शाह-ए-शोहदा हैं शाह-ए-हुदा कोई क्या जाने कोई क्या समझे
शाह-ए-शोहदा हैं शाह-ए-हुदा कोई क्या जाने कोई क्या समझे
यह्या हुसैन पाशा
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शाह-ए-शोहदा हैं शाह-ए-हुदा कोई क्या जाने कोई क्या समझे
क़ाइम उन से इस्लाम हुआ कोई क्या जाने कोई क्या समझे
आदम से अब तक कोई भी इस शान का बतला दे तो सही
साबिर शाकिर राज़ी-ब-रज़ा कोई क्या जाने कोई क्या समझे
मशहूर है सब्र-ए-अय्यूबी इस सब्र को समझे तो कोई
इस जा क्या था उस जा क्या था कोई क्या जाने कोई क्या समझे
वो सिब्त-ए-नबी वो इब्न-ए-'अली वो हक़ के दुलारे हक़ के वली
वो दोनों जहाँ के हैं आक़ा कोई क्या जाने कोई क्या समझे
ख़ालिक़ ने ज़कात को सदक़ा को औलाद पे उन की हराम किया
सरदार हैं ये सब उन के गदा कोई क्या जाने कोई क्या समझे
कौनैन से अपने 'हाज़िक़' को बेगाना बना कर छोड़ दिया
वो सिब्त-ए-नबी ये उन का गदा कोई क्या जाने कोई क्या समझे
- पुस्तक : अनवार-ए-ग़ैब (पृष्ठ 60)
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