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ज़ाइरो 'अर्ज़ करो जब शह-ए-ज़ीशाँ को सलाम

हमीद सिद्दीक़ी लखनवी

ज़ाइरो 'अर्ज़ करो जब शह-ए-ज़ीशाँ को सलाम

हमीद सिद्दीक़ी लखनवी

MORE BYहमीद सिद्दीक़ी लखनवी

    ज़ाइरो 'अर्ज़ करो जब शह-ए-ज़ीशाँ को सलाम

    हम ग़रीबों का भी सुल्तान-ए-ग़रीबाँ को सलाम

    पेश करना ब-कमाल-ए-अदब-ओ-शौक़-ए-नियाज़

    क़िब्ला-ए-अहल-ए-वफ़ा का'बा-ए-ईमाँ को सलाम

    याद रखना हरम-ए-पाक के जाने वालो

    इस गुनहगार का भी रहमत-ए-यज़्दाँ को सलाम

    भूल जाना न कहीं वक़्त-ए-तिलावत लिल्लाह

    महबत-ए-रूह-ए-अमीं हामिल-ए-क़ुरआँ को सलाम

    ख़्वाब-गाह-ए-शह-ए-कौनैन पे हर लहज़ा दुरूद

    सहर-ओ-शाम मिरे हासिल-ए-ईमाँ को सलाम

    गोशा-गोशा पे शबिस्तान-ए-रिसालत के दुरूद

    रौज़ा-ओ-मिंबर-ओ-महिराब-ए-दरख़्शाँ को सलाम

    क़बा-ए-नूर पे होते हैं जो क़ुर्बां हमा-शब

    उन सितारों को सलाम उस मह-ए-ताबाँ को सलाम

    जिस से होती हैं मिरी हिज्र की रातें रौशन

    हरम-ए-क़ुद्स की उस शम’-ए-शबिस्ताँ को सलाम

    फ़र्श-ए-पा रहती है जो सेहन-ए-हरम में हर-सू

    उस शब-ए-माह को उस सुब्ह-ए-दरख़्शाँ को सलाम

    जिस से रौशन हुए दिल हम से सियह-कारों के

    उस दर-ए-पाक की क़िंदील-ए-फ़रोज़ाँ को सलाम

    गुंबद-ए-सब्ज़ का हर-रोज़ जो करती हैं तवाफ़

    उन शुआ'ओं को और उस मेहर-ए-दरख़्शाँ को सलाम

    रौज़ा-ए-ख़ुल्द में जो महव-ए-'इबादत होंगे

    उन के हुस्न-ए-नज़र-ओ-चेहरा-ए-ताबाँ को सलाम

    दर-ए-अक़्दस पे जो मसरूफ़-ए-गुहर-बारी हो

    निगह-ए-शौक़ का उस दीदा-ए-गिर्याँ को सलाम

    वो जो एहसास-ए-नदामत से हो तूफ़ाँ ब-कनार

    डबडबाई हुई उस चश्म-ए-पशेमाँ को सलाम

    गुम जो हो जल्वा-ए-बे-रंग के नज़्ज़ारे में

    दिल-ए-मुश्ताक़ का उस दीदा-ए-हैराँ को सलाम

    बा-सद इख़्लास-ओ-ब-अंदाज़-ए-ग़ुलामी कहना

    हरम-ए-पाक के हर-ख़ादिम-ओ-दरबाँ को सलाम

    दिल को दिल चश्म-ए-तवज्जोह से बनाया जिस ने

    दिल से उस राहबर-ए-मंज़िल-ए-’इरफ़ाँ को सलाम

    जिन को हासिल है शरफ़ आप की पा-बोसी का

    उन गली-कूचों के ज़र्रात-ए-दरख़्शाँ को सलाम

    जो फिरा करते हैं मस्तों की तरह गलियों में

    उन सगान-ए-बलद-ए-शाह-ए-रसूलाँ को सलाम

    निगह-ए-सरवर-ए-कौनैन पड़ी है जिस पर

    उस रह-ओ-मंज़िल-ओ-कोहसार-ओ-बयाबाँ को सलाम

    इक नज़र कोह-ए-उहुद पर मरी ख़ातिर पहले

    फिर उसी वादी-ए-फ़िरदौस-ए-ब-दामाँ को सलाम

    महव-ए-आराम हैं जिस ख़ाक पे असहाब-ए-उहद

    एक महजूर का उस गंज-ए-शहीदाँ को सलाम

    कैफ़-ओ-मस्ती में फ़रामोश न हों अहल-ए-बक़ी'

    जुमला असहाब-ए-शहंशाह-ए-रसूलाँ को सलाम

    जिस में हर लहज़ा महकती है नसीम-ए-रहमत

    उस गुलिस्ताँ को सलाम अहल-ए-गुलिस्ताँ को सलाम

    रंग-ओ-निकहत पे शमीम-ए-चमन-ए-ख़ुल्द निसार

    ग़ुन्चा-ओ-लाला-ओ-गुल सुम्बुल-ओ-रैहाँ को सलाम

    जिस में है ख़ुल्द दर-आग़ोश क़ुबा की मस्जिद

    उस ख़याबाँ को सलाम उस चमनिस्ताँ को सलाम

    साज़-ए-दिल गूँज उठा कैफ़-ए-नवा-संजी से

    चमन-ए-तैबा के मुर्ग़ान-ए-ख़ुश-अलहाँ को सलाम

    जिन के सदक़े में ख़लिश होती है अब तक दिल में

    संग-रेज़ो को और उन ख़ार-ए-मुग़ीलाँ को सलाम

    जज़्बा-ए-शौक़ के 'आलम में ज़रा याद रहे

    क़ाफ़िले वालों को और उन के हुदी-ख़्वाँ को सलाम

    मस्त-ओ-सरशार नज़र आएँ जो कुछ नाक़ा-सवार

    उन के बिखरे हुए गेसू-ए-परेशाँ को सलाम

    जिस जगह करते हैं हुज्जाज पहुँच कर मंज़िल

    उन मक़ामात को उन कोह-ओ-बयाबाँ को सलाम

    पा-प्यादा जो मिले राह में दीवाना-ए-शौक़

    उस ग़रीब-उल-नतन-ओ-बे-सर-ओ-सामाँ को सलाम

    ग़ाज़ा-ए-ख़ाक-ए-रह-ए-शौक़ हो जिस के रुख़ पर

    उस के ज़ौक़-ए-तलब-ओ-रंग-ओ-परेशाँ को सलाम

    ना'त पढ़ता हुआ मिल जाए जो कोई यमनी

    ग़ाएबाना मिरा उस मस्त-ओ-ग़ज़ल-ख़्वाँ को सलाम

    रहमत-ए-हक़ से मुयस्सर हों वो दिन काश 'हमीद'

    ख़ुद करें 'अर्ज़ शहंशाह-ए-रसूलाँ को सलाम

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