक चहारदीवारी नज़र आई। वह जवान दरवाज़े पर गया और एक डरावना ना’रा मारा। वह दरवाज़ा आप से आप खुल गया। वह अन्दर पैठा। मैं बाहर का बाहर खड़ा रह गया।

    इलाही अब क्या करूँ! हैरान था। बारे एक दम के बाद एक ग़ुलाम आया और पैग़ाम लाया कि “चल! तुझे अपने रू-बरू बुलाया है। शायद तेरे सर पर मौत का फ़रिश्ता आया है। क्या तुझे कम-बख़्ती लगी थी?”

    मैंने कहा, “मेरी क़िस्मत जागी है।” और, मैं बेधड़क उसके साथ बाग़ के अन्दर चला गया।

    आख़िर वह मुझे एक मकान में ले गया, जहाँ वह बैठा था। मैंने उसे देख कर फ़र्राशी सलाम किया। उसने बैठने को इशारा किया। मैं अदब से घुटने मोड़कर बैठा। क्या देखता हूँ कि वह जवान अकेला एक मसनद पर बैठा है और सोना बनाने के औज़ार आगे धरे हैं और एक झाड़ ज़मुर्रद का तैयार कर चुका है। जब उसके उठने का वक़्त आया, जितने ग़ुलाम उस शहनशीन के चारों तरफ़ आगे-पीछे हाज़िर थे, सब-के-सब कोठरियों में छुप गये। मैं भी डर के मारे एक कोठरी में जा घुसा।

    वह जवान उठ कर सब कोठरियों की कुंडियाँ चढ़ाकर बाग़ के कोने की तरफ़ चला और अपनी सवारी के बैल को मारने लगा। उसके चिल्लाने की आवाज़ मेरे कान में आई। कलेजा काँपने लगा। लेकिन इसी मा’मले की हक़ीक़त जानने के लिए तो यह सब आफ़तें सही थीं। मैं डरते-डरते दरवाज़ा खोलकर एक दरख़्त के तने की आड़ में जाकर खड़ा हुआ और देखने लगा। कुछ देर के बाद जवान ने वह सोंटा जिस से बैल को मारता था, हाथ से डाल दिया और एक मकान का ताला कुंजी से खोला और अन्दर गया। फिर फ़ौरन ही बाहर निकल कर बैल की पीठ पर हाथ फेरा और मुँह चूमा और दाना-घास खिला कर इधर को चला। मैं देखते ही जल्द दौड़कर फिर कोठरी में जा छुपा।

    उस जवान ने सब दरवाज़ों की ज़ंजीरें खोल दीं। सारे ग़ुलाम बाहर निकले, ज़ेर-अंदाज़ सिलफ़ची, आफ़्ताबा लेकर हाज़िर हुये। वह वज़ू करके नमाज़ की ख़ातिर खड़ा हुआ। जब वह नमाज़ अदा कर चुका तो पुकारा कि, “वह दर्वेश कहां है।”

    अपना नाम सुनते ही मैं दौड़ कर रू-बरू जा खड़ा हुआ। उस जवान ने फ़रमाया, “बैठो।”

    मैं तस्लीम करके बैठा। खाना आया। उसने खाना खाया, मुझे भी खिलाया। जब दस्तर-ख़्वान बढ़ाया और हम दोनों ने हाथ धो लिया, तो उसने ग़ुलामों को छुट्टी दी कि “जा कर सो रहो।” जब कोई उस मकान में रहा, तब मुझसे बातें करने लगा। उसने मुझ से पूछा कि, “ऐ अज़ीज़, तुझ पर क्या ऐसी आफ़त आई है, जो अपनी मौत को ढूँढ़ता फिरता है?” मैंने अपना हाल शुरू से आख़िर तक जो कुछ गुज़रा था, तफ़्सील से बयान किया और कहा कि, “आपकी तवज्जोह से उमीद है कि अपनी मुराद को पहुँचूँगा।” उसने यह सुनते ही एक ठंडी सांस भरी और बेहोश हुआ और कहने लगा, “ख़ुदाया! इश्क़ के दर्द से तेरे सिवा कौन वाक़िफ़ है! जिसके पांव फटी बवाई, वह क्या जाने पीर पराई? इस दर्द की क़द्र जो दर्दमन्द हो सो जाने-

    आफ़तों को इश्क़ की आशिक़ से पूछा चाहिए।

    क्या ख़बर फ़ासिक़ को है सादिक़ से पूछा चाहिए।

    एल लम्हे के बाद उसे होश आया और एक कलेजे को छेदने वाली आह भरी। सारा मकान गूँज गया। तब मुझे यक़ीन हुआ कि यह भी इसी इश्क़ की बला में गिरफ़्तार है और इसी मर्ज़ का बीमार है। तब तो मैंने दिल चलाकर कहा कि, “मैंने अपना सब हाल अ’र्ज़ किया। आप भी तवज्जोह करके अपने हाल से मुझे आगाह कीजिए। तो मैं भी, जहां तक मेरा बस चले, अपने मतलब तक पहुँचने से पहले आप के लिए कोशिश करूँ और शायद कोशिश से दिल का मतलब हाथ में लाऊँ।” क़िस्सा यह कि वह सच्चा आ’शिक़ मुझ को अपना हमराज़ और हमदर्द जानकर अपना हाल इस तरह बयान करने लगा- “सुन अज़ीज़! मैं दिल-जला इसी मुल्क ‘नीमरोज़’ का हूँ। बादशाह सलामत ने मेरे पैदा होने के बाद नजूमी, ज्योतिषी और रम्माल और पण्डित जमा’ किये और फ़रमाया कि शाहज़ादे की क़िस्मत का हाल देखो और जांचो और जन्मपत्री बनाओ और जो-कुछ होना है, पल-पल, घड़ी-घड़ी और पहर-पहर, दिन-दिन, महीने-महीने और बरस-बरस का मुफ़स्सल हाल बताओ।

    “बादशाह के हुक्म के मुताबिक़, सब ने मिलकर, अपने-अपने इल्म से जांच कर और साध कर अ’र्ज़ किया कि ख़ुदा की मेहरबानी से शाहज़ादे का जन्म ऐसी अच्छी घड़ी और शुभ लग्न में हुआ है कि होना यह चाहिए कि सिकन्दर सी बादशाहत करे और नौशेरवां की तरह इंसाफ़ करने वाला हो और जितने इल्म और हुनर हैं, उन में पूरा उतरे और जिस काम की तरफ़ उसका दिल मायल हो वह उसे अच्छी तरह हासिल करे। दान देने में और बहादुरी में ऐसा नाम पैदा करे कि लोग हातिम और रुस्तम को भूल जायँ। लेकिन चौदह बरस तलक सूरज और चांद को देखने से एक बड़ा ख़तरा नज़र आता है, बल्कि यह खटका है कि पागल, सौदाई होकर बहुत आदमियों का ख़ून करे और बस्ती से घबराये और जंगल में निकल जाए। इसलिए यह क़ैद रहे कि रात-दिन चांद-सूरज को देखे बल्कि रात-दिन आसमान की तरफ़ निगाह भी करने पाये। जो इतनी मुद्दत ठीक-ठिकाने से कटे तो फिर सारी उम्र सुख और चैन से बादशाहत करे।”

    “यह सुनकर बादशाह ने एक बाग़ की नींव डाली और हर एक नक़्शे के कई मकान बनवाए और मेरे तहख़ाने में पलने का हुक्म दिया और उसके ऊपर एक बुर्ज नमदे का तैयार करवा दिया ताकि धूप और चाँदनी उस में से छने। मैं दाई, दूध पिलाई और अंगा छूछू और कई ख़ासों के साथ, उस आ’लीशान मकान में हिफ़ाज़त के साथ पलने लगा। एक तजरबा-कार, अक़्लमन्द उस्ताद को मेरी ता'लीम-तर्बियत के लिए मुक़र्रर किया और मैं हर इल्म और हुनर की ता'लीम और सातों क़लम लिखने की मश्क़ करने लगा। जहाँपनाह हमेशा मेरी ख़बरगीरी किया करते और पल-पल और घड़ी-घड़ी का हाल बदाशाह के हुज़ूर में अ’र्ज़ किया जाता। मैं उस मकान को सारी दुनिया जानकर खिलौनों और रंग-बिरंग के फूलों से खेला करता और सारी दुनिया की नेमतें खाने के वास्ते मौजूद रहतीं। जो चाहता सो खाता। दस बरस तक जितनी कलाएँ और विद्यायें थीं, सब मैंने हासिल कर लीं।

    एक दिन उसी गुंबद के नीचे, रोशनदान से एक अचंभे का फूल नज़र पड़ा। मैंने चाहा कि हाथ से पकड़ लूँ। जैसे-जैसे मैं हाथ लंबा करता जाता था वह और ऊँचा होता जाता था। मैं हैरान होकर उसे तक रहा था। वैसे ही एक क़हक़हे की आवाज़ मेरे कान में पड़ी। मैंने उसे देखने को गर्दन उठाई तो देखा कि नम्दे को चीर कर एक चाँद-सा मुखड़ा निकल रहा है। उसे देखते ही मेरे होश-हवास ठिकाने रहे।

    मैंने अपने को फिर सँभालकर देखा तो एक सोने का तख़्त परियों के कन्धों पर टिका हुआ खड़ा है और एक परी जवाहिरात का ताज पहने और झलाबोर ख़िलअ'त बदन पर पहने, हाथ में याक़ूत का प्याला लिये और शराब पिये हुए उस सोने के तख़्त पर बैठी है। वह तख़्त ऊँचाई से धीरे-धीरे नीचे उतर कर उस बुर्ज में आया। तब परी ने मुझे बुलाया और अपने नज़दीक बिठाया और प्यार की बातें करने लगी और मुँह से मुँह मिलाकर एक जाम गुलाब की शराब का मुझे पिलाया और कहा, ‘आदमीज़ाद बेवफ़ा होता है। लेकिन हमारा दिल तुझे चाहता है।’ एक दम में ऐसी नाज़-ओ-अन्दाज़ की बातें की कि मेरा दिल फ़रेफ़्ता हो गया और ऐसी ख़ुशी मिली कि ज़िन्दगी का मज़ा पाया और यह समझा कि आज तू दुनिया में आया है।”

    “कहने का हासिल यह है कि मैं तो क्या हूँ किसी ने यह आ'लम देखा सुना होगा। उस मज़े में डूबे हम दोनों इत्मीनान से बैठे थे कि कुरियाल में ग़ुलेला लगा। अब उस अचानक हादिसे का हाल सुनो।

    उसी वक़्त चार परीज़ादों ने आसमान से उतरकर उस मा’शूक़ा के कान में कुछ कहा जिसे सुनते ही उसके चेहरे का रंग बदल गया और मुझसे बोली कि, ‘ऐ प्यारे! दिल तो यही चाहता था कि कुछ देर तेरे साथ बैठ कर दिल बहलाऊँ और इसी तरह हमेशा आऊँ या तुझे अपने साथ ले जाऊँ। पर यह आसमान दो चाहने वालों को एक जगह आराम से और ख़ुशी से रहने नहीं देता। जानाँ! अब तेरा ख़ुदा निगहबान है।’ यह सुनकर मेरे हवास जाते रहे और तूती हाथ की उड़ गई। मैंने कहा कि, ‘अजी! अब फिर कब मुलाक़ात होगी? यह तुमने क्या ग़ज़ब की बात सुनाई? अगर जल्द आओगी तो मुझे जीता पाओगी, नहीं तो पछताओगी। या, अपना ठिकाना और नाम-ओ-निशान बताओ, कि मैं ही उस पते पर ढूँढ़ते-ढूँढ़ते अपने को तुम्हारे पास पहुँचाऊँ।’

    “यह सुनकर बोली, ’दूर पार शैतन के कान बहरे! तुम्हारी उम्र एक सौ बीस साल की होवे। अगर ज़िनदगी है तो फिर मुलाक़ात होगी। मैं जिन्नों के बादशाह की बेटी हूँ और ‘कोह काफ़’ पर रहती हूँ।’ इतने में परियों ने तख़्त उठाया और वह जिस तरह उतरा था वैसे ही ऊँचा होने लगा। जब तलक सामने था मेरी और उसकी आँखें चार हो रही थीं। जब तख़्त नज़रों से ग़ायब हुआ, यह हालत हो गई जैसे परी का साया होता है। अ’जब तरह की उदासी दिल पर छा गई। अक़्ल और होश रुख़्सत हुए। दुनिया आँखों तले अंधेरी हो गई। हैरान, परेशान, ज़ार-ज़ार रोना और सर पर ख़ाक उड़ाना, कपड़े फाड़ना, खाने की सुध, भले-बुरे की बुध।

    इस इश्क़ की बदौलत क्या-क्या ख़राबियाँ हैं!

    दिल में उदासियां हैं और इज़्तिराबियां हैं!

    “इस ख़राबी से दाई और उस्ताद आगाह हुए। डरते-डरते बादशाह के रूबरू गए कि मा’लूम नहीं अपने-आप यह क्या ग़ज़ब टूटा, जवान शहज़ादे का आराम और खाना-पीना सब छूटा। तब बादशाह, वज़ीर, अमीर, सूझ-बूझ वाले हकीम, तबीब, मुल्ला, सयाने, पहुँचे फ़क़ीर, दर्वेश, सालिक, मजज़ूब इन सब को साथ लेकर बाग़ में तशरीफ़ लाए और मेरी बेक़रारी और नाला-ओ-ज़ारी देखकर उनकी हालत में भी बेक़रारी की हो गई। आंख में आंसू भरकर बेइख़्तियार गले से लगा लिया और इस मर्ज़ के इलाज की तदबीर करने का हुक्म दिया।

    “हक़ीमों ने दिल की ताक़त और दिमाग़ की ख़राबी के वास्ते नुस्ख़े लिखे और मुल्लाओं ने नक़्श-तावीज़ पिलाने और पास रखने को दिये। दुआ’एँ पढ़-पढ़ कर फूँकने लगे। नजूमी बोले कि सितारों की गर्दिश से यह सूरत पैदा हुई है। ग़रज़ हर कोई अपने-अपने इल्म की बातें कहता था। पर मुझ पर जो गुज़रती थी, मेरा दिल ही सहता था। किसी को कोशिश, तदबीर मेरी बुरी तक़दीर के काम आई। दिन-ब-दिन पागलपन का ज़ोर बढ़ता गया और मेरा बदन बग़ैर आब-ओ-दाने के कमज़ोर हो चला। रात-दिन चिल्लाना और सर पटकना ही बाक़ी रहा। इसी हालत में तीन साल गुज़रे। चैथे बरस एक सौदागर सैर-ओ-सफ़र करता हुआ आया और हर-एक मुल्क के अजीब-ओ-ग़रीब तोहफ़े जहांपनाह के हुज़ूर में लाया, मुलाज़मत हासिल की।

    “बादशाह ने उस पर तवज्जोह फ़रमाई और उसका हाल पूछने के बाद उससे पूछा कि, ‘तुमने बहुत मुल्क देखें, कहीं कोई माहिर हकीम भी पड़ा या किसी का ज़िक्र तुमने कहीं सुना?’ उसने अ’र्ज़ किया, ‘जहांपनाह! ग़ुलाम ने बहुत सैर की है। हिन्दुस्तान में हरिया के बीच एक पहाड़ी है। वहाँ एक जटाधारी गोसांई ने बड़ा मण्डप महादेव का औऱ संगत और बड़ी बहार का बाग़ बनाया है। वह उसी में रहता है और उसका क़ायदा है कि हर बरस शिवरात्रि के दिन अपने स्थान से निकल कर दरिया में तैरता है और क्रीड़ा करता है। स्नान के बाद जब वह अपने आसन पर जाने लगता है तब बीमार दुःखी और पीड़ित लोग जो देस-देस और मुल्क-मुल्क के दूर-दूर से आते हैं, उनकी बड़ी भीड़ होती है।

    ‘वह महन्त (जिसे उस ज़माने का अफ़्लातून कहा चाहिये) क़ारूरा और नब्ज़ देखता हुआ और हर-एक को नुस्ख़ा लिख कर देता हुआ चला जाता है। ख़ुदा ने ऐसा दस्त-ए- शिफ़ा उस को दिया है कि दवा पीते असर होता है और मर्ज़ बिल्कुल जाता रहता है। यह बात मैंने ख़ुद अपनी आँखों से देखी और मैंने ख़ुदा की क़ुदरत को याद किया कि ऐसे-ऐसे बन्दे पैदा किये हैं। अगर हुक्म हो तो राजकुमार को उसके पास ले जावें, उसको एख नज़र दिखावें। काफ़ी उम्मीद इस बात की है कि जल्द ही राजकुमार बिल्कुल अच्छा हो जायेगा। और ज़ाहिर में भी यह तदबीर अच्छी है कि हर-एक मुल्क की हवा खाने से और जगह-जगह के आब-ओ-दाने से मिज़ाज में ठंडक आती है।’

    बादशाह को उसकी सलाह पसन्द आई और ख़ुश होकर फ़र्माया, ‘बहुत बेहतर, शायद उसी का हाथ रास आये और मेरे बेटे के दिल से वहशत चली जाय।’ एक मो'तबर दुनिया-देवी और तजरबा-कार अमीर को और उस सौदागर को मेरे साथ के लिये मुक़र्रर किया और ज़रूर असबाब साथ कर दिया। निवाड़ी बजरे, मोरपंखी, पनवार, कचके, खेलने, इलाक़, पटेलियों पर दूसरे सामान समेत सवार करके रुख़्सत कर दिया। मंज़िल-मंज़िल चलते-चलते उस ठिकाने पर जा पहुँचे। नई हवा और नया दाना-पानी खाने-पीने से कुछ मिज़ाज ठहरा। लेकिन ख़ामोशी का वही आ’लम था और रोने से काम। किसी वक़्तभी उस परी की याद दिल से भूलती थी। अगर कभी भूलता तो यह शेर पढ़ता-

    ना जानूँ किस परी-रू की नज़र हुई।

    अभी तो था भला-चंगा मेरा दिल।।

    बारे जब दो-तीन महीने गुज़रे, उस पहाड़ पर क़रीब चार हज़ार मरीज़ जमा’ हुए। लेकिन सब यही कहते थे कि अब ख़ुदा ने चाहा तो गोसांई अपने मठ से निकलेंगे और सबको उनके हाथों पूरी-पूरी सेहत होगी।

    क़िस्सा यह कि जिस दिन वह दिन आय़ा, सुब्ह को वह जोगी सूरज की तरह निकल आया और दरिया में नहाया और तैरा। पार जाकर पलट आया, और सारे बदन में भभूत-भस्म लगाया और वह गोरा बदन अंगारे की तरह राख में छुपाया और माथे पर मलागीर का टीका दिया, लंगोट बांधकर, अंगौछा कांधे पर डाला। बालों का जूड़ा बांधा, मूछों पर ताव देकर चढ़ौवां जूता उड़ाया।

    उसके चेहरे से यह मा’लूम होता था कि सारी दुनिया, उसके नज़दीक कुछ क़्द्र नहीं रखती थी! एक जड़ाऊ क़लमदान बग़ल में लेकर एक-एक की तरफ़ देखता और नुस्ख़ा देता हुआ मेरे नज़दीक पहुँचा। जब मेरी और उसकी आँखें चार हुईं, खड़ा होकर सोच में पड़ गया। उसके बाद कहने लगा, ‘मेरे साथ आओ।’ मैं साथ हो लिया।

    जब सब की बारी हो चुकी तो मुझे बाग़ के अन्दर ले गया और एक ख़ूबसूरत छोटे से अकेले कमरे को मुझे दिखा कर कहा कि ‘तुम यहाँ रहा करो!’ और ख़ुद अपने स्थान पर वापस चला गया। जब चालीस दिन गुज़रे तो मेरे पास आया और पहले से मुझे ज़ियादा खुश पाया। तब मुस्कराकर कहने लगा कि ‘इस बाग़ीचे में सैर कर लिया करो, और जिस मेवे पर जी चले खा लिया करो।’ और एक क़ुल्फ़ी चीनी की मा’जून से भरी हुई दी कि ‘इसमें से छः माशे हमेशा बिना नाग़ा रोज़ खा लिया करो।’ यह कह कर वह तो चला गया। मैंने उसके कहने पर अमल किया। हर रोज़ दिल को ताक़त और जी को ठंडक महसूस होने लगी। लेकिन इश्क़ के मर्ज़ पर कुछ असर नहीं हुआ। उस परी की सूरत नज़रों के आगे फिरती थी।

    एक रोज़ ताक़ पर एक किताब नज़र आई। उतार कर देखा तो उस में लोक-परलोक के सारे इल्म जमा’ किये गये थे। गोया दरिया को कूज़े में भर दिया गया था। हर घड़ी उसे पढ़ा करता। मैं ने इस तरह दवा-इलाज की विद्या और आत्माओं को क़ाबू में करने में काफ़ी होशियारी हासिल की। इसी अर्से में एक बरस का दिन गुज़र गया। फिर वही ख़ुशी का दिन आया। जोगी अपने आसन से उठकर बाहर निकला। मैं ने सलाम किया। उसने क़लमदान मुझे देकर कहा, ‘मेरे साथ चलो।’ मैं साथ हो लिया।

    जब दरवाज़े से बाहर निकला, एक आ’लम दुआ’ देने लगा। वे अमीर और सौदागर मुझे साथ लेकर गोसांई के क़दमों पर गिरे और शुक्रिया अदा करने लगे कि ‘आप की तवज्जोह से बारे इतना तो हुआ।’ वह अपनी आ’दत के मुताबिक़ दरिया के घाट तक गया और स्नान-पूजा जिस तरह हर साल करता था, किया। लौटते वक़्त बीमारों को देखता चला आता था कि इत्तिफ़ाक़ से पागलों के ग़ोल में एक ख़ूबसूरत जवान नज़र पड़ा, जिसमें क़मज़ोरी के कारण खड़े होने की ताक़त थी। मुझसे कहा, ‘इसको साथ ले आओ।’ सब की दवा-दारू करके जब अपने अकेले कमरे में गया। जोगी ने चाहा कि थोड़ी सी खोपड़ी उस जवान की छील कर, उस कनखजूरे को जो उस के भेजे पर बैठे था, चिमटी से उठा लेवे।

    मेरे मन में एक बात आई और मैं बोल उठा, ‘अगर चिमटी आग पर गर्म करके कनखजूरे की पीठ पर रखिये तो अच्छा है, अपने-आप निकल जायेगा। अगर इस तरह से खींचा जाएगा तो भेजे के गूदे को छोड़ेगा। इसके साथ-साथ इस उपाय में इसकी जान के जाने का डर भी है।’

    यह सुन कर जोगी ने मेरी तरफ़ देखा और चुपके से उठकर बाग़ के कोने में जा कर एक दरख़्त को पकड़ कर, जटा के लट से गले में फाँसी लगा लिया। मैंने पास जाकर देखा तो जी धक् से हो गया कि अरे! यह तो मर गया! यह अचम्भा देख कर बहुत अफ़्सोस हुआ। आख़िर मैंने सोचा कि उसे गाड़ दूँ। जैसे ही दरख़्त से अलग करने लगा, दो कुंजियां उसकी लटों में से गिर पड़ी। मैंने उनको उठा लिया और उस महात्मा को ज़मीन में गाड़ दिया। दोनों कुंजियां लेकर सब तालों में लगाने लगा। इत्तिफ़ाक़ से दो कोठरियों के ताले उन कुंजियों से खुल गये और ज़मीन से छत तक जवाहिर भरे हुए दिखाई दिये। एक मख़मल की पेटी जिसमें सोने के पत्तर लगे हुए और ताला बंद था, एक तरफ़ रखी थी। उसको जो खोला तो एक किताब देखी जिसमें इस्म-ए-आज़म और जिन और परी को बुलाने की तरकीब और आत्माओं से मुलाक़ात और सूरज को अपने क़ाबू में करने की विधि लिखी थी।

    ऐसी दौलत के हाथ लगने से बहुत खुशी हुई और मैंने उन पर अमल करना शुरू किया। बाग़ का दरवाज़ा खोल दिया और अपने उस अमीर और साथ वालों से कहा कि, ‘किश्तियां मंगवाकर ये सब जवाहिरात, नक़दी, जिन्स और किताबें उन पर लाद लो।’ और, एक निवाड़ी पर सवार होकर, एक बजरे को रवाना किया। जब अपने मुल्क के नज़दीक पहुँचा तो बादशाह को ख़बर हुई और वह सवार होकर स्वागत को आए और इश्तियाक़ से बेक़रार होकर कलेजे से लगा लिया। मैंने उनके क़दमों को छूकर कहा कि, ‘इस नाचीज़ को पुराने बाग़ में रहने का हुक्म हो’, उन्होंने कहा कि, ‘ऐ बेटे! वह मकान मेरे ख़याल में मनहूस है। इसलिए उसकी मरम्मत और तैयारी रोक दी गई। अब वह मकान आदमी के रहने लायक़ नहीं रहा। इसलिए और जिस महल में चाहो रहो। बल्कि ज़ियादा अच्छा यह है कि कोई जगह पसन्द करके मेरी आंखों के सामने रहो और जैसा बाग़ चाहो तैयार करके सैर-तमाशा देखा करो।’

    मैंने बहुत ज़िद और हठ कर के उस बाग़ को नये सिरे से बनवाया और जन्नत की तरह सजा कर उसमें रहने लगा। फिर इत्मीनान से जिनों को कब्ज़े में करने के लिए चिल्ले में बैठा और गोश्त खाना बन्द करके अमल पढ़ने लगा। जब चालीस दिन पूरे हो गये तो आधी रात को एक ऐसी आँधी आई कि कि बड़ी-बड़ी इमारतें गिर पड़ी और पेड़ जड़ से उखड़ कर कहीं से कहीं जा पड़े और एक परीज़ादों का लश्कर दिखाई पड़ा। एक तख़्त हवा से उतरा जिस पर एक शख़्स मोतियों का शानदार ताज और खिलअ’त पहने बैठा था। मैंने देखते ही बहुत अदब से सलाम किया। उसने मेरे सलाम का जवाब दिया औऱ कहा कि, ‘ऐ अज़ीज़, तूने नाहक़ यह तूफ़ान उठाया। हमसे तुझे क्या ग़रज़ है?’

    मैंने अ’र्ज़ किया, ‘यह नाचीज़ एक मुद्दत से तुम्हारी बेटी पर आ’शिक़ है। इसीलिए कहाँ से कहां खराब और तबाह हुआ और जीते जी मरा। अब ज़िन्दगी से तंग आया हूँ और अपनी जान से खेला हूँ। इसलिये यह काम किया है। अब आपकी ज़ात से उमीद रखता हूँ कि मुझ हैरान और परेशान को अपनी मेहरबानी से इज़्ज़त दीजिए और उसके दर्शन से ज़िन्दगी और आराम दीजिए, तो बड़ा सवाब होगा।’

    मेरी यह आर्ज़ू सुन कर वह बोला कि, ‘आदमी मिट्टी का और हम आग के, इन दोनों का मेल होना मुश्किल है।’

    मैंने क़सम खाई कि मैं सिर्फ़ उनको देखने का मुश्ताक़ हूँ और कुछ मतलब नहीं। फिर उस तख़्त पर बैठे हुए जिन ने जवाब दिया कि, ‘आदमी अपने क़ौल-क़रार पर नहीं रहता। ग़रज़ के वक़्त पर सब-कुछ कहता है, लेकिन याद नहीं रखता। यह बात मैं तेरे भले के लिए कहता हूँ कि अगर तूने कभी कुछ और इरादा किया तो वह भी और तू भी दोनों ख़राब और तबाह होंगे, बल्कि जान जाने का डर भी है।’ मैंने फिर अपनी क़सम दुहराई कि, ‘जिसमें दोनों की बुराई हो, ऐसा काम हरगिज़ करूँगा, सिर्फ़ एक नज़र देखता रहूँगा।’

    ये बातें हो ही रही थीं कि अचानक वह परी, जिसका ज़िक्र था, बड़े ठस्से से बनाव सिंगार किये पहुँची और बादशाह का तख़्त वहाँ से चला गया। तब मैं बेइख़्तियार उस परी को जान की तरह बग़ल में ले आया और यह शेर पढ़ा-

    कमान-ए-अब्रू मेरे घर क्यों आवे।

    कि जिसके वास्ते खींचे हैं चिल्ले।

    उसी ख़ुशी के आ’लम में हम दोनों उस बाग़ में साथ-साथ रहने लगे। मारे डर के कुछ और ख़याल जी में करता। ऊपरी मज़े लेता और सिर्फ़ देखा करता। वह परी मेरे क़ौल-क़रार के निबाहने पर दिल में हैरान रहती और बाज़ वक़्त कहती कि, ‘प्यारे, तुम भी अपनी बात के बड़े सच्चे हो। लेकिन मैं एक सलाह दोस्ती की ख़ातिर देती हूँ कि अपनी किताब के बारे में सावधान रहना, क्योंकि जिन किसी किसी दिन तुम्हें ग़ाफ़िल पाकर चुरा ले जाएँगे।’

    मैंने कहा, ‘मैं इसे अपनी जान के बराबर रखता हूँ।’

    इत्तिफ़ाक़ से एक रात को शैतान ने बहकाया। काम वासना के प्रवाह में यह बात दिल में आई कि जो-कुछ हो, सो हो, कहाँ तक अब अपने-आप को सँभालूँ! मैंने जैसे ही भोग करने का इरादा किया, वैसे ही एक आवाज़ आई कि ‘यह किताब मुझको दे, क्योंकि इसमें इस्म-ए-आज़म है। बेदअबी कर।’ उस मस्ती के आ’लम में कुछ होश रहा, किताब बग़ल से निकाल कर बग़ैर जाने-पहचाने हवाले कर दी और अपने काम में लगा। वह नाज़नीन मेरी यह नादानी की हरक़त देख कर बोली, ‘ऐ ज़ालिम, आख़िर तू चूका और मेरी सलाह भूला।’

    यह कह कर बेहोश हो गई और मैंने उसके सिरहाने एक देव को देखा कि किताब लिये खड़ा है। मैंने चाहा कि उसको पकड़ कर ख़ूब मारूँ और किताब छीन लूं। मैंने जो मंत्र याद किये थे, पढ़ना शुरू किया और वह जिन जो खड़ा था बैल बन गया। लेकिन अफ़्सोस की परी ज़रा भी होश में आई और वही हालत बेहोशी की रही। तब मेरा दिल घबराया और सारा ऐटश कड़ुवा हो गया। उस दिन से आदमियों से नफ़रत हुई। इस बाग़ के एक कोने में पड़ा रहता हूँ। और दिल बहलाने के लिये यह मर्तबान ज़मुर्रद का झाड़दार बनाया करता हूँ और हर महीने उस मैदान में उसी बैल पर चढ़कर जाया करता हूँ। मर्तबान को तोड़कर ग़ुलाम को मार डालता हूँ, इस उम्मीद पर कि सब मेरी हालत को देखें और अफ़्सोस खावें। शायद कोई ऐसा ख़ुदा का बन्दा मेहरबान हो कि मेरे हक़ में दुआ’ करे और मुझे भी अपना मतलब हासिल हो।

    दोस्त, यही मेरे पागलपन का क़िस्सा है, जो मैंने तुझ कह सुनाया।

    यह क़िस्सा सुनकर मेरी आँखें भर आईं, और मैंने कहा कि, “ऐ शहज़ादे, वाक़ई तूने इश्क़ में बड़ी मुसीबत उठाई। लेकिन मैं ख़ुदा की क़सम खाता हूँ कि मैंने अब तेरे लिये अपनी ग़रज़ को छोड़ा। अब तेरे लिये जंगल पहाड़ों में फिरूँगा और जो मुझसे हो सकेगा करूँगा।” यह वा’दा करके मैं उस जवान से विदाअ' हुआ और पांच बरस तक पागलों सा वीराने में खाक छानता फिरा। लेकिन कुछ पता चला। आख़िर उकता कर एक पहाड़ पर चढ़ गया कि अपने को गिरा दूँ कि हड्डी, पसली कुछ साबित रहे कि वही बुर्क़ा-पोश सवार पहुँचा और बोला, “अपनी जान मत खो। थोड़े दिनों के बाद तू अपनी ग़रज़ में कामियाब होगा। या साईं, तुम्हारे दर्शन तो मुयस्सर हुए! अब ख़ुदा की मेहरबानी से उम्मीद रखता हूँ कि सब को ख़ुशी मिले और सब नामुराद अपनी मुराद को पहुँचे।

    हाल आज़ादबख़्त बादशाह का-

    जब दूसरा दर्वेश भी अपनी सैर का क़िस्सा कह चुका, रात आख़िर हो गई और सुब्ह का वक़्त शुरू होने को आया। आज़ाद बख़्त बादशाह चुपका अपने दौलतख़ाने की तरफ़ रवाना हुआ। महल में पहुँच कर उसने नमाज़ पढ़ी, फिर ग़ुस्ल-ख़ाने में जा शानदार खिलअ'त पहनकर दीवान-ए-आ’म में आया और तख़्त पर बैठा। हुक्म दिया कि यसावल जावे और चार फ़क़ीर फ़लाने मकान पर आए हुए हैं, उनको इज़्ज़त के साथ ले आवे। बादशाह के हुक्म के मुताबिक़ चोबदार वहाँ गया, देखा तो चारों फ़क़ीर हाथ-मुँह धोकर चाहते हैं कि अपनी-अपनी राह लें। चोबदार ने कहा, “शाह जी! बादशाह ने आप चारों को तलब फ़रमाया है, मेरे साथ चलिये।”

    चारो दर्वेश आपस में एक-एक को तकने लगे और चोबदार से कहा, “बाबा, हम अपने दिल के बादशाह है। हमें दुनिया के बादशाह से क्या काम है?”

    उसने कहा, “मियाँ, कुछ हर्ज नहीं, अगर चलो तो अच्छा है।”

    इतने में चारों को याद आया कि मौला मुर्तज़ा ने जो फ़रमाया था, सो अब सामने आया। खुश हुए और यसावल के साथ चले। जब क़िले में पहुँचे और बादशाह के सामने गए, चारो फ़क़ीरों ने दुआ’’ दी कि, “बाबा! तेरा भला हो।”

    बादशाह दीवान-ए-ख़ास में जा बैठे। दो-चार ख़ास-ख़ास अमीरों को बुलाया और फ़रमाया कि चारों गुदड़ी पोशों को बुलाओ। जब वहाँ गए बैठने का हुक्म दिया, हाल पूछा कि, “तुम्हारा कहाँ से आना हुआ, और कहाँ का इरादा है? मकान मुर्शिदों के कहाँ हैं?”

    उन्होंने कहा कि, “बादशाह की उम्र और दौलत बढ़े। हम फ़क़ीर हैं, एक मुद्दत से इसी तरह सैर-ओ-सफ़र करते फिरते हैं। वह मसल है कि फ़क़ीर को जहाँ शाम हुई, वहीं घर है और जो कुछ इस बदलने वाली दुनिया में देखा है, कहाँ तक बयान करें?”

    आज़ाद बख़्त ने बहुत तसल्ली और दिलासा दिया और खाने की चीज़े मँगवाकर अपने सामने नाश्ता कराया। जब वे फ़ारिग़ हो चुके तो बादशाह ने फ़रमाया कि, “अपना हाल पूरा-पूरा और सही-सही कहो, जो मुझसे तुम्हारी मदद हो सकेगी उससे इन्कार नहीं करूँगा।” फ़क़ीरों ने जवाब दिया कि, “हम पर जो कुछ बीता है, हमें बयान करने की ताक़त है और बादशाह को सुनने की फ़ुर्सत होगी। इसलिये मुआ'फ़ कीजिये।” तब बादशाह ने मुस्कराकर कहा, “रात को जहाँ तुम बिस्तरों पर बैठे-बैठे अपना-अपना हाल कह रहे थे, वहाँ मैं भी मौजूद था। चुनांचे दो दर्वेशों का हाल सुन चुका हूँ। अब चाहता हूँ कि दोनों जो बाक़ी हैं, वह भी कहें और कुछ दिन इतमीनान से मेरे पास रहें क्योंकि दर्वेशों का क़दम बलाओं को दूर करता है।” बादशाह की बात सुनते ही फ़क़ीर डर के मारे काँपने लगे और सर नीचे करके चुप हो रहे। बात करने की ताक़त रही।

    आज़द बख़्त ने जब यह देखा कि अब इनके रो’ब के मारे हवास नहीं रहे कि जो कुछ बोले तो फ़रमाया, “इस दुनिया में कोई ऐसा शख़्स होगा जिस पर एक एक अ’जीब-ओ-ग़रीब वारदात गुज़री हो। बावजूद इसके कि मैं बादशाह हूँ, मैंने भी ऐसा तमाशा देखा है। पहले मैं ही उसका बयान करता हूँ। तुम इत्मीनान से सुनो।”

    दर्वेशों ने कहा, “बादशाह सलामत! आपकी मेहरबानी हम फ़क़ीरों के हाल पर है। ज़रूर इर्शाद फ़रमाइये।” आज़ाद बख़्त ने अपना हाल कहना शुरू किया। कहा-

    शाहो! बादशाह का अब माजरा सुनो।

    जो कुछ कि मैंने देखा है और है सुना सुनो।

    कहता हूँ मैं फ़क़ीरों की ख़िदमत में सर-बसर।

    अहवाल मेरा ख़ूब तरह दिल लगा सुनो।।

    मेरे क़िबलागाह (पिता) ने जब वफ़ात पाई और मैं तख़्त पर बैठा, जवानी का दौर था और सारे मुल्क रूम पर मेरी बादशाहत थी और मेरा हुक्म चलता था। इत्तिफ़ाक़ से एक साल कोई सौदागर मुल्क बदख़्शाँ से आया और तिजारत का असबाब लाया। ख़बरदारों ने मेरे हुज़ूर में ख़बर की कि इतना बड़ा ताजिर आज तक शहर में नहीं आया। मैंने उसको तलब किया। वह हर-एक मुल्क के तोहफ़े मुझे भेंट करने के लायक़ लेकर आया और वाक़ई हर-एक चीज़ जो उसके पास थी, ला-जवाब नज़र आई। एक डिबिया में एक ला'ल नज़र आय़ा, बहुत खुश-रंग और आबदार, क़द-ओ-क़ामत में दुरुस्त और वज़न में पाँच मिस्क़ाल का। मैंने बादशाहत के बावजूद ऐसा जवाहिर कभी देखा था और कभी सुना था। मैं ने उस ला'ल को पसन्द किया और सौदागर को बहुत सा इनआ'म-इकराम दिया और राहदारी की सनद लिख दी कि ‘इससे हमारी बादशाहत में कोई महसूल लिया जाय औऱ जहाँ वह जाय, उसे आराम से रखा जाय। चौकी पहरे वाले हाज़िर रहें और इसके नुक़सान को अपना नुक़सान समझें।’

    वह ताजिर मेरे हुज़ूर में दरबार के वक़्त हाज़िर रहता। दरबार के तौर तरीक़ों से वह अच्छी तरह वाक़िफ़ था और बातें उसकी सुनने के लायक़ होती थीं। मैं उस ला’ल को हर रोज़ जवाहिरख़ाने से मँगवाकर दरबार में देखा करता था।

    एक रोज़ दीवान-ए-आम किये बैठा था और सब अमीर और दरबारी अपनी-अपनी जगह पर खड़े थे। सभी मुल्कों के बादशाहों के दूत जो मुबारकबाद देने के लिए आए थे, वे भी सब हाज़िर थे। उस वक़्त मैंने दस्तूर के मुताबिक़ उस ला’ल को मँगवाया। जवाहिरख़ाने का दरोग़ा उसे लेकर आया। मैं उसे हाथ में लेकर ता’रीफ़ करने लगा। वह उसे देख कर मुस्कराया और मेरा दिल रखने के लिए उस ने भी ता’रीफ़ की। इसी तरह हाथों हाथ हर-एक ने उसे लिया और देखा। सब एख ज़बान होकर बोले कि, “बादशहा सलामत के इक़बाल के सबब ऐसा बेनज़ीर ला’ल मुयस्सर हुआ है और अब तक ऐसा लाजवाब जवाहिर किसी बादशाह के हाथ नहीं लगा।”

    उस वक़्त वह वज़ीर जो मेरे वालिद का वज़री था और अब भी उसी ओहदे पर था और बड़ा तजरबा-कार और अक़्ल-मंद आदमी माना जाता था, वज़ारत की चौकी पर खड़ा हुआ आदाब बजा लाया और कहा कि, “अगर जान बख़्शी जाय तो मैं भी कुछ अ’र्ज करना चाहता हूँ।”

    मैंने हुक्म दिया, “कह!” वह बोला, “क़्बिला-ए-आलम! आप बादशाह हैं और बादशाहों पर यह बात सजती नहीं कि वह एक पत्थर की इतनी ता’रीफ़ करें। अगरचे, रंग-ढंग-संग में ला-सानी है, लेकिन पत्थर है और इस वक़्त सब मुल्कों के दूत दरबार में हाज़िर हैं। जब ये अपने-अपने शहर जाएँगे तो जाकर कहीं कहेंगे कि अ’जब बादशाह है जिसने एक ला’ल कहीं से पाया है, उसे ऐसा तोहफ़ा बनाया है कि हर रोज़ अपने सामने मँगाता है और ख़ुद उसकी ता’रीफ़ करके सब को दिखाता है। अब जो बादशाह या राजा यह हाल सुनेगा, अपनी मज्लिस में हँसेगा। जहांपनाह! नेशापुर में एक मा’मूली सौदागर है, जिसने बारह दाने ला’ल के और हर-एक दाना सात-सात मिस्क़ाल का है, पट्टे में लगवाकर, कुत्ते के गले में डाल दिये हैं।” मुझे यह सुनते ही ग़ुस्सा चढ़ आया और खिसियाने होकर हुक्म दिया कि, “इस वज़ीर की गर्दन मारो।”

    जल्लादों ने उसी वक़्त उसका हाथ पकड़ लिया और चाहा कि बाहर ले जावें कि विलायत के बादशाह का दूत हाथ बांधकर सामने खड़ा हुआ। मैंने पूछा, “तू क्या चाहता है? क्या मतलब है?”

    उसने अ’र्ज़ किया, “बादशाह सलामत! मैं वज़ीर का क़ुसूर जानना चाहता हूँ।”

    मैंने कहा, “झूठ बोलने से बड़ा और कौन सा गुनाह है और ख़ुसूसन बादशाहों के सामने।”

    दूत ने कहा, “उसका झूठ अभी साबित नहीं हुआ, शायद जो कुछ उसने अ’र्ज़ किया हो, सच हो। अभी बेगुनाह को क़त्ल करना मुनासिब नहीं।”

    इस बात का मैंन यह जवाब दिया कि, “हरगिज़ यह बात अक़्ल में नहीं आती कि एक ताजिर जो नफ़े के वास्ते, शहर-शहर और मुल्क-मुल्क मारा-मारा फिरता है और कौड़ी-कौड़ी जमा’ करता है, किस तरह बारह दाने ला’ल के जो वज़न में सात-सात मिस्क़ाल के हों कुत्ते के पट्टे में लगा दे।”

    उसने कहा, “ख़ुदा की क़ुदरत में कोई चीज़ अ’जीब नहीं। शायद ऐसा हो। ऐसे तोहफ़े अक्सर सौदागरों और फ़क़ीरों के हाथ आते हैं। इस वास्ते कि दोनों हर एक मुल्क में जाते हैं और जहां से जो कुछ पाते हैं, ले आते हैं। इसलिए मुनासिब सलाह यह है कि अगर वज़ीर ऐसा ही क़ुसूरवार है तो उसे क़ैद का हुक्म हो। इसलिए कि वज़ीर बादशाहों की अक़्ल होते हैं और यह हरकत बादशाहों को ज़ेब नहीं देती कि एक ऐसी बात पर जिसका-झूठ सच अभी साबित नहीं हुआ उसके क़त्ल का हुक्म फ़रमाये और उसकी सारी उम्र की ख़िदमत और नमकहलाली भूल जांय।”

    “बादशाह सलामत! अगले बादशाहों ने क़ैदख़ाना इसीलिए बनाया कि बादशाह या सरदार अगर किसी पर ग़ुस्सा हों, तो उसे क़ैद करे। कुछ दिन में ग़ुस्सा जाता रहेगा और उसका बेगुनाह होना ज़ाहिर होगा तो बादशाह एक बेगुनाह के ख़ून से बचे रहेंगे। क़यामत के दिन इसका जवाब देना पड़ेगा।” मैंने उसे क़ायल करना चाहा, पर उसने ऐसी मा’क़ूल बातें की कि मुझे लाजवाब कर दिया। तब मैंने कहा, “ख़ैर, तेरा कहा मैंने क़ुबूल किया। मैंने अभी इसका ख़ून माफ़ किया। लेकिन यह क़ैदखाने में बन्द रहेगा। अगर एक साल के अ’र्से में इसकी बात सच्ची हुई कि ऐसे ला’ल कुत्ते के गले में हैं तो इसे छोड़ दिया जायेगा, नहीं तो बड़ी बुरी तरह मारा जायेगा।” मैंने हुक्म दिया कि, “वज़ीर को क़ैदख़ाने में ले जाओ।” यह हुक्म सुनकर दूत ने सामने की ज़मीन चूमी और सलाम किया

    जब यह ख़बर वज़ीर के घर गई, आह-वावैला वहाँ मची और कुहराम मच गया। उस वज़ीर की एक बेटी थी, चौदह-पन्द्रह बरस की, बहुत ख़ूबसूरत और लिखने पढ़ने में बहुत क़ाबिल। वज़ीर उस को बहुत प्यार करता था और जान से अज़ीज़ रखता था। इसलिए, उसने अपने दीवान-ख़ाने के पीछे अपनी बेटी के लिये एक रंग महल बनवा दिया था। अमीरों की लड़कियां उसके साथ खेलने के लिये वहां आती थीं और ख़ूबसूरत ख़ासें, उसकी ख़िदमत में हाज़िर रहती थीं और वह उनके साथ हँसी-खुशी खेला करती थी।

    इत्तिफ़ाक़न जिस दिन वज़ीर को क़ैदख़ाने में भेजा, वह लड़की अपनी हमजोलियों में बैठी थी और उसने बड़ी ख़ुशी से गुड़िया का ब्याह रचाया था और ढोलक-पखावज लिये हुए रतजगे की तैयारी कर रही थी और कड़ाही चढ़ाकर, गुलगुले, रहम तलती वग़ैरह बना रही थी कि यकबारगी उसकी मां रोती-पीटती, खुले सर, नंगे पांव घर में गई और दोहत्तड़ उस लड़की के सर पर मारा और कहने लगी, “काश! ख़ुदा तेरे बदले अन्धा बेटा देता, तो मेरा कलेजा ठंडा होता और बाप का साथ देता।”

    वज़ीरज़ादी ने पूछा, “अन्धा बेटा तुम्हारे किस काम आता? जो कुछ बेटा करता, मैं भी कर सकती हूँ।”

    मां ने जवाब दिया, “ख़ाक तेरे सर पर! यह विपता बीती है कि तेरे बाप ने बादशाह के सामने कुछ ऐसी बात कही कि वह क़ैदख़ाने में बन्द कर दिया गया।”

    लड़की ने पूछा, “वह क्या बात थी? ज़रा मैं भी सुनूँ।” तब वज़ीर की बीवी ने कहा, “शायद तेरे बाप ने कहा कि नेशापुर में कोई सौदागर है, जिसने बारह बेबहा ला’ल कुत्ते के पट्टे में टांके हैं। बादशाह को इस बात पर यक़ीन आया, उसे झूठा समझा और उसे क़ैद कर दिया। अगर आज के दिन बेटा होता तो हर तरह से कोशिश करते इस बात की खोज करता और बादशाह से आरज़ू मिन्नत करके मेरे शौहर को क़ैदख़ाने से रिहाई दिलाता।

    वज़ीर की बेटी बोली, “अम्माँ जान, तक़दीर से नहीं लड़ा जाता। जब अचानक कोई मुसीबत आये तो इंसान को सब्र करना चाहिये और ख़ुदा की मेहरबानी से उमीद रखना चाहिये। वह रहम करने वाला है और किसी की मुश्किल अटकी नहीं रखता। ज़ियादा रोना-धोना अच्छा नहीं। ऐसा हो कि दुश्मन किसी और तरह से चुग़ली खावें और लुतरे लगाई-बुझाई करें। ऐसा हो कि बादशाह का ग़ुस्सा और ज़ियादा बढ़े। बल्कि अच्छा यह होगा कि हम बादशाह के हक़ में दुआ’’ करें। हम उसके नौकर हैं, वह हमारा मालिक है। वही ग़ुस्सा हुआ है। वही मेहरबान होगा।” उसकी लड़की ने अक़्लमन्दी से ऐसी-ऐसी तरह माँ को समझाया कि कुछ उसको सब्र और क़रार आया। तब वह अपने महल में गई और चुपकी हो रही।

    जब रात हुई, वज़ीर की बेटी ने दादा को बुलाया। उसके हाथ-पाँव पड़ी, बहुत मिन्नत और ख़ुशामद की, रोने लगी और कहा कि, “मैं यह इरादा रखती हूँ कि अम्माँ जान का ताना मुझ पर रहे और मेरा बाप रिहाई पाये। जो आप मेरा साथ दें तो मैं नेशापूर चलूँ और उस सौदागर को जिसके कुत्ते के गले में ऐसे ला’ल है, जिस तरह भी बने लेकर आऊँ और अपने बाप को छुडाऊँ।”

    पहले तो उस आदमी ने इंकार किया। आख़िर बहुत कहने-सुनने से राज़ी हुआ। तब वज़ीर की बेटी ने कहा, “चुपके-चुपके सफ़र का असबाब ठीक करो। तिजारत का सामान और बादशाहों को भेंट करने लायक़ चीज़ें और जितने ग़ुलाम, नौकर-चाकर ज़रूरी हों साथ ले लो। लेकिन यह बात किसी पर खुले।”

    दादा ने इसे क़ुबूल किया और सफ़र की तैयारी में लगा। जब सब असबाब मुहय्या हो गया तो ऊँटों और ख़च्चरों पर लादकर रवाना हुआ और वज़ीर की बेटी भी मर्दाना लिबास पहनकर साथ जा मिली। हरगिज़ किसी को घर में ख़बर हुई। जब सुब्ह हुई तो वज़ीर के महल में चर्चा हुआ कि वज़ीर की बेटी ग़ायब है, मा’लूम नहीं क्या हुई!

    आख़िर बदनामी के डर से मां ने बेटी का गुम होना छुपाया और उधर वज़ीर की बेटी ने अपना नाम सौदागर बच्चा रखा। मंज़िल-बमंज़िल चलते-चलते नेशापूर पहुँची, ख़ुशी- ख़ुशी कारवां-सराय में जा उतरी और अनपा सब असबाब उतारा। रात को रही। सबेरे हम्माम में गई और नहा धोकर ऐसी साफ़-सुथरी पोशाक पहनी जैसी रूम के रहने वाले पहनते हैं और उसके बाद सैर को निकली। आते-आते जब चौक में पहुँची, चौराहे पर खड़ी हुई तो एक तरफ़ जौहरी की दूकान नज़र पड़ी, जहां बहुत से जवाहिरात का ढेर लग रहा था और भड़कीले लिबास पहने हुए ग़ुलाम हाथ बांध खड़े थे। उसने देखा कि एक शख़्स जो सरदार है, और पचास बरस की उम्र का मा’लूम होता है, अमीरों की सी खुली आस्तीन की खिलअ’त पहने हुए बैठा है और कई भले मानस दोस्त उसके नज़दीक कुर्सियों पर बैठे हैं और आपस में बातें कर रहे हैं।

    वह वज़ीर की बेटी जिसने अपने को सौदागर-बच्चा मशहूर किया था, उस जौहरी को देखकर हैरान हुई और दिल में यह सोच कर ख़ुश हुई कि ख़ुदा झूठ करे, जिस सौदागर का मेरे बाप ने बादशाह से ज़िक्र किया है, मुमकिन है यही हो। बारे ख़ुदाया! इसका हाल मुझ पर ज़ाहिर कर।

    इत्तिफ़ाक़ से एक तरफ़ जो देखा तो एक दूकान है, उसमें दो लोहे के पिंजरे लटके हुए हैं और उन दोनों में दो आदमी क़ैद हैं। उनकी पागलों की सी सूरत हो रही है। सिर्फ़ हड्डी और चमड़ा बाक़ी है और सर के बाल नाख़ून बढ़े हुए हैं। वे सर औंधाये बैठे हैं और दो बदसूरत हब्शी, हथियार लिये हुए दोनों तरफ़ खड़े हैं। सौदागर-बच्चा को तअ’ज्जुब हुआ। लाहौल पढ़कर दूसरी तरफ़ जो देखा तो एक दूकान में क़ालीन बिछे हैं। उन पर एक चौकी हाथीदांत की रखी हुई है। उस पर मख़मल का गद्दा पड़ा हुआ और उस पर एक कुत्ता जवाहिरात का पट्टा गले में डाले और सोने की ज़ंजीर से बँधा हुआ बैठा है और दो ख़ूबसूरत ग़ुलाम उसकी ख़िदमत कर रहे हैं। एक तो जड़ाऊ दस्ते का मुर्छल लिये झलता है और दूसरा तारकशी का रूमाल हाथ में लेकर उसका मुँह और पाँव पोंछ रहा है।

    सौदागर-बच्चे ने जब ख़ूब ग़ौर करके देखा तो कुत्ते के पट्टे में बारहों दाने ला’ल के जैसे सुने थे, मौजूद हैं। उसने ख़ुदा का शुक्र अदा किया और इस सोच में पड़ गया कि किस तरह उन ला’लों को बादशाह के पास ले जाऊँ और दिखाकर अपने बाप को छुड़ाऊँ। वह तो इस सोच में था और चौक के सारे लोग रास्ते में उसकी ख़ूबसूरती और हुस्न देखकर हैरान थे और हक्का-बक्का हो रहे थे। सब आदमी आपस में यही चर्चा कर रहे थे कि आज तलक इस सूरत और शक्ल का इतना ख़ूसूरत इन्सान नज़र नहीं आया। उस सौदागर ने भी देखा और एक ग़ुलाम को भेजा कि, “तू जाकर मिन्नत और ख़ुशामद से उस सौदागर-बच्चे को ले आ।”

    वह ग़ुलाम आया और सौदागर का पैग़ाम लाया कि, “मेहरबानी करके हमारे मालिक के पास चलिये। वह आपसे मुलाक़ात करना चाहता है।”

    सौदागर-बच्चा तो यही चाहता ही थी। बोला, “क्या हर्ज!”

    जैसे ही वह सौदागर के नज़दीक आया और उस पर सौदागर की नज़र पड़ी, एक बर्छी इश्क़ की सीने में गड़ी। उसकी इज़्ज़त करने के लिए उठ खड़ा हुआ, लेकिन हवास खोए हुए। सौदागर-बच्चे ने यह समझ लिया कि अब यह फंदे में आया। दोनों एक-दूसरे से गले मिले। सौदागर ने उस सौदागर-बच्चे के माथे को चूमा और अपने बराबर बिठाया। बहुत मुलामियत से और ख़ुशामद के लहजे में पूछा, “अपने नाम-ख़ानदान से मुझे आगाह करो। कहाँ से आना हुआ और कहां का इरादा है?”

    सौदागर-बच्चा बोला, “इस कमतरीन का वतन रूम है। मेरे बाप भी सौदागर है। अब बुढ़ापे की वजह से सैर-ओ-सफ़र की ताक़त नहीं रही। इस वास्ते मुझे रवाना किया है ताकि कारोबार और तिजारत के तरीक़े सीखूँ। आज तलक मैंने घर से बाहर क़दम निकाला था। ज़िन्दगी में यह पहला सफ़र ही किया है। दरिया की राह से मुवाफ़िक़ हवा मिली, इसीलिये ज़मीन के रास्ते से सफ़र किया। लेकिन इस अ’जम के मुल्क में आपके अख़्लाक़ और ख़ूबियों का जो शोर है उसे सुनकर सिर्फ़ आपसे मुलाक़ात के शौक़ में यहाँ तक आया हूँ। ख़ुदा की मेहरबानी से आपसे मुलाक़ात की इज़्ज़त नसीब हुई और जितना सुना था, उससे ज़ियादा पाया। दिल की तमन्ना पूरी हुई। ख़ुदा आपको सलामत रखे, अब यहाँ से कूच करूँगा।”

    यह सुनते ही सौदागर के अक़्ल और होश जाते रहे। बोला, “ऐ बेटे, ऐसी बात मुझे सुनाओ। कुछ दिन मेरे ग़रीबख़ाने पर रहो। भला, यह तो बताओ कि तुम्हारा असबाब और नौकर-चाकर कहाँ हैं?”

    सौदागर-बच्चे ने कहा, “मुसाफ़िर का घर सराय है, उन्हें वहाँ छोड़कर मैं आपके पास आया हूँ।” सौदागर ने कहा, “भटियारख़ाने में रहना मुनासिब नहीं। इस शहर में मेरी बड़ी साख है और बड़ा नाम है, जल्द उन्हें बुलवा लो। मैं एक मकान तुम्हारे असबाब के लिये ख़ाली कर देता हूँ। जो कुछ सामान लाए हो, मैं भी ज़रा उन्हें देखूँ। ऐसी तरकीब करूँगा कि यहीं से तुम्हें बहुत-सा नफ़ा मिले, तुम भी ख़ुश होगे और सफ़र की तकलीफ़ और मुसीबत से बचोगे। मेरे साथ चन्द रोज़ रहने से मुझ पर भी बड़ा एहसान होगा। सौदागर-बच्चे ने ऊपरी दिल से उज़्र किया। लेकिन सौदागर ने उसकी एक बात सुनी और अपने गुमाश्ते से कहा, “क़ुली को जल्द भेजो और कारवाँ सराय से इनका असबाब जल्द मँगवाकर फ़लाने मकान में रखवाओ।”

    सौदागर-बच्चे ने एक हब्शी ग़ुलाम को सब समझाकर यह हुक्म दिया कि सब माल-असबाब लदवाकर ले आए और ख़ुद शाम तक सौदागर के साथ बैठा रहा। जब कारोबार का वक़्त ख़त्म हुआ और सौदागर ने दुकान बढ़ाई और घर को चला तब दोनों ग़ुलामों में से एक ने कुत्ते को बग़ल में लिया। दूसरे ने कुर्सी और क़ालीन उठा लिया और उन दोनों हब्शी, ग़ुलामों ने उस पिंजरे को मज़दूरों के सर पर रख दिया और आप पाँचों हथियार बाँधे साथ हुए। सौदागर,सौदागर-बच्चे का हाथ हाथ में लिये, बातें करता हुआ हवेली में आया।

    सौदागर-बच्चे ने देखा कि बादशाहों या अमीरों के लायक़ आ’लीशान मकान है। नहर के किनारे चाँदनी का फ़र्श बिछा है और मसनद के सामने ऐ’श का सारा सामान चुना है। कुत्ते की सन्दली भी उसी जगह बिछाई और सौदागर, सौदागर-बच्चे को लेकर जा बैठा। बेतकल्लुफ़ शराब से ख़ातिर की, दोनों पीने लगे। जब कुछ मस्त हुए, तो सौदागर ने खाना माँगा, दस्तरख़्वान बिछा और दुनिया की नेमत चुनी गई। पहले एक लँगरी में ख़ाना लेकर सोने का सरपोश ढाँपकर कुत्ते के वास्ते ले गए और ज़रबफ़्त का एक दस्तरख़्वान बिछाकर उसके आगे धरी गई। कुत्ता सन्दली से नीचे उतरा, जितना चाहा, उतना खाया और सोने की लगन में पानी पिया, फिर हाथीदाँत की चौकी पर जा बैठा। ग़ुलामों ने रूमाल से हाथ-मुँह उसका पाक किया। फिर उस थाली और लगन को ग़ुलाम आदमियों के पिंजरे के नज़दीक ले गए और सौदागर से कुंजी माँग कर पिंजरे का ताला खोला। उन दोनों आदमियों को बाहर निकालकर कई सोंटे मारकर, कुत्ते का झूठा उन्हें खिलाया और वही पानी पिलाया। फिर ताला बन्द कर के कुंजी सौदागर के हवाले की। जह यह सब हो चुका, तब सौदागर ने ख़ुद खाना शुरू किया।

    सौदागर-बच्चे को यह हरकत पसन्द आई। घिन खाकर, हाथ खाने में डाला। हरचन्द सौदागर ने मिन्नत-ख़ुशामद की पर उसने इन्कार ही किया। तब सौदागर ने इसका कारण पूछा। सौदागर-बच्चे ने कहा, “तुम्हारी यह हरकत बुरी मा’लूम हुई, इसलिये कि इन्सान का दर्जा सबसे ऊँचा है और कुत्ता सबसे नीच और गन्दा समझा जाता है। ख़ुदा के दो बन्दे को कुत्ते का झूठा खिलाना किस धर्म और मज़हब में जायज़ है। सिर्फ़ इतनी बात को ग़नीमत नहीं जानते कि वह तुम्हारी क़ैद में हैं, नहीं तो तुम और वह बराबर हैं। अब मेरे दिल में यह शक पैदा हुआ कि तुम मुसलमान नहीं, क्या जाने तुम कौन हो, कुत्ते को पूजते हो? मेरे लिये तुम्हारा खाना उस वक़्त तक जायज़ नहीं है, जब तलक यह शक दिल से दूर हो।”

    सौदागर ने कहा, “ऐ बाबा! जो कुछ तू कहता है, मैं सब समझता हूँ। मैं इसीलिये बदनाम हूँ। इस शहर के लोगों ने मेरा नाम ख़्वाजा सग परस्त (कुत्ते को पूजने वाला सौदागर) रखा है। वे इसी नाम से मुझे पुकारते हैं और इसी नाम से मुझे मशहूर किया है। सौदागर ने सौदागर बच्चे को इत्मीनान दिलाने के लिये कलमा पढ़ा। तब सौदागर-बच्चे ने कहा कि अगर तुम दिल से मुसलमान हो, तो इसका क्या कारण है? ऐसी हरकत करके क्यों अपने को बदनाम किया है?”

    सौदागर ने कहा, “ऐ बेटे, मेरा नाम बदनाम है और दुगुना महसूल इस शहर में भरता हूँ। इसी वास्ते कि यह भेद किसी पर ज़ाहिर हो। अ’जीब क़िस्सा है कि जो-कोई सुने सिवाय ग़म और ग़ुस्से के उसे कुछ और हासिल हो। मुझे मुआ'फ़ रख क्योंकि मुझमें क़ुदरत कहने की और तुझमें ताक़त कहने सुनने की रहेगी।” सौदागर बच्चे ने अपने दिल में ग़ौर किया कि मुझे अपने काम से काम है, क्या ज़रूरत है कि इस बात पर ज़ियादा ज़ोर दिया जाय। बोला, “ख़ैर, नहीं कहने के लायक़ है तो कहिये।” यह कह कर खाने में हाथ डाला और निवाला उठाकर खाने लगा।

    दो महीने सौदागर-बच्चे ने इस होशियारी और अक़्लमन्दी के साथ गुज़ारे कि किसी पर हरगिज़ यह भेद खुला कि यह औ’रत है। सब यही जानते थे कि मर्द है। सौदार को उस से दिन-ब-दिन इतनी मुहब्बत बढ़ती गई कि एक पल के लिये भी वह अपनी आँखों से उसे ओझल करता।

    एक दिन साथ में शराब पीते वक़्त सौदागर-बच्चे ने रोना शुरू कर दिया। सौदागर ने उसे रोता देखते ही ख़ातिरदारी की, रुमाल से आंसू पोंछने लगा और रोने का सबब पूछा।

    सौदागर-बच्चे ने कहा, “ऐ क़िबला क्या कहूँ? काश! आपसे यह लगाव पैदा होता और आपने इतनी मेहरबानी जो मेरे साथ करते हैं की होती। अब दो मुश्किलें मेरे सामने हैं। आप से अलग रहने को जी चाहता है और अब यहाँ ज़ियादा रहना मुमकिन है। अब जाना ज़रूरी है लेकिन आप से अलग रहकर ज़िन्दगी की उमीद नज़र नहीं आती।”

    यह बात सुनकर बेइख़्तियार सौदार ऐसा रोने लगा कि हिचकी बँध गई और बोला कि, “ऐ मेरी आंख के तारे, इतनी जल्दी अपने इस बूढ़े ग़ुलाम की ख़िदमत से तबीअ’त भर गई कि उस का दिल तोड़ कर चले जाते हो! जाने का ख़याल दिल से दूर करो, जब तलक मेरी ज़िन्दगी है। तुम्हारे जाने के बाद मैं एक पल जीता रहूँगा। बिना मौत मर जाऊंगा। वैसे इस मुल्क की आब –ओ-हवा बहुत अच्छी और मुवाफ़िक़ है। बेहतर यह होगा कि एक मो'तबर आदमी भेज कर मां-बाप को असबाब के साथ यहीं बुलवा लो, जो-कुछ सवारी, क़ुली, मज़दूर औऱ जिस सामान की ज़रूरत हो हाज़िर करूं। जब तुम्हारे मां-बाप और तुम्हारा घर-बार सब जाय तो अपनी ख़ुशी मर्ज़ी से कारोबार, व्यापार किया करना। मैंने भी इस उम्र में ज़माने की बड़ी मुसीबतें उठाई हैं और देस-विदेस घूमता फिरा हूँ। अब बूढ़ा हुआ और कोई औलाद नहीं है। मैं तुझे बेटे से ज़ियादा समझता हूँ और तुझे अपना वली-वारिस और मुख़्तार करता हूँ। मेरे कारख़ाने और कारोबार की देख-रेख भी तुम्हीं को करना है। जब तलक जीता हूँ एक टुकड़ा खाने को अपने हाथ से दो। जब मर जाऊंगा गाड़-दाब दीजो और तब माल असबाब मेरा ले लीजो।”

    तब सौदागर बच्चे ने जवाब दिया, “वाक़ई, आपने बाप से ज़ियादा मेरी हमदर्दी और ख़ातिरदारी की कि मुझे मां-बाप भूल गए। लेकिन इस गुनाहगार के बाप ने इसे सिर्फ़ एक साल की छुट्टी दी थी। अगर देर लगाऊंगा तो वह इस बुढ़ापे में रोते-रोते मर जाएँगे। बाप-मां की ख़ुशी से ख़ुदा भी ख़ुश रहता है और मैं डरता हूँ कि अगर वे मुझसे नाराज़ हुये और कहीं उन्होंने मुझे बद-दुआ’ दे दी तो मैं लोक-परलोक में दोनों में ख़ुदा की मेहरबानी से महरूम हो जाऊंगा।

    “अब आप की यही मेहरबानी होगी कि मुझे हुक्म दीजिए कि अपने बाप का हुक्म पूरा करूँ और इस तरह बाप का हक़ अदा करूं और जहाँ तक आपकी मेहरबानी का शुक्र अदा करने की बात है, जब तलक दम में दम है, आप का एहसान मेरी गर्दन पर है। अगर अपने मुल्क भी जाऊँगा, तो हर दम दिल-ओ-जान से याद किया करूंगा। ख़ुदा बड़ा कारसाज़ है, शायद फिर कोई ऐसा मौक़ा आये, जो आप से मुलाक़ात का सुख मिले।”

    ग़रज़ सौदागर-बच्चे ने ऐसी-ऐसी बातें नमक-मिर्च लगाकर सौदागर को सुनाई कि वह बेचारा लाचार होकर होंठ चाटने लगा और चूंकि इस लड़के पर फ़रेफ़्ता था और उससे बहुत ज़ियादा मुहब्बत रखता था, कहने लगा कि, “अगर तुम नहीं रहते तो मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूँ। मैं तुझको अपनी जान के बराबर जानता हूँ और जब जान चली जावे, तो ख़ाली बदन किस काम आवे? अगर तू इसी में राज़ी है तो चल और मुझे भी ले चल।” सौदागर-बच्चे से यह कह कर अपने सफ़र की भी तैयारी करने लगा और गुमाश्तों को हुक्म दिया कि सामान ले जाने का इंतिज़ाम जल्दी से करो।

    जब सौदागर के चलने की ख़बर मशहूर हुई तो वहां के सौदागरों ने भी सफ़र का इरादा किया। ख़्वाजा सग परस्त (सौदागर) खज़ाना, बेशुमार जवाहिरात, अनगिनत ग़ुलाम और नौकर और बहुत सा शाहाना सामान साथ लेकर शहर के बाहर तम्बू, क़नात, बेचोवे, सरापर्दे और कुन्दले खड़े करवा कर उनमें दाख़िल हुआ। जितने दूसरे सौदागर थे अपनी-अपनी हैसियत के हिसाब से सौदागरी का माल लेकर साथ हो लिये और अपनी जगह पर यह क़ाफ़िला एक अच्छा ख़ासा लश्कर बन गया। एक शुभ दिन मुक़र्रर करके वे वहां से रवाना हुए। हज़ारों ऊँटों पर असबाब के थैले और ख़च्चरों पर नक़दी और जवाहिरात के सन्दूक़ लदे हुए, पाँच सौ ग़ुलाम अनेक मुल्कों की तलवारें लिए हुए हथियार बन्द, ताज़ी, तुर्की, इराक़ी और अरबी घोड़ों पर सवार होकर चले। सब के पीछे सौदागर और सौदागर-बच्चा भड़कीली पोशाक में सुखपाल पर सवार हो चले। एक ऊंट पर एक बग़दादी तख़्त कसा गया। उस पर कुत्ता मसनद पर सोया हुआ चला। गुलाम ख़ाना उन दोनों क़ैदियों के पिंजरे को एक ऊंट पर लटकाए हुये था। हर मंज़िल पर वे खाना खाते, शराब पीते और सौदागर, सौदागर-बच्चे के साथ होने की खुशी में ख़ुदा का शुक्र अदा करते। इसी तरह काफ़िला मंज़िल-मंज़िल तै करता हुआ चला जाता था। बारे, वे खै ख़ैरियत से क़ुस्तुनतुनिया के नज़दीक पहुचे और उन्होंने शहर के बाहर पड़ाव किया। सौदागर बच्चे ने कहा, “ऐ क़िबला! अगर इजाज़त दीजिये तो मैं जाकर मां-बाप को देखूं और आप के वास्ते मकान खाली कराऊं। इसके बाद जब मिज़ाज में आए, शहर में दाख़िल होइयेगा।”

    सौदागर ने कहा, “तुम्हारी ख़ातिर तो मैं यहाँ आया। अच्छा! जल्द मिल-जुल कर मेरे पास आओ और अपने घर के नज़दीक उतरने को मकान दो।” सौदागर-बच्चा विदाअ’ होकर अपने घर में आय़ा। सब वज़ीर के महल के आदमी हैरान हुए कि यह कौन मर्द घुस आया। सौदागर-बच्चा (यानी वज़ीरज़ादी) अपनी मां के पैरों पर जा गिरा और बोला कि, “मैं तुमहारी बेटी हूँ।” यह सुनते ही वज़ीर की बीवी गालियां देने लगी कि, “ऐ तितली! तू बड़ी हर्राफ़ा निकली। अपना मुँह तूने काला किया और ख़ानदान को बदनाम किया। हम तो तेरी जान को रो-पीटकर, सब्र करके तुझसे हाथ धो बैठे थे। जा दूर हो।”

    तब वज़ीरज़ादी ने सर से पगड़ी उतार कर फेंक की और बोली, “ऐ अम्मा जान! मैं बुरी जगह नहीं गई, कुछ बदी नहीं की। तुम्हारे कहने के मुताबिक़ बाबा को क़ैद से छुड़ाने की ख़ातिर ये सारे पापड़ बेले। ख़ुदा का शुक्र है कि तुम्हारे आशीर्वाद से और ख़ुदा की मेहरबानी से पूरा काम करके आई हूं और नेशापुर से उस सौदागर को उस कुत्ते के साथ जिस के गले में वे ला’ल पड़े हैं अपने साथ लाई हूँ। तुम्हारी अमानत की भी मैंने पूरी तरह हिफ़ाज़त की है। इसीलिए सफ़र के वास्ते मर्दाना भेस किया है। अब एक रोज़ का काम और बाकी है। उसे करके अपने बाप को क़ैदख़ाने से छुड़ाती हूँ और अपने घर में आती हूँ। अगर हुक्म हो तो वापस जाऊँ और एक रोज़ बाहर रह कर आप के पास आऊँ।”

    माँ को जब यह मा’लूम हुआ कि मेरी बेटी ने मर्दों का काम किया है और अपने को सब तरह सलामत और पाक रखा है और कोई धब्बा अपने ऊपर आने नहीं दिया, तो उसने ख़ुदा की दर्गाह में नकघिसनी की और ख़ुश होकर बेटी को छाती से लगा लिया। मुंह को चूमा, बलाएं लीं और यह कह कर रुख़्सत किया कि, “तू जो मुनासिब जान, सो कर। मुझे इत्मीनान हो गया।”

    वज़ीरज़ादी फिर सौदागर-बच्चा बनकर ख़्वाजा सग परस्त के पास चली। वहाँ सौदागर को उसकी जुदाई इतनी दूभर हुई कि बेअख्तियार होकर चल पड़ा। इत्तफ़ाक़ से शहर के नज़दीक, इधर से सौदगार-बच्चा जाता था, उधर से सौदागर आरहा था। रास्ते में मुलाक़ात हुई। ख़्वाजा ने देखते ही कहा, “बाबा! मुझे बूढ़े को अकेला छोड़ कर कहाँ चला गया था?”

    सौदागर-बच्चा ने कहा, “आप से इजाज़त लेकर अपने घर गया था। आख़िर आपकी ख़िदमत के शौक़ ने वहां रहने दिया। कर हाज़िर हुआ।”

    शहर के दरवाज़े पर, दरिया के किनारे एक सायादार बाग़ देख कर खे़मे लगाये गये और सब वहीं उतरे। ख़्वाजा और सौदागर-बच्चा साथ बैठकर शराब-कबाब पीने और खाने लगे। जब तीसरे पहर का वक़्त हुआ, सैर-तमाशे की ख़ातिर खे़मे से निकल कर सन्दलियों पर बैठे। इत्तिफ़ाक़ से एक शाही सिपाही उधर निकला। उनका लश्कर और उठना-बैठना देख कर उसे बड़ा अचम्भा हुआ और उसने अपने दिल में कहा, “शायद किसी बादशाह का दूत आया है।” वह खड़ा तमाशा देखता रहा।

    ख़्वाजा के एक चालाक सिपाही ने उसे आगे बुलाया और पूछा, “तू कौन है?” उसने कहा, “मैं बादशाह का शिकार का दारोग़ा हूँ।” ख़्वाजा के सिपाही ने अपने मालिक से उसका हाल कहा। ख़्वाजा ने एक ग़ुलाम से कहा, “जाओ, उनसे कहो कि हम मुसाफ़िर हैं, अगर जी चाहे तो आओ बैठो, क़हवा-क़लियान हाज़िर है।” जब दारोग़ा ने सौदागर का नाम सुना, उसे बड़ा तअ’ज्जुब हुआ और ग़ुलाम के साथ ख़्वाजा की मज्लिस में आया। वहाँ का सारा सामान शान-शौक़त, सिपाही, ग़ुलाम देखे, ख़्वाजा और सौदागर-बच्चे को सलाम किया। पर जब कुत्ते के ठाठ पर उसकी नज़र पड़ी तो उसके होश जाते रहे, हक्का-बक्का सा हो गया।

    ख़्वाजा ने उसे बिठा कर क़हवे से ख़ातिर की। दारोग़ा ने ख़्वाजा का नाम-ओ-निशान पूछा। जब उसने ख़्वाजा से चलने की इजाज़त माँगी, ख़्वाजा ने कई थान और कुछ तोहफ़े उसे देकर इजाज़त दी। दूसरे दिन सुब्ह को जब बादशाह के दरबार में हाज़िर हुआ, दरबारियों ने ख़्वाजा सौदागर का ज़िक्र करने लगा। रफ़्ता-रफ़्ता मुझ को ख़बर हुई। दारोग़ा को मैंने सामने तलब किया और सौदागर का हाल पूछा।

    उस ने जो-कुछ देखा था अ’र्ज़ किया। कुत्ते की यह इज़्ज़त और दो आदमियों के पिंजरे में क़ैद होने की ख़बर सुन कर मुझे ग़ुस्सा आया। मैंने कहा कि, “वह मर्दूद सौदागर क़ल्त करने लायक़ है।” लश्कर का इंतिज़ाम करने वाले चोबदार को हुक्म दिया कि, “जल्द जाओ और उस बेदीन (अधर्मी) का सर काट लाओ।” इत्तिफ़ाक़ से वही विलायत का दूत दरबार में हाज़िर था। वह मुस्कराया। मुझे और ज़ियादा ग़ुस्सा आया। मैंने कहा, “ऐ बेअदब! बादशाहों के हुज़ूर में बिला वजह दांत खोलना, अदब से बाहर है। बेमौ’क़ा हँसने से रोना बेहतर है।” उसने अ’र्ज़ किया, “कई बातें ख़याल में आई, जिनकी वजह से यह ग़ुलाम मुस्कराया। पहली बात यह है कि वज़ीर सच्चा है और अब रिहाई पायेगा। दूसरे यह कि बादशाह उस वज़ीर के नाहक़ ख़ून से बचे। तीसरे यह कि जहाँपनाह ने बिला वजह, बिला क़ुसूर उस सौदागर के क़त्ल का हुक्म दिया। इन हरकतों पर मुझे तअ’ज्जुब हुआ कि बिला खोज किये और सुबूत माँगे एक वेबक़ूफ के कहने से आप हर किसी के क़त्ल का हुक्म दे बैठते हैं। ख़ुदा जाने अस्लियत में उस सौदागर का हाल क्या है? उसे हुज़ूर में तलब कीजिए और उसकी वारदात सुनिये। अगर क़ुसूरवार साबित हो, तब आप मालिक मुख़्तार हैं, जो मर्ज़ी में आये सो उससे सुलूक कीजिये।”

    जब दूत ने इस तरह से समझाया, मुझे भी वज़ीर का कहना याद आया और मैंने हुक्म दिया कि “जल्द सौदागर को उसके बेटे के साथ और यह कुत्ता और पिंजरा हाज़िर करो।” सिपाही उसके बुलाने को दौड़ गये। थोड़ी ही देर में सब को हुज़ूर में ले आये। मैंने सामने तलब किया। पहले ख़्वाजा और उसका बेटा आया। दोनों भड़कीली पोशाक में थे। सौदगर-बच्चे की ख़ूबसूरती देख कर सब छोटे-बड़े हैरान और भौंचक्के हुए। सौदागर-बच्चा सोने का एक थाल जवाहिरात से भरा हुआ हाथ में लिये आया और मेरे तख़्त के आगे निछावर किया। इनमें से हर रत्न ऐसा था, जिस की चमक ने सारे मकान को रौशन कर दिया। सौदागर-बच्चा, आदाब कोरनिश करके खड़ा हो गया। ख़्वाजा ने भी ज़मीन चूमी और दुआ’’ करने लगा और इतनी रवानी और मिठास से बोलता था जैसे बुलबुल-ए-हज़ार दास्तान है। मैंने इसकी लियाक़त को बहुत पसन्द किया। लेकिन- ग़ुस्से से कहा, “ऐ शैतान! आदमी की सूरत! तूने यह क्या जाल फैलाया है और अपनी राह में कुआँ खोदा है? तेरा क्या धर्म-ईमान है और यह क्या तरीक़ा तूने इख़्तियार किया है? किस पैग़म्बर का मानने वाला है? अगर अधर्मी है, तब यह ढंग क्या है? तेरा क्या नाम है और यह क्या काम है?”

    उसने कहा, “जहाँपनाह की उम्र और दौलत बढ़ती रहे! ग़ुलाम का ईमान यह है कि ख़ुदा एक है, उसका कोई शरीक नहीं और मुहम्मद मुस्तफ़ा का कल्मा पढ़ता हूँ और उसके बाद बारह इमाम को अपना पेशवा (मार्ग-दर्शक) जानता हूं। मेरा तरीक़ा यह है कि पाँचों वक़्त की नमाज़ पढ़ता हूँ, रोज़ा रखता हूँ और हज भी कर आया हूँ। अपने माल में से पाँचवाँ हिस्सा ज़कात (दान) देता हूँ और मुसलमान कहलाता हूँ। लेकिन ज़ाहिर में ये सारे ऐ’ब मुझ में भरे हैं जिन की वजह से आप नाख़ुश हुए हैं। मैं भी सारे लोगों में बदनाम हो रहा हूँ। इस की एक वजह है, जो ज़ाहिर नहीं कर सकता, अगरचे मैं कुत्ता पूजने वाला मशहूर हूँ और दुगुना महसूल देता हूँ। मैंने यह सब क़ुबूल किया है। पर दिल का भेद किसी से नहीं कहा।”

    उस के इस बहाने से मेरा ग़ुस्सा ज़्यादा हुआ और कहा, “मुझे तू बातों में फुसलाता है। मैं उस वक़्त तलक़ नहीं मानने का, जब तक तू अपनी गुमराही की कोई मा’क़ूल दलील दे, जो मेरे दिल में बैठ जाय। तब तो तू जान से बचेगा, नहीं तो इस जुर्म की सज़ में तेरा पेट चाक कराऊँगा, ताकि दूसरों को सबक़ मिले और आगे कोई धर्म-ईमान में इस तरह की दख़लअंदाज़ी करे।”

    ख़्वाजा ने कहा, “ऐ बादशाह! मुझ कमबख़्त के ख़ून से दरगुज़र कर और जितना मेरा माल है जो गिनती और शुमार से बाहर है सब ज़ब्त करले और सिर्फ़ मुझे और मेरे बेटे को अपने तख़्त के सदक़े में छोड़ दे और जान-बख़्शी कर दे।”

    मैंने मुस्कराकर कहा, “ऐ बेवक़ूफ, अपने माल की लालच मुझे देता है! अब सिवाय सच बोलने के तेरे बचने का कोई रास्ता नहीं।” यह सुनते ही ख़्वाजा की आँखों से बेइख़्तियार आँसू टपकने लगे। अपने बेटे की तरफ़ देख कर उसने एक आह भरी और बोला, “मैं तो बादशाह की नज़र में गुनाहगार ठहरा। मारा जाऊँगा। अब क्या करूँ? तुझे किस को सौंपू?”

    मैंने उसे डाँटा कि, “ऐ मक्कार! बस, अब बहुत बहाने हो चुके, जो कहना है सो जल्द कह।”

    तब तो उस मर्द ने क़दम बढ़ा कर, तख़्त के पास आकर तख़्त के पाए को चूमा और ख़ुदा की तारीफ़ करने लगा। इसके बाद उसने कहा, “ऐ शहनशाह! अगर क़त्ल का हुक्म मेरे हक़ में होता तो सब-कुछ सहता और अपना हाल कहता। लेकिन जान सब से अज़ीज़ है। कोई आप से आप कुएँ में नहीं गिरता। इसलिये जान की हिफ़ाज़त करना वाजिब है। जो बात वाजिब है उसके ख़िलाफ़ जाना ख़ुदा के हुक्म के खिलाफ़ जाना है। अगर आप की मर्ज़ी यही है तो इस बूढ़े का हाल सुनिये। पहले हुक्म हो, वे दोनों पिंजरे जिनव में वे दोनों आदमी क़ैद हैं, हुजूर में लाकर रखे जायँ। मैं अपना हाल कहता हूँ। अगर मैं कहीं झूठ कहूँ तो इन से पूछ कर मुझे क़ायल किया जाय और इन्साफ़ किया जाय।” मुझे उस की यह बात पसन्द आई और पिंजरों को मँगवाया और उन दोनों को निकलवा कर ख़्वाजा के पास खड़ा किया।

    ख़्वाजा ने कहा- बादशाह, यह आदमी जो मेरे दाहनी तरफ़ है मेरा बड़ा भाई है, और जो बाईं तरफ़ खड़ा है, मेरा मंझला भाई है। मैं इन दोनों से छोटा हूँ। मेरा बाप मुल्क़ फ़ारस में सौदागर था। जब मैं चौदह बरस का हुआ, तो मेरे बाप परलोक सिधारे। जब कफ़न-दफ़न से फ़राग़त हुई और फूल उठ चुके, तो एक दिन दोनों भाइयों ने मुझसे कहा कि ‘अब बाप का माल जो-कुछ है, आपस में बाँट लें और जिसका जो दिल चाहे करे।’ मैंने सुन कर कहा कि, ‘ऐ भाइयो! मैं तुम्हारा ग़ुलाम हूँ, भाईचारे का दा’वा नहीं रखता। एक बाप मर गया तो क्या, तुम दोनों मेरे बाप की जगह मेरे सर पर क़ायम हो। एक सूखी रोटी चाहता हूँ जिसमें ज़िन्दगी बसर करूँ और तुम्हारी ख़िदमत में हाज़िर रहूँ। मुझे हिस्से-बखरे से क्या काम है? तुम्हारे आगे के जूठे से अपना पेट भर लूंगा और तुम्हारे पास रहूंगा। मैं लड़का हूँ। कुछ पढ़ा, लिखा भी नहीं, मुझसे क्या हो सकेगा? अभी तुम मुझे तर्बियत करो।’

    यह सुनकर इन्होंने जवाब दिया कि, ‘तू चाहता है कि अपने साथ हमें भी ख़राब और मुहताज करे।’ मैं चुपका एक कोने में जाकर रोने लगा। फिर दिल को समझाया। भाई आख़िर बड़े हैं, मेरी ता’लीम की ख़ातिर आँखें दिखाते हैं कि कुछ सीखे, इसी चिंता में सो गया। ,सुब्ह को एक प्यादा क़ाज़ी के पास से आया और मुझे उसकी अ’दालत में ले गया। वहाँ जा कर देखा तो ये दोनों भाई हाज़िर हैं। क़ाज़ी ने कहा, ‘अपने बाप का विर्सा बाँट क्यों नहीं लेता?’ मैंने घर पर जो कहा था, वहाँ भी वही जवाब दिया। इस पर भाइयों ने कहा कि ‘अगर यह बात दिल से कहता है, तो कागज़ पर लिख दे कि बाप के माल-जायदाद पर मेरा कोई दा'वा नहीं।’ तब भी मैंने यही समझा कि ये दोनों मेरे बड़े हैं, मेरे भले और मुझे सीख देने के लिये कहते हैं कि बाप का माल ले जा कर बेजा ख़र्च करे। उनकी मर्ज़ी के मुताबिक़ मैंने फ़ारिग़खती लिख दी और क़ाज़ी ने अपनी मुहर लगा दी। ये लोग राज़ी हो गए और मैं घर आया।

    दूसरे दिन मुझ से कहने लगे कि, ‘ऐ भाई! यह मकान जिस में तू रहता है, हमें इस की ज़रूरत है। तू अपने रहने के लिये किसी और जगह का इंतिज़ाम कर।’ तब मैंने सोचा कि ये लोग मेरे बाप की हवेली में रहने से भी ख़ुश नहीं है। लाचार होकर उठ जाने का इरादा किया। जहाँपनाह! जिस वक़्त मेरा बाप ज़िन्दा था, जिस वक़्त सफ़र से आता था, हर-एक मुल्क का तोहफ़ा, सौग़ात के तौर पर लाता और मुझे देता था, इसलिये कि छोटे बेटे को हर-कोई ज़ियादा प्यार करता है। मैंने उन तोहफ़ों को बेच-बेच कर थोड़ी सी अपनी निज़ी पूंजी बना ली थी। इसी से कुछ दिन लेन-देन करता। एक बार मेरा बाप तुर्किस्तान से मेरी ख़ातिर एक लौंडी लाया था और एक बार घोड़े लाया था। उन में से एक होनहार बछड़ा जो सिखाया हुआ नहीं था, वह भी मुझे दिया। मैं उसे अपने पास से दाना-घास खिलाता था।

    आख़िर उनकी बेमुरव्वती देखकर एक हवेली ख़रीदी और वहाँ जा कर रहने लगा। यह कुत्ता भी मेरे साथ चला आया। ज़रूरत का घर-गृहस्ती का सामान जमा’ किया और ख़िदमत के लिये दो ग़ुलाम मोल लिये और बाक़ी पूजी से बजाज़ की एक दूकान करके ख़ुदा के भरोसे पर बैठा। अपनी क़िस्मत पर राज़ी था। अगरचे भाइयों ने बुरा सुलूक किया था पर ख़ुदा मेहरबान था। इसलिये तीन बरस के अ’र्से में ऐसी दूकान जमी कि मेरी साख बन गई। अमीरों को और शाही सरकार में जिस तोहफ़े की ज़रूरत होती, मेरी ही दूकान से जाता। इस दूकान से मैंने बहुत रुपये कमाए और बहुत इत्मीनान से गुज़र होने लगी। हरदम ख़ुदा का शुक्र अदा करता और आराम से रहता। यह कविता अक्सर अपने हाल पर पढ़ता-

    रूठे क्यों राजा? बातें कुछ नहीं काजा,

    एक तोसे महाराजा और कौन को सराहिए?

    रूठे क्यों भाई! बातें कुछ बसाई,

    एक तू ही है सहाई और कौन पास जाइये?

    रूठे क्यों मित्र-शत्रु, आठों जाम बस

    एक सांवरे के चरन के नेह को निभाइये।

    संसार है रूठा, एक तू है अनूठा,

    सब चूमेंगे अंगूठा, एक तू रूठा चाहिये।

    एक रोज़ जुमा को मैं अपने घर बैठा था और मेरा एक ग़ुलाम सौदा-सुलुफ़ लेने बाज़ार गया था। वह थोड़ी देर बाद रोता हुआ आया। मैंने सबब पूछा कि ‘तुझे क्या हुआ?’ खफ़ा होकर बोला, ‘तुम्हें क्या? तुम ख़ुशी मनअ’ओ, लेकिन क़यामत में क्या जवाब दोगे?’ मैंने कहा, ‘ऐ हब्शी! ऐसी क्या बला तुझ पर नाज़िल हुई?’ उस ने कहा, ‘यह ग़ज़ब है कि एक यहूदी ने चौक के चौराहे पर तुम्हारे बड़े भाइयों की मुश्कें बांधी हैं। वह उन को क़ुमचियां मारता है और कहता है कि ‘अगर मेरा रुपया दोगे तो मारते-मारते मार ही डालूँगा। भला मुझे सवाब तो होगा।’ तुम्हारे भाइयों की यह नौबत है और तुम बेफ़िक्र हो। क्या यह बात अच्छी है? लोग क्या कहेंगे?” यह बात ग़ुलाम से सुनते ही लहू ने जोश मारा। नंगे पांव बाज़ार की तरफ़ दौड़ा और ग़ुलामों से कहा, ‘जल्द रुपये लेकर आओ।’ जैसे ही वहां पहुँचा तो देखा कि जो-कुछ ग़ुलाम ने कहा था सच है। उन पर मार पड़ रही है। हाकिम के सिपाहियों से कहा, ‘ख़ुदा के वास्ते ज़रा ठहर जाओ! मैं यहूँदी से पूछूँ तो लूं कि इन्होंने ऐसा क्या क़ुसूर किया है जिसके बदले यह सज़ा दी जा रही है?’

    यह कह कर मैं यहूदी के नज़दीक गया और कहा, ‘आज जुमाअ’ का दिन है। तू इन को क्यों लकड़ी से इस बुरी तरह मार रहा है?’ उसने जवाब दिया, ‘अगर हिमायत करते हो, तो पूरी तरह करो। इनके एवज़ रुपये मेरे हवाले करो, नहीं तो अपने घर की राह लो।’ मैं ने कहा, ‘कितने रुपये? दस्तावेज़ निकाल, मैं रुपये गिन देता हूँ।’ उसने कहा, ‘दस्तावेज़ हाकिम के पास दे आया हूँ।’

    इतने में मेरे दोनों ग़ुलाम रुपये की दो थैलियां लेकर आए। हज़ार रुपये मैंने यहूदी को दिये और भाइयों को छुड़ाया। उनकी हालत ख़राब हो रही थी। बदन से नंगे, भूखे-प्यासे थे। उन को अपने साथ घर ले आया। घर पहुंचते ही हम्माम में नहलवाया, नए कपड़े पहनाए, खाना खिलाया। हरगिज़ उनसे यह पूछा कि बाप का इतना माल तुम ने क्या किया? मैंने इसलिये उनसे पूछना मुनासिब समझा कि शायद वे शर्मिन्दा हो। बादशाह, ये दोनों मैजूद है। पूछिये कि सच कहता हूँ या कोई बात झूठ है? ख़ैर, जब ये कई दिनों में मार की कोफ़्त से बहाल हुए तो एक दिन मैंने कहा, ‘ऐ भाइयो! अब इस शहर में तुम बेए'तबार हो गए हो। बेहतर यह है कि कुछ दिन सफ़र करो।’ यह सुनकर ये चुप हो रहे। मैंने समझा कि राज़ी है। मैं इनके सफ़र की तैयारी करने लगा। खेपे, सामान, जांबर ओर सवारी की फ़िक्र करके बीस हज़ार रुपये का तिजारत का सामान ख़रीदा। एक क़ाफ़िला सौदागरों का बुख़ारा जाता था, उस के साथ इन्हें भी कर दिया।

    एक साल के बा’द वह क़ाफ़िला वापस आय़ा। इनकी ख़ैर-ख़बर कुछ पाई। आख़िर एक जानने वाले से बड़ी क़स्में देकर पूछा। उस ने कहा, ‘जब बुख़ारा पहुंचे, तो उन में से एक जुएख़ाने में अपना सारा माल हार गया। अब वहाँ झाडू देता है। फड़ को लीपता-पोतता है। जुवारी जो जमा होते हैं, उनकी खिदमत करता है। वे ख़ैरात समझकर जो कुछ दे देते हैं वह खा लेता है और वहां कुत्ता बना पड़ा रहता है। दूसरा भाई एक शराब बेचने वाले की लड़की पर आशिक़ हुआ। अपना सारा माल वहां सर्फ़ किया। अब शराबखाने की टहल किया करता है, क़ाफ़िले वाले ये सारी बातें इसलिए नहीं कहते कि तू शर्मिन्दा होगा।’

    यह हाल उस शख्स की ज़बानी सुनकर मेरी अ’जब हालत हुई। मारे फ़िक्र के नींद-भूख जाती रही। सामान और रुपये लेकर बुख़ारा चलने का इरादा किया। वहाँ पहुँच कर ढूँढ-ढाँढ़ कर दोनों को निकाला। अपने मकान में लाया। नहलवाकर नए कपड़े पहनवाये और इस डर से इनका दिल दुखे और इन्हें शर्म घेरे, मैं एक बात ज़बान तक नहीं लाया। पिर सौदागरी का माल इनके वास्ते ख़रीदा और घर चलने का इरादा किया। जब अपने वतन नेशापूर के नज़दीक आया तो एक गांव में इनके साथ साथ माल-असबाब छोड़कर घर आया इसलिये कि मेरे आने की किसी को ख़बर हो। दो दिन के बाद मैं ने मशहूर किया कि मेरे भाई सफ़र से आये हैं। कल मैं उनके स्वागत की ख़ातिर जाऊँगा। सुब्ह को चाहा कि जाऊँ। इतने में एक गृहस्त उसी मौज़ा का मेरे पास आया और फ़रियाद करने लगा। मैं उसकी आवाज़ सुनकर बाहर आय़ा। उसे रोता देख कर पूछा कि, ‘भाई, क्यों रोता है?’ वह बोला, ‘तुमहारे भाइयों के कारण हमारे घर भी लूटे गए। काश कि उन को तुम वहां छोड़ आते!’

    मैं ने पूछा, ‘क्या मुसीबत गुज़री?’ बोला, ‘रात को डाका पड़ा। उनका माल-असबाब लूटा और हमारे घर भी लूट ले गए।’ मैं ने अफ़्सोस किया और पूछा कि ‘अब वे दोनों कहां हैं?” उस ने कहा, ‘शहर के बाहर नंगे-मंगे, ख़राब ख़स्ता बैठे हैं।’ यह सुनते ही दो जोड़े कपड़ों को साथ ले कर गया। पहनाकर घर में लाया। लोग सुन कर उनको देखने को आते थे और वे मारे शर्मिन्दगी के बाहर निकलते थे। तीन महीने इसी तरह गुज़रे। तब मैंने अपने दिल में ग़ौर किया कि कब तलक ये कोने में दुबके बैठे रहेंगे। बन पड़े तो इन को अपने साथ सफ़र में ले जाऊँ।

    भाइयों से मैंने कहा, ‘अगर फ़रमाइये तो यह ग़ुलाम आप के साथ चले।’ ये ख़ामोश रहे। फिर सफ़र का सारा सामान और सौदागरी की जिन्स तैयार करके चला और इनको साथ लिया। जिस वक़्त माल की ज़कात देकर असबाब कश्ती पर चढ़ाया और लंगर उठाया, नाव चली। यह कुत्ता किनारे सो रहा था। जब चौंका और जहाज़ को मँझधार में देखा तो यह हैरान होकर भूँकने लगा, दरिया में कूद पड़ा और तैरने लगा। मैंने एक छोटी कश्ती दौड़ाई। बारे कुत्ते को लेकर कश्ती में पहुँचाया। एक महीना ख़ैर-ख़ैरियत से दरिया में गुज़रा। इत्तिफ़ाक़ से कहीं मँझला भाई मेरी लौंडी पर आशिक़ हुआ। एक दिन बड़े भाई से कहने लगा, ‘छोटे भाई का एहसान उठाने से बड़ी शर्मिन्दगी हासिल हुई। अब उस से बचने के लिये क्या करें?’ बड़े ने जवाब दिया, ‘एक बात दिल में आई है, अगर बन आये तो बड़ी बात है।’ आख़िर दोनों ने सलाह करके तज्वीज़ की कि मुझे मार डालें और सारे माल-असबाब पर क़ब्ज़ा करके ख़र्च करे।

    एक दिन मैं जहाज़ की कोठरी में सो रहा था और लौंडी पाँव दाबती थी कि मँझला भाई आया और जल्दी से मुझे जगाया। मैं हड़बड़ाकर चौंका और बाहर निकला। यह कुत्ता भी मेरे साथ हो लिया। देखा तो बड़ा भाई जहाज़ की बाड़ पर हाथ टेके निहुड़ा हुआ दरिया का तमाशा देख रहा है और मुझे पुकारता है। मैंने पास जाकर कहा, ‘ख़ैरियत तो है?’ बोला, ‘अ’जब तरह का तमाशा हो रहा है कि दरियाई आदमी, मोती की सीपियां और मूँगे के दरख़्त हाथ में लिये हुये नाचते हैं।’ अगर कोई और ऐसी अक़्ल के ख़िलाफ़ बात कहता, तो मैं शायद कभी मानता। लेकिन बड़े भाई के कहने की सच जाना। देखने को सर झुकाया। बहुतेरी नज़र दौड़ाई। कुछ नज़र आया। पर वह यही कहता रहा, ‘अब देखा?’ लेकिन कुछ हो तो देखूं। इतने में मुझे ग़ाफ़िल पाकर मँझले भाई ने अचानक पीछे से आकर ढकेला। मैं बेइख़्तियार पानी में गिर पड़ा और वे रोने-धोने लगे कि ‘दौड़ियो! हमारा भाई दरिया में डूबा।’

    इतने में नाव बढ़ गई और दरिया की लहर मुझे कहीं से कहीं ले गई। ग़ोते पर ग़ोते खाता था और मौजों में चला जाता था। आख़िर मैं थक गया। बस ख़ुदा को याद करता था और कुछ बस चलता था। यकबारगी किसी चीज़ पर हाथ पड़ा। आँखें खोल कर देखा तो यही कुत्ता था। शायद जिस दम मुझे दरिया में डाला, मेरा साथ यह भी कूदा और तैरता हुआ मेरे साथ लिपटा चला जाता था। मैं ने उसकी दुम पकड़ ली। अल्लाह ने उस को मेरी ज़िन्दगी का सबब कर दिया। सात दिन और रात यही सूरत गुज़री। आठवें दिन किनारे जा लगे। ताक़त बिलकुल थी। लेटे-लेटे करवटें खा कर ज्यों त्यों, अपने को ख़ुश्की में डाला। एक दिन मैं बेहोश पड़ा था। दूसरे दिन कुत्ते की आवाज़ कान में गई। होश में आया। ख़ुदा का शुक्र किया। इधर-उधर देखने लगा। दूर से शहर दिखाई देने लगा। लेकिन इतनी ताक़त कहां कि चलने का इरादा करूँ! लाचार दो क़दम चलता फिर बैठता। इसी हालत से शाम तक कोस भर राह काटी।

    बीच में एक पहाड़ मिला। रात को वहीं गिर रहा। सुब्ह को शहर में दाख़िल हुआ। जब बाज़ार में गया नानबाई और हलवाइयों की दुकानें नज़र आईं। दिल तरसने लगा, पास पैसा जो खरीदूं, जी चाहे कि मुफ़्त मांगू। इसी तरह अपने दिल को तसल्ली देता हुआ कि अगली दूकान से लूँगा, चला जाता था। आख़िर ताक़त रही और पेट में आग लगी थी। नज़दीक था कि रूह बदन से निकले कि अचानक दो जवानों को देखा जो अ’जम का लिबास पहने और हाथ पकड़े चले आते थे। उन को देख कर ख़ुश हुआ कि ये अपने मुल्क के इन्सान हैं, शायद जान-पहचान के हों। उनसे अपना हाल कहूँगा। जब नज़दीक आये तो देखा दोनों मेरे सगे भाई थे। देख कर बहुत ख़ुश हुआ। ख़ुदा का शुक्र किया कि उसने आबरू रख ली। ग़ैर के आगे मैंने हाथ पसारा। नज़दीक जा कर सलाम किया और बड़े भाई का हाथ चूमा। उन्होंने मुझे देखते ही शोर-ओ-ग़ुल किया। मंझले भाई ने ऐसा तमांचा मारा कि मैं लड़खड़ाकर गिर पड़ा। बड़े भाई का दामन पकड़ा कि शायद यह हिमायत करेगा। उसने लात मारी।

    ग़रज़ दोनों ने मुझे ख़ूब चूर-चूर किया और हज़रत यूसुफ़ के भाइयों का सा काम किया। हरचन्द मैंने ख़ुदा के वास्ते दिये और घिघियाया। मगर हरगिज़ किसी ने रहम खाया। एक मजमा' इकठ्ठा हुआ। सबने पूछा, ‘इस का क्या गुनाह है?’ तब भाइयों ने कहा, ‘यह हरामज़ादा हमारे भाई का नौकर था। सो उस को दरिया में डाल दिया और माल-असबाब सब इस ने ले लिया। हम मुद्दत से इस की तालाश में थे। आज यह इस सूरत से नज़र आया।’ और, मुझ से वे पूछते थे कि ‘ऐ ज़ालिम! यह क्या तेरे दिल में आया, जो हमारे भाई को मार खपाया? उस ने तेरा क्या क़ुसूर किया था? उस ने तुझ से क्या बुरा सुलूक किया था, जो अपना मुख़्तार बनाया था?’ फिर उन दोनों ने अपने गरेबान चाक कर डाले और बेइख़्तियार झूठ-मूठ भाई की ख़ातिर रोते थे और मुझे लात-मुक्के मारते थे।

    इतने में हाकिम के सिपाही आए और इन को डाँटा कि, ‘क्यों मारते हो?’ और वे मेरा हाथ पकड़ कर कोतवाल के पास ले गए। वे दोनों भी साथ चले और हाकिम में भी कुछ कहा और कुछ रिश्वत देकर अपना इन्साफ़ चाहा और ख़ून-ए-नाहक़ का दा’वा किया।

    मेरी यह हालत थी कि मारे भूख और मार-पीट के कारण बोलने की ताक़त बिल्कुल थी। हाकिम ने मुझ से पूछा तो मैं सर नीचा किये खड़ा था, कुछ मुँह से जवाब निकला। हाकिम को भी यक़ीन हुआ कि मैं सचमुच ख़ूनी हूँ। उसने हुक्म दिया कि, ‘इसे मौदान में जाकर सूली दो।’ ‘जहाँपनाह! मैंने रुपये देकर इन को यहूदी की क़ैद से छुड़ाया था। इस के ए’वज़ इन्होंने भी रुपये खर्च करके मेरी जान लेने की ठानी। ये दोनों हाज़िर हैं, इन से पूछिये जो इस में बाल बराबर भी फ़र्क़ हो। ख़ैर, सिपाही मुझे ले गए। जब मैंने सूली को देखा तो अपनी ज़िन्दगी से हाथ धोए।’

    सिवाय इस कुत्ते के कोई मेरा रोने वाला था। इस की यह हालत थी कि हर-एक आदमी के पाँव में लोटता और चिल्लाता था। कोई लकड़ी, कोई पत्थर से मारता। लेकिन यह उस जगह से सरकता। और मैं का’बे की तरफ़ मुँह करके खड़ा हो कर ख़ुदा से कहता था कि ‘ऐसे वक़्त में तेरी ज़ात के सिवा मेरा कोई नहीं जो आड़े आवे और बेगुनाह को बचावे। अब तू ही बचावे तो बचता हूँ!’ यह कह कर कलमा शहादत का पढ़कर तेवराकर गिर पड़ा।

    ख़ुदा की हिक़मत से उस शहर के बादशाह को क़ौलंज की बीमारी हुई। अमीर ओर हकीम जमा’ हुए। ये इलाज करते थे, पर कोई फ़ायदा होता था। एक बुज़ुर्ग ने कहा कि ‘सब से बेहतर दवा यह है कि मुहताजों को कुछ ख़ैरात करो और क़ैदियों को आज़ाद करो। दवा से दुआ’’ में बड़ा असर है।’ यह सुनते ही शाही सिपाही कैदख़ाने की तरफ़ दौड़े।

    इत्तिफ़ाक़ से एक सिपाही उस मैदान की तरफ़ निकला। भीड़ देख कर समझ गया कि किसी को सूली चढ़ाते हैं। यह सुनते ही घोड़े को सूली के नज़दीक लाकर तलवार से तनाबें काट दी। हाकिम के सिपाहियों को डाँटा और सावधान किया कि, ‘ऐसे वक़्त में जब बादशाह की हालत यह है, तुम ख़ुदा के बन्दे को क़त्ल करते हो!’ और उसने मुझे छुड़ा दिया। तब ये दोनों भाई फिर हाक़िम के पास गए और मेरे क़त्ल के वास्ते कहा। कोतवाल ने तो रिश्वत खाई थी। जो ये कहते थे, सो करता था।

    कोतवाल ने इन से कहा, ‘ख़ातिरजमा’ रखो। अब मैं ऐसा क़ैद करता हूँ कि आप-से-आप, मारे भूखों के, बे आब-ओ-दाना मर जावे और किसी को ख़बर होवे।’ मुझे पकड़ लाए और एक कोने में रखा। उस शहर से बाहर, एक कोस की दूरी पर, एक पहाड़ था जहाँ देवों ने हज़रत सुलैमान के वक़्त में एक बहुत छोटे मुँह का, अंधियारा कुआँ उस में खोदा था। उस को ज़िन्दान-ए सुलैमान कहते थे। जिस पर बादशाह का बहुत ज़ियादा ग़ुस्सा होता, उसे वहां क़ैद करते और वह अपने आप मर जाता। क़िस्सा यह कि रात को ये दोनों भाई और कोतवाल के सिपाही मुझे उस पहाड़ पर ले गए और उस कुएं में डाल कर, अपनी ख़ातिरजमा’ कर के वापस चले गए। बादशाह! यह कुत्ता भी मेरे साथ चला गया। जब मुझे कुएं में गिराया तब यह उसकी मेंड पर लेटा रहा। मैं अन्दर बेहोश पड़ा था। ज़रा ताक़त आई तो मैंने अपने को मुर्दा ख़याल किया और उस मकान को क़ब्र समझा। इतने में दो आदमियों के बात करने की आवाज़ कान में पड़ी। मैं यही समझा कि मुनकिर-नकीर हैं। मुझ से सवाल करने आए हैं। और मैंने रस्सी की सरसराहट सुनी, जैसे किसी ने वहाँ लटकाई हो। मैं हैरत में था। ज़मीन को टटोलता था, तो हड्डियाँ हाथ में आती थीं।

    एक घड़ी के बाद चिपड़- चिपड़ मुँह चलाने की आवाज़ मेरे कान में आई, जैसे कोई कुछ खाता है। मैंने पूछा कि ‘ऐ ख़ुदा के बन्दो, तुम कौन हो? ख़ुदा के वास्ते बताओ।’ वे हँसे और बोले, ‘यह ज़िन्दान-ए-सुलैमान है और हम क़ैदी हैं।’ मैंने उन से पूछा कि, ‘क्या मैं जीता हूँ?’ वे फिर खिलखिलाकर हँसे औऱ कहा कि, ‘अब तलक तो तू ज़िन्दा है, पर अब मरेगा।’ मैंने कहा, ‘तुम खाते हो। बड़ा अच्छा हो जो मुझे भी थोड़ा सा दो।’ तब उन्हों ने झुँझलाकर ख़ाली जवाब दिया और खाने को कुछ दिया। वे खा-पीकर सो रहे और मैं कमज़ोरी और नातवानी के मारे ग़श में पड़ा रोता था। बादशाह सलामत! सात दिन मैं दरिया में रहा और अपने भाइयों के झूठे इल्ज़ाम के कारण दाना मुयस्सर आया। इसके अ’लावा खाने के बदले मार-पीट खाई और ऐसे क़ैदखाने में फँसा, जहाँ से छूटने की सूरत बिलकुल ख़याल में भी आती थी।

    आख़िर जान निकलने की नौबत पहुँची। कभी दम आता, कभी निकल जाता था। लेकिन कभी-कभी आधी रात को एक आदमी आता और रुमाल में रोटियाँ और पानी की सुराही डोरी में बाँधकर लटका देता और पुकारता। वे दोनों आदमी जो मेरे साथ क़ैद में थे, ले लेते और खाते-पीते।

    ऊपर से कुत्ते ने हमेशा यह देखते-देखते यह अक़्ल दौड़ाई कि जिस तरह यह शख़्स पानी और रोटी कुएँ में लटका देता है, तू भी ऐसी फ़िक्र कर कि कुछ उस बेकस को भी, जो मेरा मालिक है, रोज़ी पहुँचे, तो उस की जान बचे। यह ख़याल कर के शहर में गया। नानबाई की दूकान पर गुर्दे चुने हुए धरे थे। जस्त मारकर उसने एक कुल्चा मुँह में लिया और भागा, लोग पीछे दौड़े। वे ढेले मारते थे, लेकिन उसने रोटी को छोड़ा। आदमी थक कर वापस हुए। शहर के कुत्ते पीछे लगे। उन से लड़ता-भिड़ता, रोटी को बचाए, उस कुएँ पर आया और रोटी को अन्दर डाल दिया। दिन था, मधिम रौशनी में, मैं ने रोटी को पास पड़ा देखा और कुत्ते की आवाज़ सुनी। मैंने रोटी को उठा लिया और यह कुत्ता रोटी को फेंक कर पानी की तलाश में गया।

    किसी गाँव में किनारे, एक बुढ़िया की झोंपड़ी थी, ठिलिया और बंधना पानी से भरा हुआ धरा था और वह बुढ़िया चर्ख़ा कातती थी। कुत्ता बँधने के नज़दीक गया। चाहा कि उसे उठावे। औ’रत ने डाँटा। लोटा उसके मुँह से छूटा, घड़े पर गिरा, मटका फूटा, बाक़ी बासन लुढ़क गए, पानी वह चला। बुढ़िया लकड़ी लेकर मारने को उठी। यह कुत्ता उस के दामन में लिपट गया, उसके पाँव पर मुँह मलने और दुम हिलाने लगा और पहाड़ की तरफ़ दौड़ गया। फिर उस के पास आकर कभी रस्सी उठाता और कभी डोल मुँह में पकड़ कर दिखाता और मुँह उस के क़दमों पर रगड़ता और आँचल चादकर का पकड़कर खींचता। ख़ुदा ने उस औ’रत के दिल में रहम दिया कि डोल-रस्सी लेकर उसके साथ चली। यह उस का आँचल पकड़े घर से बाहर होकर आगे-आगे हो लिया।

    आख़िर उस बुढ़िया को पहाड़ पर ले ही आया। औ’रत के जी में कुत्ते की हरकत से यह बात आई कि ज़रूर इसका मालिक, इस कुएँ में गिरफ़्तार है। शायद उस की ख़ातिर पानी चाहता है। ग़रज़ बुढ़िया को लिए हुए वह कुत्ता कुएं के मुंह पर आया। औ’रत ने लोटा पानी से भर कर रस्सी से लटकाया। मैंने वह बासन ले लिया और रोटी का टुकड़ा खाया। दो-तीन घूंट पानी पिया। इस तरह कुत्ते को राज़ी किया। ख़ुदा का शुक्र करके एक किनारे बैठा और ख़ुदा की मेहरबानी का इंतिज़ार करने लगा कि देखिये अब क्या होता है? यह बेज़बान इसी तरह रोटी ले आता और बुढ़िया के हाथ पानी पिलवाता।

    जब भटियारों ने देखा कि कुत्ता हमेशा रोटी ले जाता है तो तरस खा कर मुक़रर्र किया कि जब उस को देखते, एक रोटी उसके आगे फेंक देते। अगर वह औ’रत पानी लाती तो यह उस के बासन फोड़ डालता। लाचार वह भी एक सुराही पानी की दे जाती। मेरे इस साथी ने इस तरह रोटी-पानी से मेरी ख़ातिर जमा' की ओर आप कुएं के मुंह पर पड़ा रहता। इस तरह छः महीने गुज़रे, लेकिन जो आदमी ऐसे कुएं में रहे कि दुनिया की हवा उस को लगे, उसका क्या होगा? निरा हड्डी-चमड़ा मुझ में बाक़ी रहा। ज़िन्दगी वबाल हुई, जी में आवे कि या इलाही! यह दम निकल जावे तो बेहतर है।

    एक रोज़ वे दोनों सोए थे कि मेरा दिल उमड़ आया, बेइख़्तियार रोने लगा और ख़ुदा की दर्गाह में नकघिसनी करने लगा। पिछले पहर क्या देखता हूँ कि ख़ुदा की क़ुदरत से एक रस्सी कुएं में लटकी और एक आवाज़ मैंने सुनी कि ‘ऐ कम्बख़्त, डोर का सिरा अपने हाथ में मज़बूती से बाँध और यहाँ से निकल।’

    मैं ने सुनकर दिल में ख़याल किया कि आख़िर भाई लहू के जोश से मुझ पर मेहरबान होकर ख़ुद की निकालने आए। ख़ुशी से उस रस्सी को कमर में ख़ूब कसा। किसी ने मुझे ऊपर खींचा। रात ऐसी अंधेरी थी कि जिसने मुझे निकाला, उसको मैं ने पहचाना कि कौन है? जब मैं बाहर आया तब उस ने कहा, ‘जल्द आ, यहाँ खड़े होने की जगह नहीं।’ मुझ में ताक़त तो थी पर मारे डर के लुढ़कता गिरता-पड़ता पहाड़ से नीचे आया। देखा तो दो घोड़े ज़ीन बँधे हुए खड़े हैं। उस शख़्स ने एक पर मुझे सवार किया और एक पर आप चढ़ लिया और आगे हो गया। जाते-जाते दरिया के किनारे पर जा पहुँचा।

    सुब्ह हो गई, उस शहर से दस-बारह कोस निकल आए। उस जवान को देखा कि ओपची बना हुआ ज़िरह-बक्तर पहने, चार आईना बाँधे, घोड़े पर पाखर डाले, मेरी तरफ़ ग़ुस्से की नज़रों से घूरकर देखा और अपना हाथ दाँतों से काट कर, उसने तलवार मियान से खींची और घोड़े को जस्त करके मुझ पर चलाई। मैंने अपने को घोड़े से नीचे गिरा दिया और घिघियाने लगा कि, ‘मैं बेक़ुसूर हूँ। मुझे क्यों क़त्ल करता है? मुरव्वतदार! इतने ख़तरनाक कुएँ से और ऐसी बुरी क़ैद से तूने मुझे निकाला। अब यह बेमुरव्वती क्या है?’

    उस ने कहा, ‘सच कह, तू कौन है?’ मैं ने जवाब दिया कि, ‘मुसाफ़िर हूँ। नाहक़ की बला में गिरफ़्तार हो गया था। तुम्हारे सदक़े से बारे जीता निकला हूँ।’ और भी बहुत सी बातें ख़ुशामद की कहीं।

    ख़ैर ख़ुदा ने उस के दिल में रहम दिया। तलवार को मियान में डाला और बोला, ‘ख़ैर, ख़ुदा जो चाहे सो करे। जा, तेरी जान बख़्शी की। जल्द सवार हो जा। यहाँ ठहरने का मौक़ा नहीं।’ घोड़े को तेज़ किया और हम चले।

    वह रास्ते में अफ़्सोस करता और पछताता जाता था। ज़ुहर के वक़्त तक हम एक टापू में जा पहुँचे। वहाँ वह घोड़े से उतरा और मुझे भी उतारा। ज़ीन और दूसरा सामान घोड़ों की पीठ से खोला और चरने को छोड़ दिया। अपनी कमर से भी हथियार खोल डाले और बैठ गया। मुझ से बोला, ‘ऐ बदनसीब! अब अपना हाल कह तो मा’लूम हो कि तू कौन है?’ मैं ने अपना नाम-ओ-निशान और जो-जो कुछ बिपता बीती थी, उस से शुरू से आख़िर तक कही।

    उस जवान ने जब मेरा सब हाल सुना तो रोने लगा और मुख़ातिब हुआ कि, ‘ऐ जवान! अब मेरा हाल सुन। मैं ‘ज़ेरबाद’ देश का राजा की कन्या हूँ और वह जवान जो कुएँ में क़ैद है उसका नाम ‘बहरामन्द’ है। वह मेरे पिता के मंत्री का बेटा है। एक दिन महाराज ने आज्ञा दी कि जितने कुँवर और राजा हैं झरोख़े के नीचे मैदान में निकल कर, तीरअन्दाज़ी और चौगानबाज़ी करें तो घुड़चढ़ी और हर-एक का कस्ब-ए-कमाल ज़ाहिर हो। मैं रानी के नज़दीक, जो मेरी माता थीं, अटारी में ओझल बैठी थी। यह दीवान का बेटा सब में सुन्दर था और घोड़े को कावे देकर कस्ब कर रहा था। मुझ को वह भाया और दिल से उस पर रीझी और मुद्दत तलक यह बात गुप्त रखी।

    आख़िर जब बहुत व्याकुल हुई, तब दाई से कहा और ढेर सा इनआ’म दिया। वह उस जवान को किसी किसी ढब से, चोरी-चोरी मेरे धरोहर में ले आई। तब यह भी मुझे चाहने लगा। बहुत दिन इस इश्क़-मिश्क में कटे। एक रोज़ चौक़ीदारों ने उसे आधी रात को हाथियार बांधे और महल में आते देख कर उसे पकड़ा और राजा से जा कर कहा। राजा ने उस क़त्ल कर देने का हुक्म दिया। लेकिन सब दरबारियों ने कह-सुन कर उसकी जान बख़्शी कराई। तब राजा ने कहा कि, ‘इस को ज़िन्दान-ए-सुलैमान में डाल दो।’ दूसरा जवान जो उसके साथ क़ैद है, उस का भाई है। उस रैन को वह भी उस के साथ था। दोनों की उस कुएँ में छोड़ दिया गया। आज तीन बरस हुए कि वे वहीं फँसे हैं। पर किसी ने यह नहीं पूछा कि यह जवान राजा के घर क्यों आया था। भगवान ने मेरी पत रखी। इसके शुक्राने में मैंने अपने ऊपर यह ज़िम्मेदारी ली है कि अन्न जल उन को पहुँचाया करूँ। तब से अठवारे में एक-दिन आती हूँ और आठ दिन की रोज़ी इकट्ठा दे जाती हूँ।

    ‘कल की रात सपने में देखा कि कोई मुझसे कहता है कि, ‘जल्द उठ और घोड़ा-जोड़ा और कमन्द और कुछ नक़्द ख़र्च के वास्ते लकरे, उस कुएँ पर जा ओर बेचारे को वहां से निकाल।’ यह सुन कर मैं चौंक पड़ी। और मगन होकर मर्दाना भेस धारण किया और सन्दूक़चा अशर्फ़ी और जवाहिरात से भर लिया और यह घोड़ा और कपड़ा लेकर वहाँ गई कि कमन्द से उसे खींचू। पर करम में तेरे था कि वैसी क़ैद से इस तरह छुटकारा पावे। नहीं तो मेरे इस कर्तब और काम का जानने वाला कोई नहीं। शायद वह कोई देवता था, जिसने तुझे छुड़ाने के लिये मुझे भिजवाया। ख़ैर, जो मेरे भाग्य में था सो हुआ।’

    यह कथा कह कर पूरी-कचड़ी, और मांस का सालन उस ने अंगौछे से खोला। पहले मिस्री निकाल कर उसे एक कटोरे में घोला और अर्क़-ए-बेद-ए-मुश्क का उस में डालकर मुझे दिया। मैंने उस के हाथ से लेकर पिया। फिर थोड़ा सा नाश्ता किया। एक घड़ी के बाद मुझे लुंगी बंधवाकर दरिया में ले गई। क़ैंची से मेरे सर के बाल कतरे, नाख़ून काटे। नहला-धुलाकर कपड़े पहनाए। नए सिरे से आदमी बनाया। मैं दो रका’त शुक्राने की नमाज़ का’बे की तरफ़ मुँह करके पढ़ने लगा और वह नाज़नीन मेरी इस हरक़त को देखती रही।

    जब नमाज़ से फ़ारिग़ हुआ, वह पूछने लगी, ‘यह तूने क्या काम किया?’ मैंने कहा कि जिस विधाता ने सारे संसार को पैदा किया और तुझ-सी महबूबा से मेरी सेवा करवाई और तेरे दिल को मेहरबान किया और वैसे क़ैदख़ाने और अंधेरे कुएँ से छुड़ाया, उसकी ज़ात में कोई शरीक नहीं। उसकी मैंने इबादत (आराधना) की, बन्दगी बजा लाया और उसी का शुक्र अदा किया।’ यह बात सुन कर कहने लगी, ‘तुम मुसलमान हो?’ मैंने कहा, ‘ख़ुदा का शुक्र है।’ बोली, ‘मेरा दिल तुम्हारी बातों से ख़ुश हुआ, मुझे भी सिखाओ और कलमा पढ़ाओ।’ मैं ने दिल में कहा, ‘ख़ुदा का शुक्र है। यह हमारे मज़हब मैं शरीक हुई।’ ग़रज़ मैंने कलमा (ला इलाहा इल्लल्लाह, मुहम्मादुर रूसलुल्लाह) पढ़ा और उससे पढ़वाया। फिर यहाँ से घोड़ों पर सवार होकर हम दोनों चले। रात को उतरते तो वह धर्म-ईमान का चर्चा करती, सुनती और ख़ुश होती। इसी तरह दो महीने तलक लगातार दिन-रात चलते चले गए।

    आख़िर एक मुल्क में पहुँचे। यह मुल्क ज़ेरबाद और सरअन्दीप की सरहद के बीच था। वहां एक शहर नज़र आया जो आबादी में इस्तंबोल से बड़ा था और वहां की आब-ओ-हवा बहुत अच्छी और मुवाफ़िक थी। वहां का बादशाह इन्साफ़ में ज़ियादा मुंसिफ़ और रिआ’या का ख़याल रखने वाला था। मेरा दिल वहाँ पहुँचकर बहुत ख़ुश हुआ। एक हवेली ख़रीद कर वहां रहने लगा। जब कुछ दिनों में सफ़र की तकलीफ़ दूर हुई तो कुछ ज़रूरी असबाब दुरुस्त करके उस बीवी से इस्लामी तरीक़े से निकाह किया और रहने लगा। तीन साल में वहाँ के बड़ों और छोटों से मिल-जुल कर ए’तबार पैदा किया, साख बनाई और तिजारत का ठाट फैलाया। आख़िर वहां के सब सौदागरों से बाज़ी ले गया।

    एक दिन वज़ीर-ए-आज़म (महामंत्री) की ख़िदमत में सलाम के लिए चला। एक मैदान में लोगों की भीड़ जमा’ देख कर, किसी से पूछा कि ‘यहा क्यों इतनी भीड़ है?’ मा’लूम हुआ कि दो आदमियों को ज़िना और चोरी करते हुये पकड़ा गया और उन्हों ने शायद ख़ून भी किया है। उन को पत्थर मार कर मारने के लिये लाए हैं।

    मुझे यह सुनते ही अपना हाल याद गया कि एख दिन मुझे भी इसी तरह सूली चढ़ाने ले गये थे, ख़ुदा ने बचा लिया। पता नहीं ये कौन होंगे कि ऐसी बला में गिरफ़्तार हुए हैं? भीड़ को चीर कर अन्दर घुसा। देखा कि यही मेरे दोनों भाई हैं, जिन को टुडियां कसे नंगे सर, नंगे पांव लिये जाते हैं। इन की सूरत देखते ही ख़ून ने जोश किया और कलेजा जला। सिपाहियों को एक मुट्ठी अशर्फ़ियां दीं और कहा, ‘एक घड़ी ठहरो’ और वहां से घोड़े को सरपट फेंकर, हाकिम के घर गया। एक दाना याक़ूत का जो बेहद क़ीमती था भेंट किया और अपने भाइयों की सिफ़ारिश की। हाकिम ने कहा, ‘एक शख़्स उन के खिलाफ़ दा’वेदार है और उन के गुनाह साबित हो चुके हैं और बादशाह का हुक्म हो चुका है, मैं लाचार हूँ।’

    बारे, बहुत मिन्नत-ख़ुशामद और रोने धोने से हाकिम ने मुद्दई को बुलवाकर पाँच हज़ार रुपये पर राज़ी किया कि वह ख़ून का दा’वा मुआ'फ़ करे। मैंने रुपये गिन दिये और ‘लादा'वा’ लिखवा कर ऐसी बला से छुटकारा दिलवाया। ‘जहाँपनाह! इन से पूछिये कि सच कहता हूँ या झूठ बकता हूँ।’

    वे दोनों भाई सर नीचे किये शर्मिन्दा खड़े थे। ख़ैर, इन को छुड़वाकर घर में लाया। हम्माम करवा कर लिबास पहनवाया। दीवान-ख़ाने में मकान रहने को दिया। इस बार अपनी बीवी को इनके सामने किया। पर मैं इनकी ख़िदमत में हाज़िर रहता। इन के साथ खाना खाता। सिर्फ़ सोने के वक़्त घर में जाता। तीन बरस इनकी ख़ातिरदारी में गुज़रे और मैं सवार हो कर कहीं जाता तो ये घर में रहते।

    इत्तिफ़ाक़ से एक दिन वह नेक बख़्त बीवी हम्माम को गई थी। जब दीवान-ख़ाने में आई और कोई मर्द नज़र पड़ा तो उस ने बुर्क़ा उतारा। शायद यह मँझला भाई लेटा हुआ जागता था। देखते ही आ’शिक़ हुआ। बड़े भाई से कहा। दोनों ने मेरे मार डालने की आपस में सलाह की। मैं इस हरकत की बिल्कुल ख़बर रखता था, बल्कि दिल में कहता था कि ख़ुदा का शुक्र है इस मर्तबा इन्होंने कोई ऐसी बात नहीं की। अब ये ठीक रास्ते पर गए। शायद इन को कुछ ग़ैरत गई।

    एक दिन खाने के बाद भाई साहब आँख में आँसू भर लाये और अपने वतन की तारीफ़ और ईरान की अच्छाइयाँ बयान करने लगे। यह सुन कर दूसरे भी बिसूरने लगे। मैंने कहा, ‘अगर वतन चलने का इरादा है, तो मैं आप की मर्ज़ी का ताबेदार हूँ, मेरी भी यही ख़्वाहिश है। अब इंशाअल्लाह मैं भी आप के साथ चलता हूँ।’ उस बीवी से दोनों भाइयों की उदासी का ज़िक्र किया ओर अपना इरादा भी बताया। वह अक़्लमन्द बोली कि, ‘तुम जानो, लेकिन फिर कुछ दग़ा किया चाहते हैं। ये तुम्हारी जान के दुश्मन हैं। तुम ने आस्तीन के साँप पाले हैं और तुम उनकी दोस्ती का भरोसा रखते हो! जो जी चाहे सो करो। लेकिन इन दुष्टों से सावधान रहो।’

    पर जो तक़दीर में था वह हुआ। थोड़े अर्से में सफ़र की तैयारी कर के मैदान में ख़ेमा खड़ा करवा दिया। बड़ा क़ाफ़िला जमा’ हुआ और मेरी सरदारी में क़ाफ़िला ले चलने पर सब राज़ी हुए। अच्छी घड़ी देख कर क़ाफ़िला रवाना हुआ। लेकिन इन की तरफ़ से मैं हुशियार रहता और हर तरह से इन का कहना मानता और इन को ख़ुश रखने की कोशिश करता।

    एक रोज़, एक मंज़िल में, मँझले भाई ने ज़िक्र किया कि ‘यहाँ से तीन मील की दूरी पर एक चश्मा जारी है, जो स्वर्ग के सोते ‘सलसबील’ के मानिन्द मीठा, नर्म और ख़ुश ज़ायका है और मैदान में कोसों तलक ख़ुदरव, लाला, नाफ़र्मान, नर्गिस और गुलाब के फूल फूले हुए हैं। वाक़ई, सैर के लिए बड़ी ख़ूबसूरत जगह है। अगर अपना ईख़्तियार होता तो कल वहाँ जा कर तफ़रीह करते और थकन दूर होती।’

    मै ने कहा, ‘आप को इख़्तियार है, कहो तो कल ठहर जायँ और वहाँ चल कर सैर करें।’ ये लोग बोले, ‘इस से अच्छी बात क्या हो सकती है?’ मैंने हुक्म दिया कि सारे क़ाफ़िले में पुकार दो कि कल पड़ाव है और बावर्ची से कहा कि ‘क़िस्म-क़िस्म के खाने तैयार करो, कल सैर को चलेंगे।’

    जब सुब्ह हुई, इन दोनों भाइयों ने कपड़े पहन कर, कमर बाँधकर मुझे याद दिलाया कि, ‘जल्द ठंढे-ठंढे चलिये और सैर कीजिए।’ मैं ने सवारी माँगी। इन्होंने कहा, ‘पैदल सैर में जो मज़ा है वह सवारी में कहाँ? नौकरों से कह दो, दो घोड़े दौड़ाकर ले आवें।’

    दोनों ग़ुलामों ने क़लियान और क़हवादान ले लिया और साथ हो लिये। हम लोग राह में तीर चलाते हुए चले जाते थे। अब क़ाफ़िले से दूर निकल गए, एक ग़ुलाम को उन्होंने किसी काम से भेजा। थोड़ी दूर आगे बढ़ कर दूसरे को भी उसे बुलाने के लिए रुख़्सत किया। मेरी कमबख़्ती जो आई तो ऐसा लगता था कि मेरे मुँह पर किसी ने मुहर लगा दी। जो वे चाहते थे सो करते थे और मुझे बातों में उलझाए लिये जाते थे। पर यह कुत्ता मेरे साथ रह गया।

    हम बहुत दूर निकल गये। चश्मा नज़र आया, गुलज़ार, बल्कि एक काँटों भरा मैदान था। यहाँ मुझे पेशाब लगा। मैं पेशाब करने बैठा तो अपने पीछे तलवार की सी चमक देखी। मुड़कर देखा तो मंझले भाई साहब ने मुझ पर ऐसी तलवार मारी कि सर दो टुकड़े हो गया। जब तलक कुछ बोलूँ कि, ‘ऐ ज़ालिम मुझे क्यों मारता है?’ बड़े भाई ने कन्धे पर तलवार मारी, दोनों ज़ख़्म कारी लगे। तेवराकर मैं गिर पड़ा। तब इन दोनों बेरहमों ने अपने इतमीनान के लिए मुझे चूर ज़ख़्मी किया और लहूलुहान कर दिया। यह कुत्ता मेरा हाल देख कर उन पर झपटा। उस को भी इन्होंने घायल किया। उसके बाद अपने हाथों से अपने बदनों पर ज़ख़्मों के निशान किये और नंगे सर नंगे पांव क़ाफ़िले में गए और ज़ाहिर किया कि, ‘हरामियों ने मैदान में हमारे भाई को शहीद किया और हम भी लड़-भिड़कर ज़ख़्मी हुए। जल्दी रवाना हो जाओ, नहीं तो अब क़ाफ़िले पर टूट कर सब को नंगा कर देंगे।’ क़ाफ़िले के लोगों के जब बद्दुओं का नाम सुना तो सुनते ही बदहवास हुए और घबरा कर कूच किया और चल निकले।

    मेरी बीवी ने इनका सुलूक और इनके कर्तूत के बारे में सुन रखा था। वह जानती थी कि क्या-क्या फ़रेब और दग़ा इन्होंने मेरे साथ किया था। इन झूठों के मुँह से इस वारदात का हाल सुनकर जल्दी से ख़ंजर से उसने अपने को ख़त्म कर दिया और अपने प्राण त्याग दिये।

    दर्वेशो! उस ख़्वाजा सगपरस्त ने जब अपनी हालत और मुसीबत इस तरह से यहाँ तलक कही, तो सुनते ही मुझे बेइख़्तियार रोना आया।

    वह सौदागर कहने लगा कि, ‘क़िबला-ए-आ’लम! अगर बेअदबी होती तो मैं कपड़े उतारकर अपना सारा बदन दिखाता।’ इस पर भी अपने बयान की सच्चाई ज़ाहिर करने के लिए गरीबान मोंढे तलक चीरकर दिखलाया। वाक़ई उस का तन चार अंगुल बग़ैर ज़ख़्म के साबित था। फिर मेरे सामने उसने पगड़ी सर से उतारी। खोपड़ी में ऐसा बड़ा गढ़ा पड़ा था कि एक समूचा अनार उसमें समा जाये। उस वक़्त दरबार में जितने अमीर हाज़िर थे, सबने अपनी आँखें बन्द कर लीं, देखने की ताक़त रही।

    फिर सौदागर बोला कि, ‘बादशाह सलामत! जब ये भाई अपनी समझ में मेरा काम तमाम करक चले गए, एक तरफ़ मैं और एक तरफ़ मेरे नज़दीक यह कुत्ता ज़ख़्मी पड़ा था। लहू बदन से इतना निकल गया था कि ज़रा होश था और ताक़त भी बिलकुल रह गई थी। ख़ुदा जाने, दम कहां अटका रहा कि जी रहा था। जिस जगह मैं पड़ा था वह मुल्क ‘सरअन्दीप’ की सरहद थी और एक बहुत आबाद शहर उसके क़रीब था। उस शहर में एख बहुत बड़ा मन्दिर था और वहां के बादशाह की एक बेटी थी, बहुत ख़ूबसूरत और रूपवती।’

    कई बादशाह और शाहज़ादे उसके इश्क़ में ख़राब थे। वहाँ पर्दे की रस्म बिल्कुल थी, इसलिए वह लड़की सारे दिन अपनी हमजोलियाँ के साथ सैर-शिकार करती फिरती।

    जहां हम पड़े थे वहां से नज़दीक एक बादशाही बाग़ था। उस रोज़ वह बादशाह से इजाज़त लेकर उस बाग़ में आई थी। सैर की ख़ातिर उस मैदान में घूमती फिरती निकली। कई ख़ासें भी साथ सवार मुझे इस हालत में देख कर वे भागीं और राजकुमारी से कहा कि ‘एक मर्दुवा और एक कुत्ता लहू में शराबोर पड़े हैं।’ उन से यह बात सुन कर मल्का ख़ुद मेरे सर के पास आई और अफ़्सोस कर के कहा, ‘देखो तो कुछ जान बाक़ी है?’ दो-चार दाइयों झुक कर देखा और अ’र्ज किया कि, ‘अब तलक तो जाती है।’ तुरन्त हुक्म दिया कि, ‘ग़लीचे पर लिटाकर बाग़ में ले चलो।’

    वहां ले जा कर सरकारी जर्राह को बुलाकर मेरे और मेरे कुत्ते के इलाज की ख़ातिर बहुत ताकीद की ओर बहुत इनआ’म और बख़्शिश का वायदा किया। उस हज्जाम ने मेरा सारा बदन पोंछ-पांछकर, ख़ाक-ख़ून से पाक किया और शराब से धो-धोकर ज़ख़्मी को टांके, मरहम लगाया और बेद-ए-मुश्क का अर्क़ पानी के बदले मेरे हलक़ में चुवाया। मल्का ख़ुद मेरे सिरहाने बैठी रहती और मेरी ख़िदमत करवाती और रात-दिन में दो-चार बार कुछ शोरबा या शर्बत अपने हाथ से पिलाती।

    बारे मुझे होश आया तो देखा कि मल्का बहुत अफ़्सोस से कहती है, ‘किस ज़ालिम ख़ूंख्वार ने तुझ पर यह ज़ुल्म किया। बड़े बुत से भी नहीं डरा।’ दस दिन के बाद, अर्क़, शर्बत और मा’जूनों की ताक़त से मैं ने आंख खोली। देखा तो इन्दर का अखाड़ा मेरे आस-पास जमा’ है। राजकुमारी सिरहाने खड़ी है। मैंने एक आह भरी और चाहा कि कुछ हरकत करूँ, पर ताक़त पाई। राजकुमारी मेहरबानी से बोली कि, ‘ऐ अजमी! कुढ़ मत, ख़ातिरज़मा’ रख। अगरचे किसी ज़ालिम ने तेरा यह हाल किया लेकिन बड़े बुत ने मुझ को तुझ पर मेहरबान किया है, अब तू चंगा हो जायेगा।’

    क़सम उस ख़ुदा की जो एक है और जिस की ज़ात में कोई शरीक नहीं, मैं उसे देख कर फिर बेहोश गया। मल्का भी इस बात को समझ गईं और गुलाब पाश से गुलाब अपने हाथ से छिड़का। बीस दिन के अर्से में ज़ख़्म भर आये और अंगूर कर लाए। राजकुमारी हमेशा रात को जब सब सो जाते तो मेरे पास आती और खिला-पिला जाती। ग़रज़ चालीस दिन में मैं ने सेहत का ग़ुस्ल किया। राजकुमारी बहुत ख़ुश हुई। हज्जाम को बहुत सा इनआ’म दिया और मुझ को नई पोशाक पहनवाई। ख़ुदा की मेहरबानी से और राजकुमारी की ख़बरगीरी और कोशिश से मैं बहुत चौकस, तन्दुरुस्त और हट्टा-कट्ठा हो गया। बदन बहुत तैतोर निकला और कुत्ता भी मोटा हो गया। अब रोज़ मुझे शराब पिलाती और बातें सुनाती और ख़ुश होती। मैं भी एकआध नक़्ल या अनूठी कहानी कहकर उसके दिल को बहलाता।

    एक दिन पूछने लगी कि, ‘अपना हाल तो बयान करो कि तुम कौन हो और वारदात तुम पर क्यों हुई?’ मैंने अपना सारा हाल शुरू से आख़िर तक कह सुनाया। सुनकर वह रोने लगी और बोली कि ‘अब मैं तुझसे ऐसा सुलूक करूँगी कि अपनी सारी मुसीबत भूल जाएगा।’ मैं ने कहा, ‘ख़ुदा तुझे सलामत रखे। तुम ने नए सिरे से मेरी जां- बख़्शी की है। अब मैं तुम्हारा हो चुका हूँ। ख़ुदा के वास्ते इसी तरह हमेशा मुझ पर अपनी मेहरबानी की नज़र रखियो।’ ग़रज़ सारी रात अकेली मेरे पास बैठी रहती। बाज़े दिन उसकी दाई भी साथ रहती और हर तरह का ज़िक्र, चर्चा सुनती और कहती। जब राजकुमारी उठ जाती ओर मैं अकेला होता तो पाक होकर किसी कोने में छुप कर नमाज़ पढ़ लेता।

    एक बार ऐसा इत्तिफ़ाक़ हुआ कि राजुकमारी अपने बाप के पास गई थी। मैं ख़ातिरजमा’ हो कर वज़ू कर के नमाज़ पढ़ रहा था कि अचानक राजकुमारी दाई से बोलती हुई आई कि, ‘देखें अजमी इस वक़्त क्या करता है, सोता है, या जागता है!’ मुझे जो अपनी जगह पर देखा, उसे बड़ा तअ’ज्जुब हुआ कि, ‘ऐं! यह कहां गया है? किसी से कोई लग्गा तो नहीं लगाया।’ कोना-खुतरा देखने लगी और तलाश करने लगी। आख़िर जहां मैं नमाज़ पढ़ रहा था वहाँ निकली। उस लड़की ने कभी नमाज़ काहे को देखी थी। चुपकी खड़ी देखा की। जब मैं ने नमाज़ करके दुआ’’ के लिये हाथ उठाया और सिज्दे में गया तो वह बेइख़्तियार खिलखिलाकर हँसी और बोली, ‘क्या यह आदमी पागल हो गया? यह कैसी कैसी हरकतें कर रहा है?’

    मैं हँसने की आवाज़ सुन कर दिल में डरा। राजकुमारी आगे कर पूछने लगी कि, ‘ऐ अजमी! यह तू क्या करता था?’ मैं कुछ जवाब दे सका। इतने में दाई बोली, ‘मैं तेरी बलाएँ लूँ। तेरे सदक़े गई। मुझे यूँ मा’लूम होता है कि यह शख़्स मुसलमान है और लात-मनात का दुश्मन है। अनदेखे ख़ुदा को पूजता है।’ राजकुमारी ने यह सुनते ही हाथ पर हाथ मारा। बहुत ग़ुस्सा हुई। कहने लगी, ‘मैं क्या जानती थी कि यह तुर्क है और हमारे देवताओं से इन्कार करने वाला है, तभी तो हमारे बुत के ग़ुस्से में पड़ा था। मैंने नाहक़ इसकी परवरिश की और इसे अपने घर में रखा।’ यह कहती हुई वह चली गई। मैं यह सुनते ही बदहवास हुआ कि देखिये अब क्या सुलूक करे ? मारे डर के नींद उचाट हो गई। सुब्ह तक बेइख़्तियार रोया किया और आंसुओं से मुँह धोया किया।

    तीन दिन-रात इसी डर-खटके में रोते गुज़रे। हरगिज़ आंख झपकी। तीसरी रात को राजकुमारी शराब के नशे में मस्त और दाई को साथ लिये मेरे मकान पर आई। ग़ुस्से में भरी हुई और तीर-कमान हाथ में लिये बाहर चमन के किनारे बैठी। दाई से शराब का प्याला मांगा। पीकर कहा, ‘दैया! वह अजमी जो हमारे बड़े बुत के ग़ुस्से में गिरफ़्तार है, मरा या अब तक जीता है?’ दाई ने कहा कि, ‘बलैया लूँ, कुछ दम बाक़ी है।’

    बोली कि, ‘अब वह हमारी नज़रों से गिर गया है। लेकिन कह दे कि बाहर आवे।’ दाई ने मुझे पुकारा। मैं दौड़ा तो देखा कि राजकुमारी का चेहरा ग़ुस्से के मारे तमतमा रहा है और सुर्ख़ हो गया है। जान तन में रही। सलाम किया, हाथ बांध कर खड़ा हुआ। ग़ुस्से की निगाह से मुझे देख कर दाई से बोली कि, ‘अगर मैं इस धर्म के दुश्मन को तीर से मार दूँ तो मेरा क़ुसूर बड़ा बुत मुआ'फ़ करेगा या नहीं? यह मुझ से बड़ा गुनाह हुआ है कि मैं ने इसे अपने घर में रख कर ख़ातिरदारी की।’

    दाई ने कहा, ‘राजकुमारी की इस में क्या ग़लती है? तुम ने उसे दुश्मन जानकर तो नहीं रखा। तुम ने उस पर तरस खाया। तुम को नेकी के बदले नेकी मिलेगी। यह अपने बुरे का फल बड़े बुत से पाएगा।’ यह सुनकर कहा, ‘दाई! इस से बैठने को कहो।’ दाई ने मुझे इशारा किया कि, ‘बैठ जा।’ मैं बैठ गया। मल्का ने एक और शराब का जाम पिया और दाई से कहा कि ‘इस कमबख़्त को भी एक प्याला दे तो आसानी से मारा जाय।’ दाई ने मुझे जाम दिया। मैंने बे-उज्र पिया और सलाम किया। पर उसने हरगिज़ मेरी तरफ़ निगाह की। मगर कनखियों से चोरी-चोरी देखती थी। जब मुझे आनन्द आया मैं शेर पढ़ने लगा। उन सब अशआ'र में एक शे'र यह भी था-

    क़ाबू में हूँ मैं तेरे गो अब जिया तो फिर क्या?

    ख़ंजर तले किसू ने टुक दम लिया तो फिर क्या?

    सुन कर मुस्कराई और दाई की तरफ देखकर बोली, ‘क्या तुझे नींद आती है?’ दाई ने मर्ज़ी पाकर कहा, ‘हाँ, मुझपर तो नींद ने काबू पा लिया।’ वह तो रुख़्सत होकर वहाँ से चली गई।

    कुछ देर बाद राजकुमारी ने प्याला मुझ से माँगा। मैं जल्दी से भर कर उस के सामने ले गया। एक अदा से मेरे हाथ से लेकर पी लिया। तब मैं क़दमों पर गिरा। राजकुमारी ने हाथ मुझ पर झाड़ा और कहने लगी, ‘ऐ जाहिल! हमारे बड़े बुत में क्या बुराई देखी जो अनदेखे ख़ुदा की पूजा करने लगा?’

    मैं ने कहा, ‘इंसाफ़ शर्त है। ज़रा ग़ौर फ़रमाइये कि बन्दगी के लायक़ वह ख़ुदा है जिस ने एक क़तरे पानी से तुम-सा महबूब पैदा किया और यह रूप और यह सुन्दरता दी कि एक क्षण में हज़ारो इंसानों के दिल को दीवाना कर डालो। बुत क्या चीज़ है कि कोई उसकी पूजा करे? एक पत्थर से संगतराशों ने गढ़कर एक सूरत बनाई और बेवक़ूफ़ों के वास्ते जाल फैलाया। वे बनाई हुई चीज़ को बनाने वाला समझते है। जिसे अपने हाथों से बनाते हैं, उस के आगे सर झुकाते हैं। हम मुसलमान हैं, जिसने हमें बनाया है, हम उसे मानते हैं। उसने उनके वास्ते दोज़ख़, हमारे वास्ते बहिश्त बनाया है। अगर राजकुमारी ख़ुदा पर ईमान लावे तो मज़ा उस का पावे और सत्य और असत्य में फ़र्क करे, अपने विश्वास को ग़लत समझे।’

    बारे ऐसी-ऐसी नसीहतें सुन कर उस पत्थर-दिल का दिल मुलायम हुआ और ख़ुदा की मेहरबानी से रोने लगी और बोली, ‘अच्छा मुझे भी अपना दीन सिखाओ।’ मैं ने कलमा पढ़ाया समझाया। उस ने सच्चे दिल से पढ़ा और तौबा इस्तिग़फ़ार कर के मुसलमान हुई। तब मैं उस के पाँव पड़ा। फिर कहने लगा, ‘भला मैंन तो तुम्हारा दीन क़ुबूल किया, लेकिन माँ-बाप काफ़िर हैं, उन का क्या इलाज है?’ मैं ने कहा, ‘तुम्हारी बला से। जो जैसा करेगा, वैसा पावेगा।’ बोली कि, ‘चचा के बेटे से मेरी बात पक्की की है। और वह बुत-परस्त है। कल ख़ुदा करे ब्याह हो, वह मुझ से मिले और उस से पेट हो जाय तो बड़ी क़बाहत है। इस की फ़िक्र अभी से किया चाहिये कि इस बला से छुटकारा पाऊ।’ मैं ने कहा, ‘तुम बात तो मा’क़ूल कहती हो। जो मिज़ाज में आवे, सो करो।’ बोली कि, ‘मैं अब यहाँ रहूँगी, कहीं निकल जाऊँगी।’ जवाब दिया कि, ‘पहले तुम मेरे पास से जाओ और मुसलमानों के साथ सराय में जाकर रहो। सब आदमी सुनें और तुम पर गुमान ले आने पावे! तुम वहाँ किश्तियों की तलाश में रहो और जो जहाज़ अ’जम की तरफ़ चले, मुझे ख़बर कीजियो। मैं इस वास्ते दाई को तुम्हारे पास अक्सर भेजा करूँगी। जब तुम कहला भेजोगे, मैं निकल कर आऊँगी और किश्ती पर सवार होकर चली जाऊंगी और इन कमबख्तों के हाथ से छुटकारा पाऊंगी।’ मैं ने कहा, ‘मैं तुम्हारे जान-ईमान पर क़ुर्बान हुआ। दाई का क्या करोगी?’ बोली, ‘इसकी तरकीब आसान है। एक प्याले में क़ातिल ज़हर पिला दूँगी।’ यही सलाह तय हुई।जब दिन हुआ मैं सराय में गया। एक कोठरी किराये पर ली और वहाँ रहने लगा। इस वियोग में केवल मिलन की आशा पर जीता था। जब दो महीने में, रूम, शाम, असफ़हान के सौदागर जमा' हुये, उन्होंने तरी की राह से कूच का इरादा किया और अपना-अपना असबाब जहाज़ पर चढ़ाने लगे। एक जगह रहने से उन में से कई-एक से जान-पहचान और दोस्ती हो गई थी। मुझ से कहने लगे, ‘क्यों साहब, तुम भी चलो ? यहाँ अजनबी देश में कब तक रहोगे?’

    मैं ने जवाब दिया, ‘मेरे पास क्या है जो अपने वतन को जाऊँ? यही एक लौंडी, एक कुत्ता, एक सन्दूक़ की बिसात रखता हूँ। अगर थोड़ी-सी जगह बैठ रहने को दो और उस का महसूल मुक़र्रर करो, तो मेरी ख़ातिरजमा' हो, मैं भी सवार हो जाऊँ।’

    सौदागरों ने एक कोठरी मेरे सिपुर्द की। मैं ने उसके महसूल का रुपया भरा और इत्मीनान कर के दाई के घर गया और कहा कि ‘ऐ माँ! तुझ से रुख़्सत होने आया हूँ। अब वतन को जाता हूँ। अगर तेरी तवज्जोह से एक नज़र राजकुमारी को देख लूँ तो बड़ी बात है।’

    बारे, दाई ने क़ुबूल किया। मैं ने कहा कि ‘मैं रात को आऊँगा, फ़लाने मकान पर खड़ा रहूँगा।’ बोला, ‘अच्छा!’ मैं यह कह कर सराय में आया, सन्दूक़ और बिछौने उठाकर जहाज़ में लाया और नाख़ुदा को सौंप कर कहा कि, ‘कल सबेरे अपनी लौंडी को लेकर आऊँगा।’ नाख़ुदा बोला, ‘जल्द उठ आइयो, सुब्ह को हम लंगर उठाएंगे।’ मैंने कहा, ‘बहुत अच्छा।’

    जब रात हुई, उसी मकान पर जहाँ दाई से वा'दा किया था जा कर खड़ा रहा। फिर रात गए महल का दरवाज़ा खुला और राजकुमारी मैले कुचैले कपड़े पहने, एक पेटी जवाहिरता की लिये बाहर निकली। वह पिटारी मेरे हवाले की और साथ चली। सुब्ह होते-होते हम दरिया के किनारे पहुँचे। एक छोटी कश्ती पर सवार होकर जहाज़ में जा उतरे। यह वफ़ादार कुत्ता भी साथ था। जब सुब्ह ख़ूब रौशन हुई जहाज़ ने लंगर उठाया। रवाना हुये और इत्मीनान से चले जाते थे कि एक बंदरगाह से कई तोपों के एक साथ छूटने की आवाज़ आई। सब हैरान और परेशान हुये। जहाज़ का लंगर गिरा दिया गया और आपस में चर्चा होने लगी कि बंदरगाह का राजा कुछ दग़ा करेगा, तोप छोड़ने का सबब क्या है?

    इत्तिफ़ाक़ से सब सौदागरों के पास ख़ूबसूरत लौंडियां थीं। इस डर से कि कहीं बंदरगाह का राजा उन्हें छीन ले, सबने लौंडियों को सन्दूक़ में बिठाकर ताला लगा दिया। इसी अर्से में बंदरगाह का राजा एक कश्ती में अपने नौकर-चाकर के साथ बैठा हुआ नज़र आया। आते-आते जहाज़ पर चढ़ा। शायद उस के आने का सबब यह था कि जब बादशाह को दाई के मरने और राजकुमारी के ग़ायब होने की ख़बर मा'लूम हुई, मारे लाज के इस का नाम तो लिया, पर बंदरगाह के राजा को हुक्म दिया कि, ‘मैंने सुना है कि अजमी सौदागरों के पास बड़ी ख़ूबसूरत लौंडियाँ हैं। उन्हें मैं राजकुमारी के वास्ते लेना चाहता हूँ। तुम उन को रोक कर जितनी लौंडियां जहाज़ में हों, मेरे हुज़ूर में हाज़िर करोगे। उन्हें देख कर जो पसन्द आयेंगी, उनकी क़ीमत दी जाएगी, नहीं तो वापस होंगी।’

    बादशाह के हुक्म के मुताबिक़ बन्दरगाह का राजा इसीलिए ख़ुद जहाज़ पर आया। मेरे नज़दीक एक शख़्स था। उसके पास भी एक ख़ूबसूरत बाँदी सन्दूक़ में बन्द थी। बन्दरगाह का राजा उसी सन्दूक़ पर आकर बैठा और लौंडियों को निकलवाने लगा। मैं ने ख़ुदा का शुक्र किया कि राजकुमारी की कोई चर्चा नहीं। गरज़ जितनी लौंडियाँ पाईं, बन्दरगाह के राजा ने नाव पर चढ़ाई और ख़ुद वह जिस सन्दूक़ पर बैठा था, उस के मालिक से भी हँसते-हँसते पूछा कि, ‘तेरे पास भी तो लौंडी थी!’

    उस बेवकूफ़ ने कहा, ‘आप के क़दमों की क़सम, सिर्फ़ मैं ने ही यह काम नहीं किया। सभों ने लौंडियाँ तुम्हारे डर से सन्दूक़ों में छुपाई हैं। बन्दरगाह के राजा ने यह बात सुन कर सब सन्दूक़ों का झाड़ा लेना शुरू कर दिया। मेरा भी सन्दूक़ खोला और राजकुमारी को निकाल कर सब के साथ ले गया। अ’जब तरह की मायूसी हुई कि यह ऐसी हरक़त हुई कि मेरी जान तो मुफ़्त गई और राजकुमारी से देखिए क्या सुलूक करे।

    उस की फ़िक्र में अपनी जान का डर भी भूल गया। सारे दिन-रात ख़ुदा से दुआ’ मांगता रहा। जब सवेरा हुआ, सब लौंडियों को कश्ती पर सवार कर के लाये। सौदागर ख़ुश हुये। अपनी-अपनी बाँदियाँ सब ने लीं। सब आईं, मगर राजुकमारी उन में थी। मैं ने पूछा कि, ‘मेरी लौंडी नहीं आई, इस का क्या सबब है?’ उन्होंन जवाब दिया, ‘हम कुछ नहीं जानते, शायद बादशाह ने पसन्द की होगी।’ सब सौदागर मुझे तसल्ली और दिलासा देने लगे कि, ‘ख़ैर जो हुआ सो हुआ, तू कुढ़ मत। उसकी क़ीमत हम सब मिल कर तुझे देंगे।’

    मेरे होश उड़ गये। मैं ने कहा कि, ‘अब मैं अ’जम नहीं जाने का।’ कश्ती वालों से कहा, ‘यारो मुझे भी अपने साथ किनारे ले चलो। किनारे पर उतार दीजो।’ वे राज़ी हुये। मैं जहाज़ से उतर कर कश्ती में बैठा। यह कुत्ता भी मेरे साथ चला आया।

    जब मैं बंदरगाह में पहुँचा तो एक सन्दूक़चा जवाहिरात का, जो राजकुमारी अपने साथ लाई थी, उसे तो रख लिया और बाक़ी सब असबाब बन्दरगाह के राजा के नौकरों को दे दिया। मैं हर जगह राजकुमारी के लिए फिरने लगा कि शायद कहीं राजकुमारी की ख़बर पाऊँ। लेकिन हरगिज़ कुछ निशान मिला और इस बात का पता पाया। एक रात को किसी बहाने से बादशाह के महल में भी गया और ढूँढ़ा लेकिन कुछ ख़बर मिली। एक महीने के क़रीब शहर के कूचे और मुहल्ले छान मारे और उसके ग़म से अपने को मौत के क़रीब पहुँचाया और पागलों सा फिरने लगा। आख़िर अपने दिल में ख़याल किया कि मुमकिन है कि बन्दरगाह के राजा के घर में मेरी राजकुमारी हो तो हो, नहीं तो और कहीं नहीं। राजा की हवेली के चारों तरफ़ देखता फिरता था कि कहीं से जाने की राह पाऊं तो अन्दर जाऊ।

    एक नाली पर नज़र पड़ी जिस में से आदमी आ-जा सकता है। पर देखा कि एक लोहे की जाली उस के मुँह पर जड़ी है। यह इरादा किया कि इसी नाली की राह से चलूँ। कपड़े बदन से उतारे और उस नजिस कीचड़ में उतरा। हज़ार मेहनत से उस जाली को तोड़ा और संडास की राह से उस चोर महल में गया। औ’रतों का सा लिबास बनाकर हर तरफ़ देखने भालने लगा। एक मकान से एक आवाज़ मेरे कान में पड़ी जैसे कोई मुनाजात (भजन) कर रहा है। आगे जा कर देखा तो राजकुमारी है कि अ'जब हालत से रोती है और नकघिसनी कर रही है और ख़ुदा से दुआ’ माँगती है कि, ‘अपने रसूल और उसकी पाक औलाद के सदक़े! मुझे यहाँ से मुक्त कर और जिस शख़्स ने मुझे सच्ची राह बतलाई है, उस से एक बार ख़ैरियत से मिला।’ मैं देखता ही दौड़ कर उस के पाँव पर गिर पड़ा। राजकुमारी ने मुझे गले लगा लिया। हम दोनों पर एकदम बेहोशी का आ’लम हो गया। जब हवास दुरुस्त हुए, मैंने राजकुमारी से सारा हाल पूछा। बोली, ‘जब बन्दरगाह का राजा सब लौंडियों को किनारे पर ले गया, मैं ख़ुदा से यही दुआ’’ मांगती थी कि कहीं मेरा भेद खुले, मैं पहचानी जाऊँ और तेरी जान पर आफ़त आवे। सच, ख़ुदा ने मेरी दुआ’’ सुन ली। हर्गिज़ किसी को यह मा’लूम हुआ कि यह राजकुमारी है। बन्दरगाह का राजा हर-एक बांदी को ख़रीदारी की नज़र से देखता था। जब मेरी बारी आई, मुझे पसन्द करके चुपके से अपने घर में भेज दिया और उस ने दूसरी बांदियों को बादशाह के सामने पेश किया।

    मेरे बाप ने जब मुझे उन में देखा, सब बांदियों को रुख़्सत किया क्योंकि यह सारा पेच मेरे वास्ते किया था। अब उस ने यूँ मशहूर किया कि राजकुमारी बहुत बीमार है। अगर मैं ज़ाहिर हुई तो मेरे मरने की ख़बर सारे मुल्क में उड़ेगी। इस तरह बादशाह की बदनामी होगी। लेकिन अब मैं इस मुसीबत में हूँ कि बन्दरगाह का राजा कुछ और इरादा मुझसे अपने दिल में रखता है और हमेशा साथ सोने को बुलाता है, मैं राज़ी नहीं होती। वह चाहता हद से ज़ियादा है लेकिन अब तक उसे रज़ामन्दी नहीं मिली है इसलिए चुप हो रहता है। पर मैं हैरान हूँ कि इस तरह कहाँ तक निभेगी। सो मैं ने भी अपने जी में ठान लिया है कि जब मुझ से कुछ और इरादा करेगा तो मैं अपनी जान दूँगी और मर रहूँगी। लेकिन तेरे मिलने से एक तदबीर और दिल में सूझी। ख़ुदा चाहे तो सिवाय इस के कोई दूसरी राह यहाँ से छूटने की नज़र नहीं आती।’

    मैं ने कहा, ‘कहो तो। वह कौन सी तदबीर है?’ कहने लगी, ‘अगर तू मेहनत और कोशिश करे तो यह काम पूरा हो सके।’

    मैं ने कहा, ‘मैं ता’बेदार हूँ, अगर हुक्म दो तो जलती आग में कूद पडूँ और सीढ़ी पाऊँ तो तुम्हारी ख़ातिर आसमान पर चला जाऊँ। जो कुछ कहो, कर डालूँ।’ राजकुमारी ने कहा कि, ‘तू बड़े बुत के बुतख़ाने में जा। जिस जगह जूतियाँ उतारते हैं वहाँ एक काला टाट पड़ा रहता है। इस मुल्क की रस्म यह है कि जो ग़रीब, मुफ़लिस और मुहताज हो जाता है उस जगह वह टाट ओढ़ कर बैठता है। जब दो-चार दिन में माल जमा’ होता है, पण्डे एक ख़िलअ’त बड़े बुत की सरकार से दे कर उसे रुख़्सत करते हैं और वह अमीर हो कर चला जाता है। कोई यह नहीं पूछता कि यह कौन था? तू भी जा कर उसी जगह बैठ और हाथ मुँह अपना अच्छी तरह छुपा ले और किसी से बोल। तीन दिन के बाद जब पुजारी तुझे जोड़ा-कपड़ा देकर रुख़्सत करे तू वहाँ से हरगिज़ मत उठ। जब बहुत मिन्नत-ख़ुशामद करे तब तू बोलियो कि मुझे रुपया-पैसा कुछ चाहिये। मैं माल का भूखा नहीं, मैं मज़लूम हूँ फ़रियाद को आया हूँ। अगर पुजारी की माता मेरा इन्साफ़ करे तो बेहतर है, नहीं तो बड़ा बुत मेरा इन्साफ़ करेगा और उस ज़ालिम के ख़िलाफ़ यही बड़ा बुत मेरे इन्साफ़ को पहुँचेगा।’ जब तक वह पुजारियों की माता आपा तेरे पास आवे, बहुतेरा कोई मनअ’वे तू राज़ी होजियो। आख़िर लाचार हो कर यह ख़ुद तेरे पास आयेगी। वह बहुत बूढ़ी है, दो सौ चालीस साल उसकी उम्र है और छत्तीस बेटे उसके जने हुए मन्दिर के सरदार हैं और उस का बड़े बुत के पास बड़ा दर्जा है। इसीलिए उस का हुक्म सब के ऊपर चलता है। जितने छोटे-बड़े इस मुल्क के हैं उस के कहने को अपनी इज़्ज़त जानते हैं और जो वह कहती है, उसे सर-आँखों पर मानते हैं। उस का दामन पकड़ कर कहियो ‘ऐ माई! अगर तू मुझ मज़लूम मुसाफ़िर का इन्साफ़ ज़ालिम से करेगी तो मैं बड़े बुत के सामने टक्करें मारूँगा। आख़िर वह रहम खा कर तुझसे मेरी सिफ़ारिश करेगा।’

    ‘उस के बाद वह पजारी की माता जब तेरा हाल पूछे तो कहियो कि ‘मैं अ’जम का रहने वाला हूँ, बड़े बुत के दर्शन की ख़ातिर और तुम्हारी अ’दालत की शोहरत काले कोसों से यहाँ आया हूँ। कई दिनों आराम से रहा। मेरी बीवी भी मेरे साथ आई थी। वह जवान है और सूरत-शक्ल भी अच्छी है। आँख-नाक से भी दुरुस्त है। मा’लूम नहीं बन्दरगाह के राजा ने उसे क्योंकर देखा, ज़बरदस्ती मुझ से छीनकर अपने घर में डाल दिया। हम मुसलमानों का यह क़ायदा है कि अगर कोई ग़ैर उनकी औ’रत को देखे या छीन ले तो वाजिब है कि उस को जिस तरह हो मार डाले और अपनी जोरू को ले लें और नहीं तो खाना-पीना छोड़ दें, क्योंकि जब तलक वह जीता रहे वह औ’रत अपने शौहर पर हराम है। अब यहाँ लाचार होकर आया हूँ। देखें तुम क्या इंसाफ़ करती हो।’ जब राजकुमारी ने मुझे सब सिखा पढ़ा दिया तो मैं रुख़्सत होकर उसी नाबदान की राह से निकला और वह लोहे की जाली फिर लगा दी।

    सुब्ह होते ही मंदिर में गया और वह काला टाट ओढ़ कर बैठा। तीन दिन में इतना रुपया, अशर्फी और कपड़ा मेरे नज़दीक जमा’ हुआ कि ढेर लग गया। चौथे दिन पण्डे भजन करते और गाते-बजाते खिलअ’त लिये मेरे पास आए और रुख़्सत करने लगे। मैं राज़ी हुआ और दुहाई बड़े बुत कि मैं भीख माँगने नहीं आया बल्कि इंसाफ़ के लिए बड़े बुत और पुजारी की माता के पास आया हूँ। जब तक मेरे साथ इंसाफ़ होगा, यहाँ से जाऊँगा। वे सुन कर बुढ़िया के पास गए और मेरा हाल बयान किया। उस के बाद एक चौबे आया और मुझ से कहने लगा, ‘चलो! माता तुम्हें बुलाती है।’ मैं उसी वक़्त वह काला टाट सर से पाँव तक ओढ़े हुए घर में गया। वहाँ देखा कि एक जड़ाऊ सिंहासन पर जिस में ला’ल, जवाहिरात, मोती और मूँगा लगा हुआ है, उस पर बड़ा बुत बैठा है और एक सोने की कुर्सी पर जिस पर शानदार फ़र्श बिछा है, उस पर शान-शौकत और ठाठ से एक बुढ़िया काले कपड़े पहने हुए मसनद और तकिया लगाए बैठी है और दो लड़के दस-बारह के, एक दाहने और एक बायें बैठे हैं। मुझे आगे बुलाया। मैं अदब से आगे गया और तख़्त के एक पाए को चूमा, फिर उसका दामन पकड़ लिया। उस ने मेरा हाल पूछा। मैंने उसी तरह, जिस तरह राजकुमारी ने सिखाया था, कहा।

    मेरा हाल सुन कर बोली कि, ‘क्या मुसलमान अपनी स्त्रियों को पर्दे में रखते हैं?’ मैं ने कहा, ‘हाँ, तुम्हारे बच्चों की ख़ैर हो, यह हमारी पुरानी रस्म है।’ बोली कि, ‘तेरा मज़हब अच्छा है। मैं अभी हुक्म देती हूँ कि बन्दरगाह का राजा तेरी जोरू समेत कर हाज़िर हो और उस के साथ ऐसी तरकीब करती हूँ कि दोबारा ऐसी हरकत करे। सब के कान खड़े हो गए और डरे। अपने लोगों से पूछने लगी कि बन्दरगाह का राजा कौन है? उस की यह मजाल हुई कि बेगानी स्त्री को ज़बरदस्ती छीन लिया।’

    लोगों ने कहा, ‘फ़लाना शख़्स है।’ यह सुन कर अपने दोनों लड़कों से जो पास बैठे थे बोली कि जल्दी इस को साथ लेकर बादशहा के पास जाओ और कहो कि माता कहती है कि हुक्म बड़े बुत का यह है कि बन्दरगाह का राजा आदमियों पर जोर-ज़यादती करता है, चुनांचे इस ग़रीब की औ’रत को छीन लिया है। उस का यह क़ुसूर बहुत बड़ा साबित हुआ। जल्दी से उस पथ-भ्रष्ट का माल-असबाब, जायदाद ज़ब्त कर के उस तुर्क के हवाले करो, जो हमारा ख़ास आदमी है। नहीं तो आज रात को तेरा सत्यानाश होगा और हमारे ग़ुस्से में पड़ेगा। वे दोनों लड़के उठ कर मण्डल से बाहर आए और सवार हुए, सब पण्डे शंख बजाते और आर्ती गाते जुलूस में हो लिए।

    ग़रज़ वहाँ के छोटे-बड़े जहाँ उन लड़कों का पाँव पड़ता था वहाँ की मिट्टी पवित्र जान कर उठा लेते और आँखों से लगाते। उसी तरह बादशाह के क़िले तक गए! बादशाह को ख़बर हुइ तो वह नंगे पाँव स्वागत की ख़ातिर निकल आया और उन को बड़े मान मर्यादा से ले जा कर अपने पास तख़्त पर बिठाया और पूछा कि ‘आज क्योंकर कष्ट किया?’ उन दोनों बच्चों ने माँ की तरफ़ से जो-कुछ सुन आए थे कहा, औऱ बड़े बुत के ग़ुस्से से डराया।

    बादशाह ने सुनते ही फ़र्माया, ‘बहुत अच्छा!’ और अपने नौकरों को हुक्म दिया कि, ‘सिपाही जावें और बन्दरगाह के राजा को उस औ’रत के साथ बहुत जल्द मेरी सरकार में हाज़िर करे तो मैं उस के अपराध का पता करके उचित दण्ड दूँ।’ यह सुन कर मैं अपने दिल में घबराया कि यह बात तो अच्छी नहीं हुई। अगर बन्दरगाह के राजा के साथ लावें तो भेद खुलेगा और क्या हाल होगा। दिल में बहुत डर गया और ख़ुदा की तरफ़ ध्यान किया। लेकिन मेरे मुँह पर हवाइयाँ उड़ने लगीं और बदन काँपने लगा। लड़कों ने मेरा यह रंग देख कर अनुमान कर लिया कि यह हुक्म मेरी मर्ज़ी के मुवाफ़िक़ नहीं हुआ। वे उसी वक़्त खफ़ा हो कर उठे और बादशाह से झिड़क कर बोला, ‘ऐ आदमी! तू क्या दीवाना हुआ है जो बड़े बुत की ताबेदारी से बाहर निकला और हमारे बचन को झूठ समझा और अब दोनों को बुलवाकर पूछ-गछ करना चाहता है? अब सावधान! तू बड़े बुत के ग़ुस्से में पड़ा। हम ने तुझे हुक्म पहुँचा दिया। अब तू जान और बड़ा बुत जाने।’

    यह कहने से बादशाह की अ’जब हालत हुई। वह हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया और सर से पाँव तलक काँपने लगा। मिन्नत कर के मनअ’ने लगा। ये दोनों हरगिज़ बैठे और खड़े रहे। इतने में जितने अमीर और दरबारी वहाँ हाजिर थे, एक मुँह होकर बन्दरगाह के राजा की बुराई करने लगे कि, ‘वह ऐसा ही हरामज़ादा, बदचलन और पापी है, ऐसी-ऐसी हरकतें करता है कि बादशाह के हुज़ूर में क्या-क्या अ’र्ज़ करें? जो-कुछ पुजारिय की माता ने कहला भेजा है ठीक है। इस वास्ते जो हुक्म बड़े बुत का है झूठ क्योंकर होगा?’

    बादशाह ने जब सब की ज़बानी एक ही बात सुनी तो अपने कहे पर लज्जित और शर्मिंदा हुआ। फ़ौरन ही एक साफ़-सुथरा जोड़ा मुझे दिया और हुक़्मनामा अपने हाथ से लिख कर उस पर अपने हाथ की मुहर लगा कर मेरे हवाले किया और एक रुक़्क़ा पुजारियों की माता को लिखा और जवाहिरात और अशर्फ़ियों के थाल लड़कों के सामने भेंट रख कर रुख़्सत किया। मैं ख़ुशी- ख़ुशी मंदिर में आया और उस बुढ़िया के पास गया।

    बादशाह का जो ख़त आया, उस में सम्बोधन और उसके बाद अपनी छोटाई का वर्णन करने के बाद माता के प्रति अपनी भक्ति, श्रद्धा और आदर प्रकट करके लिखा था कि, ‘आप के हुक्म के मुताबिक़ इस तुर्क को बन्दरगाह का हाकिम मुक़र्रर किया और शाही जोड़ा दिया गया। अब इसे बन्दरगाह के राजा को क़त्ल करने का हक़ है। सारा माल-धन और जायदाद इस तुर्क की हुई। यह जो चाहे सो करे। प्रार्थी हूँ कि मेरा अपराध क्षमा हो।’ पुजारियों की माता ने कहा कि मन्दिर के नौबतख़ाने में नौबत बजे। पाँच सौ बन्दूक चलाने वाले सिपाही जो बाल-बँधी कौड़ी मारें, हथियारबन्द मेरे साथ कर दिये और हुक्म दिया कि बन्दरगाह के राजा को गिरफ़्तार कर के तुर्क के हवाले करें और जिस तरह से इस का जी चाहे, उसे सजा दे। और ख़बरदार! सिवाय इस आदमी के कोई और महल के अन्दर दाख़िल होवे। राजा सब माल, ख़ज़ाने को इसकी अमानत में सुपुर्द करें। जब यह ख़ुशी से इजाज़त दे तो रसीद और मुआ'फ़ी-नामा इस से लेकर वापस आवें। इसके बाद एक और जोड़ा बड़े बुत की सरकार से मुझे देकर, सवार करवाकर विदाअ’ किया।

    जब मैं बन्दरगाह में पहुँचा एक आदमी ने बढ़ कर बन्दरगाह के राजा को ख़बर की। वह हैरान-सा बैठा था कि मैं वहाँ जा पहुँचा। ग़ुस्सा तो दिल में भर ही रहा था। देखते ही उसे तलवार खींच कर ऐसी गर्दन से लगाई कि उस का सर अलग भुट्टा सा उड़ गया। वहाँ के गुमाश्ते, खज़ांची, कारिन्दों और दरोगों को पकड़वाकर सब के दफ़्तर ज़ब्त किये। इस के बाद मैं महल में दाख़िल हुआ। राजकुमारी से मुलाक़ात की। आपस में लगे लगकर रोए औऱ ख़ुदा का शुक्र किया। मैं ने उस के, उस ने मेरे आँसू पोंछे। फिर बाहर मसनद पर बैठकर अहलकारों को जोड़े दिये और अपनी-अपनी नौकरियों पर सब को बहाल किया। नौकर और ग़ुलामों को इनआ’म और इज़्ज़त दी। वे लोग जो मंडप से मेरे साथ मुक़र्रर हुए थे, हर-एक को इआ’म, बख़्शिश देकर और उन के जमा'दार और रिसालेदार को जोड़े पहनाकर रुख़्सत किया और क़ीमती जवाहिरात, नूरबाफ़ी थान और शालबाफ़ी, ज़ंर्दोज़ी और हर-एक मुल्क की जिन्स और तोहफ़े, इसके अलावा बहुत-सा नक़्द बादशाह की भेंट की ख़ातिर और हर-एक अमीर और दरबारी के लिये उस के दर्जे के अनुसार और पुरोहितों के लिये और पंडों में बाँटने की ख़ातिर, अपने साथ लेकर एक हफ़्ते के बाद मंदिर में आया और उसे माता जी के आगे भेंट रखा।

    उस ने एक और इज़्ज़त का जोड़ा मुझे दिया और उपाधि दी। फिर बादशाह के दरबार में जा कर भेंट दी और जो-जो ज़ुल्म और फ़साद बन्दरगाह के पिछले राजा ने किये थे, उसे बन्द कर देने की ख़ातिर अ’र्ज़ किया। इस वजह से बादशाह, अमीर और सौदागर सब मुझ से राज़ी हुए। बादशाह ने बड़ी मेहरबानी मुझ पर दिखाई और जोड़ा और घोड़ा देकर जागीर, पद, इज़्ज़त और सम्मान मुझे दिया। जब बादशाह के हुज़ूर से आय़ा, शागिर्द पेशा और अहलकारों को इतना-कुछ देकर राज़ी किया कि सब मेरी तारीफ़ करते नहीं थकते थे। ग़रज़ कि मैं बहुत ख़ुशहाल हो गया और बहुत चैन आराम से उस मुल्क में राजकुमारी से शादी कर के रहने लगा और ख़ुदा की बन्दगी करने लगा। मेरे इन्साफ़ के कारण रईयत, प्रजा सभी ख़ुश थे। महीने में एक बार मंदिर में और बादशाह के हुज़ूर में आता जाता और दिन-ब-दिन बादशाह के हुज़ूर में इज़्ज़त और सम्मान पाता।

    आख़िर बादशाह ने मुझे अपने ख़ास दरबारियों में दाख़िल किया औऱ बग़ैर मेरी सालह के कोई काम करता। निहायत बे-फ़िक्री से ज़िन्दगी गुज़रने लगी। मगर ख़ुदा ही जानता है, कभी-कभी इन दोनों भाइयों का ख़याल दिल में आता कि वे कहाँ होंगे और किस तरह होंगे ? दो बरस की मुद्दत के बाद मुल्क ‘ज़ेरबाद’ से सौदागरों का एक क़ाफ़िला उस बन्दरगाह में आया। सब अ’जम जाने का इरादा रखते थे। उन्होंने यह चाहा कि दरिया की राह से अपने मुल्क को जावें। वहाँ का क़ायदा यह था कि जो क़ाफ़िला आता उसका सरदार सौग़ात और तोहफ़ा हर-एक मुल्क का मेरे लिये लाता और नज़र पेश करता। दूसरे दिन मैं उस के मकान पर जाता और उसके माल का महसूल लेकर जाने की इजाज़त देता। इसी तरह ‘ज़ेरबाद’ के वे सौदागर भी मुझ से मुलाक़ात को आए और बहुत क़ीमती तोहफ़े और सौग़ात लाए। दूसरे दिन मैं उन के ख़ेमे में गया। देखा तो दो आदमी, फटे-पुराने कपड़े पहने गठरी बक़ची सर पर उठा कर मेरे सामने लाते हैं और जब मैं देख-भाल लेता हूँ फिर उठा ले जाते हैं और बड़ी मेहनत और ख़िदमत कर रहे हैं।

    मैं ने जब अच्छी तरह ग़ौर करके देखा तो पता चला कि यह मेरे दोनों भाई ही है। उस वक़्त ग़ैरत और मुरव्वत ने यह चाहा कि इन को इस तरह की नौकरी करते देखू। जब मैं अपने घर को चला तो आदमियों से कहा कि, ‘इन दोनों आदमियों को साथ लिये आओ।’ इन के लाए, फिर लिबास और पोशाक बनवा दी और अपने पास रखा। इन बदज़ातों ने फिर मेरे मारने का इरादा किया। एक दिन, आधी रात को, सब को सोता पाकर, चोट्टों की तरह ये मेरे सिरहाने पहुँचे। मैंने अपनी जान के डर से चौकीदारों को दरवाज़े पर रखा था और यह वफ़ादार कुत्ता मेरी चारपाई की पट्टी तले सोता था। जैसे ही इन्होंने तलवारें मियान से खींची, पहले कुत्ते ने भूँक कर उन पर हमला किया। उस की आवाज़ से सब जाग पड़े। मैं भी हलबलाकर चौंका। आदमियों ने इन को पकड़ा। मा’लूम हुआ कि आप ही हैं। सब लानतियाँ देने लगे कि इतनी ख़ातिरदारी के बावजूद इन्होंने यह क्या हरकत की।

    बादशाह सलामत! तब तो मैं भी डरा। मसल मशहूर है कि ‘एक ख़ता दो ख़ता तीसरी ख़ता, मा दर ब-ख़ता।’ दिल मैं यही सलाह ठहरी की अब इन को क़ैद करूँ। लेकिन अगर क़ैदख़ाने में रखूँ तो कौन इन की ख़ैर-ख़बर लेगा? भूख-प्यास से मर जाएँगे या कोई और स्वाँग की तैयारी करेंगे। इस वास्ते इन्हें पिंजरे में रखा है कि हमेशा मेरी नज़रों तले रहे तो मुझे इतमीनान रहे। नहीं तो आँखों से ओझल होकर कुछ और करें। इस कुत्ते की यह इज़्ज़त और यह ख़ातिरदारी इसकी वफ़ादारी और नमकहलाली के कारण है। सुबहानअल्लाह! बेवफ़ा आदमी वफ़ादार जानवर से बद तर है। मेरा यह हाल था, जो आपके हुज़ूर में अ’र्ज़ किया। अब चाहे क़त्ल का हुक्म फ़रमाइये या जाँ-बख़्शी कीजिये, जो हुक्म बादशाह का हो।

    मैं ने सुन कर उस जवान, ईमान वाले को शाबाशी दी और कहा, ‘तेरी मुरव्वत में कोई शक नहीं और इन की बेहयाई और हरामज़दगी में हरगिज़ शुबह भी नहीं! सच है, कुत्ते की दुम को बारह बरस गाड़ो तो भी टेढ़ी रहे।’

    उस के बाद मैं ने उन बारहों ला’ल की हक़ीक़त पूछी जो उस कुत्ते के पट्टे में थे। सौदागर बोला कि, ‘बादशाह की उम्र एक सौ बीस साल की हो। उसी बन्दरगाह में जहाँ मैं हाक़िम था, तीन-चार साल के बाद, एक रोज़ महल के कोठे पर जो बहुत ऊँचा था, जंगल और दरिया के सैर तमाशे के लिये बैठा था। मैं हर तरफ़ देखता था कि अचानक एक तरफ़ जंगल में, जहाँ कोई रास्ता था, दो आदमियों की तस्वीर सी नज़र आई जो चले जाते थे। दूरबीन लेकर देखा तो अ’जब सूरत-शक्ल के आदमी दिखाई दिये। चोबदारों को उनके बुलाने के वास्ते दौड़ाया।

    जब वे आए, मा’लूम हुआ कि एक औ’रत और एक मर्द है। औ’रत को महल के अन्दर राजकुमारी के पास भेज दिया और मर्द को सामने बुलाया। देखा तो एक जवान बीस-बाइस का, डाढ़ी-मूँछ निकल रही है, लेकिन धूप की गर्मी से, उस के चेहरे का रंग काला तवे सा हो रहा है और सर के बाल और हाथों के नाख़ून बढ़ कर बनमानुस की सूरत बन रहा है। एक लड़का तीन-चार बरस का काँधे पर लिये हुए और कुत्ते की दो आस्तीनें भरी हुई तौक़ की तरह गले में डाले, अ’जब सूरत और अ’जब वज़्अ देखी। मैंने निहायत हैरान हो कर पूछा कि, ‘ऐ अज़ीज़ तू कौन है और किस मुल्क का बाशिन्दा है और यह क्या तेरी हालत है?’ वह जवान बेइख़्तियार रोने लगा। और वह हिमयानी खोलकर मेरे आगे ज़मीन पर रखी और बोला, ‘ख़ुदा के वास्ते कुछ खाने को दो। मुद्दत से घास और वनस्पतियाँ खाता चला आता हूँ। ज़रा भी ताक़त मुझ में बाकी नहीं रही।’ उसी वक़्त मैंने रोटी, कबाब और शराब मँगवा दी। वह खाने लगा।

    इतने में ख़्वाजासरा महल से उनकी बीवी के पास से कई और थैलियाँ ले आया। मैं ने उन सब को खुलवाया। हर एक क़िस्म के जवाहिरात देखे जिनमें से एक-एक दाना क़ीमत में बादशाह के बराबर था। एक से एक अनमोल, डौल में और तौल में और आबदारी में ऐसे कि उनकी छूट पड़ने से सारा मकान रौशन हो गया। जब उसने टुकड़ा खाया और एक जाम दारू का पिया, हवास दुरुस्त हुए, तब मैं ने पूछा, ‘यह पत्थर तेरे हाथ कहाँ लगे?’ जवाब दिया, ‘मेरा वतन आज़रबाइजान है। लड़कपन में घर-बार, माँ-बाप से जुदा हो कर बड़ी मुसीबतें उठाई और एक मुद्दत तलक ज़िन्दा-ब-गोर था और कई बार मौत के पंजे से बचा हूँ।’ मैं ने कहा, ‘ऐ मर्दे आदमी! अपना पूरा हाल कह तो मा’लूम हो।’ तब वह अपना हाल बयान करने लगा कि ‘मेरा बाप सौदागर-पेशा था। हमेशा चीन, हिन्दुस्तान, रूस और विलायत का सफ़र किया करता था। जब मैं दस बरस का हुआ, बाप हिन्दुस्तान को चला और मुझे अपने साथ ले जाना चाहा। बहुतेरा माँ ने और ख़ाला, ममानी और फूफी ने कहा कि, ‘अभी यह लड़का है, सफ़र लायक़ नहीं हुआ? पर बाप ने माना और कहा कि, ‘मैं बूढ़ा हो चुका अगर यह मेरे साथ तर्बियत नहीं पाएगा तो मैं यह हसरत क़ब्र में ले जाऊँगा। मर्द-बच्चा अब सीखेगा तो कब सीखेगा?’

    यह कह कर मुझे ख़्वाह-मख़्वाह साथ लिया और रवाना हुआ। ख़ैर-ओ-आफ़ियत से राह कटी। जब हिन्दुस्तान में पहुँचे, कुछ जिन्स वहाँ पहुँची और वहाँ की सौग़ात ले कर ‘ज़ेरबाद’ के मुल्क को गए। वहाँ से भी ख़रीद-फ़रोख़्त कर के जहाज़ पर सवार हुए कि जल्द वतन पहुँचें। एक महीने के बाद एक रोज़ आँधी और तूफ़ान आया और मूसलाधार बारिश होने लगी। सारा ज़मीनो-ओ-आसमान धुआँधार हो गया और जहाज़ की पतवार टूट गई। मल्लाह और जहाज़ चलाने वाले अपना सर पीटने लगे। दस दिन तलक हवा से टक्कर खा के जहाज़ पुर्ज़े -पुर्ज़े हो गया। यह मा’लूम हुआ कि बाप और नौकर-चाकर और अस्बाब कहाँ गया।

    मैं ने अपने को एक तख़्ते पर देखा। तीन दिन तीन रात वह बेड़ा बेइख़्तियार चला किया और चौथे दिन किनारे पर जा लगा। उस पर से उतर कर, घुटनियों चल कर बारे किसी किसी तरह ज़मीन पर पहुँचा। दूर से खेत नज़र आए और बहुत से आदमी वहाँ जमा थे, लेकिन सब काले मादरज़ाद नंगे थे! मुझ से कुछ बोले लेकिन मैं ने उनकी ज़बान बिल्कुल समझी। वह खेत चने का था। वह आग का अलाव लगा कर बूटों के होले करते थे। कई दिन बाद एक घर भी वहाँ नज़र आया। शायद उनकी ख़ूराक यही थी और वे वहीं बसते थे। मुझे भी इशारा करने लगे कि तू भी खा, मैं ने भी एक मुट्ठी उखाड़ कर भूने और फाँकने लगा। थोड़ा सा पानी पीकर एक कोने में सो रहा।

    कुछ देर बाद जब जागा, उन में से एक शख़्स मेरे नज़दीक आया और मुझे राह दिखाने लगा। मैं ने थोड़े से चने उखाड़ लिये और उसी राह पर चला। एक चटियल साफ़ मैदान था, बहुत लम्बा चौड़ा जिसे क़यामत का मैदान कहा चाहिये। यही बूट खाता हुआ चला जाता था। चार दिन बाद एक क़िला नज़र आया। जब पास गया तो एक कोट देखा, बहुत ऊँचा तमाम पत्थर का और हर-एक तरफ़ से दो-दो कोस का। एक दरवाज़ा पत्थर से तराशा हुआ जिस में एक बड़ा सा ताला जड़ा था, लेकिन वहाँ इन्सान का निशान नज़र पड़ा। वहाँ से आगे चला तो एक टीला देखा, जिस की ख़ाक सुर्मे के रंग सियाह थी। जब उस टीले के पार हुआ तो एक बहुत बड़ा शहर नज़र पड़ा। शहर के चारों तरफ़ दीवारें खिंची हुई थीं और जगह-जगह पर बुर्ज़ बने हुए थे। शहर के एक तरफ़ बहुत बड़े पाट का दरिया था। जाते-जाते दरवाज़े पर गया और बिस्मिल्लाह कह कर क़दम अन्दर रखा। एक शख़्स को देखा कि अँग्रेज़ों की सी पोशाक पहने हुए कुर्सी पर बैठा है। जैसे ही उस ने मुझ अजनबी मुसाफ़िर को देखा और मेरे मुँह से बिस्मिल्लाह सुनी, पुकारा, ‘आगे आओ।’ मैं ने जा कर सलाम किया। निहायत मेहरबानी से सलाम का जवाब दिया। तुरन्त मेज़ पर पावरोटी, मस्का और मुर्ग़ का कबाब और शराब रख कर कहा, ‘पेट भरकर खाओ।’ मैंने थोड़ा सा खाया और बेख़बर होकर सोया। जब रात हो गई तब आँख खुली, हाथ-मुँह धोया। फिर मुझे खाना खिलाया और कहा कि, ‘ऐ बेटा! अपना हाल कह!’ जो कुछ मुझ पर गुज़रा था कह सुनाया। तब बोला कि, ‘यहाँ तू क्यों आया?’ मैं ने दिक़ हो कर कहा, ‘शायद तू दीवाना है! मुद्दत तक मुसीबत उठाने के बाद मैं ने अब बस्ती की सूरत देखी है। ख़ुदा ने यहाँ तलक पहुँचाया और तू कहता है, क्यों आया?’ कहने लगा, ‘अब तू आराम कर, कल जो कहना होगा कहूँगा।’

    जब सुब्ह हुई बोला, ‘कोठरी में फावड़ा, छलनी और तोबड़ा है। बाहर ले आ।’ मैं ने दिल में कहा कि ख़ुदा जाने रोटी खिला कर क्या मेहनत मुझ से करवाएगा। लाचार वह सब निकाल कर उस के सामने लाया। तब उस ने कहा कि, ‘उस टीले पर जा और गज़ के मुआफ़िक़ गढ़ा खोद। वहाँ से जो कुछ निकले इस छलनी में छान। जो छन सके, इस तोबड़े में भर कर मेरे पास ला।’ मैं वह सब चीज़ें ले कर वहाँ गया और इतना ही खोद कर छान-छून कर तोबड़े में डाला। देखा तो सब रंग-बिरंग के जवाहिरात थे। उनकी ज्योति से आँखें चौंधिया गईं। उसी तरह थैली को मुँहामुँह भर कर उस अज़ीज़ के पास ले गया। देख कर बोला कि, जो इस में भरा है, तू ले और यहाँ से जा। इस शहर में तेरा रहना अच्छा नहीं। मैं ने जवाब दिया, ‘साहब ने अपनी तरफ़ से बड़ी मेहरबानी की जो इतना-कुछ कंकर-पत्थर दिया। लेकिन मेरे किस काम का? जब भूखा रहूँगा तो इन को चबा सकूँगा, पेट भरेगा। इसलिये अगर और भी दो तो वह मेरे किस काम आएँगे?’

    वह मर्द हँसा और कहने लगा कि, ‘मुझ को तुझ पर अफ़सोस आता है क्योंकि तू भी हमारी तरह मुल्क़ अ’जम का रहने वाला है। इसलिए मैं मनअ' करता हूँ। नहीं तो तू जान। अगर तेरा यही इरादा है कि शहर में जाऊँ तो मेरी अंगूठी लेता जा। जब बाज़ार के चौक में जाए तो वहाँ एक सफ़ेद दाढ़ी वाला आदमी बैठा मिलेगा। उस की सूरत-शक़्ल मुझ से बहुत मिलती-जुलती है। वह मेरा बड़ा भाई है। उस को यह निशानी दीजियो तो वह तेरी ख़बरगीरी करेगा और जो कुछ वह कहे उसी मुआफ़िक़ काम कीजियो, नहीं तो मुफ़्त मारा जाएगा। मेरा हुक्म यहीं तलक है। शहर में मेरा दख़ल नहीं।’

    ‘तब मैं ने वह अंगूठी उस से ली और सलाम रके रुख़्सत हुआ। शहर में गया, अच्छा-ख़ासा शहर देखा। कूचे, बाज़ार साफ़ और औ’रत -मर्द बेहिजाब आपस में ख़रीद-फ़रोख़्त कर रहे थे। सब अच्छे कपड़े पहने हुए थे। मैं सैर करता और तमाशा देखता जब चौक के चौराहे पर पहुंचा, ऐसी भीड़ थी कि थाली, फेंकिये तो आदमियों को राह चलना मुश्किल था। जब कुछ भीड़ छटी, तो मैं भी धक्कम-धुक्का करता हुआ आगे गया। बारे उस अज़ीज़ को देखा कि एक चौकी पर बैठा है और एक जड़ाऊ लोहे का गदा सामने धरा है। मैंने जा कर सलाम किया और वह अंगूठी दी। ग़ुस्से की नज़र से मेरी तरफ़ देखा और बोला, ‘तू क्यों यहाँ आया और अपने को बला में डाला? क्या मेरे बेवक़ूफ़ भाई ने तुझ को मनअ' नहीं किया था?’

    मैं ने कहा कि, ‘उन्हों ने तो कहा था लेकिन मैं ने नहीं माना।’ और सारा हाल शुरू से आख़िर तक कह सुनाया। वह शख़्स उठा और मुझे साथ ले कर अपने घर की तरफ़ चला। उस का मकान बादशाहों सा देखने में आया। बहुत से नौकर-चाकर उस के पास थे। जब एकान्त में जा कर बैठा तब मुलायमियत से बोला कि, ‘ऐ बेटे! यह क्या तू ने बेवक़ूफ़ी की कि अपने पाँव से क़ब्र में आया? कोई भी इस कमबख़्त तिलिरमाती शहर में आता है?’ मैं ने कहा, ‘मैं अपना हाल पहले ही कह चुका हूँ। अब तो क़िस्मत ले आई। लेकिन मेहरबानी फ़रमाकर यहाँ की रहा-रस्म बता दीजिए ताकि यह मा’लूम हो कि किस वास्ते तुमने और तुम्हारे भाई ने मनअ' किया।’ तब वह जवाँमर्द बोला कि, ‘इस शहर का बादशाह औऱ सारे अमीर इन सब पर एक विचित्र शाप है। अ’जब तरह का इनका रवैया और मज़हब है। यहाँ के मन्दिर में एक मूर्ति है जिस के पेट में से शैतान हर किसी का नाम, ज़ात और धर्म बयान करता है। इसलिये जब कोई ग़रीब मुसाफ़िर आता है, बादशाह को ख़बर होती है, उसे मण्डप में ले जाता है और मूर्ति को सज्दा करवाता है। अगर दण्डवत् की तो बेहतर, नहीं तो बेचारे को दरिया में डुबवा देता है। अगर वह चाहे कि दरिया से निकल भागे तो उस को रोग हो जाता है, ऐसा कि ज़मीन पर घसीटता फिरे। ऐसा तिलिस्म इस शहर में बनाया है। मुझ को तेरी जवानी पर रहम आता है। पर तेरी ख़ातिर एक उपाय करता हूँ कि भला कुछ दिन तो जीता रहे और इस कष्ट से बचे।’

    मैं ने पूछा कि, ‘वह क्या सूरत तज्वीज़ की है? इर्शाद हो।’ कहने लगा, ‘तेरी शादी करा दूँ और वज़ीर की लड़की तुझे ब्याह लाऊँ।’ मैं ने जवाब दिया कि, ‘वज़ीर अपनी बेटी मुझ से मुफ़्लिस को कब देगा? इसी समय, जब मैं उस के धर्म को स्वीकार करूँ? सो यह मुझ से हो सकेगा।’ कहने लगा कि, ‘इस शहर की यह रस्म है कि जो कोई उस मूर्ति को सज्दा करे तो अगर फ़क़ीर हो और बादशाह की बेटी माँगे तो उस की ख़ुशी की ख़ातिर हवाले करे और उसे रंजीदा करे। यहाँ का बादशाह मुझ पर विश्वास रखता है और बहुत अ’ज़ीज़ रखता है। इस लिए यहाँ के सब अमीर और बड़े लोग मेरी क़द्र करते हैं। हफ़्ते में दो दिन यहाँ के लोग मन्दिर में पूजा के लिए जाते हैं। चुनांचे कल सब जमा’ होवेंगे। मैं तुझे ले जाऊँगा।’ यह कह कर खिला-पिलाकर सुला रखा। सुब्ह हुई तो मुझे साथ लेकर मन्दिर की तरफ़ चला। वहां जा कर देखा तो आदमी आते-जाते हैं और पूजा करते हैं।

    बादशाह और अमीर मूर्ति के सामने, पण्डितों के पास सर नंगे किये, अदब से घुटने मोड़े बैठे थे और ख़ूबसूरत कुँवारी लड़कियां और लड़के, जैसे स्वर्ग के बासी हैं, चारों तरफ़ क़तार बाँधे खड़े थे। तब वह अज़ीज़ मुझ से मुख़ातिब हुआ कि, ‘अब जो मैं कहूँ सो कर।’ मैं ने क़ुबूल किया कि, ‘जो कहो सो करूँ।’ वह बोला कि, ‘पहले बादशाह के हाथ-पाँव को चूम और उस के बाद वज़ीर का दामन पकड़।’ मैं ने वैसा ही किया। बादशाह ने पूछा कि, ‘यह कौन है, और क्या कहता है?’ उस आदमी ने कहा कि, ‘यह जवान मेरा रिश्तेदार है और बादशाह की क़दम बोसी करने के लिए बहुत दूर से आया है, इस आशा पर कि वज़ीर उस को अपनी ग़ुलामी में लेकर इज़्ज़त दे अगर बड़े देवता का हुक्म और आप की मर्ज़ी होवे।’ बादशाह ने पूछा कि, ‘अगर हमारा धर्म, मज़हब और क़ानून क़ुबूल करेगा तो मुबारक है।’ उसी वक़्त मंदिर का नक़्क़ारखाना बजने लगा और भारी जोड़ा मुझे पहनवाया गया और एक काली रस्सी गले में डालकर खींचते हुए मूर्ति के सिंहासन के आगे ले जा कर सज्दा करवाकर खड़ा किया।

    मूर्ति से आवाज़ निकली कि, ‘ऐ सौदागर-बच्चे, तू हमारी बन्दगी में आया। अब हमारी मेहरबानी और कृपा का उम्मीदवार रह।’ यह सुनकर सब लोगों ने मूर्ति को सज्दा किया और ज़मीन पर लौटने लगे और पुकारे, ‘धन्य है, क्यों हो, तुम ऐसे ही ठाकुर हो!’

    जब शाम हुई, बादशाह और वज़ीर सवार हो कर वज़ीर के महल में दाख़िल हुये और वज़ीर की बेटी को अपनी रीति-रस्म करके मेरे हवाले किया और बहुत सा दान-दहेज़ दिया और बड़े कृतज्ञ हो कर कहा कि, ‘बड़े देवता के आदेशानुसार हम ने उसे तुम्हारी सेवा में दिया।’ एक मकान में हम दोनों को रखा। उस नाज़नीन को जब मैं ने देखा तो वाक़ई उस का आ’लम परी का सा था। नख-सिख से दुरुस्त। जो-जो ख़ूबियाँ पद्मिनी की सुनी जाती हैं सो सब उस में मौजूद थीं। मैं ने बहुत इत्मीनान से उसे स्वीकार किया। सुब्ह को स्नान करके बादशाह के सामने हाज़िर हुआ। बादशाह ने दामादी का जोड़ा दिया और यह हुक्म दिया कि हमेशा दरबार में हाज़िर रहा करूँ। आख़िर को चन्द दिनों के बाद बादशाह के ख़ास दरबारियों में दाख़िल हुआ।

    बादशाह मेरी संगत से बहुत ख़ुश होते और अक्सर जोड़े और इनआ’म मुझे दिया करते। दुनिया के माल से मैं धनी था, इस वास्ते कि मेरी बीवी के पास इतना नक़्द, जिन्स और जवाहिरात थे जिस की हद और गिनती थी। दो साल तक बहुत ऐ’श-आराम से गुज़री। इत्तिफ़ाक़ से वज़ीरज़ादी को पेट रहा। जब सतवाँसा हुआ और अनगिना महीना गुज़र कर पूरे दिन हुए, पीड़ा लगी, दाई-जनाई आयी तो मरा लड़का पेट से निकला। उस का विष ज़च्चा को चढ़ा। वह भी मर गई। मैं मारे ग़म के दीवाना हो गया कि यह क्या आफ़त टूटी। उस के सिरहाने बैठा रोता था। यकबारगी रोने की आवाज़ सारे महल में बुलन्द हुई और चारों तरफ़ से औरतें आने लगीं। जो आती थी एक दो हत्तड़ मेरे सर पर मारती और रोना शुरू करती। इतनी औ’रतों इकट्ठी हुईं कि मैं उन के बीच में छुप गया। नज़दीक था कि जान निकल जाय।

    इतने में किसी ने पीछे से मेरा गरीबान खींच कर घसीटा। देखा तो वह ‘अजमी’ मर्द है जिस ने मुझे बियाहा था। कहने लगा कि, ‘बेवक़ूफ़ तू क्यों रोता है?’ मैं ने कहा कि, ‘ज़ालिम तू ने यह क्या बात कही? मेरी बादशाहत लुट गई, घरदारी का आराम गया गुज़रा और तू कहता है, क्यों ग़म करता है?’ वह अज़ीज़ मुस्कराकर बोला कि, ‘अब अपनी मौत की ख़ातिर रो। मैं ने पहले ही तुझ से कहा था कि शायद इस शहर में तेरी अजल ले आई है, सो वही हुआ। अब सिवाय मरने के तेरी रिहाई नहीं।’ आख़िर लोग मुझे पकड़ कर मन्दिर में ले गए। देखा तो बादशाह, अमीर और छत्तीसों ज़ात प्रजा रईयत वहाँ सब जमा' हैं और वज़ीरज़ादी का सब माल-मिलकियत वहाँ रखी है। जो चीज़ जिस का जी चाहता है, लेता है और उसकी क़ीमत के रुपये वहाँ धर देता है।

    ग़रज़ सब असबाब के नक़्द रुपये जमा’ हुये। उन रुपयों के जवाहिरात ख़रीदे गए और उन को एक सन्दूक़ में बन्द किया गया और एक दूसरे सन्दूक़ में, रोटी, हल्वा, गोश्त के कबाब और सूखा और तर मेवा और दूसरी खाने की चीज़ें लेकर भरीं और उस बीबी की लाश एक सन्दूक़ में रख कर खाने की चीज़ों का सन्दूक़ एक ऊँट पर लदवा दिया और मुझे सवार किया और जवाहिरता का सन्दूक़चा मेरी बग़ल दिया। बहुत से पुजारी आगे-आगे भजन गाते, शंख बजाते चले और पीछे जन समूह मुबारकबादी कहता हुआ साथ हो लिया। इसी तरह उसी दरवाज़ें जिस से मैं पहले रोज़ आया था, शहर के बाहर निकला। जैसे ही दारोग़ा की निगाह मुझ पर पड़ी रोने लगा, और बोला कि, ‘ऐ कम-बख़्त ! मौत के मारे! मेरी बात सुनी और उस शहर में जाकर मुफ़्त अपनी जान दी। मेरा क़ुसूर नहीं, मैं ने मनअ' किया था।’ उस ने यह बात कही, लेकिन मैं तो हक्का-बक्का हो रहा था। ज़बान से बोली निकलती थी कि जवाब दूँ। होश ठीक थे कि देखिये अंजाम मेरा क्या होता है?

    आख़िर उसी क़िले के पास ले गए जिस का दरवाज़ा मैं ने पहले रोज़ बन्द देखा था और बहुत से आदमियों ने मिलकर ताला खोला और ताबूत और सन्दूक़ को अन्दर ले चले। एक पण्डित मेरे नज़दीक आया और समझाने लगा कि, ‘मनुष्य एक दिन जन्म पाता है और एक रोज़ नाश होता है। संसार का यही नियम है। अब यह तेरी स्त्री, पूत और धन चालीस दिन के भोजन का सामान यहाँ मौजूद है। इस को ले और यहाँ रह जब तलक बड़ा देवता तुझ पर मेहरबान होवे।’ ग़ुस्से से मैं ने चाहा कि उस देवता पर और वहाँ के रहने वालों पर और उस रीति-रस्म पर लानत कहूँ और इस पुजारी को धूल-धक्कड़ करूँ। वही ‘अजमी’ मर्द अपनी ज़बान में मनअ' करने लगा कि, ‘ख़बरदार! हरगिज़ दम मत मार। अगर कुछ भी बोला तो इसी वक़्त तुझे जला देंगे। ख़ैर, जो तेरी क़िस्मत में था, सो हुआ। अब ख़ुदा की मेहरबानी पर उम्मीद रख। शायद अल्लाह तुझे यहाँ से जीता निकाले।’

    आख़िर सब मुझे तन-तनहा छोड़ कर उस क़िले से बाहर निकले और दरवाज़े पर फिर ताला लगा दिया। उस वक़्त मैं अपनी बेबसी और तनहाई पर बेइख़्तियार रोया और उस औ’रत की लाश पर लातें मारने लगा, ‘ऐ मुर्दार, अगर तुझे बच्चा जनते ही मर जाना था तो ब्याह काहे को किया था, और पेट से क्यों हुई थी?’ उसे मार-मूर कर फिर चुपका हो बैठा। इतने में दिन चढ़ा और धूप गर्म हुई। सर का भेजा पकने लगा और बदबू के मारे रूह निकलने लगी। जिधर देखता हूँ मुर्दों की हड्डियाँ और जवाहिरात के सन्दूक़ के ढेर लगे हैं। तब कई सन्दूक़ पुराने लेकर नीचे-ऊपर रखे ताकि दिन को धूप से और रात को ओस से बचाव हो। अब पानी की तलाश करने लगा। एक तरफ़ झरना सा देखा कि क़िले की दीवार में पत्थर से तराशा हुआ घड़े के मुँह के मुआफ़िक़ है। बारे कई दिन उस पानी और खाने से ज़िन्दगी चली।

    आख़िर खाने का सामान ख़त्म हुआ और ख़ुदा के हुज़ूर में फ़रियाद की। वह ऐसा मेहरबान है कि अचानक क़िले का दरवाज़ा खुला और लोग एक मुर्दे को लाये। उसके साथ एख बूढ़ा आदमी आय़ा। जब उसे भी छोड़ कर चले गए, यह दिल में आय़ा कि इस बूढ़े को मार कर उसके खाने का सन्दूक़ सब का सब ले लें। एक सन्दूक़ पाया। हाथ में लेकर उस के पास गया। वह बेचारा सर ज़ानू पर धरे हैरान बैठा था। मैं ने पीछे से कर उस के सर में ऐसा मारा कि सर फट कर भेजे का गूदा निकल पड़ा और उसी वक़्त उस का दम निकल गया। उस का खाना लेकर मैं खाने लगा। मुद्दत तलक यही मेरा काम था कि जो ज़िन्दा मुर्दे के साथ आता, उसे मैं मार डालता और खाने का सामान लेकर इत्मीनान से खाता।

    कितनी मुद्दत के बाद एक मर्तबा एक ताबूत के साथ एक लड़की आई। बहुत ख़ूबसूरत। मेरा दिल चाहा कि उसे भी मारूँ। उस ने मुझे देखा औऱ डर के मारे बेहोश हो गई। मैं उसका बी खाना उठाकर अपने पास ले आया। लेकिन अकेला खाता। जब भूख लगती उसके नज़दीक ले जाता और साथ मिल कर खाता। जब उस औ’रत ने देखा कि मुझे यह शख़्स नहीं सताता तो दिन-ब-दिन उसकी वहशत कम हुई और आराम होती गई। वह मेरे मकान में आने लगी। एक रोज़ मैं ने उसका हाल पूछा कि ‘तू कौन है?’ उस ने जवाब दिया कि, ‘मैं बादशाह के ख़ास वकील की बेटी हूँ। अपने चचा के बेटे से ब्याही गई थी। सोहाग रात को उसे क़ौलंज हुआ। ऐसा दर्द से तड़पने लगा कि आन की आन में मर गया। मुझे उस के ताबूत के साथ यहाँ छोड़ गए।’ तब उसने मेरा हाल पूछा और मैं ने भी अपना पूरा हाल बयान किया और कहा, ‘ख़ुदा ने तुझे मेरी ख़ातिर यहाँ भेजा है।’ वह मुस्कराकर चुपकी हो रही।

    इसी तरह कई दिन में आपस में मुहब्बत ज़ियादा हो गई। बाद में एक बेटा पैदा हुआ। तीन बरस के क़रीब इसी सूरत से गुज़री। तब लड़के का दूध पढ़ाया। एक रोज़ बीबी से कहा कि, ‘यहाँ कब तलक रहेंगे और किस तरह से यहाँ से निकलेंगे?’ वह बोली, ‘खुदा निकाले तो निकलें, नहीं तो एक रोज़ यूँ ही मर जायेंगे।’ मुझे उसके कहने पर और अपने इस हाल में रहने पर बहुत रोना आया, रोते-रोते सो गया। एक शख़्स को ख़्वाब में देखा कि कहता है कि, ‘परनाले की राह से निकलना है तो निकल।’ मैं मारे ख़ुशी के चौंक पड़ा और जोरू से कहा कि, ‘लोहे की मेख़ें और सीख़ें जो पुराने सन्दूक़ों में हैं, जमा’ कर के ले आओ तो मैं इस मोरी को चौड़ा करूँ।’ ग़रज़ मैं उस मोरी के मुँह पर मेख़ रख कर पत्थरों से ऐसा ठोंकता कि थक जाता। एक बरस की मेहनत के बाद यह सूराख़ इतना बड़ा हुआ कि आदमी निकल सके।

    उस के बाद मुर्दों की आस्तीनों में अच्छे-अच्छे जवाहिरात चुनकर भरे और साथ लेकर उसी राह से हम तीनों बाहर निकले। ख़ुदा का शुक्र किया और बेटे को काँधे पर बिठा लिया। एक महीना हुआ है कि आ’म रास्ता छोड़ कर मारे डर के जंगल पहाड़ों की राह से चला आता हूँ। जब भूख लगती है, घास-पात खाता हूँ। बात कहने की ताक़त मुझ में नहीं। यह मेरी हक़ीक़त है, जो तुम ने सुनी।’

    बादशाह सलामत! मैं ने उसकी हालत पर तरस खाया और हम्माम करवाकर अच्छा लिबास पहनवाया और अपना सहायक बनाया। मेरे घर में मल्का से कई लड़के पैदा हुये लेकिन छोटी उम्र में ही मर गये। एक पाँच बरस का होकर मरा। उस के ग़म में मल्का की मौत हुई। मुझे बहुत ग़म और वह मुल्क उस के बग़ैर काटने लगा। दिल उदास हो गया और अ’जम चलने का इरादा किया। बादशाह से अ’र्ज़ करके, बन्दरगाह के राजा का पद उस जवान को दिलवा दिया। इस अर्से में बादशाह भी मर गया। मैं उस वफ़ादार कुत्ते को और सब माल खज़ाना जवाहिरात साथ लेकर नेशापूर में रहा। इस वास्ते कि कोई मेरे भाइयों के हाल से वाक़िफ़ होवे, मैं ख़्वाजा सग परस्त मशहूर हुआ और इस बदनामी के कारण आज तक दुगुना महसूल ईरान के बादशाह की सरकार में भरता हूँ।

    इत्तिफ़ाक़ से यह सौदागर-बच्चा वहाँ गया। इस के ज़रिये जहाँपनाह की क़दमबोसी की इज़्ज़त मिली।

    मैं ने पूछा, ‘क्या यह तुम्हारा बेटा नहीं?’ ख़्वाजा ने जवाब दिया कि, ‘क़िबला-ए-आलम यह मेरा बेटा नहीं, आप ही के रईयत है। लेकिन अब मेरा मालिक और वारिस जो भी कहिये, सो यही है।’

    यह सुन कर मैं ने सौदागर बच्चे से पूछा कि, ‘तू किस ताजिर का लड़का है और तेरे माँ-बाप कहाँ रहते हैं?’ उस लड़के ने ज़मीन चूमी और जान की अमाँ माँगी और बोला कि, ‘यह लौंडी, सरकार के वज़ीर की बेटी है। मेरा बाप इस सौदागर के ला’लों के कारण हुज़ूर के ग़ुस्से में पड़ा और हुक्म यह हुआ कि अगर एक साल के अन्दर उस की बात सही साबित होगी तो जान से मारा जाएगा। मैं ने यह सुन कर एक भेस बनाया और अपने को नेशापुर पहुँचाया। ख़ुदा ने इस सौदागर को इस के कुत्ते और ला’लों के साथ हुज़ूर में हाजिर कर दिया। आपने सारा हाल सुन लिया, अब उम्मीदवार हूँ कि मेरे बूढ़े बाप को छोड़ दिया जाय।’

    यह बयान वज़ीर की बेटी से सुन कर सौदागर ने एक आह की और बेइख़्तियार गिर पड़ा। जब उस पर गुलाब छिड़का गया तब होश में आया और बोला कि, ‘हाय कमबख़्तो! इतनी दूर से इतनी मुसीबत और तकलीफ़ उठाकर इस उमीद पर आया था कि इस सौदागर-बच्चे को अपना बेटा बनाऊँगा और अपने माल और अपनी जायदाद का हेबानामा इस के नाम लिख दूँगा तो मेरा नाम रहेगा और सारा आ’लम इसे ‘ख़्वाजाज़ादा’ कहेगा। पर मेरा ख़याल ख़ाम हुआ और उल्टा काम हुआ। इस ने औ’रत हो कर मुझ बूढ़े आदमी को ख़राब किया। मैं औ’रत के चरित्र में पड़ा। अब मेरी वह कहवात हो गई, ‘घर में रहे तीरथ गये, मूँड़-मूँड़ा फ़ज़ीहत भए।’

    क़िस्सा यह कि मुझे उस की बेक़रारी और रोने धोने पर रहम आया। सौदागर को नज़दीक बुलाया और उस के कान में इस बात की ख़ुशख़बरी सुनाई कि ग़मगीन मत हो तेरी शादी इसी से कर देंगे। इस ख़ुशख़बरी के सुनने से उसे बड़ी तसल्ली हुई। तब मैं ने कहा, ‘वज़ीदरज़ादी को महल में ले जाओ, वज़ीर को क़ैदख़ाने से ले आओ, हम्माम में उसे नहलाओ, इज़्ज़त का जोड़ा पहनाओं और जल्दी मेरे पास लाओ।’

    जिस वक़्त वज़ीर मेरे पास आया, फ़र्श के किनारे तक आकर मैं ने उस का स्वागत किया और अपना बुज़ुर्ग जान कर गले लगाया और नये सिरे से वज़ारत का क़लमदान दिया। सौदागर को भी जागीर और पद दिया और अच्छी घड़ी देख कर वज़ीरज़ादी से निकाह पढ़वाकर उस से शादी कर दी।

    कई साल में दो बेटे और एक बेटी उस के घर पैदा हुई। चुनांचे बड़ा बेटा अब सौदागरों का सरदार है और छोटा हमारी सरकार का मुख़्तार है। फ़क़ीरों! मैं ने इसीलिये यह क़िस्सा तुम्हारे सामने कहा कि कल रात दो फ़क़ीरों का हाल मैं ने सुना था। अब तुम दोनों भी जो बाक़ी रहे हो यह समझो कि हम उसी मकान में बैठे हैं और मुझे अपना नौकर और इस घर को अपना तकिया जानो। बेखटके अपनी-अपनी सैर का हाल कहो और कुछ दिन मेरे पास रहो।

    जब फ़क़ीरों ने बादशाह की तरफ़ से बहुत ख़ातिरदारी देखी तो कहने लगे, ‘ख़ैर, जब तुम ने हम फ़क़ीरों पर यह मेहरबानी की तो हम दोनों भी अपना हाल बयान करते हैं।’

    सैर तीसरे दर्वेश की

    तीसरा दर्वेश कोट बाँधकर बैठा और अपनी सैर का बयान इस तरह से करने लगा-

    अहवाल इस फ़क़ीर का दोस्ताँ सुनो,

    यानी जो मुझ पर बीती है वह दास्ताँ सुनो।

    जो कुछ कि शाह-ए-इश्क़ ने मुझ से किया सुलूक,

    तफ़सीलवार करता हूँ उसका बयाँ सुनो।

    कि यह कमतरीन अ’जम का राजकुमार है। मेरे बाप वहाँ के बाहशाह थे और सिवाय मेरे कोई बेटा रखते थे। मैं जवानी के आ’लम में दोस्तों के साथ चौपड़, गंजीफ़ा, शतरंज और दूसरे खेल खेला करता या सवार होकर सैर-शिकार में मशग़ूल रहता। एक दिन का क़िस्सा यह है कि सवारी तैयार करवाकर और सब यार दोस्तों को लेकर मैदान की तरफ़ निकला, बाज़ बहरी सुर्ख़ाब और तीतरों पर उड़ाता हुआ दूर निकल गया। अ’जब तरह का एक टुकड़ा बहार का नज़र आया कि जिधर निगह जाती थी, कोसों तलक सब्ज़ और फूलों से लाल ज़मीन नज़र आती थी। यह समाँ देख कर घोड़ों की बागें डाल दीं और क़दम-क़दम सैर करते हुए चले जाते थे। अचानक उस जंगल में देखा कि एक काला हिरन, उस पर ज़रबफ़्त की झूल और सुनहरी जड़ाऊ भँवरकली और ज़र्दोज़ी के पट्टे में सोने के घुँघरू टँके लगे में पड़े हुए, इत्मीनान से ऐसे मैदान में चरता-फिरता है जहाँ इंसान का दख़ल नहीं और परिन्दा पर नहीं मारता। हमारे घोड़ों की टापों की आहट पाकर चौकन्ना हुआ और सर उठा कर देखा और धीरे-धीरे चला।

    मुझे उस के देखने से यह शौक़ हुआ कि दोस्तों से कहा कि, ‘तुम यहीं खड़े रहो, मैं उसे जीता पकड़ूँगा। ख़बरदार! तुम क़दम आगे बढ़ाइयो और मेरे पीछे आइयो।’ घोड़ा मेरी रानों तले ऐसा परिन्दा था कि बारहा हिरनों के ऊपर दौड़ कर उनकी करछालों को भुला कर हाथों से पकड़-पकड़ किये था। मैं ने उस दिन भी घोड़ा उस के पीछे दौड़ाया। वह देख कर छलाँगे भरने लगा और हवा हुआ। घोड़ा भी हवा से बातें करता था लेकिन उस की धूल को पहुँचा। वह घोड़ा भी पसीने-पीसने हो गया और मेरी जीभ भी मारे प्यास के चटखने लगी। पर कुछ बस चला। शाम होने लगी और मैं क्या जाने कहाँ से कहाँ निकल आया? लाचार हो कर उसे भुलावा दिया और तर्कश से तीर निकाल कर और कमान संभाल कर और चिल्ले में जोड़ कर कान तलक खींचकर उस की रान को ताक कर ‘अल्लाहु अकबर’ कह कर मारा। बारे पहला ही तीर उस के पाँव में तराज़ू हुआ। तब लंगड़ाता हुआ पहाड़ की तराई की तरफ़ चला। मैं भी घोड़े पर से उतर पड़ा और पैदल उसके पीछे लगा। उसने पहाड़ की तरफ़ जाने का इरादा किया और मैं ने भी उसका साथ दिया। कई उतार-चढ़ाव के बाद एक गुंबद दिखाई दिया। जब पास पहुँचा, एक बाग़ीचा ओर चश्मा देखा। वह हिरन तो नज़रों से छलावा हो गया। मैं बहुत थका था, हाथ-पाँव धोने लगा।

    यकबारगी उस बुर्ज के अन्दर से रोने की आवाज़ मेरे कान में आई, जैसे कोई कहता है कि, ‘ऐ बच्चे! जिसने तुझे तीर मारा, मेरी आह की तीर उस के कलेजे में लगे, और वह अपनी जवानी का फल पावे और ख़ुदा उस को मेरा सा दुखिया बना दे। मैं यह सुन कर वहाँ पहुँचा, देखा तो एक बूढ़ा सफ़ेद दाढ़ी रखे, अच्छे कपड़े पहने एक मसनद पर बैठा है और हिरन आगे लेटा है। बूढ़ा उस की जाँघ से तीर खींचता है और बद्दुआ’ देता है।

    मैं ने सलाम किया और हाथ जोड़ कर कहा, ‘हज़रत सलाम! यह गुनाह अनजाने में इस ग़ुलाम से हुआ। मैं यह जानता था। ख़ुदा के वास्ते माफ़ करो।’

    बोला कि, ‘बेज़बान को तू ने सताया है। अगर अनजान में यह हरक़त तुझ से हुई तो अल्लाह माफ़ करेगा।’ मैं पास जा बैठा और तीर निकालने में उस का साथ देने लगा। बड़ी मुश्किल से तीर को निकाला ओर ज़ख़्म में मरहम भर के छोड़ दिया। फिर हाथ धो कर उस बूढ़े ने जो-कुछ उस वक़्त मौजूद था मुझे खिलाया। मैं ने खा-पीकर एक चारपाई पर लम्बी तानी।

    थकावट के सबब खूब पेट भर कर सोया। उस नींद में आवाज़ रोने-धोने की कान में आई। आँखें मल कर जो देखता हूँ तो उस मकान में वह बूढ़ा है कोई और है। अकेला मैं पलंग पर लेटा हूँ और वह दालान ख़ाली पड़ा है। चारों तरफ़ हैरान हो कर देखने लगा। एक कोने में पर्दा पड़ा दिखाई दिया। वहाँ जा कर उसे उठाया, देखा तो एक तख़्त बिछा है और उस पर एक परी जैसी औ’रत बरस चौदह-एक की, चाँद की सी सूरत, चोटियां दोनों तरफ़ छूटी हुई, हँसता चेहरा, अंग्रेज़ी कपड़े पहने हुए, अ’जब अदा से देखती है और बैठी है और वह बूढ़ा अपना सर उस के पाँव पर धरे फूट-फूट कर रो रहा है और होश-हवास खो रहा है। मैं उस बूढ़े का यह हाल और नाज़नीन का रंग-रूप देख कर मुर्झा गया और मुर्दे की तरह बेजान होकर गिर पड़ा। वह बूढ़ा मेरा हाल देख कर मुर्झा गया। शीशी गुलाब की ले आया और मुझ पर छिड़कने लगा। जब जीता उठ कर मा’शूक़ के आगे जा कर सलाम किया तो उस ने हरगिज़ हाथ उठाए और होंठ हिलाया। मैंने कहा, ‘ऐ गुलबदन, इतना ग़ुरूर करना और सलाम का जवाब देना किस मज़हब में दुरुस्त है?’

    कम बोलना अदा है हरचन्द पर इतना,

    मुँद जाय चश्म-ए-आ’शिक़ तो भी वह मुंह खोले।

    ‘उस ख़ुदा के वास्ते जिस ने तुझे बनाया है, कुछ तो मुँह से बोल। हम भी इत्तिफ़ाक़ से यहाँ निकले हैं। मेहमान की ख़ातिर ज़रूरी है। मैं ने बहुतेरी बातें बनाईं, लेकिन कुछ काम आई। वह चुपकी बुत की तरह बैठी सुना की। तब मैं ने भी आगे बढ़ कर अपना हाथ पाँवन पर चलाया। जब पाँव को छेड़ा तो सख़्त मा’लूम हुआ। आख़िर यह जाना कि पत्थर से इस ला’ल को तराशा है और आज़र ने इस बुत को बनाया है। तब उस बुत पूजने वाले बूढ़े से पूछा कि, ‘मैं ने तेरे हिरन की टांग में तीर मारा है। तूने इस इश्क़ के तीर से मेरा कलेजा छेद कर आर-पार किया। तेरी दुआ’’ क़ुबूल हुई। अब साफ़-साफ़ बता कि यह तिलिस्म क्यों बनाया है और तूने बस्ती को छोड़ कर जंगल-पहाड़ क्यों बसाया है। तुझ पर जो-कुछ बीता है मुझ से कह।’

    जब मैं उस के बहुत पीछे पड़ा तब उस ने जवाब दिया कि, ‘इस बात ने मुझे तो ख़राब किया। क्या तू भी सुन कर मरना चाहता है?’ मैं ने कहा, ‘लो, अब बहुत मक्कर-चकर किया। मतलब की बात कहो, नहीं तो मार डालूँगा।’

    मेरा हठधर्मी देख कर बोला, ‘ऐ जवान! ख़ुदा हर आदमी को इश्क़ की आँच से बचाए रखे। देख तो इस इश्क़ ने क्या आफ़तें ढाई हैं। इश्क़ ही के मारे औ’रत शौहर के साथ सती होती है और अपनी जान खोती है। फ़रहाद और मजनूँ का क़िस्सा सब को मा'लूम है। उस के सुनने से क्या से पावेगा? नाहक़ घर-बार दुनिया की दौलत छोड़-छाड़ कर निकल जावेगा?’

    मैं ने जवाब दिया, ‘बस अपनी दोस्ती तह कर रखो। इस वक़्त मुझे अपना दुश्मन समझो। अगर जान प्यारी है तो साफ़ कहो।’

    लाचार हो कर आँसू भर लाया और कहने लगा, ‘मुझ ख़ाना ख़राब की यह हक़ीक़त है कि बन्दे का नाम नोमान सय्याह है। मैं बड़ा सौदागर था। इस उम्र में तिजारत की वजह से सारी दुनिया की सैर की और सब बादशाहों के दरबार में हाज़िरी दी।’

    एक बार यह ख़याल जी में आया कि चारों तरफ़ तो मुल्कों में घूमता फिरा लेकिन विलायत के टापू की तरफ़ गया और वहां के बादशाह को और रईयत सिपाहियों को देखा और वहाँ की राह-रसम का कुछ पता चला। एक बार वहाँ भी चलना चाहिये। दोस्तों और साथियों से सलाह लेकर पूरा और मज़बूत इरादा किया। तुहफ़े सौग़ात जहाँ-तहाँ का जो वहां के लायक़ था और एक क़ाफ़िला सौदागरों का इकट्ठा करके जहाज़ पर सवार हो कर रवाना हो हुआ। हवा जो मुआफ़िक़ पाई गई, तो महीनों में उस मुल्क में जा दाख़िल हुआ और शहर में डेरा किया। अ’जब शहर देखा कि कोई शहर उस शहर की ख़ूबी को नहीं पहुँचता। हर-एक बाज़ार और कूचे में पक्की सड़कें बनी हुई और छिड़काव किया हुआ। सफ़ाई ऐसी कि एक तिनका कहीं पड़ा नज़र आया, कूड़े का तो क्या ज़िक्र है! इमारतें रंग-बिरंग की और रात को रास्तों पर क़दम-ब-क़दम दो तरफ़ा रौशनी और शहर के बाग़ात कि जिन में अ’जायब, गुल-बूटे और मेवे नज़र आए जो शायद सिवाय स्वर्ग के कहीं और होंगे। जो वहाँ की तारीफ़ करूँ सो बजा है।

    ग़रज़ सौदागरों के आने का चर्चा हुआ। एक मो'तबर ख़्वाजासरा हो कर और कई नौकर साथ ले कर क़ाफ़िला में आया और व्यापारियों से पूछा कि, ‘तुम्हारा सरदार कौन सा है?’ सभी ने मेरी तरफ़ इशारा किया और वह ख़्वाजासरा मेरे मकान में आया। मैं ने उस का आदर सत्कार किया। एक ने दूसरे को सलाम किया। उस को कथरी पर बिठाया। तकियों से तवाज़ोअ’ की। उस के बाद मैं ने पूछा कि, ‘साहब के तशरीफ़ लाने का क्या सबब है? फरमाइये।’ उस ने जवाब दिया कि, ‘राजकुमारी ने सुना है कि सौदागर आये हैं और बहुत जिन्स लाए हैं। इसलिये मुझ को हुक्म दिया कि जा कर उन को हुज़ूर में लाओ। तो अब तुम जो कुछ असबाब, बादशाहों की सरकार के लायक़ हो साथ लेकर चलो और उन की चौखट चूमने की इज़्ज़त हासिल करो।’

    मैं ने जवाब दिया कि, ‘आज तो थकन के कारण मजबूर हूँ कल जान-ओ-माल से हाज़िर हूँ। जो-कुछ इस नाचीज़ के पास मौजूद है, भेंट करूँगा। जो पसन्द आवे माल सरकार का है। यह वा’दा कर के और ख़्वाजा को इत्र-पान दे कर रुख़्सत किया और सब सौदागरों को अपने पास बुलाकर जो-जो तोहफ़ा जिसके पास था ले कर जमा’ किया। जो मेरे घर में था, वह भी ले लिया। सुब्ह के वक़्त बादशाही महल के दरवाज़े पर हाज़िर हुआ। बारे दरबान ने मेरे आने की ख़बर अ’र्ज़ की। हुक्म हुआ कि, ‘हुज़ूर में लाओ।’ वही ख़्वाजासरा निकला और मेरा हाथ अपने हाथ में ले कर दोस्तों की तरह बातें करता हुआ ले चला। पहले एक आ’लीशान मकान में ले गया। अज़ीज़! तू यक़ीन करेगा यह आ’लम नज़र आया, गोया पर काटकर परियों को छोड़ दिया है। जिस तरफ़ देखता था, निगाह गड़ जाती थी, पाँव ज़मीन से उखड़े जाते। कोशिश कर के अपने को सँभालता हुआ सामने पहुँचा। जैसे बादशाहज़ादी पर नज़र पड़ी, ग़श की नौबत हुई और हाथ पाँव में कपकपी गई।

    किसी तरह सलाम किया। दोनों तरफ़, दाहनी तरफ़ औऱ बाईं तरफ़ परी-सूरत नाज़नीनों की क़तारें हाथ बाँधे खड़ी थीं। मैं जो कुछ जवाहिरात, कपड़े, पोशाक और तोहफ़े साथ ले गया था। उनकी कईं कश्तियाँ हुज़ूर में चुनी गईं। बात यह थी कि हर चीज़ पसन्द के लायक़ थी। खुश होकर ख़ानसामां के हवाले की गईं और फ़र्माया कि इस की क़ीमत सूची के अनुसार कल दी जाएगी। मैं ने सलाम किया और दिल में ख़ुश हुआ कि इसी बहाने से भला कल भी आना होगा।

    जब रुख़्सत हो कर बाहर आया तो पागलों की तरह कहता कुछ था और मुँह से निकलता कुछ था। उसी तरह सराय में आय़ा लेकिन हवास बजा थे। सब दोस्त- आश्ना पूछने लगे कि, ‘यह तुम्हारी क्या हालत है?’ मैं ने कहा, ‘इतना आने-जाने से दिमाग़ पर गर्मी चढ़ गई है?’

    ग़रज़ वह रात तड़पते काटी। सवेरे फिर जा कर हाज़िर हुआ और उसी ख़्वाजा के साथ फिर महल में पहुँचा। वही आ'लम जो कल देखा था देखा। राजकुमारी ने मुझे देखा और हर एक को अपने-अपने काम पर रुख़्सत किया। जब अकेला हुआ तो अपने ख़ास कमरे में उठ गईं और तलब किया। जब मैं वहाँ गया, बैठने का हुक्म किया। मैं आदाब बजा लाकर बैठा।

    राजकुमारी ने फ़रमाया कि, ‘यहाँ जो तू आया और यह असबाब लाया उस में मुनाफ़ा कितना मंजूर है?’

    मैं ने अ’र्ज़ किया कि, ‘आप के क़दम देखने की बड़ी ख़्वाहिश थी, सो ख़ुदा ने मुयस्सर की। अब मैं ने सब-कुछ भर पाया और दोनों जहान की इज़्ज़त हासिल हुई। क़ीमत जो कुछ सूची में है, आधे की ख़रीद है और आधा नफ़ा है।’

    फ़रमाया, ‘नहीं, जो क़ीमत तू ने लिखी है वही इनायत होगी, बल्क़ि और भी इनआ’म दिया जायेगा। शर्त यह कि एक काम तुझ से हो सके तो हुक्म करूँ?’

    मैंने कहा कि, ‘ग़ुलाम का जान-ओ-माल अगर सरकार के काम आवे तो मैं अपनी क़िस्मत की ख़ूबी समझूँ और सर आँखों से करूँ।’ यह सुन कर क़लमदान मँगवाया और एक रुक़्क़ा लिखा। उसे मोतियों की थैली में रख कर एक रुमाल शबनम का ऊपर लपेटकर मेरे हवाले किया। एक अँगूठी निशान के वास्ते उँगली से उतार दी और कहा कि, ‘उस तरफ़ को एक बड़ा बाग़ है, दिलकुशा उसका नाम है जिसका दारोग़ा एक शख़्स केख़ुसरौ नाम का है। वहाँ तू जाकर उसके हाथ में यह अंगूठी दीजियो। हमारी तरफ़ से दुआ’' कहियो और इस रुक़्क़े का जवाब माँगियो। लेकिन जल्द आइयो। अगर खाना वहाँ खाइयो तो पानी यहाँ पीजियो। इस काम का इनआ'म तुझे ऐसा दूँगी कि तू देखेगा।’

    मैं रुख़्सत हुआ और पूछता-पूछता चला। क़रीब दो कोस के जब गया, वह बाग़ नज़र पड़ा। जब पास पहुँचा एक हथियारबन्द सिपाही मुझ को पकड़ के बाग़ में ले गया। देखा तो एक जवान, शेर की सूरत, सोने की कुर्सी पर ज़िरह-बक्तर पहने चार-आईना बाँधे फ़ौलादी ख़ोद सर पर धरे, निहायत शान-शौक़त से बैठा है और पाँच सौ जवान तैयार, ढाल-तलवार हाथ में लिये, कमान कसे, क़तार बाँधे खड़े हैं।

    मैं ने सलाम किया। मुझे पास बुलाया। मैं ने वह अंगुठी दी और ख़ुशामद की बातें रके, वह रूमाल दिखाया और रुक़्क़े के लाने का भी हाल कहा। उस ने सुनते ही उँगली दाँतों से काटी और सर धुन कर बोला कि, ‘शायद तेरी मौत तुझ को ले आई है। ख़ैर, बाग़ के अन्दर जा। सरों के दरख़्त में एक लोहे का पिंजरा लटकता है। उस में एक जवान क़ैद है। उस को यह ख़त देकर जवाब लेकर जल्दी वापस आ।’

    मैं जल्दी बाग़ में घुसा। बाग़ क्या था, गोया जीते जी स्वर्ग में गया। एक-एक चमन रंग-बिरंग का फूल रहा था और फ़व्वारे छूट रहे थे। चिड़ियाँ चहचहा रही थीं।

    मैं सीधा चला गया और उस दरख़्त में वह पिंजरा देखा। उस में एक हसीन जवान नज़र आया। मैं ने अदब से सर झुकाया और सलाम किया और वह मुहर-बन्द थैली पिंजरे की तीलियों की राह से दी। वह अज़ीज़ रुक़्क़ा खोल कर पढ़ने लगा और मुझ से बेइख़्तियार हाल राजकुमारी का पूछने लगा।

    अभी बातें चल ही रही थीं कि एक फ़ौज हब्शियों की आई और चारों तरफ़ से मुझ पर टूट पड़ी और बेतहाशा बरछी और तलवार मारने लगी। एक निहत्थे आदमी की बिसात ही क्या? एकदम में चूर और ज़ख़्मी कर दिया। मुझे अपनी कुछ सुध-बुध रही। फिर जो होश आया, अपने को चारपाई पर पाया जिसे दो सिपाही उठाये लिये जाते हैं और आपस में बतियाते हैं।

    एक ने कहा, ‘इस मुर्दे की लोथ को मैदान में फेंक दो, कुत्ते कौवे खाएँगे।’

    दूसरा बोला, ‘अगर बादशाह पूछ-गछ करे और यह हाल खुले तो जीता गड़वा दे और बाल बच्चों को कोल्हू में पेलवा दे। क्या हमें अपनी जान भारी पड़ा है, जो ऐसी बेवकूफ़ी की हरकत करें?’

    मैं ने यह बातचीत सुनकर दोनों से कहा, ‘ख़ुदा के वास्ते मुझ पर रहम करो। अभी मुझ में ज़रा जान बाक़ी है। जब मर जाऊँगा जो तुम्हारा जी चाहेगा, सो करना। लेकिन यह तो कहो कि मुझ पर यह क्या बीती? मुझे क्यों मारा? तुम कौन हो, भला इतना तो कह सुनाओ!’

    तब उन्होंने रहम खाकर कहा कि, ‘वह जवान जो पिंजरे में बन्द है, इस बादशाह का भतीजा है। पहले इस का बाप बादशाह था। मरते वक़्त अपने भाई को यह वसीयत की कि ‘अभी मेरा बेटा जो इस बादशाहत का वारिस है, लड़का और नासमझ है। इसलिए बादशाहत का इंतिज़ाम ख़ैरख़्वाही और होशियारी के साथ तुम करना। जब यह बालिग़ हो, अपनी बेटी से शादी इसकी कर देना और इसे मुख़्तार तमाम मुल्क और ख़ज़ाने का कर देना।’ यह कह कर वह तो चलते हुये और बादशाहत की बागडोर छोटे भाई के हाथ में आई। उसने वसीयत का पास किया बल्कि इसे दीवाना और पागल मशहूर करके पिंजरे में डाल दिया। इतना कड़ा पहरा बाग़ के चारों तरफ़ रखा कि परिन्दा पर नहीं मार सकता। इसे कई बार ज़हर दिया गया, लेकिन इसकी ज़िन्दगी ज़बरदस्त थी, असर नहीं किया। अब वह शाहज़ादी और यह शाहज़ादा दोनों आशिक़ और मा’शूक़ बन रहे हैं। वह घर में तड़पे है और यह पिंजरे में तड़पे है। तेरे हाथ जो रुक़्क़ा उसने भेजा, यह ख़बर हरकारों ने बादशाह को पहुँचाई। उसने हब्शियों की फ़ौज भेजी जिस ने तेरा यह हाल किया। उस ने उस जवान के क़त्ल की तदबीर वज़ीर से पूछी। उस नमकहराम ने राजकुमारी को राज़ी किया है कि उस बेगुनाह को बादशाह के सामने अपने हाथ से क़ैदी मार डालें।’

    मैं ने कहा, ‘चलो, मरते-मरते यह तमाशा भी देख लें।’ आख़िर राज़ी होकर वे दोनों और मैं ज़ख़्मी चुपके एक कोने में जाकर खड़े हुये। देखा तो तख़्त पर बादशाह बैठा है और राजकुमारी के हाथ में नंगी तलवार है और राजकुमार को पिंजरे से बाहर निकालकर खड़ा किया गया है। राजकुमारी जल्लाद बनकर नंगी तलवार लिये हुये अपने आशिक़ को क़त्ल करने को आई। जब नज़दीक पहुँची, तलवार फेंक दी और उसके गले में चिमट गई।

    तब वह आशिक़ बोला, ‘ऐसे मरने पर मैं राज़ी हूँ। यहाँ भी तेरी आर्ज़ू है, वहाँ भी तेरी तमन्न रहेगी।’

    राजकुमारी बोली कि, ‘मैं इसी बहाने से तुझे देखने को आई थी।’

    बादशाह को यह हरकत देख कर बहुत ग़ुस्सा आया और वज़ीर को डांटा कि, ‘तू यही तमाशा मुझे दिखाने को लाया था?’ नौकर राजकुमारी को अलग करके महल में ले गए और वज़ीर ने ख़फ़ा होकर तलवार उठाई और राजकुमार के ऊपर दौड़ा कि एक ही वार में काम उस बेचारे का तमाम करे। जैसे ही वह चाहता था कि तलवार चलावे, ग़ैब से अचानक एक तीर ऐसा उसके माथे पर बैठा कि आर-पार हो गया और वह गिर पड़ा।

    बादशाह यह वारदात देख कर महल में घुस गये। जवान को फिर पिंजरे में बन्द करके बाग़ में ले गए। मैं भी वहाँ से निकला। राह से एक आदमी मुझे बुलाकर राजकुमारी के हुज़ूर में ले गया। उसने मुझे घायल देख कर एक जर्राह को बुलवाया और निहायत ताकीद से कहा कि, ‘इस जवान को जल्द चंगा करके, सेहत का ग़ुस्ल दे। यही मेरा इम्तहान है। इसके ऊपर तू जितनी मेहनत करेगा उतना ही इनआ’म और इज़्ज़त पाएगा।’

    ग़रज़ वह जर्राह राजकुमारी के कहने के अनुसार मेहनत और दौड़-धूप करके चालीस दिन में नहला-धुलाकर मुझे राजकुमारी के सामने ले गया। राजकुमारी ने पूछा, ‘अब तो कुछ कसर बाक़ी नहीं रही?’ मैं ने कहा, ‘आप की तवज्जोह से अब हट्टा-कट्ठा हूँ।’ तब मल्का ने एक शाही जोड़ा और बहुत से रुपये जो कहे थे, बल्कि उससे भी दो-गुने दिये और रुख़्सत किया।

    मैं वहां से सब साथियों और नौकरों चाकरों को लेकर चल पड़ा। जब इस मक़ाम पर पहुँचा तो सब से कहा, ‘तुम अपने वतन को जाओ मैं इस पहाड़ पर यह मकान और उसकी मूरत बनवाकर रहने लगा। नौकरों और ग़ुलामों को हर-एक की क़द्र के रुपये देकर आज़ाद किया और यह कह दिया कि, ‘जब तलक मैं जीता रहूँ मेरी हालत की खोज-ख़बर लेना तुम्हारे लिये ज़रूरी है, आगे तुम मालिक हो।’ अब वही नमकहलाली से मेरे खाने की ख़बर लेते हैं और मैं इत्मीनान से इस मूर्ति की पूजा करता हूँ। जब तलक जीता हूँ मेरा यही काम है। यही मेरा हाल है जो तूने सुना है।

    फ़क़ीरों, मैं ने इस क़िस्से को सुनते ही कफ़नी गले में डाली और फ़क़ीरों का लिबास किया और उस देश को देखने के शौक़ में चल पड़ा। बहुत समय तक जंगलों-पहाड़ों की सैर करता हुआ मजनूँ और फ़रहाद की सूरत बन गया।

    आख़िर मेरे शौक़ ने उस शहर तलक पहुँचाया। गली कूचे में बावला सा फिरने लगा। अक्सर राजकुमारी के महल के आस-पास रहा करता। लेकिन कोई ढब ऐसा होता, जो वहाँ तलक पहुँच हो। अ’जब परेशानी थी कि जिस वास्ते इतनी मुसीबत उठाकर गया, वह मतलब हाथ आया।

    एक दिन बाज़ार में खड़ा था कि यकबारगी आदमी भागने लगे और दुकानदार दुकानें बन्द करके चले गए। या वह रौनक़ थी या सुनसान हो गया! एक तरफ़ से एक जवान रुस्तम सा, कल्ला-जबड़ा शेर की तरह गूँजता और दो दस्ती तलवार झाड़ता हुआ, ज़िरह-बक्तर गले में और टोप झल्लम का सर पर और तमंचे की जोड़ी कमर में, पागलों की तरह बकता-झकता नज़र आया। उसके पीछे दो ग़ुलाम नबात की पोशाक पहने, एक मख़मल का ताबूत शाफ़ी से मढ़ा हुआ सर पर लिये चले आते हैं।

    मैं ने यह तमाशा देख कर साथ चलने का इरादा किया। जो कोई आदमी मेरी नज़र पड़ता, मुझे मनअ' करता। लेकिन मैं कब सुनता हूँ? धीरे-धीरे वह जवाँमर्द एक आ’लीशान मकान में चला। मैं भी साथ हुआ। उसने पलटकर चाहा कि एक हाथ मारे और मेरे दो टुकड़े करे।

    मैं ने उसे क़सम दी कि, ‘मैं भी यही चाहता हूँ। मैं ने अपना ख़ून मुआ'फ़ किया। किसी तरह मुझे इस ज़िन्दगी के अ'ज़ाब से छुड़ा दे। मैं बहुत तंग चुका हूँ और मैं जान-बूझकर तेरे सामने आया हूँ। देर मत कर।’

    मुझे मरने पर साबित-क़दम देख कर, ख़ुदा ने उसके दिल में रहम डाला और उसका ग़ुस्सा भी ठंडा हुआ। बहुत तवज्जोह और मेहरबानी से पूछा कि, ‘तू कौन है और क्यों अपनी ज़िन्दगी से बेज़ार हुआ है?’

    मैं ने कहा, ‘ज़रा बैठिये तो कहूँ। मेरा क़िस्सा बहुत लम्बा-चौड़ा है। मैं इश्क़ के पंजे में गिरफ़्तार हूँ। इस सबब से लाचार हूँ।’ यह सुन कर उसने अपनी कमर खोली और हाथ-मुँह धो-धाकर कुछ नाश्ता किया। मुझे भी खिलाया। जब फ़राग़त होकर बैठा तो बोला कि, ‘तुझ पर क्या गुज़री? मैं ने सारी वारदात उस बूढ़े आदमी की और राजकुमारी की और अपने वहाँ जाने की कह सुनाई। पहले सुन कर रोया और राजकुमारी की और अपने वहाँ जाने की कह सुनाई। पहले सुनकर रोया और यह कहा कि, ‘इस कमबख़्त इश्क़ ने किस-किस का घर तबाह किया! लेकिन तेरा इलाज मेरे हाथ में है। मुमकिन है कि इस पापी के कारण तू अपने मतलब तक पहुँचे। तू खटका कर और इतमीनान रख।’ हज्जाम से कहा कि, ‘इसकी हजामत बनाकर, इस को हम्माम में नहला दे।’ एक जोड़ा कपड़ा उसके ग़ुलाम ने लाकर पहनाया। तब मुझसे कहने लगा कि, ‘यह ताबूत जो तूने देखा उसी मरहूम शहज़ादे का है जो पिंजरे में क़ैद था। उस को दूसरे वज़ीर ने आख़िर मक्र से मारा। उसकी तो मुक्ति हुई, पर बेगुनाह मारा गया। मैं उस का कोका हूँ। मैं ने भी उस वज़ीर को तलवार से मारा और बादशाह को मारने का इरादा किया। बादशाह गिड़गिड़ाया और क़सम खाने लगा कि मैं बेगुनाह हूँ। मैं ने उसे नामर्द जान कर छोड़ दिया। तब से मेरा काम यही है कि हर महीने की नौचन्दी जुमेरात को मैं इसी ताबूत को लिये इसी शहर में फिरता हूँ और उसका मातम करता हूँ।’

    उसकी ज़बानी यह हाल सुन ने में मुझे तसल्ली हुई कि अगर यह चाहेगा तो मेरा मतलब पूरा होगा। ख़ुदा ने बड़ा एहसान किया जो ऐसे पागल को मुझ पर मेहरबान किया। सच है ख़ुदा मेहरबान तो कुल मेहरबान। जब शाम हुई और सूरज डूबा, उस जवान ने ताबूत को निकाला और एक ग़ुलाम की जगह वह ताबूत मेरे सर पर धरा और अपने साथ लेकर चला। कहने लगा कि, ‘राजकुमारी के पास जाता हूँ और जहाँ तक हो सकेगा तेरी सिफ़ारिश करूंगा। तू हरगिज़ दम मत मारना, चुपका बैठ सुना करना।’

    मैं ने कहा, ‘जो-कुछ साहब फ़रमाते हैं वही करूँगा। ख़ुदा तुम को सलामत रखे, जो मेरे हाल पर तरस खाते हो।’ उस जवान ने बादशाही बाग़ चलने का इरादा किया। जब अन्दर दाख़िल हुआ, संग-ए-मरमर के एक चबूतरे पर जो बाग़ के सहन में था, एक सफ़ेद कपड़ा तना हुआ था और मोतियों की झालर लगी हुई थी। वह पत्थर के खम्भों पर खड़ा था और एक सुनहरा काम बनी हुई मसनद बिछी हुई थी। तकिया-गाव और बग़लीत किये ज़रबफ़्त के लगे हुए थे। वह ताबूत उस जवान ने रखवाया और हम दोनों से कहा कि, ‘उस दरख़्त के पास जा कर बैठो।’

    एक घड़ी के बाद मशअ'ल की रोशनी नज़र आई। मल्का ख़ुद और उसके साथ कई ख़्वासें आगे-पीछे तशरीफ़ ले आईं। लेकिन उदासी औग ग़ुस्सा चेहरे से ज़ाहिर था। आकर मसनद पर बैठीं। यह कोका अदब से हाथ बाँधे खड़ा रहा। फिर अदब से दूर फ़र्श के किनारे जा बैठा, फ़ातिहा पढ़ी और कुछ बातें करने लगा। मैं कान लगाए सुन रहा था। आख़िर उस जवान ने कहा कि, ‘मल्का-ए-जहाँ सलामत! अ’जम का शाहज़ादा आपकी ख़ूबियाँ लोगों से सुनकर अपनी बादशाहत को छोड़ कर और फ़क़ीर बनकर, इब्राहीम अद्हम की तरह, तबाह हुआ और बड़ी मुसीबत उठाकर यहाँ तलक पहुँचा। साईं ने तेरे कारण शहर बलख़ छोड़ा और इस शहर में बहुत दिनों से हैरान, परेशान फिरता है। आख़िर वह इरादा मरने का करके मेरे साथ लग चला। मैं ने तलवार से डराया, उसने गर्दन आगे धर दी और क़सम दी कि, ‘अब मैं यही चाहता हूँ, देर मत कर।’ ग़रज़ तुम्हारे इश्क़ में सच्चा है। मैं ने ख़ूब अज़माया, सब तरह पूरा पाया। इस सबब से उस की बात छेड़ी। अगर आप उसके हाल पर, मुसाफ़िर जान कर मेहरबानी करें तो बहुत अच्छा है।

    यह सब राजकुमारी ने सुन कर फ़रमाया, ‘कहाँ है, अगर शाहज़ादा है तो क्या हर्ज?’ वह कोका वहाँ से उठकर आया और मुझे साथ लेकर गया। मैं राजकुमारी को देख कर बहुत ख़ुश हुआ। लेकिन अक़्ल और होश जाते रहे। चुप रह गया। यह हिम्मत पड़ी कि कुछ कहूँ। कुछ ही देर में राजकुमारी सिधारी और कोका अपने मकान को चला। घर आकर बोला कि, ‘मैंने तेरा सब हाल कह सुनाया और सिफ़ारिश भी की। अब तू रोज़ रात को जाया कर और ऐ’श-खुशी मनअ’या कर।’

    मैं उन के क़दम पर गिर पड़ा। उसने गले लगा लिया। सारे दिन घड़ियाँ गिनता रहा कि कब साँझ हो जो मैं जाऊँ। जब रात हुई मैं उस जवान से रुख़्सत होकर चला और बाग़ में राजकुमारी के चबूतरे पर तकिया लगाकर जा बैठा।

    एक घड़ी के बाद राजकुमारी अकेले, एक ख़्वास को साथ लेकर धीरे-धीरे आकर मसनद पर बैठी। ख़ुशक़िस्मती से यह दिन मुयस्सर हुआ। मैं ने पाँव चूमे। उन्होंन मेरा सर उठा लिया और गले से लगा लिया और बोली, ‘इस मौक़े को ग़नीमत जान और मेरा कहा मान। मुझे यहाँ से ले निकाल, किसी और मुल्क़ को चल।’ मैं ने कहा, ‘चलिये।’ यह कह कर हम दोनों बाग़ के बाहर तो हुए, पर हैरत से और ख़ुशी से हाथ-पाँव फूल गए और राह भूल गए। एक तरफ़ को चले जाते थे, पर कुछ ठिकाना नहीं पाते थे। राजकुमारी बिगड़कर बोली कि, ‘अब मैं थक गई। तेरा मकान कहाँ है, जल्द चलकर पहुँच, नहीं तो क्या किया चाहता है, मेरे पाँव में फफोले पड़ गये हैं, रास्ते में कहीं बैठ जाऊँगी।’

    मैं ने कहा, ‘तेरे ग़ुलाम की हवेली नज़दीक है। अब पहुँचे, इतमीनान रखो और क़दम उठाओ।’ झूठ तो बोला पर दिल में हैरान था कि कहाँ ले जाऊँ? रास्ते में ही एक दरवाज़ा ताला लगा नज़र पड़ा जल्दी से ताला तोड़ मकान के भीतर गए। अच्छी हवेली, फ़र्श बिछा हुआ, शराब के शीशे भरे हुए, क़रीने से ताक़ में धरे और बावर्चीख़ाने में नान-कबाब तैयार थे। थकन बहुत थी, एक-एक गुलाबी शराब पुर्तगाली की, उस गज़क के साथ ली और सारी रात ख़ुशी मनअ’ई। जब इस चैन से सुब्ह हुई, शहर में गुल मचा कि राजकुमारी ग़ायब हुई। मुहल्ला-मुहल्ला गली-गली मुनादी फिरने लगी और कुटनियाँ और हरकारे छूटे कि जहाँ से भी हाथ आवे पैदा करें। शहर के सब दरवाज़ों पर बादशाही ग़ुलामों की चौकी बैठी। दरबानों को हुक्म हुआ कि बग़ैर इजाज़त च्यूँटी भी शहर के बाहर निकल सके। जो कोई राजकुमारी का पता चलायेगा, हज़ार अशर्फ़ी और शाही जोड़ा इनआ’म पावेगा। तमाम शहर में कुटनियाँ फिरने और घर-घर में घुसने लगीं।

    मुझे जो कमबख़्ती लगी, दरवाज़ा बन्द किया। एक बुढ़िया, (शैतान की ख़ाला, उसका ख़ुदा करे मुँह काला!) हाथ में तस्बीह लटकाए, बुर्क़ा ओढ़े दरवाज़ा खुला पाकर बेधड़कर चली आई और सामने खड़ी होकर हाथ उठाकर दुआ’’ देने लगी कि, ‘इलाही! तेरी सुहाग की नथ और जोड़ी सलामत रहे और कमाऊ की पगड़ी क़ायम रहे। मैं ग़रीब राँड फ़क़ीरनी हूँ। एक बेटी मेरी है कि वह पेट में बच्चा होने से दर्द के मारे मरती है और मेरे पास इतनी समाई नहीं कि अद्धी का तेल चिराग़ में जलाऊँ। खाने-पानी को कहाँ से लाऊँ? अगर मर गई तो कफ़न-दफ़न कैसे करूँगी और दाई जनाई को क्या दूँगी और ज़च्चा को सठौरा, अछवानी कहाँ से पिलाऊँगी? आज दो दिन हुए है कि भूखी-प्यासी पड़ी है। साहबज़ादी! अपनी ख़ैर कुछ टुकड़ा-पार्चा दिला, तो उसकी पानी पीने का आसरा हो।’

    राजकुमारी ने तरस खाकर, उसे अपने नज़दीक बुलाकर चार नान और कबाब और एक अंगूठी छंगुलिया से उतारकर हवाले की कि, ‘इस को बेच-बाचकर गहना-पाता बना लेना और इत्मीनान से गुज़र करना और कभी-कभी आया करना। यह तेरा घर है।’ उसने अपने दिल का मतलब जिसकी तलाश में आई थी, यहाँ आकर पाया। ख़ुशी से दुआ’एँ देती और बलाएँ लेती चली गई। डेवढ़ी में नान, कबाब फेंक दिया, मगर अंगूठी को मुट्ठी में ले लिया कि राजकुमारी का पता मेरे हाथ आया।

    ख़ुदा जिसे आफ़त से बचाया चाहे बचा लेता है। उस मकान का मालिक जवाँमर्द सिपाही घोड़े पर चढ़ा, भाला हाथ में लिये, शिकारबन्द से एक हिरन लटकाए पहुँचा। अपनी हवेली का ताला टूटा और किवाड़ खुले पाए। उस कुटनी को निकलते देखा, ग़ुस्से के मारे एक हाथ से उसका झोंटा पकड़कर लटका लिया और घर में आया। उसके दोनों पाँव में रस्सी बांधकर एक दरख़्त की टहनी में लटकाया। सर नीचे और पाँव ऊपर किया। ज़रा सी देर में तड़प-तड़पकर वह मर गई।

    उस मर्द की सूरत देख कर यह डर समाया कि कि हवाइयाँ उड़ने लगीं और कलेजा काँपने लगा। उसने हम दोनों को बदहाल देख कर तसल्ली दी और कहा कि, ‘बड़ी नादानी तुमने की जो ऐसा काम किया और दरवाज़ा खोल दिया।’

    राजकुमारी ने मुस्कराकर फ़रमाया कि, ‘शाहज़ादा अपने ग़ुलाम की हवेली कहकर मुझे ले आया और मुझे फुसलाया।’ उसने कहा कि, ‘शहज़ादे ने जो कुछ कहा सच कहा। जितने लोग हैं, बादशाहों के लौंडी-ग़ुलाम है। उन्हीं की मेहरबानी और दया से सब की परवरिश और निबाह है। यह ग़ुलाम बेदाम तुम्हारे हाथ बिका हुआ है। लेकिन भेद छुपाना अक़्ल से दूर है। शहज़ादे, तुम्हारा और राजकुमारी का इस ग़रीबख़ाने में तशरीफ़ लाना और यह मेहरबानी करना, मेरी बहुत बड़ी इज़्ज़त है। मैं निछावर होने को तैयार हूँ। किसी सूरत से, जान-माल से पीछे नहीं हटूँगा। आप आराम फ़रमाइये। अब कौड़ी-भर ख़तरा नहीं। यह बदमाश कुटनी अगर सलामत जाती तो आफ़त लाती। अब जब तलक मिज़ाज-ए-शरीफ़ चाहे, बैठे रहिये और जो-कुछ ज़रूरत हो इस ग़ुलाम से कहिये। सब हाज़िर करेगा। बादशाह तो क्या चीज़ है, तुम्हारी ख़बर फ़रिश्तों को भी होगी।’

    उस जवाँमर्द ने ऐसी-ऐसी बातें तसल्ली की कहीं कि डर जाता रहा। तब मैंने कहा, ‘शाबाश, तुम बड़े मर्द हो। इस सुलूक का बदला हमसे भी जब हो सकेगा तब देंगे। तुम्हारा नाम क्या है?’

    उसने कहा, ‘ग़ुलाम का नाम बहज़ाद खाँ है।’ ग़रज़ छः महीने तक जितनी ख़िदमत हो सकती थी, जी-जान से करता रहा। खूब आराम से गुज़री।

    एक दिन मुझे अपना मुल्क और माँ-बाप याद आए। इसलिए बेचैन बैठा था। मेरा चेहरा उदास देख कर बहज़ाद खाँ सामने हाथ बाँधकर खड़ा हुआ और कहने लगा, ‘इस ग़ुलाम से अगर कोई ग़लती हुई हो तो कह डालिए।’ मैं ने कहा, ‘ख़ुदा के लिए, यह क्या कह रहे हो? तुम ने ऐसा सुलूक किया कि इस शहर में ऐसे आराम से रहे, जैसे कोई अपनी माँ के पेट में रहता है। नहीं तो यह ऐसी हरकत हमसे हुई थी कि तिनका-तिनका हमारा दुश्मन था। ऐसा दोस्त हमारा कौन था कि ज़रा दम लेने देता। ख़ुदा तुम्हें खुश रखे, बड़े मर्द हो।’ तब उसने कहा, ‘अगर यहाँ से दिल उचाट हुआ हो तो जहाँ हुक्म हो सही सलामत पहुँच दूँ।’ मैं ने कहा कि, ‘अगर अपने वतन तक पहुँचू तो माँ-बाप को देखूं। मेरी तो यह सूरत हुई, ख़ुदा जाने उन पर क्या गुज़री। मैं ने जिस वास्ते वतन छोड़ा था, मेरी तो आर्ज़ू पूरी हुई अब। उन्हें भी देखना ज़रूरी है। मेरी ख़बर उन को कुछ नहीं कि मरा या जीता है। उनके दिल पर क्या बीती होगी?’ यह कह कर घोड़ा तुर्की सौ कोस चलने वाला और एक घोड़ी सधी राजकुमारी के वास्ते लाया और हम दोनों को सवार करवाया। फिर ज़िरह-बक्तर पहन, हथियार बाँध, सिपाही बन, अपने घोड़े पर सवार हुआ और कहने लगा, ‘ग़ुलाम आगे हो लेता है। साहब इत्मीनान के साथ घोड़ा दबाए हुये चले आवें।’

    जब शहर के दरवाज़े पर आया, एक नारा मारा और एक तबर से ताले को तोड़ा और दररबानों को डाँट-डपटकर ललकारा, ‘बदमाशो! अपने मालिक से जाकर कहो कि बहज़ाद खाँ राजकुमारी और शहज़ादे को जो तुम्हारा दामाद है, अपने साथ लिये जाता है। अगर हिममत है और मर्दानगी का कुछ नशा है तो बाहर निकलो और राजकुमारी को छीन लो। यह कहना कि चुपचाप ले गया। नहीं तो, क़िले में बैठे आराम किया करो।’ यह ख़बर बादशाह को जल्द जा पहुँची। वज़ीर और मीर बख़्शी को हुक्म हुआ कि ‘उन तीनों बदज़ात बदमाशों को बाँधकर लाओ, या उनके सर काटकर हुज़ूर में पहुँचाओ।’ कुछ देर के बाद फ़ौज बाहर निकल आई और तमाम ज़मीन-आसमान धूल से भरा गया। बहज़ाद खाँ ने राजकुमारी को और मुझे एक पुल के दर में जो बारह पुली और जौनपुर के पुल के बराबर था, खड़ा किया और आप घोड़े को मोड़कर उस फौज़ की तरफ़ फिरा और शेर की तरह डपटकर और घोड़े को मचकाकर फ़ौज के बीच घुसा। सारा लश्कर काई-सा फट गया और वह दोनों सरदारों तलक जा पहुँचा। दोनों के सर काट लिए। जब सरदार मारे गए, लश्कर तितिर-बितिर हो गई। वह कहावत है सर से सरवाह, जब बेल फूटी राई-राई हो गई। वैसे ही बादशाह ख़ुद कितनी फ़ौज बक्तरशों को साथ लेकर मदद को आये। उनकी भी लड़ाई इस अकेले जवान ने मार दी और बादशाह ने शिकस्त-ए-फ़ाश खाई।

    बादशाह पस्पा हुए। सच है फ़त्ह देने वाला अल्लाह है। लेकिन बहज़ाद खाँ ने ऐसी जवाँमर्दी दिखाई जो शायद रुस्तम से भी हो सकती। जब बहज़ाद खाँ ने देखा कि मामला साफ़ हुआ, अब कौन बाक़ी रहा है जो हमारा पीछा करेगा, बेखटके होकर और इत्मीनान करके, जहाँ हम खड़े थे, वहाँ आया और राजकुमारी को और मुझको साथ लेकर चला।

    सफ़र की उम्र छोटी होती है। थोड़े ही समय में अपने मुल्क की सरहद में जा पहुँचे। एक अ’र्ज़ी अपने सही-सलामत आने की अपने बाप बादशाह सलामत को लिखकर रवाना की। जहाँपनाह पढ़कर बहुत ख़ुश हुये। दो रकात नमाज़ शुक्र की पढ़ी, जैसे सूखे धान में पानी पड़े। खुश हो कर सब अमीरों को साथ लेकर इस नाचीज़ के स्वागत के लिये दरिया के किनारे खड़े हुए। कश्तियों के दरोग़ा को रस्सियों के वास्ते हुक्म हुआ। मैं ने दूसरे किनारे पर बादशाह की सवारी खड़ी देखी। उनके क़दम चूमने की आर्ज़ू में घोड़े को दरिया में डाल दिया। हेला मारकर हुज़ूर में हाज़िर हुआ। मुझे मारे शौक़ के कलेजे से लगा लिया।

    अब और एक आफ़त आई कि जिस घोड़े पर मैं सवार था, शायद बच्चा उसी घोड़ी का था जिस पर राजकुमारी सवार थी या मेरे घोड़े को देखकर घोड़ी ने भी जल्दी करके अपने को राजकुमारी समेत दरिया में गिराया और तैरने लगी। राजकुमारी घबराकर बाग खींची। वह मुँह की नर्म थी, उलट गई। राजकुमारी ग़ोते ख़्वार घोड़ी के साथ दरिया में बह गई। फिर उन दोनों का निशान नज़र आया। बहज़ाद खाँ ने यह हालत देख कर अपने को घोड़े समेत राजकुमारी की मदद के लिये दरिया में पहुँचाया। वह भी इस भँवर में गया, फिर निकल सका। बहुतेरे हाथ-पाँव मारे, कुछ बस चला, डूब गया।

    जहाँपनाह ने यह वारदात देख कर बड़ा जाल मंगवाकर फेंकवाया और मल्लाहों और ग़ोताख़ोरों से कहा। उन्होंने सारा दरिया छान मारा, यहाँ तक मिट्टी तक ले-ले आए। पर वे दोनों हाथ आए।

    फ़क़ीरो! यह घटना ऐसी हुई कि मैं पागल और दीवाना हो गया और फ़क़ीर बनकर यही कहता फिरता था, ‘इन नैनों का यही बिसेख, वह भी देखा, यह भी देखा।’ अगर राजकुमारी कहीं ग़ायब हो जाती या मर जाती तो दिल को तसल्ली आती। फिर तलाश को निकलता या सब्र करता। लेकिन जब नज़रों के सामने डूब गई तो कुछ बस चला। आख़िर जी में यही लहर आई कि दरिया में डूब जाऊँ, शायद मर कर अपने महबूब को पाऊं। एक रोज़ रात को उसी दरिया में बैठा और डूबने का इरादा करके, गले तक पानी में गया। चाहता था कि आगे पाँव रखूं और ग़ोता खाऊँ कि वही बुर्क़ापोश सवार, जिन्हों ने तुम को ख़बर दी थी, आया, मेरा हाथ पकड़ लिया और दिलासा दिया कि, ‘इतमीनान रख, मल्का और बहज़ाद खाँ जीते हैं। तू क्यों मुफ़्त में अपनी जान खोता है? दुनियां में ऐसा भी होता है। ख़ुदा की दरगाह से मायूस मत हो। अगर जीता रहेगा तो तेरी मुलाक़ात उन दोनों से एक रोज़ होकर रहेगी। अब तू रूम की तरफ़ जा और भी दो ज़ख़्मी दिल फ़क़ीर वहाँ गए हैं उन से तू जब मिलेगा, अपनी मुराद को पहुँचेगा।’

    फ़क़ीरों! उस बुज़ुर्ग के हुक्म पर मैं भी आपकी ख़िदमत में पहुँचा। उम्मीद यही है कि हर-एक अपने-अपने मंज़िल को पहुँचेगा। इस टुकड़गदे का यही हाल था जो पूरा-पूरा कह सुनाया।

    सैर चौथे दर्वेश की :-

    चौथा फ़क़ीर अपनी सैर का हाल रो-रोकर इस तरह दुहराने लगा-

    क़िस्सा हमारी बेसर-ओ-पाई का अब सुनो,

    टुक अपना ध्यान रख के मेरा हाल सब सुनो।

    किस वास्ते मैं आया हूँ यां तक तबाह हो,

    सारा बयान करता हूँ, उसका वह सब सुनो।।

    फ़क़ीरो! ज़रा तवज्जोह करो। यह फ़क़ीर जो इस हालत में गिरफ़्तार है, चीन के बादशाह का बेटा है। नाज़-ओ-नेमत से परवरिश पाई और बहुत अच्छी तरह तर्बियत हुई। ज़माने के भले-बुरे से कुछ वाक़िफ़ था। जानता था कि यूँ ही हमेशा निभेगी। पर उसी बेफ़िक्री के आ’लम में यह हादिसा हुआ हुआ कि बादशाह सलामत जो इस यतीम के बाप थे, परलोक सिधारे और दम निकलते वक़्त अपने छोटे भाई को जो मेरे चचा हैं बुलाया और कहा कि, ‘हम ने तो सब माल-मुल्क छोड़ कर सफ़र का इरादा किया, लेकिन मेरी यह वसीयत तुम पूरी करना और अपने बड़े होने का पूरी तरह लिहाज़ रखना। जब तलक शहज़ादा जो इस तख़्त और छत्र का मालिक है जवान हो, होश सँभाले और अपना घर देखे-भाले, तुम इसकी जगह बादशाहत का इंतिज़ाम करना और सिपाहियों और रिआया को ख़राब होने देना। जब यह बालिग़ हो तो समझा-बुझाकर तख़्त हवाले करना और रौशन अख़्तर जो तुम्हारी बेटी है, उस से मेरे शहज़ादे की शादी कर के तुम बादशाहत से किनारा पकड़ना। इस सुलूक से बादशाहत हमारे ख़ानदान में क़ायम रहेगी और कोई गड़बड़ी पैदा होगी।’

    यह सुन कर उन्होंने तो प्राण त्याग दिये और चचा बादशाह हुआ। वह मुल्क का बन्दोबस्त करने लगा। मुझे हुक्म हुआ कि ज़नाने महल में रहा करे और जब तलक जवान हो बाहर निकले। मैं चौदह बरस की उम्र तक बेगमों और ख़्वासों में पला किया और खेला-कूदा किया। चचा की बेटी से शादी की ख़बर सुन कर ख़ुश था और इस उमीद पर बेफ़िक्र रहता और दिल में कहता कि कुछ ही दिनों में शादी भी होगी और बादशाहत भी हाथ लगेगी। दुनिया उम्मीद पर क़ायम है।

    मुबारक नाम का मेरा एक हब्शी थी, जो वालिद मरहूम के ज़माना से ही यहाँ था। उसका बड़ा एतबार था। वह बड़ा समझदार और नमक हलाल था। मैं अक्सर उसके नज़दीक जा बैठता। वह भी मुझे बहुत प्यार करता और मेरी जवानी देख कर ख़ुश होता और कहता कि, ‘ख़ुदा का शुक्र है शहज़ादे! अब तुम जवान हुए। ख़ुदा ने चाहा, बहुत जल्द तुम्हारा चचा तुम्हारे बाप की वसीयत पर अमल करेगा। अपनी बेटी और तुम्हारे बाप का तख़्त तुम्हें देगा।’

    एक रोज़ यह इत्तिफ़ाक़ हुआ कि एक मा’मूली सहेली ने बेगुनाह मुझे ऐसा तमाचा खींच मारा कि मेरे गाल पर पांचों उंगलियों का निशान उखड़ आया। मैं रोता हुआ मुबारक के पास गया। उसने मुझे गले से लगा लिया और आंसू आस्तीन से पोंछे और कहा कि, ‘चलो आज तुम्हें बादशाह के पास ले चलूं। शायद देख कर मेहरबान हो और लायक़ समझकर तुम्हारा हक़ तुम्हें दे।’ उसी वक़्त चचा के हुज़ूर में ले गया। चचा ने दरबार में बहुत मेहरबानी की और पूछा कि ‘क्यों उदास हो और आज यहाँ कैसे आये?’

    मुबारक बोला, ‘कुछ अ’र्ज़ करने आए हैं।’ यह सुनकर ख़ुद-बख़ुद कहने लगा कि, ‘अब मियां का ब्याह करना है।’

    मुबारक ने कहा, ‘बहुत मुबारक है।’ उसी वक़्त नजूमी और रम्मालों को सामने तलब किया और ऊपरी दिल से पूछा कि, ‘इस साल कौन सा महीना और कौन सा दिन और मुहूर्त मुबारक है कि शादी का इंतिज़ाम करूँ?’

    उन्होंने मर्ज़ी पाकर गिन-गिनाकर अ'र्ज़ किया कि, ‘क़िबला-ए- आ’लम! यह सारा साल मनहूस है। किसी चांद में कोई तारीख़ अच्छी नहीं ठहरती। अगर यह साल सारा असल-ख़ैरियत से कटे तो अगला बस इस शुभ काम के लिए बेहतर है।’

    बादशाह ने मुबारक की तरफ़ देखा और कहा कि, ‘शहज़ादे को महल में ले जा। ख़ुदा चाहे तो इस साल के गुज़रते उसकी अमानत उसके हवाले करूँगा। इतमीनान रखे और पढ़े लिखे।’ मुबारक ने सलाम किया और मुझे साथ लिया। महल में पहुँचा दिया। दो-तीन दिन के बाद मैं मुबारक के पास गया। मुझे देखते ही वह रोने लगा। मैं हैरान हुआ कि, ‘दादा! ख़ैर तो है, तुम्हारे रोने का क्या सबब है?’ तब यह खैरख़्वाह जो मुझे दिल-ओ-जान से चाहता था, बोला कि, ‘मैं उस रोज़ तुम्हें उस ज़ालिम के पास ले गया। काश यह जानता तो ले जाता!’

    मैं ने कहा, ‘मेरे जाने में ऐसी क्या क़बाहत हुई? कहो तो सही।’

    तब उस ने कहा, ‘सब अमीर, वज़ीर, दरबारी, छोटे-बड़े, तुम्हारे बाप के वक़्त के, तुम्हें देख कर ख़ुश हुए और ख़ुदा का शुक्र करने लगे कि अब हमारा शहज़ादा जवान हुआ और बादशाहत के लायक़ हुआ। अब कुछ ही दिनों में हक़ हक़दार को मिलेगा। तब हमारी क़द्रदानी करेगा और अपने बाप के वक़्त के ग़ुलामों और नौकरों की क़द्र समझेगा।’ यह ख़बर उस बेईमान को पहुँची। उसकी छाती पर साँप फिर गया। मुझे अकेले में बुलाकर कहा कि, ‘ऐ मुबारक! अब ऐसा काम कर कि शाहज़ादे को किसी फ़रेब से मार डाल और उस का ख़तरा मेरे जी से निकाल, तब मुझे इत्मीनान हो। यह सुन कर मैं बदहवास हो रहा हूँ कि तेरा चचा तेरी जान का दुश्मन हुआ।’

    जैसे ही मुबारक से यह नामुबारक ख़बर मैं ने सुनी, बग़ैर मारे मर गया और जान के डर से उस के पाँव पर गिर पड़ा कि, ‘खुदा के वास्ते मैं ने बादशाहदत से हाथ खींचा, किसी तरह मेरी जान बचे।’

    उस वफ़ादार ग़ुलाम ने मेरा सर उठा कर छाती से लगा लिया और जवाब दिया कि, ‘कुछ ख़तरा नहीं। एक तदबीर मुझे सूझी है। अगर काम गई तो कुछ चिन्ता नहीं। ज़िन्दगी है तो सब कुछ है। मुमकिन है कि इस फ़िक्र से तेरी जान भी बचे और अपने मतलब में भी कामयाब हो।’

    यह भरोसा दे कर, मुझे साथ लेकर उस जगह गया, जहाँ मेरे बाप सोते बैठते थे। उस ने मुझे बहुत इत्मीनान दिलाया। वहाँ एक कुर्सी बिछी थी, एक तरफ़ मुझे बैठने को कहा और एक तरफ़ आप पकड़ कर कुर्सी को खिसकाया। कुर्सी के तले का फ़र्श उठाया और ज़मीन को खोदने लगा। यकबारगी एक खिड़की नज़र आई, जिस में जंजीर और ताला लगा था। मुझे बुलाया। मैं अपने दिल में यह समझा कि यक़ीनन मुझे मार देने और गाड़ देने को यह गढ़ा उसने खोदा है। मौत आँखों के आगे फिर गई। लाचार चुपके-चुपके कलमा पढ़ता हुआ नज़दीक गया। देखता हूँ तो उस खिड़की के अन्दर इमारत है औऱ चार मक़ान है और हर-एक दालान में दस-दस गोलियाँ सोने की जंजीरों में जकड़ी हुयी लटकती हैं और हर-एक गोली के मुँह पर एक सोने की ईंट और एक जड़ाऊ-बन्दर बना हुआ बैठा है। उन्तालीस गोलियाँ चारों मकानों में गिनीं और एक मटके में देखा कि मुँहामुँह अशर्फ़ियों से भरा है। उस पर बन्दर है, ईंट है। एक हौज़ जवाहिरात से लबालब भरा हुआ देखा। मैं ने मुबारक से पूछा कि, ‘ऐ दादा! यह क्या तिलिस्म है? किस का मकान है और यह किस काम के हैं?’

    बोला कि, ‘यह बन्दर जो देखते हो, उन की यह हक़ीक़त है कि तुम्हारे बाप ने जवानी के ज़माने में मालिक सादिक़, जो जिन्नों का बादशाह है, उस के साथ दोस्ती की और आना-जाना शुरू किया था। चुनांचे हर साल में कई बार कई तरह की ख़ुशबूएँ और इस मुल्क की सौग़ातें ले जाते और एक महीने के क़रीब उस की ख़िदमत में रहते। जब जाने लगते तो मलिक सादिक़ बादशाह को ज़मुर्रद का एक बन्दर देता। हमारा बादशाह उसे लाकर इस तहख़ाने में रखता। इस बात से सिवाय मेरे और कोई वाक़िफ़ था। एक बार ग़ुलाम ने अ’र्ज़ किया कि, ‘जहाँपनाह! लाखों रुपये के तोहफ़े ले जाते हैं और वहाँ से एक पत्थर का मुर्दा बन्दर आप ले आते हैं। इस का आख़िर फ़ायदा क्या है?’ मेरी इस बात का मुस्कराकर जवाब दिया, ‘ख़बरदार! कहीं ज़ाहिर करना लेकिन बता देना ज़रूरी है। यह एक-एक बन्दर जो तू देखता है, हर एक के हज़ार देव ज़बरदस्त ता’बेदार हैं और हुक्म मानने वाले हैं। लेकिन जब तलक मेरे पास चालीसों बन्दर पूरे जमा’ हों तब तक ये सब निकम्मे हैं। कुछ काम आएँगे। सो एक बन्दर की कमी थी कि उसी बरस बादशाह की मौत हुई। इतनी मेहनत कुछ काम आई, उसका फ़ायदा ज़ाहिर हुआ। शहज़ादे! तेरी यह हालत बेकसी को देख कर तुझे मलिक सादिक़ के पास ले चलूँ और तेरे चचा का ज़ुल्म बयान करूँ। उम्मीद यही है कि तुम्हारे बाप की दोस्ती याद करके एक बन्दर जो बाकी है तुझे दे। तब उनकी मदद से तेरा मुल्क तेरे हाथ आवे और चीन की बादशाहत तुझे मिले। अगर और कुछ हुआ तो तेरी जान बचती है। इस ज़ालिम के हाथ से सिवाय इस के कोई सूरत बचाव की नज़र नहीं आती।’

    मैं ने उस से यह सब हाल सुन कर कहा, ‘दादा जान, अब तू मेरी जान का मालिक है। जो मेरे लिये भला हो, सो कर।’ मुझे तसल्ली दे कर वह ख़ुद इत्र और जो कुछ ले जाने की ख़ातिर मुनासिब जाना, ख़रीदने बाज़ार गया।

    दूसरे दिन उस ज़ालिम चचा के पास गया और कहा, ‘जहांपनाह! शहज़ादे को मार डालने की एक सूरत मैं ने सोची है। अगर हुक्म हो तो अ’र्ज़ करूँ?’

    वह कम्बख़्त खुश होकर बोला, ‘वह क्या तर्कीब है?’

    तब मुबारक ने कहा, ‘उस को मार डालने में सब तरह आप की बदनामी है। अगर मैं उसे बाहर जंगल में ले जाकर ठिकाने लगाऊँ और गाड़-दबाकर चला आऊँ तो हरगिज़ कोई जानेगा कि क्या हुआ।’

    मुबारक से यह सुन कर बोला, ‘बहुत अच्छा, मैं यह चाहता हूँ कि वह बाक़ी रहे। उस का खटका मेरे दिल में है। अगर मुझे इस फ़िक्र से छुड़ावेगा तो इस ख़िदमत के बदले बहुत कुछ पावेगा। जहाँ तेरा जी चाहे ले जावे और खपावे। मुझे सिर्फ़ यह ख़ुशख़बरी लावे।’

    मुबारक ने बादशाह की तरफ़ से इत्मीनान करके मुझे साथ लिया और वह तोहफ़ा साथ लेकर आधी रात को शहर से चल पड़ा। वह उत्तर की तरफ़ चला। एक महीने तक हम दोनों लगातार चलते रहे। एक रात को चले जाते थे कि मुबारक बोला, ‘शुक्र खुदा का! अब अपनी मंज़िल पर पहुँचे।’

    मैं ने सुनकर कहा, ‘दादा! यह तूने क्या कहा?’

    कहने लगा, ‘ऐ शहज़ादे, जिन्नों का लश्कर क्या नहीं देखता?’

    मैं ने कहा, ‘मुझे तेरे सिवा और कुछ दिखाई नहीं देता।’ मुबारक ने एक सुर्मेदानी निकाल कर सुलेमानी सुर्मे की सलाइयाँ मेरी दोनों आँखों में फेर दी। उस के बाद जिन्नों का समूह और लश्कर के तम्बू-क़नात नज़र आने लगे। वे सब ख़ूबसूरत थे और अच्छे कपड़े पहने हुए थे। मुबारक को पहचान कर हर एक गले मिलता और मज़ाक़ करता।

    आख़िर जाते-जाते शाही महल के नज़दीक पहुँचे और दरबार में दाख़िल हुए। देखता हूँ तो रोशनी हो रही है। दोनों तरफ़ तरह-तरह की कुर्सियाँ बिछी हुई हैं। आ’लिम-फ़ाज़िल, फ़कीर और अमरी, वज़ीर, दीवान, उन पर बैठे हैं और सिपाही हाथ-बाँधे खड़े हैं। बीच में एक जड़ाऊ तख़्त बिछा है। उस पर मालिक सादिक़ ताज औऱ मोतियों की लड़ियां पहने हुए, मसनद पर, तकिये लगाए, बड़ी शान-शौक़त से बैठा है। मैं ने नज़दीक जाकर सलाम किया। मुहब्बत के साथ उसने बैठने को कहा। फिर खाना आया। खाने के बाद, मुबारक से मेरा हाल पूछा। मुबारक ने कहा, ‘अब इन के बाप की जगह पर इनका चचा बादशाहत करता है और इन का जानी दुश्मन हुआ है। इसलिये मैं इन को वहाँ से लेकर भागा। आपकी ख़िदमत में आया हूँ कि यह यतीम हैं और बादशाहत पर इनका हक़ है। लेकिन बिना किसी सहारे के कुछ नहीं हो सकता। हुज़ूर की मदद से इस सताये हुए लड़के की परवरिश हो सकती है। इस के बाद की ख़िदमत का हक़ याद कर के इसकी मदद फ़रमाइये और वह चालीसवाँ बन्दर दीजिये, ताकि चालीस पूरे हों और यह अपना हक़ पाकर आपके जान-ओ-माल को दुआ’’ दे। सिवाय आप की मदद के इसका ठिकाना नज़र नहीं आता।’

    यह सारा हाल सुन कर, सादिक़ ने ज़रा देर रुक कर कहा, ‘वाक़ई’ इस के बाप की ख़िदमत और दोस्ती का हक़ हमारे ऊपर बहुत है। यह बेचारा तबाह होकर अपनी बादशाहत छोड़ कर यहाँ तलक आया है। हमारी छाया में पनाह ली है। जहाँ तक हम से हो सकेगा कमी होगी। लेकिन एक काम हमारा है। अगर वह इस से हो सका, बेईमानी की, अच्छई तरह पूरा किया और इस इम्तिहान में पूरा उतरा तो मैं वा’दा करता हूँ कि बादशाह से ज़ियादा सुलूक करूँगा और जो यह चाहेगा सो दूँगा।’

    मैं ने हाथ बाँधकर कहा, ‘इस ग़ुलाम से जहाँ तक ख़िदमत सरकार की हो सकेगी, जान-ओ-दिल से करता रहेगा और उस को ख़ूबी, ईमानदारी और होशियारी से करेगा और अपने लिये मुबारक जानेगा।’

    सादिक़ ने कहा, ‘तू अभी लड़का है, इसलिये बार-बार कहता हूँ कि कहीं ऐसा हो कि बेईमानी करे और आफ़त में पड़े।’

    मैं ने कहा, ‘ख़ुदा आप के इक़बाल से यह मुशकिल आसान करेगा और जहाँ तक मुझ से हो सकेगा कोशिश करूँगा और अमानत हुज़ूर तक ले आऊँगा।’

    यह सुन कर मालिक सादिक़ ने मुझ को क़रीब बुलाया और काग़ज निकाल कर मुझे दिखलाया और कहा, ‘यह जिस शख़्स की तस्वीर है, उसे जहाँ से भी हो तलाश करके मेरे पास ला। और जिस घड़ी तू इस का नाम और निशान पावे और सामने जावे, मेरी तरफ़ से बहुत शौक़ ज़ाहिर कीजो। अगर यह ख़िदमत तुझ से हो सकी तो जो कुछ तू चाहता है, उससे ज्यादा मदद की जायेगी और अगर नहीं तो जैसा करेगा वैसा पायेगा।’

    मैं ने उस काग़ज़ को जो देखा, एख तस्वीर दिखाई दी और मुझे ग़श सा आने लगा। मारे डर के अपने आपको सँभाला और कहा, ‘बहुत अच्छा, मैं चलता हूँ। अगर ख़ुदा को मेरा भला करना है तो जो कुछ आपने कहा है पूरा होगा।’

    यह कह कर, मुबारक को साथ लेकर जंगल की राह ली। गाँव-गाँव, बस्ती-बस्ती, शहर-शहर, मुल्क-मुल्क फिरने लगा और हर एक से उसका नाम-ओ-निशान पूछने लगा। किसी ने कहा, ‘हाँ, मैं जानता हूँ या किसी से सुना है।’ सात बरस तक इसी तरह हैरानी और परेशानी सहता हुआ एक नगर में जा पहुँचा। शहर आबाद था। लेकिन वहाँ का हर आदमी, इस्म-ए-आ’ज़म पढ़ता और ख़ुदा की बन्दगी करता था।

    एक अन्धा हिन्दुस्तानी फ़क़ीर भीख माँगता नज़र आया। लेकिन किसी ने एक कौड़ी या एक निवाला दिया। मुझे तअ’ज्जुब हुआ और उस के ऊपर रहम खाया। जेब में से एक अशर्फ़ी निकाल कर उस के हाथ में दी। वह लेकर बोला, ‘ऐ दाता, ख़ुदा तेरा भला करे! तू शायद मुसाफ़िर है। इस शहर का रहने वाला नहीं है।’ मैं ने कहा, ‘सच कहता है। सात बरस से मैं तबाह हुआ हूँ, जिस काम से निकला हूँ उसका पता नहीं मिलता। आज इस शहर में पहुँचा हूँ।’ वह बूढ़ा दुआ’’एं देकर चला। मैं उस के पीछे लग लिया। शहर के बाहर, एक आ’लीशान मकान नज़र आया और वह उस के अन्दर गया। मैं भी चला। देखा तो जा-बजा से मकान गिर पड़ा है और बेमरम्मत हो रहा है।

    मैं ने दिल में कहा, यह महल बादशाहों के लायक़ है। जिस वक़्त तैयारी इसकी हुई होगी, कैसा ख़ूबसूरत, अच्छा और शानदार मकान बना होगा और अब तो वीरानी से क्या हालत हो रही है। यह मा’लूम नहीं कि उजाड़ क्यों पड़ा है और यह अन्धा इस महल में क्यों रहता है? वह अन्धा लाठी टेकता हुआ चला जाता था कि एक आवाज़ आई जैसे कोई कहता कि, बाप! ख़ैर तो है? आज सवेरे क्यों वापस चले आते हो।’

    बूढ़े ने सुन कर जवाब दिया, ‘बेटी! ख़ुदा ने एक जवान मुसाफ़िर को मेरे हाल पर मेहरबान किया। उस ने एक अशर्फ़ी मुझ को दी। बहुत दिनों से पेट भर कर अच्छा खाना खाया था, सो गोश्त, मसाला, घी, तेल आटा नून मोल लिया औऱ तेरे लिये जो कपड़ा ज़रूरी था, ख़रीदा। अब उस को काट और सीकर पहन और खाना पका तो खा-पीकर उस सख़ी के हक़ में दुआ’’ दें। अगरचे उस के दिल का मतलब मा’लूम नहीं, पर ख़ुदा अक़्ल वाला और आँख वाला है। शायद हम बेकसों की दुआ’’ क़ुबूल करे।’

    मैं ने जब उस के फ़ाकों का हाल सुना, बेइख़्तियार जी में आया कि बीस अशर्फ़ियाँ और उस को दूँ। लेकिन आवाज़ की तरफ़ जो ध्यान गया तो एक औ’रत देखी कि ठीक वह तस्वीर उसी मा’शूक़ की थी। तस्वीर को निकाल कर मुक़ाबला किया। बाल बराबर फ़र्क़ देखा। एक ना’रा दिल से निकला और बेहोश हुआ! मुबारक मुझे बग़ल में ले कर बैठा और पंखा करने लगा। मुझ से ज़रा सा होश आया, उसी की तरफ़ ताक रहा था कि मुबारक ने पूछा कि, ‘तुम को क्या हो गया?’ अभी जवाब मुँह से नहीं निकला था कि वह नाज़नीन बोली, ‘ऐ जवान, ख़ुदा से डर और बेगानी स्त्री पर निगाह मत कर। हया और शर्म सब को ज़रूरी है।’

    इस लियाक़त से उस ने बातचीत की कि मैं उस की सूरत उस की सीरत पर फ़रेफ़्ता हो गया। मुबारक मेरी बहुत ख़ातिरदारी करने लाग। लेकिन दिल की हालत की उस को क्या ख़बर थी? लाचार होकर मैं ने पुकारा कि, ‘ऐ ख़ुदा के बन्दो और इस मकान के रहने वालो! मैं ग़रीब मुसाफ़िर हूँ। अगर अपने आप मुझे बुलाओ और रहने की जगह दो तो बड़ी बात है।’ उस अन्धे ने नज़दीक बुलाया और आवाज़ पहचान कर गले लगाया। फिर जहाँ वह गुलबदन बैठी थी, उस मकान में मुझे ले गया। वह एक कोने में छुप गई।

    उस बूढ़े ने मुझ से पूछा कि, ‘अपना हाल कह कि क्यों घर-बार छोड़ कर अकेला मारा-मारा फिरता है? तुझे किस की तलाश है?’ मैं ने ‘मलिक सादिक़’ का नाम लिया और वहाँ का कुछ ज़िक्र-चर्चा किया। उस से इस तरह का कहा कि, ‘यह बेकस चीन का शहज़ादा है। मेरे बाप अब भी बादशाह हैं। इसलिये एक सौदागर से लाखों रुपये दे कर यह तस्वीर मोल ली थी। इस के देखते सब होश-आराम जाता रहा और फ़क़ीर का भेस कर के सारी दुनिया छान मारी। अब यहाँ मेरा मतलब मिला है, सो तुम्हारा इख़्तियार है।’

    यह सुन कर अन्धे ने एक आह भरी और बोला, ‘ऐ अज़ीज़, मेरी लड़की बड़ी मुसीबत में गिरफ़्तार है। किसी आदमी की मजाल नहीं कि इससे शादी करे और फल पावे।’

    मैं ने कहा, ‘मैं उमीदवार हूँ। पूरा-पूरा हाल बयान करो।’

    तब उस अजमी ने अपना हाल इस तरह से बयान करना शुरू किया कि, ‘सुन बादशाहज़ादे! मैं इस शहर का रईस और यहाँ के बड़े लोगों में से हूँ। मेरे पुरखे बड़े आ’ली ख़ानदान और नाम वाले थे। ख़ुदा ने मुझे यह बेटी दी। जब बालिग़ हुई तो उस की ख़ूबसूरती, नज़ाकत और सलीक़े का शोर हुआ और सारे मुल्क में यह मशहूर हुआ कि फ़लाने के घर में ऐसी लड़की है कि जिस के रूप के सामने अप्सरा और परी शर्मिन्दा हों, इन्सान का तो क्या मुँह है कि बराबरी करे? यह ता’रीफ़ इस शहर के शहज़ादे ने सुनी और बिना देखे-भाले आ’शिक़ हुआ। खाना-पीना छोड़ दिया। अठवाटी-खटवाटी ले कर पड़ा।

    आख़िर बादशाह को यह बात मा’लूम हुई। मुझे रात को अकेले में बुलाया और इस बात का ज़िक्र किया। मुझे बातों में फुसलाया। यहाँ तक कि निस्बत-नाता करने पर राज़ी किया। मैं ने भी समझा कि जब घर में पैदा हुई है तो किसी किसी से ब्याही ही जाएगी। इस से अच्छी बात क्या हो सकती है कि बादशाहज़ादे से ब्याही जाय? इस में बादशाह भी एहसान मानता है। मैं बात पक्की करके रुख़्सत हुआ। उसी दिन से दोनों तरफ़ ब्याह की तैयारी होने लगी। एक रोज़ अच्छी घड़ी देख कर, क़ाज़ी, मुफ़्ती, आ’लिम, फ़ाज़िल और शहर के बड़े आदमी जमा’ हुए। निकाह हुआ। महर बाँधा गया। दुल्हन को बड़ी धूम-धाम से ले गए। सब रीति-रस्म करके फ़ारिग़ हुए। दूल्हा ने रात को दुल्हन के पास जाने का इरादा किया। उस मकान में शोर-गुल ऐसा हुआ कि जो लोग बाहर चौकी में थे, हैरान हुए। दरवाज़ा कोठरी का खोल कर चाहा देखें यह क्या आफ़त है? दरवाज़ा अन्दर से ऐसा बन्द था कि किवाड़ खोल सके। कुछ देर में वह रोने की आवाज़ भी कम हुई। पट की चूल उखाड़ कर देखा तो दूल्हा का सर कटा हुआ तड़पता है। दुल्हन के मुंह से कफ़ चला जाता है और वह उसी मिट्टी-लहू में लुथड़ी हुई बदहवास पड़ी लोटती है।

    यह क़यामत देख कर सब के होश जाते रहे। ऐसी ख़ुशी में यह ग़म ज़ाहिर हुआ। बादशाह को यह ख़बर पहुँची। सर पीटता हुआ दौड़ा। सब अमीर और दरबारी जमा’ हुए पर किसी की अक़्ल काम नहीं करती थी कि इस मा’मले की हक़ीक़त को पहुँचे। बादशाह ने बड़े कलफ़ और ग़म की हालत में यह हुक्म किया कि, ‘इस कमबख़्त भौड़ पैरी दुल्हन का सर भी काट लो।’ यह बात जैसे ही बादशाह की ज़बान से निकली, फिर वैसा ही हंगामा हो गया। बादशाह डरा और अपनी जान के डर से निकल भागा और फ़र्माया कि इसे महल से बाहल निकाल दो। कनीज़ों ने इस लड़की को मेरे घर पहुंचा दिया। यह चर्चा दुनिया में मशहूर हुआ। जिस ने सुना, हैरान हुआ। शाहज़ादे के मारे जाने के सबब से ख़ुद बादशाह और जितने रहने वाले इस शहर के हैं, सब मेरे जानी दुश्मन हुए।

    जब मातमदारी से फ़राग़त हुई और चालीसवाँ हो चुका, बादशाह ने वज़ीरों और अमीरों से सालह पूछी कि, ‘अब क्या करना चाहिए?’ सभों ने कहा, ‘और कुछ तो हो नहीं सकता। पर ज़ाहिर में दिल की तसल्ली और सब्र के वास्ते उस लड़की को उस के बाप समेत मरवा डालिये और घर-बार ज़ब्त कर लीजिये।’

    जब मेरी यह सज़ा तै हुई और कोतवाल को हुक्म हुआ तो उस ने आकर चारों तरफ़ से मेरी हवेली को घेर लिया। उस ने नरसिंहा दरवाज़ें पर बजाया और चाहा कि अन्दर घुसे और बादशाह का हुक्म पूरा करे। अचानक ऊपर से ईंट-पत्थर ऐसे बरसने लगे कि सारी फौज़ ताब ला सकी। अपना सर-मुंह बचा कर जिधर-तिधर भागी और एक आवाज़ डरावनी बादशाह ने महल में अपने कानों में सुनी कि, ‘क्यों कमबख़्ती आई है कि शैतान लगा है। भला चाहता है, तो उस नाज़नीन को अपने हाल पर छोड़ दे। नहीं तो जो तेरे बेटे ने उस से शादी करके देखा, तू भी उस की दुश्मनी से देखेगा। अब अगर तू उस को सतावेगा तो सज़ा पावेगा।’

    बादशाह को दहशत के मारे बुख़ार चढ़ा। उसी वक्त हुक्म दिया कि, ‘इन बदबख़्तों को इन के हाल पर छोड़ दो। कुछ कहो सुनो। हवेली में पड़ा रहने दो। ज़ोर-ज़ुल्म इन पर मत करो।’ उस दिन से आ'मिल, बाद-बतास जानकर दुआ’'-ता’वीज़ और सयाने जंत्र-तंत्र करते हैं और यहाँ के सब रहने वाले ‘इस्म-ए-आज़म’ और क़ुरआन शरीफ़ पढ़ते हैं। मुद्दत से यह तमाशा हो रहा है। लेकिन अब तक कुछ भेद नहीं खुलता और मुझे भी हरगिज़ कोई ख़बर नहीं। मगर उस लड़की से एक बार पूछा कि, ‘तू ने अपनी आँखों से क्या देखा था?’ तो वह बोली कि, ‘और तो मैं कुछ नहीं जानती लेकिन यह दिखाई दिया कि जिस वक़्त मेरे शौहर ने संभोग का इरादा किया, छत फट कर एक सोना का जड़ाऊ तख़्त निकला। उस पर एख ख़ूबसूरत जवान शाहाना लिबास पहने बैठा था। उस के साथ बहुत से आदमी उस मकान में आए और शहज़ादे को क़त्ल करने को तैयार हुए। वह शख़्स सरदार मेरे नज़दीक आया और कहा, ‘क्यों जानी, अब हम से कहाँ भागोगी?’ उनकी सूरतें आदमी की सी थीं, लेकिन पाँव बकरियों के से नज़र आए। मेरा कलेजा धड़कने लगा और डर के मारे ग़श में गई। फिर मुझे कुछ सुध नहीं कि आख़िर क्या हुआ?’

    ‘तब से मेरा हाल यह है कि इस टूटे-फूटे मकान में हम दोनों पड़े रहते हैं, बादशाह के ग़ुस्से की वजह से सब अलग हो गए औऱ मैं भीख माँगने निकलता हूँ तो कोई कौड़ी नहीं देता बल्कि दूकान पर खड़ा भी नहीं रहने देता। इस कमबख़्त लड़की के बदन पर लत्ता नहीं कि सर छुपाए और खाने को पास नहीं जो पेट भर खावे। ख़ुदा से यह चाहता हूँ कि मौत हमारी आवे या ज़मीन फटे और यह कमबख़्त समावे। इस जीने से मरना भला। ख़ुदा ने शायद हमारे ही वास्ते भेजा है जो तूने रहम खाकर एक अशर्फ़ी दी। खाना भी मज़ेदार पकाकर खाया और बेटी की ख़ातिर कपड़ा भी बनाया। खुदा का शुक्र किया और तुझे दुआ’’ दी! इस पर जिन या परी का साया होता तो तेरी ख़िदमत में लौंडी की जगह देता। तू इस फेर में मत पड़ और यह इरादा मत कर।’

    यह सब हाल सुन कर मैं ने बहुत रो-धोकर ख़ुशामद की कि मुझे अपना दामाद बना ले, जो मेरी क़िस्मत में होगा, सो होगा। पर वह बूढ़ा हरगिज़ राज़ी हुआ। शाम जब हुई, उस से रुख़सत होकर सराय में आया। मुबारक ने कहा, ‘लो, शहज़ादे मुबारक हो, ख़ुदा ने मौक़ा तो दिया है, बारे यह मेहनत अकारत गई।’

    मैं ने कहा, ‘आज कितनी ख़ुशामद की, पर वह अन्धा बेईमान राज़ी नहीं होता। ख़ुदा जाने देवेगा या नहीं!’ पर मेरे दिल की यह हालत थी कि रात काटनी मुश्किल हुई कि कब फिर सुब्ह हो और फिर जा कर हाज़िर हूँ। कभी यह ख़याल आता था कि अगर वह मेहरबान हो और क़ुबूल करे तो मुबारक मलिक सादिक़ की ख़ातिर ले जाएगा। फिर कहता थोड़ी देर मुबारक को मनअ' कर मैं ऐ'श करूँगा। फिर जी में यह ख़तरा आता कि मुबारक भी मान जाय तो जिनों के हाथ से वही हालत मेरी होगी जो बादशाहज़ादे की हुई और इस शहर का बादशाह, कब चाहेगा कि उस का बेटा मारा जाय और दूसरा ख़ुशी मनअ’ए?

    सारी रात नींद उचाट हो गई और उसी उलझन में कटी। जब दिल हुआ तो मैं चला। चौक में से अच्छे-अच्छे थान कपड़ों के गोटा-किनारी और मेवे ख़रीद के उस बूढ़े की ख़िदमत में हाज़िर हुआ। बहुत ख़ुश होकर बोला कि, ‘सब को अपनी जान से ज़ियादा कुछ प्यारी नहीं, पर अगर मेरी जान भी तेरे काम आवे तो इन्कार करूं और अपनी बेटी तेरे हवाले करूं। लेकिन यही डर लगता है कि तेरी जान का ख़तरा हो कि क़यामत तक यह ला'नत का दाग़ मेरे ऊपर रहे।’

    मैं ने कहा, ‘मैं इस बस्ती में बेआसरा हूँ और अब तुम मेरे दीन दुनिया के बाप हो। मैं इस उमीद में एक ज़माने से हूँ। क्या-क्या परेशानी और तबाही उठाता हुआ और कैसे-कैसे सदमे झेलता हुआ यहाँ तक आया। और मतलब का भी पता पाया ख़ुदा ने तुम्हें भी मेहरबान किया, जो अपनी लड़की ब्याह देने पर राज़ी हुए। लेकिन मेरे वास्ते आगा-पीछा करते हो। ज़रा मुंसिफ़ होकर ग़ौर करो तो कि इश्क़ की तलवार से सर बचाना और अपनी जान को छुपाना किस मज़हब में दुरुस्त है? ख़ैर जो हुआ सो हुआ। मैं ने सब तरह अपने को बर्बाद किया है। अपने मरने जीने की मुझे कुछ पर्वाह नहीं। बल्कि अगर नाउम्मीद रहूँगा तो बिना मौत ही मर जाऊंगा और तुम्हारा दामन क़यामत के दिन पकडूँगा।’

    ग़रज़ इस बातचीत और ‘हाँ’, ‘ना’ में एक महीने के आस-निरास में गुज़रे। हर रोज़ उस बूढ़े की ख़िदमत में दौड़ा जाता और उस की ख़ुशामद करता। इत्तिफ़ाक़ से वह बूढ़ा बीमार हुआ। मैं उसकी बीमारी में हाज़िर रहा। हमेशा क़ारूरा हकीम के पास ले जाता। वह जो नुस्ख़ा लिख देता, उसे बनाकर पिलाता और उस का खाना अपने हाथ से पकाकर निवाला खिलाता। एक दिन मेहरबान होकर कहने लगा, ‘ऐ जवान! तू बड़ा ज़िद्दी है। मैं ने सारी मुश्किलें कह सुनाई और मनअ' करता हूँ कि इस ख़याल को छोड़ दे। जान है तो जहान है। मेरा कहा नहीं मानता और कुएँ में गिरना चाहता है। अच्छा! आज अपनी लड़की से तेरे बारे में बात करूँगा। देखूं वह क्या कहती है।’

    फ़क़ीरो, यह ख़ुशख़बरी सुन कर मैं ऐसा फूला कि कपड़ों में समाया। आदाब बजा लाया और कहा कि, ‘आप ने मेरे जीने की फ़िक्र की।’ रुख़्सत होकर मकान पर आया और सारी रात मुबारक से यही ज़िक्र और चर्चा रहा। कहाँ की नींद और कहाँ की भूख। सुब्ह को सूरज निकलते ही, फिर जा कर मौजूद हुआ। सलाम किया। बूढ़े ने कहा, ‘लो अपनी बेटी हमने तुम को दी। ख़ुदा मुबारक करे। तुम दोनों को ख़ुदा की हिफ़ाज़त में सौंपा। जब तलक मेरे दम में दम है, मेरी आंखों के सामने रहो। जब मेरी आंख बन्द हो जाएगी, जो तुम्हारे जी में आए सो करना।’

    कितने दिन पीछे उस बूढ़े आदमी का इंतिक़ाल हुआ। रो-पीटकर कफ़न-दफ़न किया। तीजे के बाद मुबारक उस नाज़नीन का डोला लेकर कारवाँ सराय में ले आया और मुझसे कहा कि, ‘यह मलिक सादिक़ की अमानत है। ख़बरदार बेईमानी मत करना और यह मेहनत- मशक़्क़त बर्बाद मत करना!’

    मैं कहा, ‘ऐ काका! मलिक सादिक़ यहाँ कहाँ है? दिल नहीं मानता, मैं कैसे सब्र करूँ? जो-कुछ हो सो हो, जिऊं या मरूँ, अब तो ऐ'श कर लूं।’

    मुबारक ने दिक़ हो कर डाँटा कि, ‘लड़कपन मत करो। अभी एक दम में कुछ का कुछ हो जाता है। मलिक सादिक़ को दूर जानते हो जो उसका फ़रमान नहीं मानते? उसने चलते वक़्त बहुत ऊंच-नीच सब समझा दी है। अगर उस के कहने पर रहोगे और सही-सलामत उस को वहाँ तक ले चलोगे, तो वह भी बादशाह है, शायद तुम्हारी मेहनत का ख़याल कर के तुम्हीं को बख़्श दे तो क्या अच्छी बात होवे। प्रीत की प्रीत रहे और मीत का मीत हाथ लगे।’

    बारे उस के डराने और समझाने से मैं हैरान होकर चुपका हो रहा। दो सांडनियाँ ख़रीदीं और कजोवों पर सवार होकर मलिक सादिक़ के मुल्क की राह ली। चलते-चलते एक मैदान में गुल-शोर की आवाज़ आने लगी। मुबारक ने कहा, ‘शुक्र ख़ुदा का, तुम्हारी मेहनत ठिकाने लगी। यह लश्कर जिनों का पहुंचा।’ बारे मुबारक ने उन से मिल-जुल कर पूछा कि, ‘कहाँ का इरादा किया है?’ वे बोले कि, ‘बादशाह ने तुम्हारे स्वागत के वास्ते हमें भेजा है, अब तुम्हारे हुक्म का इंतिज़ार है। अगर कहो तो दम के दम में बादशाह के सामने ले चलें।’ मुबारक ने कहा, ‘देखो तो किस-किस मेहनतों से ख़ुदा ने बादशाह के हुज़ूर में हमें सुर्ख़रू किया। अब जल्दी की क्या ज़रूरत है? ख़ुदा करे, अगर कोई ऐसी वैसी बात हो गई तो हमारी मेहनत बेकार जाएगी और जहाँपनाह के ग़ुस्से में पड़ेगे।’ सभों ने कहा कि, ‘यह तुम्हारी मर्ज़ी पर है। जिस तरह जी चाहे चलो।’ अगरचे सब तरह का आराम था पर रात-दिन चलने से काम था।

    जब नज़दीक जा पहुँचे, मैं ने मुबारक को सोता देख कर, उस नाज़नीन के क़दमों पर सर रख दिया। अपने दिल की बेक़रारी और मलिक सादिक़ के सबब अपनी लाचारी, बहुत रो-धोकर बयान की। मैं कहने लगा कि, ‘जिस रोज़ से तुम्हारी तस्वीर देखी है, खाना-पीना, सोना और आराम अपने ऊपर हराम किया। अब जो ख़ुदा ने यह दिन दिखाया, तो तुम छूट रही हो।’

    कहने लगी कि, ‘मेरा भी दिल तुम्हारी तरफ़ खिंचता है। तुम ने मेरे लिये क्या-क्या तकलीफ़ें उठाई हैं और कैसे-कैसे दुःख झेल कर ले आए हो। ख़ुदा को याद करो और मुझे भूल मत जाना। देखो तक़दीर क्या गुल खिलाती है!’ यह कह कर ऐसी फूट-फूटकर रोई कि हिचकी बँध गई। इधर मेरा यह हाल, उधर उस का वह हाल। इतने में मुबारक की नींद टूट गई। वह हम दोनों मुहब्बत करने वालों का रोना देख कर रोने लगा और बोला, ‘इत्मीनान रखो, एक तेल मेरे पास है, उस गुलबदन के बदन में मल दूँगा। उसकी बू से मलिक सादिक़ का जी हट जाएगा, हो सकता है तुम्हीं को बख़्श दे।’

    मुबारक से यह तदबीर सुनकर दिल को ढाढ़स हो गई। उस के गले से लाड किया और कहा, ‘ऐ दादा! अब तू मेरे बाप की जगह है। तेरी वजह से मेरी जान बची। अब भी ऐसा काम कर जिस में मेरी ज़िन्दगी हो। नहीं तो इस ग़म में मर जाऊँगा।’ उस ने ढेर सी तसल्ली दी। जब दिन हुआ, आवाज़ जिन्नों की मा’लूम होने लगीं। देखा तो कई नौकर मलिक सादिक़ के आए हैं और दो भारी शाही जोड़े मेरे लिए आए हैं। एक चौडोल मोतियों की झालर पड़ी हुई उनके साथ है। मुबारक ने उस नाज़नीन को वह तेल मल दिया। उसे पोशाक पहनाकर बनाव-सिंगार करवाकर मलिक सादिक़ के पास ले चला। बादशाह ने देख कर शाबाशी दी औऱ मुझे इज़्ज़त के साथ बिठाया। कहने लगा कि, ‘मैं तुझ से ऐसा सुलूक करूँगा कि किसी ने आज तक किसी से किया होगा। बादशाहत तो तेरे बाप की मौजूद है। इस के अ’लावा तू अब मेरे बेटे की जगह हुआ।’ यह मेहरबानी की बातें कर रहा था, इतने में वह नाज़नीन भी सामने आई। उस तेल की बू से यक-ब-यक दिमाग़ परागन्दा हो गया और हाल बेहाल हो गया। उस बात की ताब ला सका। उठ कर बाहर चला गया। उस ने हम दोनों को बुलवाया और मुबारक को मुख़ातिब करके कहा, ‘क्यों जी, ख़ूब शर्त पूरी की!’ मैं ने ख़बरदार कर दिया था कि अगर बेईमानी करोगे तो मेरे ग़ुस्से में पड़ोगे। यह बू कैसी है? अब देखो, तुम्हारा क्या हाल करता हूँ?’ वह बहुत ग़ुस्सा हुआ। मुबारक ने मारे डर के कहा कि, ‘बादशाह सलामत! जब हुज़ूर के हुक्म से इस काम के लिये हम गए थे, ग़ुलाम ने पहले ही अपनी निशानी काटकर डिबिया में बन्द करके और महुर लगाकर के खज़ान्ची को दे दी थी।’ मुबारक से यह जवाब सुनकर मेरी तरफ़ आँखें निकाल कर घूरा और कहने लगा, ‘तो फिर यह तेरा काम है?’ और ग़ुस्से में आकर मुँह से बुरा भला बकने लगा। उस वक़्त उस की बातचीत से यूँ मा’लूम होता था कि शायद जान से मुझे मरवा डालेगा। जब मैं ने उस के चेहरे से यह मा’लूम किया तो अपनी जान से हाथ धो कर और जी खोल कर छुरी मुबारक की कमर से खींचकर मलिक सादिक़ की तोंद में मारी। छुरी के लगते ही वह झुका और झूमा। मैं ने हैरान होकर जाना कि यह ज़रूर मर गया। फिर अपने दिल में ख़याल किया कि ज़ख्म तो ऐसा करारा नहीं लगा। फिर यह क्या हुई?

    मैं खड़ा देखता रहा कि वह ज़मीन पर लोट-लाट गेंद की सूरत बनकर आसमान की तरफ़ उड़ गया। ऐसा ऊँचा हुआ कि आख़िर नज़रों से ग़ायब हो गया। फिर एक पल के बाद बिजली की तरह कड़कता और ग़ुस्से में कुछ औल-फ़ौल बकता हुआ नीचे आया और मुझे एक लात ऐसी मारी कि मैं तेवराकर चित गिर पड़ा और जी डूब गया। ख़ुदा जाने कितनी देर में होश आया। आँखें खोल कर जो देखा तो एक ऐसे जंगल में पड़ा हूँ कि जहां सिवाय केकड़ टेंटनी और झड़बेरी के दरख़्तों के कुछ और नज़र नहीं आता। अब इस घड़ी अक़्ल कुछ काम नहीं करती कि क्या करूँ कहा जाऊँ। नाउमीदी से एक आह भर कर एक तरफ़ की राह ली। अगर कहीं कोई आदमी की सूरत नज़र पड़ती तो मलिक सादिक़ का नाम पूछता। वह दीवाना जानकर जवाब देता कि, ‘हम ने तो उस का नाम भी नहीं सुना।’

    एक रोज़ पहाड़ पर जा कर मैं ने यही इरादा किया कि अपने को ख़त्म कर दूँ। जैसे ही गिरने को तैयार हुआ बुर्क़ा’ पोश सवार पहुँचा और बोला कि, ‘क्यों तू अपनी जान खोता है? आदमी पर दुःख दर्द सब होता है। अब तेरे बुरे दिन गए और भले दिन आए। जल्द रूम को जा। तीन शख़्स ऐसे ही वहाँ पहले से गए हैं। उन से मुलाक़ात कर और वहाँ के सुल्तान से मिल। तुम पाँचों का मतलब एक ही जगह मिलेगा।’ इस फ़क़ीर की सैर का हाल यही है जो अ’र्ज़ किया। अपने मौला मुश्किल कुशा के ख़बर देने से आप के हुज़ूर में पहुँचा हूँ और बादशाह के भी दर्शन हुए। अब चाहिये कि सब को इत्मीनान हासिल हो।

    यह बातें चार दर्वेश और बादशाह आज़ादबख़्त में हो ही रही थीं कि इतने में एक ख़्वाजासरा बादशाह के महल में से दौड़ा हुआ आया और मुबारकबाद की तस्लीमें बादशाह के हुज़ूर में बजा लाया और अ’र्ज़ किया कि, ‘इस वक़्त ऐसा शहज़ादा पैदा हुआ है कि चाँद और सूरज उस की ख़ूबसूरती देख कर शर्माते हैं।’

    बादशाह ने तअ’ज्जुब से पूछा कि, ‘ज़ाहिर में तो किसी को पेट था, यह सूरज कहाँ से उदय हुआ?’

    उस ने कहा कि, ‘माहरु ख़्वास जो बहुत दिनों से बादशाही ग़ुस्से में पड़ी थी, बेकसों की तरह एक कोने में रहती थी और डर के मारे कोई उस के पास जाता था, हाल पूछता था। उसी पर ख़ुदा की यह मेहरबानी हुई कि चाँद सा बेटा उसके पेट से पैदा हुआ।’

    बादशाह को ऐसी ख़ुशी हासिल हुई कि मारे ख़ुशी के मौत हो जाय! चारों फ़क़ीरों ने भी दुआ’ दी कि, ‘भला बाबा, तेरा घर आबाद रहे और उस का क़दम मुबारक हो। तेरे साए तले पोढ़-बड़ा हो।’

    बादशाह ने कहा, ‘यह तुम्हारे क़दम की बरकत है, वरना अपने सारे गुमान में भी यह बात थी। इजाज़त हो तो जाकर देखूँ?’

    दर्वेशों ने कहा, ‘अल्लाह का नाम लेकर सिधारिये।’

    बादशाह महल में तशरीफ़ ले गए। शहज़ादे को गोद में लिया और ख़ुदा का शुक्र किया। कलेजा ठंडा हुआ। वैसे ही छाती से लगाए हुए लाकर फ़क़ीर के क़दमों पर डाला। दर्वेशों ने दुआ’एँ पढ़कर झाड़-फूंक दिया। बादशाह ने जश्न की तैयीर की दुहारी नौबतें झड़ने लगीं। ख़ज़ाने का मुँह खोल दिया। दान बख़्शीश से एक कौड़ी के मुहताज को लखपती कर दिया और अमीर और दरबारी जितने थे सब दुगनी जागीर और पहले से बड़ा पद दिया गया, जितना लश्कर था, उसे पाँच बरस की तलब इनआ’म हुई। फ़क़ीरों के मीते और टुकड़-गदाओं के चमले अशर्फ़ी और रुपयों की खिचड़ी से भर दिये और तीन बरस का लगान रेआ'या को मुआ'फ़ किया कि जो कुछ बोएँ जोतों दोनों हिस्से अपने घर उठा ले जाय।

    सारे शहर में हज़ारी बज़ारी के घरों में जहां देखो वहां थेई-थेई नाच हो राह है। मारे ख़ुशी के हर अमीर ग़रीब बादशाह बन बैठा। उसी ख़ुशी के आ'लम में यकबारगी महल के अन्दर से रोने-पीटने का गुल उठा। ख़्वासें, तुर्किनियाँ, सिपाही औरतें, ख़्वाजासरा और ग़ुलाम सर में ख़ाक डालते हुए बाहर निकल आए और बादशाह से कहा कि, ‘जिस वक़्त शहज़ादे को नहला-धुलाकर दाई की गोद में दिया, बादल का एक टुकड़ा आया और दाई को घेर लिया। ज़रा देर बाद देखा तो दाई बेहोश पड़ी है और शहज़ादा ग़ायब हो गया। यह क्या क़यामत टूटी है!’ बादशाह भी यह अ’जीब बात सुनकर हैरान हो रहा और सारे मुल्क में वावैला पड़ी। दो दिन किसी के घर में हाँडी चढ़ी, शहज़ादे का ग़म खाते और अपना लहू पीते थे।

    ग़रज़ ज़िन्दगानी से लाचार थे, जो इस तरह जीते थे। जब तीसरा दिन आया, वही बादल फिर आया और पालना, जड़ाऊ मोतियों की तोड़ पड़ी हुई लाया। उसे महल में रख कर आप हवा हुआ। लोगों ने शहज़ादे को उस में अंगूठा चूसते हुए पाया। बादशाह बेगम ने जल्दी बलायें लेकर हाथों में उठा कर छाती से लगा लिया। देखा तो आबेरवाँ का कुर्ता, मोतियों का दुर्र दामन टँका हुआ गले में है और उस पर सलूका तमामी का पहने हुए हैं और हाथ-पाँव में जड़ाऊ खड़वे और गले में नौरत्न की हैकल पड़ी है और झुनझुना, चुसनी, चट्टे-बट्टे जड़ाऊ धरे हैं। सब मारे ख़ुशी के बारी-फेरी होने लगीं और दुआ’एँ देने लगीं कि, ‘तेरी माँ का पेटा ठंडा रहे और तू बड़ा-बूढ़ा हो!’

    बादशाह ने एक बड़ा महल नया बनवाकर और उस में फ़र्श बिछवाकर, वहाँ दर्वेशों को रखा। जब बादशाहत के काम से फ़ुर्सत होती, तब वहाँ बैठते, सब तरह से उनकी सेवा करते और उनका ख़याल रखते। लेकिन हर चाँद की नौचन्दी जुमेरात को वही बादल का टुकड़ा आता और शहज़ादे को ले जाता। दो दिन के बाद तोहफ़े, खिलौने और हर एक मुल्क की सौग़ातें हर एक क़िस्म की शहज़ादे के साथ ले आता जिन को देखने से इंसान की अक़्ल हैरान हो जाती।

    इसी क़ायदे से बादशाहज़ादे ने ख़ैरियत से सातवें बरस में पाँव दिया। सालगिरह के दिन बादशाह आज़ादबख़्त ने फ़क़ीरों से कहा, ‘साईं अल्लाह! कुछ मा’लूम नहीं होता कि शहज़ादे को कौन ले जाता है और फिर दे जाता है। बड़ा ताज्जुब है! देखिये अंजाम इस का क्या होता है?’

    दर्वेशों ने कहा, ‘एक काम करो! एक शौक़िया रुक़्क़ा इस मज़मून का लिख कर शहज़ादे के पालने में रख दो कि तुम्हारी मेहरबानी और मुहब्बत देख कर अपना दिल मुलाक़ात को बहुत चाहता है। अगर दोस्ती की राह से अपने हाल की ख़बर दो, तो इत्मीनान हो और हैरानी दूर हो।’ बादशाह ने दर्वेशों की सलाह मान कर उसी मज़मून का एक रुक़्क़ सुनहरे क़ाग़ज पर लिख कर शहज़ादे के सोने के पालने में रख दिया।

    शहज़ादा फिर पुराने क़ायदे के अनुसार ग़ायब हुआ। जब शाम हुई, आज़ादबख़्त दर्वेशों के बिस्तरों पर बैठे और बातचीत होने लगी कि एक काग़ज़ लिपटा हुआ, बादशाह के पास पड़ा। खोल कर पढ़ा तो जवाब उसी रुक़्क़े का था। यही दो सतरें लिखी थीं कि, ‘यह जानिये कि हमें भी आप से मिलने का बहुत शौक़ है। सवारी के लिये तख़्त जाता है। इस वक़्त अगर तशरीफ़ लाइये तो बेहतर है। एक दूसरे से मुलाक़ात हो। यहाँ सब ऐ’श और ख़ुशी का सामान तैयार है। सिर्फ़ साहब ही को जगह ख़ाली है।’

    बादशाह आज़ादबख्त दर्वेशों को साथ लेकर तख़्त हज़रत सुलेमान के तख़्त की तरह हवा पर चला। चलते-चलते एक ऐसी जगह पर जा उतरे जहाँ एक आ’लीशान इमारत और तैयारी का सामान नज़र आता है, लेकिन यह नहीं मा’लूम होता कि यहाँ कोई है या नहीं। इतने में किसी ने एक सलाई सुलेमानी सुर्मे की इन पाँचों की आँखों में फेर दी। दो-दो आँसू की बूँदे टपक पड़ी। परियों का अखाड़ा देखा कि स्वागत की ख़ातिर गुलाबपाशें लिये हुए और रंग-बिरंग के जोड़े पहने हुए खड़ा है।

    आज़ादबख़्त आगे चले, तो देखा कि दोनों तरफ़ हज़ारों परियाँ क़तार बाँधे अदब से खड़ी है और बीच में, ख़ास जगह पर एक ज़मुर्रद का तख़्त धरा है। उस पर मलिक शहबाल, शाहरुख़ का बेटा तकिया लगाये बड़ी शान से बैठा है और एक परीज़ाद लड़की सामने बैठी शहज़ादा बख़्त-यार से खेल रही है। दोनों तरफ़ कुर्सियाँ और सन्दलियाँ क़रीने से बिछी हैं। उन पर ख़ूबसूरत परीज़ाद बैठे हैं। मलिक शहबाल बादशाह को देखते ही अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ और तख़्त से उतर कर गले मिला और हाथ में हाथ पकड़ अपने बराबर तख़्त पर लाकर बिठाया। बड़े तपाक और गर्मजोशी से आपस में बातचीत होने लगी। सारा दिन हँसी-खुशी, खाने और मेवे और ख़ुश्बूओं की दा’वत रही और राग-रंग सुना किये। दूसरे दिन जब फिर दोनों बादशाह जमा’ हुए मलिक शहबाल ने बादशाह से दर्वेशों के साथ लाने का हाल पूछा।

    बादशाह ने चारों फ़क़ीरों का जो हाल सुना था पूरा-पूरा बयान किया, सिफ़ारिश की और मदद चाही की, ‘इन्होंने इतनी मेहनत की है और इतनी मुसीबत उठाई है। अब अगर आप की ज़रा सी मेहरबानी से अपने-अनपे मक़सद को पहुँचे तो बड़ा अच्छा होगा और मैं भी सारी उम्र शुक्रगुज़ार रहूँगा। आपकी एक मेहरबानी की नज़र से उन का बेड़ा पार होता है।’

    मलिक शहबाल ने सुन कर कहा कि, ‘आपका कहना सर आँखों पर। मैं आप के हुक्म से बाहर नहीं। यह कहकर मेहरबानी की नज़र से देखों और परियों की तरफ़ देखा। बड़े-बड़े जिन जो जहाँ सरदार थे, उन को ख़त लिखे कि, ‘इस हुक्मनामे को देखते ही अपने को मेरे सामने हाज़िर करो।’ अगर किसी के आने में देर होगी तो सज़ा पायेगा और पकड़ा हुआ आयेगा। और, आदमी चाहे औ’रत हो या मर्द जिसके पास हो उसे अपने साथ लिये आवे। अगर कोई छुपाकर रखेगा और बाद में उसका पता चलेगा, तो उस के बीवी-बच्चे कोल्हू में पेरे जायेंगे। उसका नाम-ओ-निशान बाक़ी रहेगा।

    यह हुक्मनामा लेकर देव चारों तरफ़ भेजे गए और उसके बाद दोनों बादशाहों में महफ़िल गर्म हुई और मेल मुहब्बत की बातें होने लगी। इतने में मलिक शहबाल दर्वेशों से मुख़ातिब होकर बोला कि, ‘मुझे भी लड़का होने का बड़ा अरमान था। दिल में यह अहद किया था कि अगर ख़ुदा बेटा दे या बेटी, तो उस की शादी किसी इन्सानों के बादशाह के यहाँ जो लड़का या लड़की होगा उस से करूँगा। ऐसी नीयत करने के बाद मा’लूम हुआ कि बादशाह बेगम पेट से हैं। बारे दिन और घड़ियां और महीने गिनते-गिनते पूरे दिन हुए और यह लड़की पैदा हुई। अपने वादे के अनुसार मैं ने सब जिनों, परियों औऱ देवों को हुक्म दिया कि चारों तरफ़ तलाश करो। जिस बादशाह या शहंशाह के यहाँ बेटा पैदा हुआ हो, उसे बहुत सम्भाल कर उठा लाओ।’ उसी वक़्त परीज़ाद मेरे हुक्म के मुताबिक़ चारों तरफ़ बिखर गए। कुछ देर के बाद इस शहज़ादे को मेरे पास ले आये।

    ‘मैं ने ख़ुदा का शुक्र किया और इसे अपनी गोद में ले लिया। अपनी बेटी से ज़ियादा इस की मुहब्बत दिल में पैदा हुई। जी नहीं चाहता कि एक पल भी अपनी नज़रों से इसे दूर करूँ। लेकिन इसलिये भेज देता हूँ कि अगर इस के माँ-बाप देखेंगे तो उनका क्या हाल होगा? इसलिये हर महीने में एक बार मँगा लेता हूँ। कई दिन अपने पास रख भेज देता हूँ। इंशाअल्लाह! अब हमारी तुम्हारी मुलाक़ात हुई। उस की शादी कर देता हूँ। मौत ज़िन्दगी सब को लगी पड़ी है। अच्छा है जीते जी उनका सेहरा देख लें।’

    बादशाह आज़ादबख़्त मलिक शहबाल की यह बातें सुन कर और उसकी ख़ूबियाँ देख कर बहुत ख़ुश हुए और बोले, ‘पहले शहज़ादे के ग़ायब हो जाने और वापस आने से हमारे दिल में अ’जब-अ’जब तरह के ख़तरे आते थे। लेकिन अब आपकी बातें सुनकर दिल को तसल्ली हुई। यह बेटा अब तुम्हारा है। जिस में तुम्हारी ख़ुशी हो सो कीजिए।’

    ग़रज़ दोनों बादशाह एक दूसरे की सुहबत में शीर-ओ-शकर की तरह रहते और ऐ’श करते। पाँच दिन के समय में बड़े-बड़े बादशाह, बागों-पहाड़ों और टापुओं के जिनको तलब करने के लिए परीज़ाद भेजे गये थे सब आकर हुज़ूर में हाजिर हुए। सब से पहले मलिक सादिक़ ने फ़र्माया कि, ‘तेरे पास जो आदमी है, उसे हाज़िर कर।’ उस ने बहुत ग़म और ग़ुस्सा खा कर लाचार उस ख़ूबसूरत लड़की को हाज़िर किया जिस के लिए चीन का शहज़ादा तबाह हुआ था। उस के बाद अम्मान के बादशाह से जिन की शहज़ादी माँगी जिस के लिए नीमरोज़ का शहज़ादा बैल पर सवार होकर पागल बना था। उस ने भई बहुत हीले-बहाने और उ’ज़्र- मा'ज़रत करके हाज़िर की। जब विलायत के बादशाह की बेटी और बहज़ाद खाँ को तलब किया, सब इन्कार करने लगे और हज़रत सुलेमान की क़सम खाने लगे।

    आख़िर जब समुन्दरों के बादशाह से पूछने की नौबत आई, तो वह सर नीचा करके चुप हो रहा। मलिक शहबाल ने उसकी ख़ातिर की, क़सम दी, इज़्ज़त देने की उमीद दिलाई और कुछ धौस-धड़का भी दिया। तब वह भी हाथ जोड़ कर अ’र्ज़ करने लगा कि, ‘बादशाह सलामत! यह हक़ीक़त है कि जब बादशाह अपने बेटे के स्वागत की ख़ातिर दरिया पर आया और शहज़ादे ने जल्दी के मारे घोड़ा दरिया में डाला, इत्तिफ़ाक़ से मैं उस रोज सैर-शिकार के लिये निकला था। इतने में शहज़ादी भी अपनी घोड़ी दरिया में ले गई। निगाह जो उस पर पड़ी दिल बेइख़्तियार हुआ। परीज़ादों को हुक्म किया कि शहज़ादी को घोड़ी समेत ले आओ। उसके पीछे बहज़ाद खाँ ने घोड़ा फेंका, जब वह भी ग़ोते खाने लगा, उस की बहादुरी और दिलावरी मुझे बहुत पसन्द आई। उसे भी हाथों-हाथ पकड़ लिया। उन दोनों के लेकर मैं ने सवारी फेरी। सो वे दोनों सही सलामत मेरे पास मौजूद है।’

    यह हाल कह कर दोनों को सामने बुलाया। तब शाम की शहज़ादी की तलाश बहुत की और सभों से सख़्ती और नर्मी से पूछा। लेकिन किसी ने हामी भरी और नाम-निशान बताया। तब मलिक शहबाल ने फ़र्माया कि, ‘कोई बादशाह या सरदार ग़ैरहाज़िर भी है या सब चुके?’ जिन्नों ने अ’र्ज़ किया कि, ‘जहाँपनाह! सब हुज़ूर में आए हैं। मगर एक जादूगर जिस ने क़ाफ़ के पहाड़ के अन्दर एक क़िला जादू के इल्म से बनाया है, वह अपने घमंड से नहीं आया है और हम ग़ुलामों में इतनी ताक़त नहीं, जो ज़बर्दस्ती उस को पकड़ लावें। वह बड़ा मज़बूत मकान है और वह ख़ुद भी बड़ा शैतान है।’

    यह सुनकर मलिक शहबाल को ग़ुस्सा आया और जिन्नों, भूतों और परीज़ादों की लड़ाकी फ़ौज को बुलाकर हुक्म दिया कि, ‘अगर सीधे-सीधे वह शहज़ादी को साथ लेकर हाज़िर हो तो बहुत अच्छा है। वरन ज़बरदस्ती, उस को बाँधकर ले आओ और उस के गढ़ और मुल्क को नेस्त-नाबूद करके गदहे का हल फेरवा दो।’

    यह हुक्म होते ही, ऐसी कितनी फ़ौज रवानी हुई कि एक आध दिन के समय में उस जोश-ख़रोश वाले सर्कस को ग़ुलाम की तरह बाँधकर पकड़ लाये और बादशाह के सामने हाथ बाँधे खड़ा किया। मलिक शहबाल ने बहुतेरा सख़्ती करके पूछा पर उस घमंडी ने सिवाय ‘ना’ करने के ‘हाँ’ नहीं किया। बहुत ग़ुस्सा होकर बादशाह ने कहा कि ‘इस बदमा’श का अंग-अंग अलग करो और खाल खींचकर भुस भरो।’ परीज़ादों के लश्कर को हुक्म दिया कि, क़ाफ़ के पहाड़ में जाकर ढूँढ-ढाँढ़कर शहज़ादी को लाओ।’ वह लश्कर जिस के ज़िम्मे यह काम हुआ था, वह शहज़ादी को भी तलाश करके ले आया। उन सब बन्दियों ने और चारों फ़क़ीरों ने मलिक शहबाल का हुक्म और इन्साफ़ देख कर दुआ’एँ दीं और ख़ुश हुए। बादशाह आज़ादबख़्त भी बहुत ख़ुश हुआ। तब मलिक शहबाल ने कहा कि, ‘मर्दों को दीवान-ए-ख़ास में और औ’रतों को शाही महल में दाखिल करो और शहर की सजावट का हुक्म दो और शादी की तैयारी जल्दी करो।’ बस हुक्म की देर थी।

    एक दिन अच्छी घड़ी और मुबारक दिन देख कर शहज़ादा बख़्तयार का निकाह अपनी बेटी रोशन अख़्तर से कर दिया और यमन के सौदागर के लड़के को दमिश्क़ की शहज़ादी से ब्याहा और ईरान के शहज़ादे का निकाह बसरे की शहज़ादी से कर दिया, अ’जम के राजकुमार को विलायत की राजकुमारी से बियाहा, नीमरोज़ के बादशाह की बेटी को बहज़ाद खाँ को दिया, नीमरोज़ के राजकुमार को जिन्न की शहज़ादी हवाले की और चीन के शहज़ादे को बूढ़े अजमी की बेटी दी जो पहले मलिक सादिक़ के कब्ज़े में थी। हर एक नामुराद मलिक शहबाल की मदद से अपने-अपने मक़सद और मुराद को पहुँचा। उस के बाद चालीस दिन तक जश्न फ़रमाया और ऐ’श-इशरत में रात-दिन डूब रहे।

    आख़िर मलिक शहबाल ने हर-एक राजकुमार को तोहफ़े और सौग़ातें और माल-असबाब दे-देकर अपने-अपने वतन को रुख़्सत किया। सब ख़ुशी और इत्मीनान से खाना हुए और ख़ैरियत से अपने-अपने मुल्क को जा पहुँचे और बादशाहत करने लगे। सिर्फ़ एक बहज़ाद खाँ और यमन के सौदागर का लड़का अपनी-अपनी ख़ुशी बादशाह आज़ादबख्त के साथ रहे। आख़िर सौदागर को शहज़ादे का ख़ान सामाँ और बहज़ाद खाँ को शहज़ादे की फ़ौज का बख़्शी किया। जब तलक जीते रहे ऐ’श करते रहे।

    इलाही! जिस तरह ये चारों दर्वेश और पाँचवाँ बादशाह आज़ादबख़्त अपनी-अपनी मुराद को पहुँचे, इसी तरह से, ख़ुदा करे हर नामुराद के दिल का मक़सद और मतलब पूरा हो।

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