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मुल्ला नसरुद्दीन- पहली दास्तान

लियोनिद सोलोवयेव

मुल्ला नसरुद्दीन- पहली दास्तान

लियोनिद सोलोवयेव

MORE BYलियोनिद सोलोवयेव

    "यह भी बयान किया गया है कि वह सीधा-सादा इंसान अपने गधे की लगाम पकड़े चल रहा था और गधा पीधे-पीछे रहा था।"

    -(अलिफ़ लैला की शहरज़ाद की 382 वीं रात)

    जब ख़ोजा नसरुद्दीन की पैंतीसवीं सालगिरह थी, तो वह सड़कों पर मारा-मारा फिर रहा था। परदेशों में, एक शहर से दूसरे शहर, एक देश से दूसरे देश, समुद्र और रेगिस्तान पार करते हुए, जहां रात हुई वहीं सोते हुए उसने दस साल काट दिये थे। कभी वह चरवाहों के छोटे अलाव के किनारे सो जाता, कभी खचाखच भरी कारवांसराय में- जहां सारी रात धुंधलके में ऊंट सांसें भरा करते और घंटियों की रुनझुन के साथ अपना बदन खुजाया करते। कभी वह धुएं और कालिख से भरे चायख़ानों में पड़ा रहता- भिश्तियों, फ़क़ीरों, ख़च्चरवालों और ग़रीबों के बीच, जो भोर होते ही तंग गलियों और बाज़ारों को अपनी चींख़-पुकार से भर देते।

    बहुत सी रातें उसने किसी किसी ईरानी रईस के हरम में नर्म, रेशमी गद्दों पर बितायी थी, जब घर का मालिक सिपाहियों के साथ इस नापाक आवारे की खोज में सरायों और चायख़ानों की ख़ाक छानता फिरता था ताकि वह उसे पकड़ ले और सूली पर लटकवा दे।

    झिंझरीदार झरोखे से आसमान में रौशनी की एक किरन दिखायी देती, सितारे धुंधले हो जाते, सुब्ह होने की ख़बर देने वाली हवा हौले से नम सब्ज़े में सरसराने लगती और खिड़कियों पर जंगली चिड़ियां चहचहाने और चोंच से अपने पर संवारने लगतीं। अलसायी आंखों वाली सुन्दरी का मुंह चूमता हुआ ख़ोजा नसरुद्दीन कहताः-

    "वक़्त हो गया। अलविदा’अअ', मेरी दिलबर, भूल जाना मुझे।"

    "अभी रुको!" अपनी सलोनी बाहें उसकी गर्दन में डाल कर वह कहती, "क्या तुम हमेशा के लिए जा रहे हो? सुनो, आज रात को जैसे ही अंधेरा होगा, तुम्हें बुलाने के लिए मैं बुढिया को फिर भेज दूंगी।"

    "नहीं। एक ही मकान में दो रातें गुज़ारना क्या होता है, यह मैं एक अ’र्से से भूल चुका हूँ। मुझे अपनी राह लगने दो। देर हो रही है मुझे।"

    "अपनी राह? किसी और शहर में तुम्हें कोई ज़रूरी काम है क्या? तुम जा कहां रहे हो?"

    " मुझे नहीं मा'लूम। लेकिन उजाला हो चुका है, शहर के फाटक खुल गये हैं और पहले कारवां रवाना हो रहे हैं। ऊंटों की घंटियों की रुनझुन सुन रही हो न? इसे सुनते ही मुझे लगता है कि जिन मेरे पैरों में समा गये हैं और मैं रुक नहीं सकता।"

    "तो, जाओ!" अपनी लम्बी पलकों में आंसू छिपाने की नाकाम कोशिश करती हुई वह नाज़नीन-ए-हरम नाराज़गी से कहती। "लेकिन सुनो तो! जाने से पहले अपना नाम तो मुझे बता जाओ।"

    "मेरा नाम? तो सुनोः तुमने यह रात ख़ोजा नसरुद्दीन के साथ बितायी है। मैं हूं ख़ोजा नसरुद्दीन। अमन में ख़लल डालनेवाला और फूट और फ़साद फैलानेवाला। मैं वही हूं जिसका सिर काटनेवाले को भारी इनआ'म देने का एलान किया गया है, हर दिन नक़ीबची बाज़ारों और आ'म जगहों पर इसका ढिंढोरा पीटते हैं। कल तो वे लोग मुझे पकड़ने वाले को तीन हज़ार तूमान देने का लालच दे रहे थे। मेरा मन हुआ कि इतनी अच्छी क़ीमत पर मैं खु़द ही अपना सिर दे दूँ। तू हंसती है, मेरी नन्ही बुलबुल? अच्छा, तो ला, आखि़री बार अपने होंठ चूम लेने दे। मेरा दिल तो चाहता है कि तुझे कोई ज़मुर्रद दूं, लेकिन वह मेरे पास है नहीं। ले, मैं यह सफे़द पत्थर का टुकड़ा दे रहा हूं, जिस को देख कर तू मुझे याद किया करे!"

    वह अपनी फटी ख़िलअ'त पहनता जो अलाव की चिनगारियों से कई जगह जल चुकी थी और चुपचाप बाहर हो जाता। दरवाज़े पर महल के सबसे क़ीमती खज़ाने का रखवाला, काहिल और बेवकू़फ़ ख़्वाजा साफ़ा बांधे और सामने की ओर ऊपर को मुड़ी मुलायम जूतियां पहने ख़र्राटे लेता रहता। आगे ग़ालीचों दरियों पर नंगी तलवारों का तकिया बनाये पहरेदार लम्बे पड़े होते। ख़ोजा नसरुद्दीन पंजों के बल चुपचाप निकल जाता- हमेशा ब-ख़ैरियत, मानो इस वक़्त वह दूसरों की नज़रों से छू मन्तर हो गया हो!

    और पथरीली सड़क फिर एक बार उस के गधे के तेज़ खुरों से गूंजने लगती और धुंआ उड़ाने लगती। नीले आसमान का सूरज दुनिया पर चमकता। ख़ोजा नसरुद्दीन बिना आंखें झपकाये उस की ओर देखता। ओस से नम खेत और

    ऊपर रेगिस्तान- जहां रेत की आंधियों से सफे़द हुई ऊंटों की हड्डियां पड़ी होती- हरे-भरे बाग़ और उफनती नदियां, नंगी बंजर पहाड़ियां और हंसते-मुस्कुराते चारागाह ख़ोजा नसरुद्दीन के गीतों से गूंज उठते। अपने गधे पर सवार, पीछे मुड़कर एक बार भी देखे बिना, गुज़री बातों के लिए किसी भी कसक के बिना और आगे आनेवाली मुसीबतों के लिए किसी डर के बिना, वह आगे बढ़ता जाता।

    पर जो क़स्बा वह अभी-अभी छोड़कर आया है उस की याद हमेशा ताज़ा रहेगी। मुल्ला और उमरा उसका नाम सुनते ही गु़स्से से लाल-पीले होने लगते। भिश्ती, गाड़ीवान, बुनकर, ठठेरे और ज़ीनसाज़ रात को चायख़ानों में इकट्ठे होकर उसकी वीरता की कहानियाँ कह कर अपना मनोरंजन करते और ये कहानियां ख़त्म होने तक हमेशा उस के मुआफ़िक़ बन जातीं। हरम की अलसायी हुई सुन्दरी बार-बार सफे़द पत्थर के टुकड़े को देखती और अपने शौहर के क़दमों की आवाज़ सुनते ही जल्दी से उसे सीप की पिटारी में छिपा लेती।

    ज़रबफ़्त की ख़िलअ'त को उतारता हुआ, हांफता-कांपता मोटा अमीर कहता- "ओफ़! इस कम्बख़्त आवारा ख़ोजा नसरुद्दीन ने हम सभी को पस्त कर दिया। उसने तो पूरे मुल्क को उभारकर, गड़बड़ फैला रखी है। आज मुझे मेरे पुराने दोस्त, खु़रासान के आ'ला हाकिम का ख़त मिला। तुम समझती हो न! उनके शहरों में यह आवारा पहुंचा ही था कि यकायक सभी लुहारों ने टैक्स देना बन्द कर दिया और सरायवालों ने बिना दाम लिये सिपाहियों को खाना खिलाने से इंकार कर दिया। और, सबसे बड़ी बात तो यह कि यह चोट्टा, इस्लाम को नापाक करनेवाला यह हराम-ज़ादा, हाकिम के हरम में घुसने की गुस्ताख़ी कर बैठा और उनकी सबसे चहेती बीवी को फुसला लिया। सच ही, दुनिया ने ऐसा बद-मआ’श कभी नहीं देखा! अफ़्सोस यही है कि यह दो कौड़ी का भिखमंगा मेरे हरम में घुसने की कोशिश करने नहीं आया, नहीं तो उस का सिर बाज़ार के चौराहे पर सूली पर लटकता दिखायी देता।"

    नाज़नी, अपने आप मुस्कुराती हुई, मौन रहती।

    और, इस बीच ख़ोजा नसरुद्दीन के गानों और उस के गधे के तेज़ खुरों से सड़क गूंजा करती और धुंआ उड़ा करता।

    इन दस सालों में वह हर जगह हो आया थाः बग़दाद और इस्ताम्बूल, तेहरान, बख़्शी सराय, तिफ़लिस, दमिश्क़, तबरेज़ और अख़मेज़। इन सभी शहरों से वह वाक़िफ़ था और इनके अ'लावा और भी बहुत से शहरों से। और हर जगह वह अपनी कभी भुलायी जा सकने वाली याद छोड़ आता। और अब वह अपने वतन, अपने शहर बुख़ारा शरीफ़ लौट रहा था- पाक बुख़ारा, जहां वह नाम बदल कर कुछ दिन अपनी भटक से छुट्टी पाकर आराम करना चाहता था।

    ।।2 ।।

    व्यापारियों के एक काफ़िले के साथ, जिसके पीछे वह लग लिया था, उसने बुख़ारा की सरहद पार की। सफ़र के आठवें दिन, दूर गर्द के धुन्ध में, इस बड़े और मशहूर शहर के ऊंचे मीनार दीखे। प्यास और गर्मी से पस्त ऊंटवालों ने फटे गलों से आवाज़ लगायी और ऊंट और तेज़ी से आगे बढ़ चले। सूरज डूब रहा था। शहर के फाटक बन्द होने से पहले बुख़ारा में दाख़िल होने के लिए जल्दी करने की ज़रूरत थी। ख़ोजा नसरुद्दीन कारवां में सबसे पीछे था- गर्द के मोटे और भारी बादल में लिपटा हुआ। यह उसके अपने वतन की पाक गर्द थी जिसकी खु़श्बू उसे दूर देशों की मिट्टी से ज़्यादा अच्छी लग रही थी। छींकता, खांसता, वह बराबर अपने गधे से कहता जाता- "ले! अच्छा ले! हम लोग ही पहुंचे। आख़िर अपने वतन ही गये। इंशा अल्लाह, कामयाबी और मसर्रत यहां हमारा इंतिज़ार कर रही हैं।"

    कारवां शहर की चहारदीवारी तक पहुंचा तो पहरेदार फाटक बन्द कर रहे थे।

    "खु़दा के वास्ते हमारा इंतिज़ार करो!" कारवां का सरदार दूर से सोने का सिक्का दिखाता हुआ चिल्लाया।

    लेकिन तब तक फाटक बन्द हो गये। झनझनाहट के साथ साकलें लग गयीं। ऊपर बुर्जियों पर लगी तोपों के पास पहरेदार तअ'ईनात हो गये। ताज़ा हवा चल निकली। धुन्ध-भरे आसमान में गुलाबी रौशनी ख़त्म हो गयी। नया, नाजु़क दूज का चांद आसमान से झांकने लगा। झुटपुटे की ख़ामोशी में अनगिनत मीनारों से, मुसलमानों को शाम की इबादत के लिए बुलाती हुई मोअज़्ज़िनों की तीखी, उदास, ऊंची आवाज़ेँ तैरती हुई आने लगीं।

    जैसे ही व्यापारी और ऊंटवाले नमाज़ के लिए दोज़ानू हुए, ख़ोजा नसरुद्दीन अपने गधे के साथ एक तरफ़ को खिसक गया।

    "इन ताजिरों के पास तो कुछ है जिस के लिए वे खु़दा का शुक्र करें," वह बोला, "शाम का खाना ये लोग खा चुके हैं और अभी ब्यालू करेंगे। मेरे वफ़ादार गधे! तू और मैं भी भूखे हैं। शाम का खाना मिला है, रात का मिलेगा। अगर अल्लाह हमारा शुक्रिया चाहता है तो मेरे लिए पुलाव की एक रकाबी और तेरे लिए एक गट्ठर तिपतिया घास भेज दे।"

    गधे को उसने सड़क के किनारे एक पेड़ से बांधा और पास ही एक पत्थर का तकिया लगाकर नंगी ज़मीन पर पड़ा रहा। ऊपर शफ़्फ़ाफ़ आसमान में सितारों के चमकते हुए जाल को देखने लगा। तारों के हर झुंड को वह पहचानता था। इन दस सालों में उसने जाने कितनी बार इस तरह खुले आसमान था। इन दस सालों में उसने जाने कितनी बार इस तरह खुले आसमान को ताका था। हमेशा उसे यही लगता कि रातों के ख़ामोश और पाक-साफ़ दुआ' के घंटे उसे सबसे बड़े दौलतमन्दों से भी ज़्यादा दौलतमन्द बना देते थे, क्योंकि दुनिया में हर एक की अपनी-अपनी क़िस्मत होती है। रईस भले ही सोने की थाली में खाना खायें, पर वे अपनी रातें छत के नीचे गुज़ारने को ही मजबूर होते हैं और इस तरह सर्द, नीले, तारों भरे कुहासे में आधी रात के सन्नाटे में इस दुनिया की उड़ान के ख़याल को महसूस करने से महरूम रह जाते हैं।

    इस बीच शहर की उस चहारदीवारी के बाहर, जिस पर तोपें चढ़ी हुई थीं, चायख़ानों और सरायों में, जो घिचपिच बने हुए थे, बड़े-बड़े कड़ाहों के नीचे आग जल रही थी और ज़ब्ह होने के लिए ले जायी जाने वाली भेड़ों ने दर्दनाक आवाज़ में मिमियाना शुरु कर दिया था। तज्रबे से होशियार हुए ख़ोजा नसरुद्दीन ने रात भर के अपने आराम के लिए हवा के रुख़ के खिलाफ़ जगह तलाश की थी ताकि खाने की ललचानेवाली महक रात मैं उसे परेशान करे। बुख़ारा के रिवाजों की पूरी जानकारी होने के कारण उसने अगले दिन शहर के फाटक पर चुंगी अदा करने के लिए अपनी रक़म का आखि़री हिस्सा भी बचा रखा था।

    बहुत देर तक वह करवटें बदलता रहा, पर उसे नींद आयी। नींद आने की वजह भूख नहीं, बल्कि वे कड़वे विचार थे जो उसे सता रहे थे।

    उसे अपने वतन से मुहब्बत थी। धूप से तपे, तांबे के रंग के चेहरे पर छोटी सी काली दाढ़ी और साफ़ आँखों में एक शैतान चमकवाले इस चालाक और ख़ुश-मिज़ाज इंसान को सबसे ज़्यादा मुहब्बत थी अपने वतन से। और फटा, पैवन्द लगा कोट, तेल से भरा कुलाह और टूटे जूते पहने वह बुख़ारा से जितनी ज़्यादा दूरी पर होता, उतनी ही ज़्यादा मुहब्बत अपने वतन के लिए उसके दिल में उमड़ती और उतनी ही ज़्यादा उसकी याद सताती। अपनी जलावतनी में उसे बुख़ारा की उन तंग गलियों की याद आती जो इतनी पतली थीं कि अ'राबा (एक तरह की गाड़ी) दोनों तरफ़ की कच्ची दीवालों को रगड़ कर ही निकल पाता, उन ऊंचे मीनरों की याद आती जिनके रोग़नदार ईटोंवाले नक़्क़शीदार गुम्बदों पर सूरज निकलने और डूबने के वक़्त लाल रौशनी पैर टिकाती थी, उन पुराने और पाक दरख़्तों की याद आती जिनकी शाखों पर सारस के घोंसलों के काले बोझ झूलते रहते थे।

    नहरों के किनारे के चायख़ाने, जिन पर सरसराते हुए चिनारों का साया था, नानबाइयों की बेहद गर्म दुकानों से निकलता हुआ धूंआ और खाने की खु़शबू, बाज़ारों के तरह-तरह के शोर-गु़ल उसे याद आते।

    उसे अपने वतन के झरने और पहाड़ियाँ याद आतीं। खेत, चारगाह, गांव, रेगिस्तान याद आते। बग़दाद या दमिश्क़ में अपने हम-वतन लोगों को वह उनकी पोशाक या कुलाह की बनावट से पहचान लेता। उस वक़्त ख़ोजा नसरुद्दीन का दिल ज़ोर से धड़कने लगता और उसका गला भर आता। जाते वक़्त के मुक़ाबले अपनी वापसी पर उसे अपना मुल्क और भी दुखी लगा। पुराना अमीर बहुत पहले दफ़्न हो चुका था। पिछले आठ साल में नये अमीर ने बुख़ारा को बर्बाद करने में कोई कसर नहीं उठा रखी थी।

    ख़ोजा नसरुद्दीन ने टूटे हुए पुल, नहरों के धूप से चटकते सूखे तले, गेहूं और जौ के धूप से जले ऊबड़-खाबड़ खेत देखे। घास और कंटीली झाड़ियों से खेत बर्बाद हो रहे थे। बाग़ बिना पानी मुरझा रहे थे।

    काश्तकारों के पास मवेशी थे, रोटी। सड़कों पर क़तार बांधे फ़क़ीर उन लोगों से भीख मांगा करते थे जो खु़द ही रोटी के ज़रूरतमन्द थे।

    नये अमीर ने हर गांव में सिपाहियों की टुकड़ियां भेज रखी थीं और गाँव वालों को हिदायत दी थी कि इन सिपाहियों के खाने-पीने की ज़िम्मेदारी गांव वालों की होगी। उस ने बहुत सी मस्जिदों की नींव डाली और फिर गांव वालों से उन्हें पूरा करने को कहा। नया अमीर बड़ा मज़हबी था और साल में दो बार लासानी और सबसे ज़्यादा पाक शेख़ बहाउद्दीन के मज़ार की, जो बुख़ारा के नज़दीक ही थी, ज़ियारत करने से चूकता। चार टैक्स, जो पहले से लागू थे, उनमें तीन नये टैक्सों का उसने इज़ाफ़ा कर दिया था। हर पुल पर उसने चुंगी लगा दी थी। तिजारत पर उसने टैक्स बढा दिया था। क़ानूनी टैक्स में भी उसने इज़ाफ़ा कर दिया था और इस तरह बहुत सी नापाक रक़म जमा' कर ली थी। दस्तकारियां

    ख़त्म हो रही थीं। तिजारत कम होती जा रही थीं।

    ख़ोजा नसरुद्दीन की वापसी के वक़्त उस के वतन में बड़ी उदासी छायी हुई थी।

    सबेरे तड़के मोअज़्ज़िन ने फिर मीनारों से अज़ान दी। फाटक खुले और कारवां धीरे-धीरे दाख़िल हुआ।घंटियां हौले-हौले बज रही थीं।

    फाटक से घुस कर कारवां ठहर गया। सड़क पहरेदारों से घिरी हुई थी। वे बहुत बड़ी ता'दाद में थे। कुछ ठीक से वर्दी पहने थे और क़रीने से थे, कुछ, जिन्हें अमीर की नौकरी में माल काटने का पूरा मौक़ा अभी नहीं मिला था, अधनंगे और नंगे पांव थे। वे चींख़-चिल्ला रहे थे और उस लूट के लिए झगड़ एक-दूसरे को ठेल रहे थे, जो उन्हें अभी मिलनेवाली थी। आख़िर, एक चायख़ाने से एक मोटा-ताज़ा और नींद से भरा टैक्स-अफ़सर निकला। उसकी रेशमी ख़िलअ'त की आस्तीनों में तेल लगा था। उसके नंगे पांव जूतियों में पड़े थे। उसके मोटे थलथल चेहरे पर अ'य्याशी और बदकारी के निशान साफ़ झलक रहे थे। व्यापारियों की ओर उसने ललचायी नज़रों से देखा और कहाः "ताजिरो खु़शामदीद! अल्लाह करे तुम्हें अपने काम में कामयाबी हासिल हो! तुम्हें मा'लूम हो कि अमीर का हुक्म है कि जो तिजारी अपने माल का छोटे-से-छोटे हिस्सा भी छिपाने की कोशिश करेगा उसे बेंत लगाकर मार जाला जायगा।"

    परेशान और चौकन्ने व्यापारी चुपचाप अपनी रंगी हुई दाढ़ियां सहलाते रहे। बेताबी से चहलक़दमी करते हुए पहरेदारों की ओर टैक्स-अफ़सर मुड़ा और अपनी मोटी उंगलियाँ नचायीं। इशारा पाते ही वे सिपाही चींखते-चिल्लाते हुए ऊंटों पर टूट पड़े। उतावली में एक-दूसरे पर गिरते-पड़ते, उन्होंने तलवारों से बालों के बने रस्से काट डाले और मख़मल के थान, काली मिर्च, चाय, काफू़र, गुलाब के क़ीमती इत्र की शीशियां और तिब्बती दवाओं के डिब्बे बिखर गये।

    खौफ़ और परेशानी से व्यापारियों की जु़बान पर मानो ताला पड़ गया।

    दो मिनट में जांच पूरी हो गयी। सिपाही अफ़सर के पीछे क़तार बांधकर खड़े हो गये। उनके कोटों की जेबें लूट के माल से फटी जा रही थीं। अब शहर में आने और सामान लाने की टैक्स वसूली शुरु हुई।ख़ोजा नसरुद्दीन के पास तिजारत के लिए कोई सामान था नहीं। उसे शहर में घुसने का ही टैक्स अदा करना था।

    अफ़सर ने पूछा, "तुम कहां से आए हो और तुम्हारे आने का मक़्सद क्या है?"

    मुहर्रिर ने सींग में भरी स्याही में नेज़े की क़लम डुबोयी और मोटे रजिस्टर पर ख़ोजा नसरुद्दीन का बयान दर्ज करने को तैयार हो गया।

    "हुज़ूर आ'ला! मैं ईरान से रहा हूँ और यहां बुख़ारा में मेरे कुछ रिश्तेदार रहते हैं।"

    "अच्छा," अफ़सर ने कहा, "तो तुम अपने रिश्तेदारों से मिलने आये हो? इस हालत में तुम्हें मिलनेवालों का टैक्स अदा करना होगा।"

    "पर मैं उनसे मिलूंगा नहीं। मैं तो एक ज़रूरी काम से आया हूँ।" ख़ोजा नसरुद्दीन ने जवाब दिया।

    "काम से आये हो? " अफ़सर चिल्लाया और उसकी आँखें चमकने लगीं। "तो तुम रिश्तेदारों से मिलने भी आये हो और काम के लिए भी आये हो। तुम मिलनेवालों का टैक्स अदा करो, काम पर लगनेवाला टैक्स दो और खु़दा की अज़्मत में बनी मस्जिदों की आराइश के लिए अ'तिया अदा करो, जिसने रास्ते में डाकुओं से तुम्हारी हिफ़ाज़त की।"

    ख़ोजा नसरुद्दीन ने सोचा,- "मैं तो चाहता था कि वह खु़दा मेरी इस वक़्त हिफ़ाज़त करता- डाकुओं से बचने का इंतिज़ाम तो मैं खु़द ही कर लेता।" पर वह ख़ामोश ही रहा, क्योंकि उसने हिसाब लगा लिया था कि इस बातचीत के हर लफ़्ज़ की क़ीमत उसे दस तंके देकर अदा करनी पड़ी रही है। उसने अपना पटका खोला

    और पहरेदारों की ललचायी, घूरनेवाली आंखों के सामने शहर में दाख़िल होने का टैक्स, मेहमान टैक्स तिजारत टैक्स और मस्जिदों की अराइश के लिए अ'तिया अदा किया। अफ़सर ने सिपाहियों की ओर घूरा तो वे पीछे को हट गये। मुहर्रिर रजिस्टर में नाक गड़ाये नेज़े की क़लम घसीटता रहा।

    टैक्स अदा करने के बाद ख़ोजा नसरुद्दीन रवाना होनेवाला ही था कि टैक्स-अफ़सर ने देखा कि उसके पटके में अब भी कुछ सिक्के बाक़ी हैं।

    "ठहरो!" वह चिल्लाया। "तुम्हारे उस गधे का टैक्स कौन अदा करेगा? अगर तुम अपने रिश्तेदारों से मिलने आये हो, तो तुम्हारा गधा भी अपने रिश्तेदारों से मिलेगा ही।"

    अपना पटका एक बार फिर खोलते हुए ख़ोजा नसरुद्दीन ने बहुत नर्मी से जावब दियाः "मेरे दानिशमन्द आक़ा! आप बजा फ़रमाते हैं। वाक़ई, मेरे गधे के रिश्तेदारों की ता'दाद बुख़ारा में बहुत बड़ी है, नहीं तो, जिस ढंग से यहां काम चल रहा है, आपके अमीर बहुत पहले ही तख़्त से धकेल दिये गये होते और मेरे बहुत क़ाबिल हुज़ूर आप, अपने लालच के लिए, जाने कब सूली पर चढ़ा दिये गये होते।"

    इसके पहले कि अफ़सर अपने होश दुरुस्त कर पाये, ख़ोजा नसरुद्दीन कूद कर अपने गधे पर सवार हुआ, उसे सरपट भगाया और सबसे नज़दीक की गली में ग़ायब हो गया।

    वह बराबर कहता जा रहा थाः "और तेज़ ! और जल्दी, मेरे वफ़ादार गधे! जल्दी भाग नहीं तो तेरे मालिक को एक टैक्स और अपना सिर देकर अदा करना पड़ेगा।"

    ख़ोजा नसरुद्दीन का गधा बहुत होशियार था। हर बात समझता था। उसके लम्बे कानों में शहर के फाटक से आयी आवाज़ें और पहरेदारों की चिल्लाहट पड़ चुकी थी और वह सड़क की परवाह किये बिना सरपट भागा जा रहा था- इतनी तेज़ रफ़्तार से भाग रहा था वह कि उसके मालिक को अपने पैर ऊंचे उठाने पड़ रहे थे, उसके हाथ गधे की गर्दन से लिपटे हुए थे और वह ज़ीन से चिपका हुआ था। भारी आवाज़ में भोंकते कुत्ते उसके पीछे दौड़ रहे थे, मुर्गी़यों के चूज़े डर से हर ओर तितर-बितर होकर भाग रहे थे और सड़क पर चलनेवाले लोग दीवारों से चिपटे, अपने सिर हिलाते हुए उसे देख रहे थे।

    शहर के फाटकों पर पहरेदार इस हिम्मतवार आज़ाद ख़याल इंसान की तलाश में भीड़ छान रहे थे।

    व्यापारी मुस्कुरा कर एक-दूसरे से फुसफुसा रहे थेः "यह जवाब तो खु़द ख़ोजा नसरुद्दीन के क़ाबिल था।"

    दोपहर होते-होते पूरा शहर इस ख़बर को सुन चुका था। बाज़ार में व्यापारी अपने गाहकों को चुपचाप यह क़िस्सा सुनाते और वे इसे दूसरों को सुनाते। हर एक हंसता और कहताः

    "ये अल्फ़ाज़ तो ख़ोजा नसरुद्दीन के ही क़ाबिल है।"

    ।। 3 ।।

    बुख़ारा में उसे रिश्तेदार मिले, पुराने दोस्त। उसे अपने वालिद का मकान भी नहीं मिला, जहां वह पैदा हुआ था और बड़ा हुआ था। वह हरा-भरा सायेदार बाग़ीचा ही उसे मिला जहां सर्दी के मौसम में पीली-पीली पत्तियां हवा में सरसराती हुई झूलतीं और पके फल ज़मीन पर भद से गिरते, जहां चिड़ियां उंची आवाज़ में गातीं और खु़शबूदार घास पर सूरज की किरनें नाचा करतीं, जहां मक्खियां मुरझाते हुए फूलों से आख़िरी रस चूसती हुई भनभनाया करती और सिंचाई के तालाब में झरना भेद भरे ढंग से बच्चों को कभी ख़त्म होने वाली अनबूझ कहानियां सुनाया करता था।... उस जगह अब ऊसर मैदान था, जिस पर बीच-बीच में मलबे और खड़ंजे की ढेर लगे थे, टूटती हुई दीवारें खड़ी थीं, चटाइयों के टुकड़े सड़ रहे थे, और कांटेदार झाड़ियां उग आयी थीं। वहां ख़ोजा नसरुद्दीन को एक चिड़िया दिखायी दी, मक्खी। सिर्फ़ पत्थरों के ढरे के नीचे से, जहां

    उसका पैर पड़ गया था, एकाएक एक लम्बी तेल की-सी धार उबल पड़ी और धूप में हलकी चमक के साथ पत्थरों के दूसरे ढेर में छिप गयी- यह एक सांप था, हमेशा से इंसान की छोड़ी हुई वीरान जगहों का अकेला और ख़ौफ़नाक बाशिन्दा!

    ख़ोजा नसरुद्दीन बहुत देर तक नीची निगाह किये ख़ामोश खड़ा रहा। उसका दिल ग़म से भर उठा था। पूरे जिस्म को कंपा देनेवाली खांसी की आवाज़ सुनकर वह चौंक उठा और पीछे मुड़ कर देखा। ग़रीबी और परेशानियों से दोहरा एक बूढ़ा उस बंजर ज़मीन को लांघता हुआ रहा था। ख़ोजा नसरुद्दीन ने उसे रोका।

    "अस्सलामालेकुम बुजु़र्गवार! अल्लाह आपको सेहत और तरक़्क़ी बख़्शे। क्या आप मुझे बतायेंगे कि इस ज़मीन पर किस का मकान था?"

    "यहां ज़ीनसाज़ शेर मुहम्मद का घर था," बूढ़े ने जवाब दिया, "मैं उनसे एक ज़माने से खू़ब वाक़िफ़ था। शेर मुहम्मद मशहूर ख़ोजा नसरुद्दीन के वालिद थे और ख़ोजा के बारे में, मुसाफ़िर, तुमने ज़रूर बहुत कुछ सुना होगा।"

    "हां, मैं ने कुछ सुना तो है। लेकिन आप बतायें कि मशहूर ख़ोजा नसरुद्दीन के वालिद ज़ीनसाज़ शेर मुहम्मद और उनके घरवाले गये कहां?"

    "इतने ज़ोर से बोलो, मेरे बेटे! बुख़ारा में हज़ारों जासूस हैं। अगर वे हम लोगों की बातचीत सुन लेंगे तो हमारे लिए परेशानी ही परेशानी रह जायेगी। तुम ज़रूर कहीं बहुत से दूर से रहे हो, तभी नहीं जानते कि हमारे शहर में ख़ोजा नसरुद्दीन का नाम लेने की सख़्त मुमानअ'त है। उनका नाम लेना ही जेल में भर दिये जाने के लिए काफ़ी है। आओ, मेरे और नज़दीक जाओ। मैं तुम्हें बताऊं कि शेर मुहम्मद का क्या हुआ?"

    घबराहट और खलबली को छिपाते हुए ख़ोजा नसरुद्दीन बूढ़े के नज़दीक गया।

    बूढ़े ने खांसते हुए कहना शुरु कियाः " यह वाक़िआ' पुराने अमीर के ज़माने का है। ख़ोजा नसरुद्दीन के बुख़ारा से निकाले जाने के लिए कोई अट्ठारह महीने बाद बाज़ारों में अफ़वाह फैली कि वह खुफ़िया तौर पर, गै़र क़ानूनी ढंग से, फिर लौट आया है और अमीर का मज़ाक़ उड़ानेवाले गीत लिख रहा है। अफ़वाह अमीर के

    महल तक पहुंची। सिपाहियों ने ख़ोजा नसरुद्दीन की बहुत तलाश की, लेकिन नाकामयाब रहे। अब अमीन ने उसके वालिद, उसके दो भाई, चाचा दूर के रिश्तेदारों दोस्तों को पकड़ लेने का हुक्म जारी किया। उन लोगों को तब तक तकलीफ़ें दी जानेवाली थीं, जब तक वे ख़ोजा नसरुद्दीन का पता बता दें।

    अल्लहमदुल्लिलाह (अल्लाह का शुक्र है) कि उसने उन लोगों को ख़ामोश रहने की हिम्मत ज़ब्त दी कि ख़ोजा नसरुद्दीन अमीर के हाथों नहीं पड़ा। पर उसका वालिद ज़ीनसाज़ शेर मुहम्मद तकलीफ़ों से बीमार पड़ गया और फ़ौरन बाद मर गया। उसके रिश्तेदार और दोस्त अमीर के गु़स्से से बचने के लिए बुख़ारा

    छोड़ कर भाग गये। किसी को मा'लूम नहीं कि वे अब कहां है। अमीर ने उनके मकानों-बाग़ीचों को तहस-नहस और बर्बाद करने का हुक्म जारी कर दिया ताकि ख़ोजा नसरुद्दीन की याद भी बाक़ी रह जाय।"

    "पर उन्हें तकलीफ़ें क्यों दी गयीं?" ख़ोजा नसरुद्दीन ने ज़ोर से पूछा। आंसू उसके गालों पर बह रहे थे लेकिन बूढ़े ने उन्हें नहीं देखा। उसकी निगाह कमज़ोर थी। "उन्हें सताया क्यों गया? ख़ोजा नसरुद्दीन उस वक़्त बुख़ारा में तो था नहीं। मैं यह बात बखू़बी जानता हूँ।"

    "यह कौन कह सकता है?" बुढ़े ने जवाब दिया। "ख़ोजा नसरुद्दीन जहां जब उसकी मर्ज़ी होती है, आता जाता है। हमारा लासानी ख़ोजा नसरुद्दीन हर जगह है और कहीं भी नहीं है!"

    यह कह कर बूढ़ा खांसता कांखता हुआ आगे बढ़ गया। अपना मुंह हाथों में छिपाये, ख़ोजा नसरुद्दीन अपने गधे की तरफ़ बढ़ा।

    गधे की गर्दन में बाहें डालकर और अपना भीगा हुआ गाल उसकी गर्म, गंधाती गर्दन से लगाते हुए ख़ोजा नसरुद्दीन बोलाः "ऐ मेरे अच्छे, मेरे सच्चे दोस्त! तू देख रहा है कि मेरे प्यारे लोगों में यहां तेरे सिवा और कोई नहीं बचा। तू ही मेरी आवारागर्दी में मेरा वफ़ादार और बराबर का साथी है।"

    गधा मानो अपने मालिक का ग़म समझ रहा हो। वह बिल्कुल चुपचाप खड़ा रहा। झाड़ी की पत्तियां तक खाना उसने छोड़ दिया। वे उसके मुंह से लटकती रह गयीं।

    घंटे भर में ख़ोजा नसरुद्दीन अपने ग़म पर क़ाबू पा चुका था और उसके आंसू उसके चेहरे पर सूख चुके थे।

    "कोई बात नहीं!" गधे की पीठ पर धौल जमाते हुए वह चिल्लाया, "कोई फ़िक्र नहीं! बुख़ारा में लोग मुझे अब भी याद रखे हैं। लोग मुझे अब भी जानते और याद करते हैं। किसी किसी तरह हम लोग कुछ दोस्त ढूंढ ही निकालेंगे! और, अमीर के बारे में हम ऐसा गीत बनायेंगे- ऐसा, कि वह गु़स्से से अपने तख़्त पर ही फट जायगा और उसकी गन्दी आंतें महल की सजी-सज़ायी दीवारों पर जा पड़ेंगी। चल, मेरे वफ़ादार गधे!आगे बढ़!"

    ।। 4 ।।

    तीसरे पहर का सन्नाटा। बड़ी उमस थी। धूल भरी सड़क। पत्थरों, कच्ची दीवारों और बाड़ों से अलसायी-सी गर्मी उठ रही थी। इसके पहले कि वह पोंछ सके, ख़ोजा नसरुद्दीन के चेहरे पर पसीना सूख जाता था।

    बड़े प्यार से उसने बुख़ारा की जानी-पहचानी सड़कों, चायख़ानों और मीनारों को पहचाना। दस साल में बुख़ारा में कुछ भी नहीं बदला था। हमेशा की तरह कुछ मरगिल्ले कुत्ते अब भी तालाब के किनारे पड़े सो रहे थे। रंगे हुए नाखू़नों वाले हाथों से बुर्क़ा उठाये एक औ'रत बड़े सजीले ढंग से झुकी गहरे रंग के पानी में एक पतली-सी, बजती हुई, सुराही डुबो रही थी।

    सवाल था कि खाना कहां और कैसे मिले।ख़ोजा नसरुद्दीन ने कल से तीसरी बार अपना पटका और कसके बांधा।

    "कोई कोई तरकीब तो करनी ही होगी, मेरे वफ़ादार गधे!" उसने कहा। "यहां रुक कर हम कोई तरकीब सोंचे।

    खु़शक़िस्मती से यहीं एक चायख़ाना भी है।"

    लगाम ढीली करते हुए उसने गधे को खूंटे के आसपास पड़े तिपतिया घास के टुकड़े चरने के लिए छोड़ दिया।

    अपनी ख़िलअ'त का दामन सिकोड़ कर वह सिंचाईवाली नहर के किनारे बैठ गया। वहां गंदला पानी मोड़ पर उफन रहा था और बुलबुले छोड़ रहा था।

    ख़यालों में डूबा ख़ोजा नसरुद्दीन सोचा रहा थाः "क्यों, कैसे और कहां से बह रहा है यह पानी? पानी को खु़द इसकी ख़बर है, इस बारे में वह कुछ सोचता ही है। मैं, खु़द भी, यह जानता हूं कि मैं कहां जा रहा हूं, मुझे घर या आराम ही मयस्सर है। मैं बुख़ारा क्यों आया? कल मैं कहां हूंगा? मुझे खाना ख़रीदने के लिए आधे तंके का सिक्का भी कहां से मिलेगा? क्या मैं भूखा ही रह जाऊंगा? यह कम्बख़्त टैक्स वसूलने वालाअफ़सर! उसने मेरी सारी रक़म साफ़ कर दी! मुझ से डाकुओं की बात करना कितनी बड़ी गुस्ताख़ी थी।"

    उसी वक़्त उसे वह आदमी दिखायी दिया जो उसकी बदक़िस्मती का बाइ'स था। टैक्स-अफ़सर घोड़े पर चढ़ा चायख़ाने की ओर रहा था। दो सिपाही उसके अ’रबी घोड़े की लगाम पकड़े-पकड़े आगे चल रहे थे। घोड़ा कत्थई भूरे रंग का ख़ूबसूरत जानवर था। उसकी गहरे रंग की आंखों में बहुत अच्छी चमक थी। गर्दन उसकी सुराहीदार थी और जब वह अपनी ख़ूबसूरत पतली टांगें बड़े अंदाज़ से आगे बढ़ाकर रखता तो साफ़ ज़ाहिर होता कि वह अपने मालिक की थलथल मोटी लाश को ढोने से ज़ाहिर है।

    सिपाहियों ने बड़े अदब से अपने सरदार को उतरने में मदद दी। वह उतरा और चायख़ाने में चला गया। चायख़ाने के घबराये हुए मालिक फ़रमाबरदारी में उसे रेशमी गद्दों की ओर ले गया जहां वह बैठ गया। फिर मालिक ने बेहतरीन चाय का एक ख़ास प्याला तैयार किया और चीनी कारीगरी के एक नाज़ुक गिलास में अपने मेहमानों को चाय दी।

    "देखो तो! मेरी कमाई पर यह कितनी शानदार ख़ातिर पा रहा है।" ख़ोजा नसरुद्दीन सोच रहा था।

    अफ़सर ने डटकर चाय पी और वहीं गद्दों पर लुढ़ककर सो गया। उसके ख़र्राटों, होंठ चटख़ारने और गलल-गलल की आवाज़ों के शोर से पूरा चायख़ाना भर गया। उसकी नींद में ख़लल पड़े इस डर से चायख़ाने के दूसरे मेहमानों ने फुसफुसाकर बातें करना शुरु किया। पहरेदार उसके दोनों तरफ़ बैठ गये और पत्तियों की चौरियों से मक्खियां उड़ाने लगे। जब उन्हें अक़्ल-मंद हो गया कि उनका सरदार गहरी नींद में सो गया है तो उन्होंने आंखो से इशारा किया, उठकर घोड़े की लगाम खोली, उसके सामने घास का एक गट्ठर डाला और एक नारियली हुक़्क़ा लेकर चायख़ाने के अंधेरे हिस्से की तरफ़ बढ़ गये। थोड़ी देर बाद ख़ोजा नसरुद्दीन को गांजे की मीठी-मीठी महक मिली।

    पहरेदार नशे में मदहोश थे।

    शहर के फाटक पर सबेरे की घटनाओं को याद कर और इस डर से कि कहीं पहरेदार उसे पहचान लें, ख़ोजा नसरुद्दीन ने तय किया कि अब रफ़ूचक्कर होने का वक़्त गया है। "तो भी, वह आधा तंका कहा मिलेगा? कातिब-ए-तक़दीर! तू ख़ोजा नसरुद्दीन की मदद के लिए जाने कितनी बार आया है। अब फिर उस पर करम की नज़र कर!"

    तभी किसी ने उसे पुकारा- "अरे सुन! हां हां तू, जो वहां बैठा है!"

    ख़ोजा नसरुद्दीन पलटा और उसे सड़क पर एक बहुत सज़ावटदार ढकी हुई गाड़ी नज़र आयी। एक बड़ा साफ़ा बांधे और क़ीमती ख़िलअ’त पहने एक आदमी गाड़ी के पर्दों से बाहर झांक रहा था। इससे पहले कि वह अजनबी एक लफ़्ज़ भी और बोले, ख़ोजा नसरुद्दीन समझ गया कि उसकी दुआ सुन ली गयी है और हमेशा की तरह क़िस्मत ने, उसे मुसीबत में देख कर, उस पर करम की नज़र की है।

    उस रईस अजनबी ने ख़ूबसूरत अ’रबी घोड़े को देखते हुए और उसकी तरीफ़ करते हुए, अकड़कर कहाः "मुझे यह घोड़ा पसन्द है। बोल, क्या यह घोड़ा बिकाऊ है?"

    बात बनाते हुए ख़ोजा नसरुद्दीन ने कहाः "दुनिया में कोई ऐसा घोड़ा है ही नहीं जो बेचा जा सके।"

    "शायद तुम्हारी जेब बिल्कुल ख़ाली है।" अजनबी बोला। "मेरी बात कान देकर सुनो। मैं नहीं जानता कि यह घोड़ा किसका है, कहां से आया है और इसका पहलेवाला मालिक कहां है। मैं तुम से पूछ भी नहीं रहा। तुम्हारे कपड़ों पर पड़ी गर्द से लगता है कि तुम कहीं बहुत दूर से बुख़ारा आये हो। मेरे लिए यह बहुत काफ़ी है। तुम समझ रहे हो न?"

    ख़ोजा नसरुद्दीन ने सिर हिलाकर हामी भरी। वह फ़ौरन भांप गया कि रईस क्या कहना चाहता है, और वह इससे भी आगे की बात समझ गया। अब वह सिर्फ़ यह मान रहा था कि कोई बेवक़ूफ़ मक्खी टैक्स-अफ़सर की गर्दन या नाक पर कूद कर कहीं उसे जगा दे। पहरेदारों की उसे ज़्यादा फ़िक्र थी, क्योंकि चायख़ाने के अंधेरे हिस्से से आनेवाले गहरे धुएं से ज़ाहिर था कि वे नशे में धुत है।

    अजनबी अमीर बड़े बुज़ुर्गाना और गम्भीर लहजे में बोलाः "तुम्हें यह समझना चाहिए कि इस फटी ख़िलअ’त को पहनकर ऐसे घोड़े पर चढ़ना तुम्हें ज़ेब नहीं देता। तुम्हारे लिए यह ख़तरनाक भी साबित हो सकता है, क्योंकि हर कोई सोचेगाः इस भिखमंगे को इतना बढ़िया घोड़ा मिला कहाँ से? इसकी भी गुंजायश है कि तुम क़ैद में डाल दिये जाओ।"

    ख़ोजा नसरुद्दीन बहुत आजिज़ी से बोलाः " ठीक फ़रमाते हैं आप, मेरे आक़ा। सचमुच यह घोड़ा मेरे जैसों के लिए ज़रुरत से ज़्यादा बढ़िया है। इस फटी ख़िलअ’त में मैं ज़िन्दगी भर गधे पर ही चढ़ता रहा हूँ और मैं ऐसे घोड़े पर सवारी करने की सोचने की हिम्मत भी नहीं कर सकता।"

    जवाब सुनकर अजनबी ख़ुश हुआ।

    "यह ठीक है कि तुम ग़रीब हो, लेकिन घमंड ने तुम्हें अंधा नहीं बना दिया। नाचीज़ ग़रीब को ख़ाकसारियत ही ज़ेब देती है, क्योंकि ख़ूबसूरत फूल बादाम के शानदार दरख़्त पर ही अच्छे लगते हैं, मैदान की कंटीली झाड़ी पर नहीं।

    अब तुम मुझे जवाब दोः क्या तुम्हें यह थैली चाहिए? इसमें चांदी के पूरे तीन सौ तंके मौजूद है।"

    "चाहिए?" भौजक्का होकर- क्योंकि एक बेवक़ूफ़ मक्खी उसी वक़्त टैक्स-अफ़सर की नाक में घुस गयी थी, जिससे कि वह छींक रहा था और कुनमुना रहा था- ख़ोजा नसरुद्दीन चिल्लाया, "चाहिए? मैं समझता हूँ ज़रुर चाहिए! चांदी

    के तीन सौ तंके लेने से कौन इनकार करेगा? अरे, यह तो ऐसे ही हुआ जैसे किसी को थैली सड़क पर पड़ी मिल जाये!"

    बड़े जानकार ढंग से मुस्कुराते हुए वह अजनबी बोलाः "लगता है कि तुम्हें सड़क पर बिल्कुल दूसरी चीज़ मिली है।

    लेकिन मैं यह रक़म उस चीज़ से बदलने को तैयार हूं जो तुम्हें सड़क पर मिली है। यह रहे तुम्हारे तीन सौ तंके।"

    उसने वह भारी थैली ख़ोजा नसरुद्दीन को सौंप दी और अपने नौकर को इशारा किया जो चाबुक से अपनी पीठ खुजलाता हुआ वहां खड़ा बातचीत सुन रहा था। काठ जैसे उसके चेचक रु चेहरे की मुस्कान और उसकी आंखों के काइयांपन को देखकर ख़ोजा नसरुद्दीन समझ गया कि यह नौकर जो घोड़े की तरफ़ जा रहा है उतना ही बड़ा मक्कार है जितना बड़ा उसका मालिक।

    "एक ही सड़क पर तीन-तीन मक्कारों का एक साथ होना ठीक नहीं।" उसने तय किया। "इनमें से कम से कम एक तो ज़रुर ही फ़ालतू है। वक़्त गया है कि मैं यहां से नौ दो ग्यारह हो जाऊं।"

    उस अजनबी रईस की नेकनीयती और दरियादिली की तरीफ़ करता हुआ नसरुद्दीन जल्दी से गधे पर सवार हो गया और उसे इतने ज़ोर से ऐड़ लगायी कि तबीअ’त से काहिल होने पर भी गधा एकदम दुलकी भाग चला।

    ख़ोजा नसरुद्दीन ने पीछे मुड़कर देखा तो नौकर अ'रबी घोड़े को गाड़ी से बांध रहा था। वह फिर मुड़ा तो देखा कि अजनबी रईस और टैक्स-अफ़सर एक-दूसरे से गुथे हुए दाढ़ियां नोच रहे हैं और सिपाही उन्हें अलग करने की बेकार कोशिश कर रहे हैं।

    अक़्ल-मंद लोग दूसरों के झगड़ों में दिलचस्पी नहीं लेते। ख़ोजा नसरुद्दीन गली-कूचो में चक्कर काटता हुआ काफ़ी दूर बढ़ गया- यहाँ तक कि उसे यक़ीन हो गया कि अब वह पीछा करनेवालों से बच गया है। उसने अपने गधे की लगाम खींची।

    "ठहरो, ठहरो," उसने कहना शुरु किया, "अब कोई जल्दी नहीं है...।" यकायक बिल्कुल पास ही उसे घोड़े की तेज़ और चौंका देनेवाली टापें सुनायी दीं।"ओह, आगे बढ़, मेरे वफ़ादार गधे! मुझे यहां से जल्दी निकाल ले चल!" वह चिल्लाया।

    लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। पीछे से एक घुड़सवार छलांग भरता हुआ सड़क पर गया था।

    यह वही चेचक रू नौकर था। वह गाड़ी से खो लकर लाये घोड़े पर सवार था। अपने पैर झुलाता हुआ वह तेज़ी से ख़ोजा नसरुद्दीन की बग़ल से गुज़र गया और घोड़े की सड़क पर आड़ा खड़ा कर के यकायक रुक गया।

    ख़ोजा नसरुद्दीन बहुत आजिज़ी से बोला- "ओ भलेमानस! मुझे आगे बढ़ने दे। ऐसी तंग सड़कों पर लोगों को सीधे- सीधे सवारी करनी चाहिए, आड़े-आड़े नहीं।"

    बदनीयती से भरी हंसी के साथ नौकर ने जवाब दियाः "आहा! क़ैदखाने से बचने का अब कोई रास्ता तुम्हारे लिए नहीं है। मा’लूम है तुम्हें? घोड़े के मालिक उस अफ़सर ने मेरे मालिक की आधी दाढ़ी नोच डाली है और मेरे मालिक ने उसकी नाक से ख़ून निकाल दिया है! कल तुम अमीर की अदालत में पेश हो गे। सच है, दोस्त! तुम्हारी तक़दीर बहुत ख़राब है!"

    ख़ोजा नसरुद्दीन ने तअ’ज्जुब से पूछा, "तुम कह क्या रहे हो? ऐसे इज़्ज़त-दार लोगों के इस तरह झगड़ पड़ने की वजह क्या है? और तुमने मुझे रोका क्यों है? उनके झगड़े का फ़ैसला मैं तो कर नहीं सकता! उन्हें इसका फ़ैसला अपने-आप करने दो, जैसे भी वे कर पायें।"

    "ख़ामोश!" नौकर चिल्लाया। "वापस लौट। तुझे उस घोड़े के लिए जवाब देना होगा।"

    "कौन सा घोडा?"

    "तेरी यह पूछने की मजाल! अरे, वही घोड़ा जिसके लिए तुझे मेरे मालिक से चांदी की थैली मिली थी।"

    "ख़ुदा गवाह है! तुम ग़लती कर रहे हो।" ख़ोजा नसरुद्दीन ने जवाब दिया। "इस मुआ’मले का घोड़े से कोई वास्ता नहीं।

    तुम ख़ुद फ़ैसला करो। तुमने तो पूरी बातचीत सुनी थी। तुम्हारे दरियादिल मालिक ने, एक ग़रीब इंसान की मदद करने के इरादे से, मुझसे पूछा कि क्या मैं चांदी के तीन सौ तंके लेना पसन्द करूंगा और मैंने जवाब दियाः "हां, वाक़ई, मैं यह रक़म लेना पसंद करूंगा।" तब उसने मुझे तीन सौ तंके दे दिये! अल्लाह उसे लम्बी ज़िन्दगी दे। पर मुझे रूपया देने से पहले उसने यह देखने के लिए कि मैं इस इनआ’म का हक़दार भी हूं या नहीं, जांचना चाहा कि मुझ नाचीज़ में आजिज़ी और इंकिसारी है या नहीं। उसने कहा, 'मैं नहीं जानना चाहता कि यह घोड़ा किस का है और कहां से आया है।'

    "देखा तुमने ! वह यह जानना चाहता था कि कहीं मैं झूठे घमंड में अपने को घोड़े का मालिक तो नहीं बता बैठता।

    मैं ख़ामोश रहा। वह फ़य्याज़, मुक़द्दस इंसान ख़ुश हुआ। उसने कहा कि मेरे जैसों के लिए यह घोड़ा ज़रुरत से ज़्यादा अच्छा है। मैं उसकी बात मान गया। इस से वह और भी ख़ुश हुआ। तब उस ने कहा कि मैं सड़क पर ऐसी चीज़ पा गया हूं जिसके बदले में चांदी के सिक्के मिल सकते हैं। उसका इशारा मुस्तक़िल मिजाज़ी जोश के साथ इस्लाम में मेरे यक़ीन की तरफ़ था। यह यक़ीन मुझे पाक जगहों के सफ़र में हासिल हुआ। इस सबके बाद उसने मुझे इनआ’म दिया। इस नेक काम के ज़रिए वह क़ुरआन शरीफ़ में बताये गये बहिश्त जाने के रास्ते में पड़ने वाले उस पुल पर से अपना सफ़र ज़्यादा आसान बनाना चाहता था, जो बाल से भी ज़्यादा बारीक है और तलवार की धार से भी ज़्यादा तेज़ है। इबादत के वक़्त मैं अल्लाह से तुम्हारे मालिक के इस भले काम की हवाला दूंगा ताकि उसके लिए वह पुल पर बाड़ लगवा दे।"

    चाबुक से अपनी पीठ खुजलाता हुआ नौकर लम्बी तक़रीर सुनता रहा। तक़रीर ख़त्म होने पर ख़ोजा नसरुद्दीन को परेशान कर डालनेवाली काइयां हंसी के साथ वह बोलाः

    "ऐ मुसाफ़िर! तुम ठीक कहते हो। मेरे मालिक से हुई तुम्हारी बातचीत का मतलब इतना नेक है, यह पहले मेरी समझ में क्यों आया? लेकिन, चूंकि उस दूसरी दुनिया के रास्ते का पुल पार करने में तुमने मेरे मालिक को मदद करना तय किया है, तो ज़्यादा हिफ़ाजत इसी में होगी कि पुल पर दोनों तरफ़ बाड़ें लग जायें। मैं भी, ब-ख़ुशी, अल्लाह से दुआ मांगूंगा ताकि वह मेरे मालिक के लिए दूसरी तरफ़ भी बाड़ लगा दे।"

    "तुम मांगो दुआ!" ख़ोजा नसरुद्दीन चिल्लाया। "तुम्हें रोकता कौन है? बल्कि ऐसा करना तो तुम्हारा फ़र्ज़ है। क्या क़ुरआन में हिदायत नहीं है कि ग़ुलामों और नौकरों को अपने मालिकों के लिए रोज़ दुआ मांगनी चाहिए और इसके लिए कोई इनआ’म अलग से नहीं मांगना चाहिए?"

    घोड़े को एड़ लगाकर ख़ोजा नसरुद्दीन को दीवाल की तरफ़ दबाते हुए नौकर सख़्ती से बोलाः "अपना गधा वापस लौटा! चल, जल्दी कर, मेरा ज़्यादा वक़्त ख़राब कर।"

    ख़ोजा नसरुद्दीन ने उसे बीच में ही टोक कर जल्दी से कहाः "ठहरो, मुझे बात तो ख़त्म कर लेने दो मेरे भाई। मैं तीन सौ तंको के हिसाब से उतने ही अल्फ़ाज़ की एक दुआ करनेवाला था। पर आब मैं, सोचता हूं कि ढाई सौ अल्फ़ाज़ की दुआ ही काफ़ी होगी। मेरी तरफ़ की बाड़ कुछ छोटी और पतली हो जायगी। जहां तक तुम्हारा तअ’ल्लुक़ है, तुम पचास अल्फ़ाज़ की दुआ मांगना और सब कुछ जानने वाला अल्लाह उतनी ही लकड़ी से तुम्हारी तरफ़ भी बाड़ लगा देगा।"

    "क्यों? मेरी तरफ़ की बाड़," नौकर बोला, "तुम्हारी बाड़ का पांचवा हिस्सा ही क्यों हो?"

    "वह सबसे ज़्यादा ख़तरनाक मक़ाम पर जो बनेगी!" नसरुद्दीन ने जल्दी से कहा।

    नौकर अकड़ कर बोलाः "नहीं, मैं ऐसी छोटी बाड़ों के लाएक़ नहीं हूं। इसका मतलब तो यह हुआ कि पुल का कुछ हिस्सा बिना बाड़ का रह जायेगा। मेरे मालिक के लिए इससे जो ख़तरा पैदा होगा, मैं तो उसे सोचकर ही कांप जाता हूं। मेरी राय में तो हम दोनों ही डेढ़ डेढ़ सौ अल्फ़ाज़ की दुआ मांगे ताकि पुल के दोनों तरफ़ बाड़ एक ही लम्बाई की हो। पतली ज़रुर होगी, पर कम से कम दोनों तरफ़ हिफ़ाजत तो रहेगी। और अगर तुम राज़ी नहीं होते, तो इसका मतलब यह हुआ कि तुम मेरे मालिक का बुरा चाहते हो और यह चाहते हो कि वह पुल से गिर जाय।

    तब मैं मदद मांगूंगा और तुम क़ैदखाने का सबसे नज़दीक का रास्ता इख़्तियार करोगे।"

    ग़ुस्से से ख़ोजा नसरुद्दीन बोलाः "पतली बाड़? तुम जो कुछ कह रहे हो उससे लगता है कि पतली टहनियों की बाड़ लगा देना ही तुम्हारे लिए काफ़ी होगा। क्या तुम समझ नहीं रहे कि बाड़ एक तरफ़ मोटी और मज़बूत होनी चाहिए, ताकि अगर तुम्हारे मालिक के पैर डग़मगाये तो उनके पकड़ने के लिए कुछ तो रहे।" उसे लग रहा था कि रुपयों की थैली पटके से खिसक रही है।

    ख़ुशी से चिल्लाता हुआ नौकर बोलाः "सचमुच तुमने हक की बात कही है। बाड़ को मेरी तरफ़ मज़बूत होने दो और मैं दो सौ अल्फ़ाज़ की दुआ मांगने में आना-कानी नहीं करूंगा।"

    "तुम शायद तीन सौ अल्फ़ाज़ की दुआ मांगना चाहोगे?" ज़हरीली आवाज़ में ख़ोजा नसरुद्दीन बोला।

    वे दोनो अलग हुए तो ख़ोजा नसरुद्दीन की थैली का आधा वज़न कम हो चुका था। उन लोगो ने तय किया था कि मालिक के लिए बहिश्त के रास्ते वाले पुल के दोनों तरफ़ बराबर-बराबर मज़बूती और मोटाई की बाड़ लगायी जाय।

    "अलविदा’अ मुसाफ़िर!" नौकर ने कहा। "हम दोनों ने आज बड़े सवाब का काम किया है।"

    "अलविदा’अ, मेहरबान, वफ़ादार और भले नौकर! अपने मालिक की रूह के लिए तुम्हें कितनी फ़िक्र है! मैं यह और कह दूं कि तुम बहुत जल्दी ख़ुद ख़ोजा नसरुद्दीन की टक्कर के हो जाओगे।"

    नौकर के कान खड़े हुए। उसने पूछाः "उसका ज़िक्र तुमने क्यों किया?"

    "कुछ नहीं, यूं ही। बस मुझे ऐसा लगा," ख़ोजा नसरुद्दीन बोला। वह सोच रहा था- "आहा! यह शख़्स बिल्कुल सीधा सादा नहीं है।"

    नौकर ने पूछाः "शायद तुम्हारा उस से कोई दूर का रिश्ता है! शायद तुम उसके ख़ानदान के किसी शख़्स से वाक़िफ़ हो!"

    "नहीं, मैं उस से कभी नहीं मिला और मैं उसके किसी रिश्तेदार को भी नहीं जानता।"

    नौकर अपनी ज़ीन से झुक कर बोलाः "सुनो, मैं तुम्हें एक राज़ की बात बताऊं। मैं उस का रिश्तेदार हूं। अस्ल में उसका चचेरा भाई हूं। हम दोनों का बचपन में साथ रहा था।"

    ख़ोजा नसरुद्दीन का शक पक्का हो गया और वह बिल्कुल ख़ामोश रहा। नौकर उस की ओर और ज़्यादा झुक आयाः "उसके वालिद, दो भाई और चचा मर चुके हैं। मुसाफ़िर, तुमने यह तो शायद सुना ही होगा?"

    लेकिन ख़ोजा नसरुद्दीन तब भी ख़ामोश रहा।

    फ़रेबी नौकर बोलाः "अमीर भी कितना बे-रहम है!"

    पर ख़ोजा नसरुद्दीन फिर भी चुप रहा।

    "बुख़ारा के सब वज़ीर बेवक़ूफ़ है!" यकायक नौकर कहने लगा। लालच और बेसब्री से वह उतावला था, क्योंकि ला-मज़हब और आज़ाद-ख़याल लोगों की गिरफ़्तारी के लिए सरकारी खज़ाने से बड़े-बड़े इनआ’म मिलते थे। लेकिन ख़ोजा नसरुद्दीन मुंह बन्द रखने की ज़िद पकड़े हुए था।

    नौकर फिर बोला-"और हमारे ज़ीशान अमीर भी उल्लू हैं! यह भी पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि अल्लाह का वजूद है ही!"

    हालांकि एक करारा जवाब ख़ोजा नसरुद्दीन की ज़बान पर आया, पर उसने मुंह नहीं खोला। कड़वी नाउमीदी से नौकर ने एक गाली दी, घोड़े के चाबुक लगायी और दो छलांग में गली का मोड़ पार करके ग़ायब हो गया। सब तरफ़ ख़ामोशी छा गयी। घोड़े की टापों से उड़ी गर्द बन्द हवा में सुनहले कोहरे की तरह छायी रही। सूरज की तिरछी, गर्म किरनें उसे भेद कर चमकती रहीं।

    "अच्छा, तो मुझे एक रिश्तेदार मिल गया!" ख़ोजा नसरुद्दीन ने सोचा और मुस्कुरा उठा। "उस बूढ़े ने मुझ से झूठ नहीं कहा था। बुख़ारा में जासूस मक्खी-मच्छरों की तरह भरे पड़े हैं। यहाँ चालाकी बरतना ही मुनासिब होगा।

    पुरानी कहावत हैः क़ुसूर-वार ज़बान सिर के साथ क़लम की जाती है।' "

    इसी तरह सोचता, काफ़ी देर तक वह अपने गधे पर सवार, सड़कें पार करता रहा। कभी वह अपनी थैली की ज़्यादातर रक़म निकल जाने पर अफ़्सोस करता। कभी टैक्स वसूल करनेवाले अफ़सर और अजनबी रईस के बीच की लड़ाई की याद करके हंस उठता।

    ।। 5 ।।

    शहर के दूसरे सिरे पर पहुंच कर ख़ोजा नसरुद्दीन रुक गया। अपने गधे को एक चायख़ाने के मालिक के सुपुर्द किया और फ़ौरन एक नानबाई की दूकान में घुस गया।

    वहां बड़ी भीड़ थी। धुआं था। खाना पकने की महक भरी थी। चूल्हे गर्म थे और कमर तक नंगे बावर्चियों की पसीने से तर पीठों पर चूल्हों की लपटों की चमक पड़ रही थी। वे चीख़ते-चिल्लाते, शोर-शराबा करते, एक-दूसरे को धक्के देते, अपना काम कर रहे थे। आम शोर-ग़ुल, गोलमाल और भम्भड़ को बढ़ाते हुए आंखें फाड़े वे उन छोटे लड़कों के कान उमेठ रहे थे जो मेहमानों को खाना दे रहे थे। बड़े-बड़े देगचों और पतीलों के लकड़ी के ढक्कनं के नीचे खाना उबल रहा था। छत के पास भाप जमा’ हो रही थी, जहां मक्खियां भनभना रही थीं। धुएं से फैले

    अंधेरे में मक्खन के जलने और कड़कड़ाने की आवाज़ सुनायी पड़ रही थी। गर्मी से सुर्ख़ अंगीठियों के किनारे दमक रहे थे। सीख़चों पर भुनते गोश्त से अंगारों पर टपकती चर्बी नीली धुंएदार लपटों में जल रही थी। यहां पुलाव पक रहा था, सीख़ कबाब भुन रहे थे, बैलों का गोश्त उबल रहा था, प्याज़, कालीमिर्च और भेड़ की दुम की चर्बी गोश्त भरे समोसे तले जा रहे थे। इन समोसों से चर्बी निकलकर तवों पर बुलबुले बना रही थी।

    बड़ी मुश्किल से नसरुद्दीन ने अपने लिए जगह तलाश की। दब-पिसकर जिस जगह वह बैठा, वह इतनी तंग थी कि जिन लोगों की पीठ को धक्का देकर वह बैठा था वे ज़ोर से ग़ुर्रा उठे। पर किसी ने बुरा नहीं माना, किसी ने उससे कुछ कहा नहीं। वह ख़ुद ही बुड़बुड़ाया। बाज़ारों में नानबाइयों की दूकानों की भारी भीड़-भाड़। झगड़े का शोर-ग़ुल।

    हंसी-मजाक़। धक्कम-धक्का और चीख़-पुकार। सैकड़ों लोगों का, जो दिन भर की कड़ी मेहनत के बाद खाने छांटने की फ़ुर्सत भी नहीं पाते थे और जिनके मज़बूत जबड़े कड़ा और मुलायम हर तरह का गोश्त, हर चीज़, चबा जाते थे और जिनके मज़बूत मेदे हर चीज़ हज़्म कर लेते थे- बशर्ते कि ये चीजें सस्ती और ख़ूब हों। उनका ज़ोर से नाक साफ़ करना, खाना चबाना और ज़बान चटख़ारना- यह सब ख़ोजा नसरुद्दीन को हमेशा से पसन्द था।

    ख़ोजा नसरुद्दीन एक बार में ही ढेर-सा खाना खा सकता था। एक बार में उसने तीन प्याले क़ीमा, तीन रकाबी चावल और दो दर्जन समोसे डकार लिये। समोसे ख़त्म करने में कुछ कोशिश ज़रुर करनी पड़ी, पर अपने इस उसूल के मुताबिक़ कि जिसकी क़ीमत अदा कर दी जाय, वह खाना थाली में नहीं छोड़ना चाहिए, उसने उन समोसों को भी ख़त्म कर ही डाला।

    खाना ख़त्म कर वह दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा और जब कुहनियों से धक्कम-धक्का करने के बाद, आख़िर खुली हवा में पहुंचा, तो वह पसीने से नहा रहा था। हाथ-पैरों में कमज़ोरी भर रही थी, जैसे वे हल्के पड़ गये हों और उनमें ताक़त रही हो- मानो किसी तगड़े आदमी ने हमाम में उसका बदन रगड़ा हो। खाने और गर्मी की वजह से तबीअ’त में भारीपन लिये पैर घसीटता हुआ वह उस चायख़ाने तक पहुंचा जहां अपना गधा छोड़ आया। उसने चाय मंगायी और गद्दों पर आराम से पसर गया। उसकी पलकें झुकने लगी और ख़ुशगवार ख़याल उसके दिमाग़ में धीमे-धीमे तैरने लगे।

    "मेरे पास इस वक़्त अच्छी-ख़ासी रक़म है। किसी करख़ाने में ज़ीन साज़ी या बर्तन बनाने के काम में इसे लगा देना अच्छा रहेगा। मैं इन दोनों कामों को जानता हूं। घुमक्कड़ी छोड़ने का वक़्त अब गया है। क्या मैं और लोगों से बदतर हूं? क्या मैं उनसे ज़्यादा बेवक़ूफ़ हूं? क्या मैं भी एक ख़ूबसूरत और मेहरबान बीवी नहीं हासिल कर सकता? क्या मेरे भी एक बेटा नहीं हो सकता जिसे मैं अपनी गोद में खिला सकूं? पैग़म्बर की क़सम, वह नन्हा, शोर मचाने वाला बच्चा, बड़ा होकर मशहूर शैतान निकलेगा, और मैं अपनी सारी दानिशमन्दी तजरबे से हासिल अक़्ल-मन्दी उसमें उडेल दूंगा। हां, मेरा इरादा पक्का हो गया है। अब मैं बेचैन आवारगर्दी की ज़िन्दगी छोडूंगा। काम शुरू करने के लिए मुझे ज़ीनसाज़ या कुम्हार की दूकान ख़रीद लेना चाहिए…"

    उसने हिसाब लगाना शुरू कियाः "अच्छी दूकान की क़ीमत कम से कम तीन सौ तंके होगी और इस वक़्त मेरे पास है कुल डेढ़ सौ तंके।" चेचक रु नौकर को उसने कोसना शुरु कर दियाः "अल्लाह इस डाकू को अंधा कर दे।

    वह मुझ से वही रक़म छीन ले गया है जिस की किसी काम को शुरू करने के लिए मुझे ज़रुरत थी।"

    एक बार फिर क़िस्मत ने साथ दिया। "बीस तंके!" किसी ने यकायक आवाज़ लगायी। फिर तांबे की थाली में पांसा गिरने की आवाज़ सुनायी दी।

    बरसाती के किनारे, जानवर बांधने के खूटों के बिल्कुल पास, कुछ लोग घेरा बनाये बैठे थे। चायख़ाने का मालिक उनके पीछे खड़ा था। गर्दन उठाये वह उनके सिरों के ऊपर से झांक रहा था।

    "जुआ!" कोहनी के सहारे उठते हुए ख़ोजा नसरुद्दीन ने भांप लिया। "उनके जुआ खेलने की बात उतनी ही सच है जितनी यह कि मेरा नाम ख़ोजा नसरुद्दीन है। मैं भी क्यों ने देखूं, भले ही दूर से देखूं। जुआ तो नहीं खेलूंगा मैं। ऐसा बेवक़ूफ़ नहीं। पर कोई अक़्लमंद आदमी बेवक़ूफ़ोँ को देखे क्यों नहीं?"

    वह उठकर जुआरियों के पास चला गया।

    "बेवक़ूफ़ लोग," चायख़ाने के मालिक के कान में वह फुसफुसाया, "मुनाफ़े के लालच में अपना आख़िरी सिक्का भी गवां देते हैं। क्या पैग़म्बर ने रुपये के लिए जुआ खेलने को मना नहीं किया है? अल्लाह का शुक्र है कि यह ख़तरनाक आदत मुझ में नहीं है! पर उस लाल बालोंवाले जुआरी की तक़दीर तो देखो! लगातार चौथी बार जीता है!

    देखों, देखो! अरे, वह तो पांचवीं बार भी जीत गया! बेदिमाग़ बेवक़ूफ़! उसे तो दौलत का झूठा सपना जुए की ओर खींच रहा है, हालांकि ग़रीबी ने उसके रास्ते में गढ़ा खोद रखा है। क्या? फिर छठी बार जीत गया? नहीं देखी, ऐसी क़िस्मत मैं ने कभी नहीं देखी। देखो, देखो, वह फिर दांव लगा रहा है। वाक़ई, इन्सान की बेवक़ूफ़ी की इन्तिहा नहीं।

    ऐसा तो नामुमकिन है कि लगातार जीतता ही जाय! झूठी क़िस्मत में यक़ीन करनेवाले लोग ऐसे ही बर्बाद होते है! इस लाल बालों वाले आदमी को बर्बाद सिखाना चाहिए। अगर वह सातवीं बार फिर जीता तो मैं उस से दांव बदूंगा- गर्चे दिल से मैं जुए के ख़िलाफ़ ही हूं। काश मैं अमीर होता, तो जुआ जाने कब का बन्द करना चुका होता।"

    लाल बालोंवाले ने फिर पांसा फेंका और सातवीं बार फिर जीता।

    अब ख़ोजा नसरुद्दीन पक्के इरादे से आगे बढ़ा। कन्धों से खिलाड़ियों को अलग हटाते हुए वह घेरे में जा बैठा।

    ख़ुशक़िस्मत जीतनेवाले से पांसे लेकर, उन्हें तजुर्बेकार आंखो से, उलट पलटकर देखते हुए बोलाः "मैं तुम्हारे साथ खेलना चाहता हूँ।"

    लाल बालोंवाले ने भर्राये गले से पूछाः "कितनी रक़म?" उसका सारा बदन कांप गया। जल्ही ही ख़त्म होने वाली ख़ुशकिस्मती में ज़्यादा से ज़्यादा जीत लेने के लिए वह उतावला हो रहा था।

    ख़ोजा नसरुद्दीन ने अपना बटुआ निकाला। ज़रुरत के लिए पच्चीस तंके उसमें वापस रख दिये और बाक़ी निकाल लिये। तांबे के थाल में चाँदी के सिक्के खनखनाकर गिरे और चमकने लगे। जुआरियों ने ऊंचा दांव लगाने वाले इस इन्सान का खुसफुसाहट के साथ इस्तिक़बाल किया। ऊंचे दांवों का खेल शुरु हो गया था।

    लाल बालों वाले ने पांसे उठा लिये और बड़ी देर तक उन्हें खनखनाता रहा, मानों फेंकने में झिझक रहा हो। हर कोई सांस रोके देख रहा था- यहां तक कि गधे ने भी मुंह उठा लिया था और कान खड़े कर लिये थे। अब सिर्फ़ जुआरी की मुट्ठी से पांसों के खनखनाने की आवाज़ रही थी। उस रूखी खनखनाहट से ख़ोजा नसरुद्दीन के पेट और बदन में चाहत भरी कमज़ोरी गयी। आख़िर लाल बालोंवाले ने पांसे फेंके। दूसरे खिलाड़ी गर्दन बढ़ा कर देखने लगे और एक साथ ठीक से पीछे की ओर लुढ़क कर बैठ गये। एक साथ ही उन्होंने लम्बी सांसे लीं- मानो ये सब सांसें एक ही सीने से निकली हों। जुआरी पीला प़ड़ गया। उसके भिंचे हुए दांतों से कराह निकल गयी। पांसे पर तीन दिखायी दिये। वह ज़रुर हार रहा था, क्योंकि एक उतना ही कम निकलता है जितना कि छः और कोई भी दूसरा पांसा ख़ोजा नसरुद्दीन के मुआफ़िक़ होगा।

    मुट्ठी में पांसे हिलाते हुए उसने तक़दीर का शुक्रिया अदा किया कि आज वह उस पर मेहरबान थी। पर वह भूल गया था कि तक़दीर ढुलमुल और सनकी होती है और उन लोगों को बड़ी आसानी से दग़ा दे जाती है जो उस पर भरोसा करते हैं। अपने पर इतना भरोसा करने के लिए, अब उसने ख़ोजा नसरुद्दीन को बर्बाद सिखाने की सोची। इसके लिए उसने चुना उसके गधे, या कहो गधे की दुम को, जिसके आख़िर में कांटे और कटाव थे। गधा जुआरियों की ओर पलटा और जो उसने दुम घुमायी तो जाकर सीधे उसके मालिक के हाथ से टकरायी। पांसे

    हाथ से फिसल गये। लाल बालोंवाला जुआरी ख़ुशी से भर्रायी चीख़ के साथ फ़ौरन थाल पर लेट गया और दांव पर लगी रक़म अपने बदन से ढंक ली।

    ख़ोजा नसरुद्दीन ने दो काने फेंके थे।

    देर तक होंठ चबाता हुआ वह चुपचाप बैठा रहा। फटी-फटी आंखों के सामने दुनिया तैरती और ढहती-सी नज़र रही थी। कानों में एक अ’जब सनसनाहट हो रही थी।

    एकाएक वह उछला, एक डंडा उठा लिया और खूंटे के पास खदेड़ते हुए गधे को पीटने में जुट पड़ा।

    "कम-बख़्त! गधे! हरामज़ादे! बदबूदार जानवर! सभी ज़िंदा जानवरों के लिए ला’नत!" ख़ोजा नसरुद्दीन चिल्ला रहा था।

    "क्या यही काफ़ी नहीं था कि अपने मालिक के पैसे से जुआ खेले ? क्या यह पैसा हारना भी ज़रूरी था? तेरी बद-मआ’श खाल खींच ली जाय! तेरे रास्ते में अल्लाह गड्ढा कर दे, ताकि तू गिरे और तेरे पैर टूट जायें! तू मरेगा कब कि मुझे तेरा बदनुमा चेहरा देखने से छुट्टी मिले!"

    गधा रेंका। जुआरी हंसी से खिलखिला उठे ओर चिल्लाने लगे। सबसे ज़्यादा ज़ोर से चिल्लाया लाल बालों वाला वह जुआरी, जिसे अपनी ख़ुशकिस्मती पर पक्का यक़ीन हो आया था।

    थके और हांफते हुए ख़ोजा नसरुद्दीन ने जब डंडा फेंक दिया तो लाल बालोंवाला बोलाः"आओ, फिर खेल लो। दो-चार दांव और लग जायें। तुम्हारे पास अभी पच्चीस तंके तो हैं ही।"

    यह कह कर उसने अपना बायां पैर फैला दिया और ख़ोजा नसरुद्दीन के लिए हिक़ारत दिखाते हुए उसे थोड़ा हिलाया।

    "हां, क्यों नहीं!" ख़ोजा नसरुद्दीन ने जवाब दिया। वह सोच रहा था- जब सवा सौ तंके चले गये तो अब बाक़ी पच्चीस का क्या होगा, यह सोचना ही फ़ुज़ूल है।

    लापरवाही से उसने पांसे फेंके। वह जीत गया।

    लाल बालोंवाला को यक़ीन नहीं रहा था कि क़िस्मत पलट गयी है।

    "पूरी रक़म।" उसने फिर कहा।

    सात बार लगातार उसने यही कहा और हर बार वह हारा।

    थाल रुपयों से भर चुका था। जुआरी ख़ामोश बैठे थे। सिर्फ़ उनकी आंखो की चमक से उस आग का पता लग रहा था, जो उनके भीतर सुलग रही थी और उन्हें जलाये डाल रही थी।

    लाल बालोंवाला चिल्लायाः "अगर शैतान ही तुम्हारी मदद कर रहा है तो दूसरी बात है, वर्ना तुम हर बार नहीं जीत सकते। कभी तुम हारोगे ही। यहाँ थाल पर तुम्हारे सोलह सौ तंके है। लगाओगे एक बार फिर पूरी रक़म? कल मैं अपनी दूकान के लिए इस रक़म से माल ख़रीदने वाला था। लो तुम्हारी रक़म के मुक़ाबले मैं इसे भी दांव पर लगाता हूँ!"

    सोने के सिक्कों- तिल्ले, रुपयों और तूमानों- से भरी एक छोटी सी थैली उसने निकाली।

    उतावली भरी आवाज़ में ख़ोजा नसरुद्दीन चिल्लाया- "अपना सोना इस थाल में उंडेल!"

    इस चायख़ाने में ऐसे भारी दांव कभी नहीं देखे गये थे। मालिक उबलती हुई केतलियों को भूल गया। जुआरियों की सांसे लम्बी चलने लगीं। लाल बालोंवाले ने पांसे फेंके और आंखें बन्द कर ली। पांसे देखने में उसे डर लग रहा था।

    "ग्यारह!"- सब एक साथ चिल्ला उठे। ख़ोजा नसरुद्दीन अपने को क़रीब-क़रीब हारा हुआ समझने लगा। अब सिर्फ़ दो छक्के, यानी बारह काने, ही उसे बचा सकते थे।

    अपनी ख़ुशी को छिपाये बिना लाल बालोंवाला जुआरी भी दोहराने लगाः "ग्यारह! ग्यारह काने! देखो भई, मेरे ग्यारह हैं! हार गये तुम! हार गये! हार गये!"

    ख़ोजा नसरुद्दीन का सारा बदन जैसे ठंडा पड़ गया हो। उसने पांसे उठाये और उन्हें फेंकने की तैयारी करने लगा।

    फिर यकायक उसने अपना हाथ रोक लिया।

    "इधर पलट!" वह अपने गधे से बोला। "तू तीन काने पर हार गया था। ले, अब ग्यारह काने पर जीतने की कोशिश कर, नहीं तो मैं तुझे फ़ौरन क़साई के यहां ले चलूंगा।"

    बायें हाथ से गधे की दुम पकड़ कर पांसे लिए हुए ही उसने दाहिने हाथ से गधे को ठोंका।

    लोगों की ज़ोर की आवाज़ोँ से चायख़ाना हिल गया। मालिक कलेजा थामकर बैठ गया। यह तनाव उसकी बर्दाश्त के बाहर था।

    ... ये लो.... एक... दो...

    पांसों पर दो छक्के थे।

    लाल बालोंवाले जुआरी की आंखें मानो बाहर निकल पड़ीं। उसके सूखे सफ़ेद चेहरे पर कांच-सी जड़ी रह गयी। धीरे से वह उठा और रोता, डग-मगाता हुआ, चला गयाः"हाय री क़िस्मत! हाय कम-बख़्ती!"

    कहते है कि उस दिन के बाद लाल बालोंवाला फिर कभी शहर में नहीं दिखायी दिया। भाग कर वह रेगिस्तान चला गया और वहां बाल बढ़ाये हुए और देखने में बदनुमा वह रेत और कंटीली झाड़ियों के बीच लगातार चिल्लाता रहता- "हाय कम-बख़्ती! हाय री क़िस्मत!" आख़िर सियारों ने उसका काम तमाम कर दिया। किसी ने उसके लिए अफ़्सोस नहीं किया, क्योंकि वह बहुत बेरहम था और इंसाफ़ की बात तक नहीं करता था। सीधे-सादे और आसानी से यक़ीन कर लेनेवाले लोगों को उसने बहुत नुक़सान पहुंचाया था।

    रही ख़ोजा नसरुद्दीन की बात, तो उसने जीती हुई दौलत को ज़ीन से लगे थैलों में भरा, गधे को गले लगाया, उसका मुंह चूमा और उसी वक़्त पकाये बढ़िया मालपुए उसे खिलाये। उस होशियार जानवर को भी अचम्भा था। अभी चन्द मिनट पहले ही उसके साथ बिल्कुल दूसरा सुलूक हुआ था।

    ।। 6 ।।

    दानिशमन्दी से भरे इस उसूल को याद कर कि, उन लोगों से दूर रहना चाहिए जो यह जानते हैं कि तुम्हारा रुपया कहां रखा है, ख़ोजा नसरुद्दीन उस चायख़ाने पर नहीं रुका और फ़ौरन बाज़ार की ओर बढ़ गया। बीच-बीच में मुड़कर वह देखता जाता था कि कोई उसका पीछा तो नहीं कर रहा, क्योंकि जुआरियों और चायख़ाने के मालिक के चेहरों पर उसे भलेमनसाहत नहीं दिखायी दी थी।

    उसका सफ़र बहुत ख़ुशगवार था। अब वह एक नहीं तीन-तीन कारख़ाने ख़रीद सकता था। यही करना उसने तय भी किया।

    "मैं चार दूकानें ख़रीदूंगा। एक कुम्हार की, एक ज़ीनसाज़ की, एक दर्ज़ी की और एक मोची की। हर दुकान में मैं दो-दो कारीगर रखूंगा। मेरा काम सिर्फ़ रुपया वसूल करना होगा। दो साल में मैं रईस बन जाऊंगा। फिर तो ऐसा मकान ख़रीदूंगा, जिसके बाग़ में फ़व्वारे हों। हर जगह सोने के पिंजरे लगाऊंगा, जिनमें गानेवाली चिड़ियां रहेंगी और दो... शायद तीन भी... बीवियां रखूंगा और हर बीवी से मेरे तीन बेटे होंगे।"

    ऐसे ही ख़ुशनुमा ख़यालों की नदी में डूबता-उतरता वह गधे पर बैठा चला जा रहा था कि गधे ने लगाम ढीली पायी और मालिक के ख़यालों में खोये रहने का फ़ायदा उठाया। वह एक छोटे पुल के पास पहुंचा ही था कि दूसरे गधों की तरह सीधे पुल पर चलने के बजाय, वह एक तरफ़ को थोड़ मुड़ा और दौड़ कर खाई के पार छलांग लगायी।

    "... और जब मेरे बेटे बड़े हो जायंगे, तो मैं उन्हें एक साथ बुलाकर उनसे कहूंगा..." ख़ोजा नसरुद्दीन के ख़याल ऐसे ही दौड़ रहे थे कि यकायक सोचना लगा- "मैं हवा में क्यों उड़ रहा हूँ? क्या अल्लाह ने मुझे फ़रिश्ता बनाकर मेरे पर लगा दिये हैं?"

    अगले मिनट ही उसे इतने तारे दिखायी दिये कि वह समझ गया कि उसके एक भी पर नहीं है। ग़ुलैल के ढेले की तरह, ज़ीन से कोई दस हाथ आगे, वह सड़क पर जा गिरा।

    धूल से भरा, कराहता हुआ जब वह उठा तो गधा दोस्ताना ढंग से कान खड़े किये उसके पास खड़ा हुआ। चेहरे पर उस के मासूमियत थी। लगता था मानो वह मालिक को फिर से ज़ीन पर बैठने की दावत दे रहा हो।

    ग़ुस्से से कांपती आवाज़ में ख़ोजा नसरुद्दीन चिल्लाया, "अरे तू! तुझे मेरे ही नहीं, मेरे बापदादों के गुनाहों की भी सज़ा के एवज़ में भेजा गया है! इस्लामी इंसाफ़ के मुताबिक़ किसी भी इंसान को उसके सिर्फ़ अपने गुनाहों के लिए इतनी सख़्त सज़ा नहीं मिल सकती! अबे झींगुर और लकड़बग्घे की औलाद! अरे..."

    लेकिन एक अधटूटी दीवाल के साये में थोड़ी दूर पर बैठे कुछ लोगों की भीड़ को देख कर वह एकदम चुप हो गया।

    गालियां ख़ोजा नसरुद्दीन के होठों में ही रह गयीं। उसे ख़याल आया कि जो भी ऐसी मज़ाकिया और बे-इज़्ज़ती की हालत में पड़ा हो और लोग उसे देख रहे हों तो अपनी परेशानी पर सबसे ज़्यादा ज़ोर से उसे ख़ुद हंसना चाहिए। उन बैठे हुए आदमियों के गिरोह की ओर आंख मारकर अपने सफ़ेद दांत दिखाते हुए वह हंसने लगा।

    "अहा ! मैंने कितनी बढ़िया उड़ान भरी!" हंसी भरी आवाज़ में वह ज़ोर से बोलाः "बताओ मुझे, मैं ने कितनी क़लाबाज़ियां खायीं? भई, ख़ुद मुझे तो गिनने का वक़्त मिला नहीं। अरे शैतान!" गधे को हंसी से थपथपाते हुए वह कहने लगा, हालांकि उसकी तबीअ’त कर रही थी कि जी भरकर उसकी मरम्मत करे, "इसे ऐसी ही शरारतें सूझती हैं! जानवर ही ऐसा है! मेरी नज़र दूसरी तरफ़ घूमी नहीं कि इसे कोई कोई शरारत सूझी!"

    ख़ोजा नसरुद्दीन फिर ख़ुशगवार हंसी हंसने लगा। लेकिन उसे बड़ा तअ’ज्जुब हुआ जब कोई भी उस की हंसी में शामिल नहीं हुआ। सिर झुकाये, ग़मगीन चेहरे लिए, वे लोग ख़ामोश बैठे रहे। उनकी औरतें, जिनकी गोदों बच्चे थे, चुपचाप रोती रही।

    "ज़रुर कोई गड़बड़ है।" ख़ोजा नसरुद्दीन ने सोचा।

    वह उन लोगों के पास गया और सफ़ेद बालों और सूखे चेहरेवाले एक बूढ़े से पूछाः

    "बुज़ुर्गवार! बताइये कि हुआ क्या है? ऐसा क्यों है कि मुझे मुस्कान दिखायी देती है, हंसी सुनायी पड़ती है?

    ये औरतें क्यों रो रही हैं? इस गरमी और धूल में आप सड़क के किनारे क्यों बैठे हैं? क्या यह बेहतर होता कि आप लोग घरों की ठंढी छांह में आराम करते?

    "घरों में बैठना उनके लिए बेहतर हैं, जिनके पास घर हों।" बूढ़े ने रंज भरे लहजे में कहा। "ऐ मुसाफ़िर ! मुझ से सवाल कर। हमारी तकलीफ़ बहुत ज़्यादा है और तू किसी भी तरह हमारी मदद नहीं कर सकता। रही मेरी बात सो मैं बूढ़ा हूं और ख़ुदा से दुआ मांगता हूं कि मुझे जल्द ही उठा ले।"

    "आप ऐसी बातें क्यों करते हैं?" झिड़कते हे ख़ोजा नसरुद्दीन ने कहा। "मर्दो को इस तरह नहीं सोचना चाहिए।

    अपनी परेशानी मुझे बताइए। ग़रीबों जैसी मेरी शक्ल पर जाइए। कौन जाने, शायद मैं आपकी कुछ मदद कर सकूं।"

    "मेरी कहानी बहुत छोटी है। अभी सिर्फ़ एक घंटे पहले सूदख़ोर जाफ़र यहां के अमीर के दो सिपाही लेकर हमारी गली से गुज़रा। मुझ पर उसका क़र्ज़ है। अदायगी की आख़िरी तारीख़ कल है। सो उन्होंने मुझे उस घर से ही निकाल दिया, जहां मेरी सारी उम्र गुज़री है। कोई मेरा ख़ानदान नहीं है। कोई घर नहीं, जहां मैं सिर छिपा सकूं...।

    और मेरी सारी जायदाद- मेरा घर, बाग़ीचा, ढोरे-डांगर, अंगूर की बेलें, सबकुछ वह कल बेच देगा।"

    बूढे की आंखें आसुओं से तर हो गयीं। उसकी आवाज़ कांपने लगी।

    "क्या आप पर बहुत ज़्यादा क़र्ज़ है?" ख़ोजा नसरुद्दीन ने पूछा।

    "बहुत ज़्यादा! मुसाफ़िर, मुझे उस को ढाई सौ तंके देने हैं।"

    "ढाई सौ तंके!!" नसरुद्दीन के मुंह से निकला। "ढाई सौ तंकों की मामूली रक़म के लिए भी कोई इंसान मरना चाहता है? बस-बस! आप ज़्यादा अफ़्सोस करें," कह कर वह गधे की तरफ़ पलटा और ज़ीन से कसे थैले को खोलने लगा। "बस मेरे बुज़ुर्ग दोस्त! लो! ये रहे ढाई सौ तंके। आप उस सूदख़ोर को ये वापस कर दीजिये, फिर लात मार कर उसे घर से निकाल दीजिए और ज़िन्दगी के बाक़ी दिन चैन से काटिए।"

    चांदी के सिक्कों की खनखनाहट सुनकर उस पूरे झुण्ड में जैसे जान गयी हो। बुढ़ा हक्का-बक्का, आंसू भरे, ख़ोजा नसरुद्दीन की तरफ़ एहसान भरी आंखों से देखता रह गया।

    "देखा आपने? तिस पर भी आप अपनी परेशानी मुझे नहीं बता रहे थे," आख़िरी सिक्का गिनते हुए ख़ोजा नसरुद्दीन ने कहा। वह सोचता जा रहा था, "कोई हर्ज नहीं! सही आठ कारीगर, सात को ही नौकर रखूंगा। तब बहुत काफ़ी होंगे।"

    यकायक बूढ़े की बग़ल में बैठी एक औरत ख़ोजा नसरुद्दीन के पैरों पर गिर पड़ी। ज़ोर-ज़ोर से रोते हुए उसने अपना बच्चा उसकी तरफ़ बढ़ा दिया।

    "देखिए, यह बीमार है।" सुब्कियां भरती हुई वह बोली। "इसके होंठ सूख रहे हैं, चेहरा जल रहा है। बेचारा नन्हा-सा बच्चा सड़क पर ही मर जायगा! हाय, मैं भी अपने घर से निकाल दी गयी हूं।"

    ख़ोजा नसरुद्दीन ने बच्चे के पतले सूखे चेहरे को देखा। उसके पतले हाथ देखे जिन में होकर रौशनी गुज़र रही थी।

    फिर उस ने बैठे हुए लोगों के चेहरे को देखा। दुख की लकीरों और झुर्रियों से भरे चेहरों, और लगातार रोने की वजह से धुंधली हुई आंखों को देख कर उसे लगा जैसे किसी ने उस की छाती में गर्म छुरा भोंक दिया हो। यकायक उसका गला भर आया। रहम और ग़ुस्से से उस का चेहरा तमतमा उठा। वह दूसरी तरफ़ देखने लगा।

    "मैं बेवा हूं।" औरत कह रही थी। "मेरा शौहर छः महीने पहले मर गया। सूद-ख़ोरों के दो सौ तंके उसे देने थे।

    क़ानूनन वह क़र्ज़ अब मुझे चुकाना है।"

    "वाक़ई, बच्चा बीमार है।" नसरुद्दीन बोला। "लो ये रहे दो सौ तंके। जल्दी घर जाओ और बच्चे के सिर पर ठंडी पट्टी रखो। और सुनो- ये पचास तंके और लेती जाओ। जाकर, किसी हकीम को बुलाओ और इसे कोई दवा दिलवाओ!'

    "छः कारीगरों से भी मैं बख़ूबी काम चला लूंगा।" मन ही मन उसने सोचा।

    तभी एक भारी-भरकम संगतराश उस के पैरों पर गिरा। अगले ही दिन उस का पूरा ख़ानदान ग़ुलामों की तरह बेचा जाने वाला था। जाफ़र के चार सौ तंके उसे भी देने थे।

    "चलो, पांच कारीगर ही सही।" एक बार फिर अपना थैला खोलते हुए ख़ोजा नसरुद्दीन ने सोचा। जैसे ही वह थैले का मुंह बांध चुका, दो और औरतें उसके सामने घुटनों के बल गिरीं। उनकी कहानी भी इतनी दर्दनाक थी कि ख़ोजा नसरुद्दीन सूदख़ोर का क़र्ज़ा चुकाने के लिए उन्हें भी काफ़ी रक़म देने में नहीं हिचका। और अब, यह देख कर कि जो रक़म उसके पास बची है वह मुश्किल से तीन कारीगरों लाएक़ ही होगी, उस ने तय किया कि अब कारख़ानों के बारे में परेशान होना बेकार है। पूरी फ़य्याज़ी के साथ अपनी दौलत उसने सूदख़ोर जाफ़र के क़र्ज़दारों में बांटने की ठान ली।

    उसके पास थैले मैं अब बचे थे कुल पांच सौ तंके। तभी ख़ोजा नसरुद्दीन की नज़र एक आदमी पर पड़ी जो अकेला बैठा था। उसने मदद नहीं मांगी थी, लेकिन उसके चेहरे पर परेशानी और तकलीफ़ झलक रही थी।

    ख़ोजा नसरुद्दीन ज़ोर से बोलाः "अरे सुनो भाई! अगर आप पर सूदख़ोर का क़र्ज़ नहीं है, तो आप यहां क्यों बैठे हैं?"

    "है! क़र्ज़ मुझ पर भी है!" भर्राये गले से वह बोला! "ज़जीरों में जकड़ा कल ही मैं ग़ुलामों के बाज़ार में बिकने जाऊंगा।"

    "लेकिन आप ख़ामोश क्यों रहे?"

    "ऐ सख़ी और मेहरबान मुसाफ़िर! मैं जानता नहीं कि तुम कौन हो। हो सकता है कि तुम फ़क़ीर बहाउद्दीन हो जो ग़रीबों की मदद करने के लिए अपनी क़ब्र से उठ आये हो, या शायद हारुनर-रशीद हो। मैं ने तुम से मदद नहीं मांगी क्योंकि तुम काफ़ी ख़र्च कर चुके हो और मेरा ख़र्च सब से भारी है- पांच सौ तंके। मुझे डर था कि अगर तुम ने मुझे रक़म दे दी तो कहीं इन बुज़ुर्ग और इन औरतों की मदद के लिए तुम्हारे पास काफ़ी रक़म बचे।"

    "आप बड़े भलेमानुस है।" दया से भर कर ख़ोजा नसरुद्दीन बोला। "पर मैं भी मामूली भलामानुस नहीं हूं। मेरे भी ज़मीर है और मैं क़सम खाता हूं कि आप कल ग़ुलामों के बाज़ार में नहीं बिकेंगे। फैलाइए अपना दामन।"

    और उसके दामन में अपने थैले का आख़िरी सिक्का तक उसने उंडेल दिया। ख़िलअ’त का दामन बायें हाथ से पकड़, दाहिने हाथ से उस आदमी ने ख़ोजा नसरुद्दीन को गले लगाया, फिर आंसुओं से भरा अपना चेहरा उसके सीने पर रख दिया।

    यकायक ज़ोर से हंसता हुआ लम्बी दाढ़ी वाला भारी-भरकम संगतराश बोलाः "सचमुच ही आप गधे से बड़े मज़े में उछले।" फिर तो सभी हंसने लगे, मर्द भारी मोटी आवाज़ में, औरतें महीन तेज़ आवाज़ में। और बच्चे मुस्कुरा कर अपने हाथ ख़ोजा नसरुद्दीन की तरफ़ बढ़ाने लगे- जो ख़ुद सबसे ज़्यादा ज़ोर से हंस रहा था।

    "हो हो हो हो! हा हा हा हा!" वह ख़ुशी से दोहरा होता हुआ हंस रहा था। "आप नहीं जानते कि यह गधा है किस किस्म का! यह बड़ा पाजी गधा है।"

    "नहीं, नहीं, अपने गधे के बारे में ऐसा कहिए।" बीमार बच्चेवाली औरत बोली। "यह दुनिया का सबसे बेशक़ीमती, होशियार और भला गधा है। इस की तरह का कोई गधा हुआ है और होगा। मैं इस से ज़्यादा और कुछ भी पसन्द करूंगी कि ज़िन्दगी भर इस गधे की सेवा-टहल करती रहूं, खाने के लिए इसे सबसे बढ़िया अनाज दूं, इस के खुरैरा करूं और इस की दुम पर कंघी करूं- क्योंकि ऐसा बेमिसाल गधा, गुलाब की तरह जिस में भलाइयों के सिवा और कुछ भी नहीं है, खाई पार करने में अगर उछला होता और ज़ीन पर से तुम्हे फेंक दिया होता तो, मुसाफ़िर, तुम जो हमारे लिए अंधेरे में सूरज बन कर आये हो, वह बिना हमारी तरफ़ ताके चुपचाप सामने से गुज़र जाते और तुम्हें रोकने की हिम्मत हम में से किसी को होती।"

    "ठीक कहती है यह!" बड़ी अहमियत के लहजे में बूढ़ा बोला। "हम सब अपना दुख दूर करने के लिए इस गधे के एहसान मन्द हैं। वाक़ई यह गधा दुनिया का ज़ेवर है! सब गधों में यह हीरे की तरह चमकता है।"

    सब ने ज़ोरों से गधे की तारीफ़ की। उसे भुना हुआ गल्ला, सूखे आडू, खूबानी और पूड़ियाँ खिलाने में सब एक दूसरे से बाज़ी लेने लगे। परेशान करने वाली मक्खियों पर गधे ने दुम फटकारी और बहुत अदब और गम्भीरता से सब की भेंट क़ुबूल करी- हालांकि उस की एक आंख कुछ परेशानी लिये हुए उस चाबुक पर भी पड़ी थी जो ख़ोजा नसरुद्दीन चुपके से उसे दिखाता हुआ हिला रहा था।

    दिन डूबने वाला था। साये लम्बे हो रहे थे। लाल पैरोंवाले सारस पर फड़फड़ाते हुए और कैं-कैं करते हुए शोर मचाते अपने घोंसलों को लौट रहे थे, जहां उनके बच्चे लालच से खुली चोंचें आगे बढ़ाये उनका इंतिज़ार कर रहे थे।

    ख़ोजा नसरुद्दीन ने उन लोगों से जाने की इजाज़त ली। सबने झुक कर शुक्रिया अदा किया।

    "आपका बहुत-बहुत शुक्रिया। आपने हमारी मुसीबतें समझीं।"

    "कैसे समझता मैं?" उसने जवाब दिया! "आज ही मेरे चार कारख़ाने छिन गये हैं, जिन में आठ-आठ होशियार कारीगर मेरे लिए काम करते थे, एक मकान छिन गया जिस में बाग़ में फ़व्वारे लगे थे और पेड़ों से लटकते सोने के पिंजरों में चिड़िया गाती थीं। कैसे मैं आपकी मुसीबतें समझता?"

    तब अपने पोपले मुंह से बूढ़े ने बुदबुदाकर कहाः

    "ऐ मुसाफ़िर! शुक्रिया के तौर पर भेंट देने के लिए मेरे पास कुछ है नहीं। जब मैं ने अपना घर छोड़ा, तो मैं सिर्फ़ एक चीज़ अपने साथ लाया था। यह है क़ुरआन शरीफ़। इसे तुम ले लो और ख़ुदा करे इस दुनिया में यह तुम्हें रास्ता दिखानेवाली रौशनी बने।"

    ख़ोजा नसरुद्दीन के लिए मज़हबी किताबें बेकार थीं। पर बुढ़े के दिल को ठेस पहुंचाने की ग़र्ज़ से उसने किताब ले ली, उसे ज़ीन से लगे थैले में डाला और कूद कर गधे पर सवार हो गया।

    "तुम्हारा नाम? तुम्हारा नाम क्या है?" बाक़ी लोगों ने एक साथ पूछा। "अपना नाम तो बताते जाओ, ताकि हमें मा’लूम रहे कि इबादत में किसके लिए दुआ मांगें।"

    "आप लोगों को मेरा नाम जानने की क्या ज़रुरत? सच्ची नेकी को शोहरत की ज़रुरत नहीं। रहा दुआ मांगने का सवाल, सो अल्लाह के बहुत से फ़रिश्ते हैं जो उसे नेक कामों की ख़बर देते हैं। फ़रिश्ते अगर काहिल और लापरवाह हुए और नर्म बादलों में सोते रहे और इस दुनिया के पाक और नापाक कामों का हिसाब रखा तो आपकी इबादत का कोई असर नहीं होगा, क्योंकि बिना ईमानवाले लोगों से बात पक्की कराये, सब की बातों पर यक़ीन करना अल्लाह के लिए बेवक़ूफ़ी ही होगी…"

    वह यह कह ही रहा था कि एक औरत यकायक मुंह फाड़कर कुछ कहती-कहती रुक गयी। ऐसा ही दूसरी औरत ने भी किया। बूढ़ा चौंका और ख़ोजा नसरुद्दीन की तरफ़ घूरने लगा। लेकिन ख़ोजा नसरुद्दीन को जाने की जल्दी थी और उसने इस बात पर ध्यान दिया।

    "अलविदा’अ! ख़ुदा करे तुम अमन चैन से रहो।"

    यह दुआ मिल ही रही थी कि ख़ोजा नसरुद्दीन सड़क के मोड़ पर ग़ायब हो गया।

    सब लोग ख़ामोश रहे। उनकी आंखों में एक ही ख़याल चमक रहा था। आख़िर बूढ़े ने ख़ामोशी तोड़ी। उसने असरदार और गंभीर आवाज़ में कहाः

    "सारी दुनिया में सिर्फ़ एक ही इंसान ऐसा है जो यह काम कर सकता था। सच, दुनिया में सिर्फ़ एक ही इसांन ऐसा है जो इस तरह की बात कह सकता था। सिर्फ़ एक ही इंसान सारी दुनिया में ऐसा है जिस की रुह की रौशनी और गर्मी से ग़रीब और सताये हुए लोगों को राहत मिलती है। और वह इंसान है हमारा…"

    "ख़बरदार! ज़बान बन्द करो!" दूसरे आदमी ने उसे फ़ौरन टोका। "क्या तुम भूल गये कि दीवारों के भी कान होते हैं, पत्थरों के भी आंखें होती है और सैकड़ों कुत्ते सूंघते-सूंघते उसे तलाश कर सकते हैं?"

    "सच कहते हो तुम, " तीसरे ने कहा,, "हमें अपना मुंह बन्द रखना चाहिए, क्योंकि यह वक़्त तो ऐसा है मानो वह तलवार की धार पर चल रहा हो। ज़रा-सा भी धक्का उसके लिए ख़तरनाक बन सकता है।"

    बीमार बच्चेवाली औरत बोली- "भले ही लोग मेरी ज़बान खींच लें, लेकिन मैं उसका नाम नहीं लूंगी।"

    "मैं भी ख़ामोश रहूंगी।" दूसरी औरत बोली। "मैं चाहे मर जाऊं, लेकिन ऐसी ग़लती करूंगी जिस से उसके गले के रस्से का फन्दा पड़े।"

    सब इसी तरह कहते रहे, सिवा संगतराश के जो कुछ कुन्दज़हन था। उसकी समझ में रहा था कि मुसाफ़िर अगर क़साई या बैल का उबला गोश्त बेचनेवाला नहीं है तो क्यों कर कुत्ते उसकी सूंघ-तलाश कर लेंगे। फिर, मुसाफ़िर अगर रस्से पर चलनेवाला नट है, तो उसका नाम ज़ोर से लेने में क्या हरज था? वह औरत उस नेक शख़्स के पेशे के लिए ज़रूरी रस्सा देने के बजाय आख़िर मरने को क्यों तैयार है? संगतराश एकदम चक्कर में था। उसने ज़ोर से नथुने फटकारे, गहरी सांस भरी और तय किया कि इस मुआ’मले में अब वह और ज़्यादा सोचेगा, ताकि कहीं पागल हो जाय।

    ख़ोजा नसरुद्दीन इस बीच काफ़ी सफ़र तय कर चुका था, तो भी उसकी आंखों के सामने अब भी उन ग़रीबों के सूखे-मुरझाये चेहरे ही नाच रहे थे। उस बीमार बच्चे की, उसके सूखे होंठों और तमतमाये गालों की उसे बार-बार याद हो आती थी। उस की आंखों के सामने सफ़ेद बालोंवाले उस बूढ़े की तस्वीरर नाच गयी जो अपने घर से निकाल दिया गया था, और उसका दिल ग़ुस्से से भर उठा।

    अब वह ज़ीन पर ज़्यादा देर बैठ सका। कूद कर वह नीचे गया और गधे के साथ-साथ चलता ठोकर से रास्ते के पत्थरों को हटाने लगा।

    "ठहर, सूदख़ोरों के सरदार! ठहर, तुझे देखूंगा!" वह बड़बड़ा रहा था और एक शैतानी चमक उसकी काली आंखों में समायी हुई थी। "एक एक दिन मेरी तेरी मुलाक़ात होगी ही और तब तेरी शामत आयेगी। और तू अमीर! तू, कांप और थर्रा, क्योंकि मैं, ख़ोजा नसरुद्दीन, बुख़ारा में पहुंचा हूं! मक्कार और शैतान जोंको! तुमने दुखी अवाम का ख़ून चूसा है। लालची लकड़बग्घे! घिनौने गीदड़ो! हमेशा तुम्हारी दाल नहीं गलेगी! ही अवाम पर हमेशा मुसीबत बरपा होगी! और तू, सूदख़ोर जाफ़र! मेरे नाम पर ला’नत बरसे, अगर मैं ने तूझ से उस सारे ग़म और मुसीबत का हिसाब चुकता किया जो तू ग़रीबों पर लादता रहा है।"

    ।। 7 ।।

    ज़िन्दगी में जिस ने बहुत कुछ देखा और किया था, उस ख़ोजा नसरुद्दीन के लिए भी, अपने वतन में वापसी का पहला दिन बहुत से वाक़िआओं और बैचेनी से भरा साबित हुआ। वह बहुत थका हुआ था और चाहता था कि कोई अलग जगह मिल जाय, जहां आराम कर सके।

    "नहीं," एक तालाब के किनारे बहुत से लोगों की भीड़ देख कर, लम्बी सासं भरता हुआ वह बोला, "लगता है आज मुझे आराम का मौक़ा नहीं मिलेगा! ज़रुर यहां कुछ गड़बड़ है।"

    तालाब सड़क से कुछ दूरी पर था। ख़ोजा नसरुद्दीन सीधा अपनी राह पर जा सकता था। लेकिन वह उन लोगों में नहीं था जो किसी भी झगड़े फ़साद या लड़ाई में कूदने का मौक़ा हाथ से निकल जाने देते हैं।

    इतने सालों से साथ होने की वजह से मालिक के तौर-तरीक़ो से ब-खूबी वाक़िफ़ गधा अपने-आप ही तालाब की तरफ़ मुड़ गया।

    खचाखच भीड़ के बीच गधा घुसेड़ते हुए ख़ोजा नसरुद्दीन चिल्लाया- "क्या बात है, भाइयों? क्या यहां किसी का क़त्ल हो गया है? कोई लुट गया है क्या? जगह ख़ाली करो! अलग हटो!"

    भीड़ में जगह बनाते हुए उस तालाब के बिल्कुल किनारे पहुंच कर, जो काई और चिकनी मिट्टी से ढंक रहा था, ख़ोजा ने एक अ’जीब नज़ारा देखा। किनारे से कुछ दूर तालाब में एक आदमी डूब रहा था। बीच-बीच में वह पानी की सतह पर आता, मगर फिर डूब जाता। पानी में बुलबुले उठ रहे थे।

    कई लोग किनारे खड़े हड़बड़ी मचा रहे थे और डूबते हुए आदमी के कपड़े पकड़ कर बाहर खींच लेने के लिए बार-बार हाथ बढ़ा रहे थे। लेकिन, वह पहुंच से ज़रा बाहर था।

    "हाथ बढ़ाओ! इधर! यहां! अपना हाथ दो!" वे चिल्ला रहे थे। वह एक बार पानी के ऊपर आता और फिर डूब जाता। जैसे ही वह डूबता, तालाब में हलकी लहरें उठतीं और किनारें से हौले से टकरातीं।

    यह नज़ारा देखता हुआ ख़ोजा नसरुद्दीन सोचना लगा, "अ’जीब बात है। बड़ी ही अ’जीब बात है! क्या वजह हो सकती है?

    क्यों वह अपना हाथ नहीं बढ़ाता? हो सकता है वह कोई होशियार ग़ोता-ख़ोर हो और कोई शर्त लगा कर ग़ोते लगा रहा हो!

    लेकिन यह बात है, तो वह अपनी ख़िलअ’त क्यों पहने हुए है?"

    वह इन ख़यालों में डूब गया। इस बीच वह डूबनेवाला आदमी कम से कम चार बार पानी की सतह पर आया और हर बार डूब गया। पानी के भीतर रहने का वक़्त हर बार पहले से ज़्यादा था।

    "बड़ी अ’जीब बात है।" गधे से उतरते हुए ख़ोजा नसरुद्दीन ने फिर दोहराया। "तू यहीं ठहर," अपने गधे से वह बोला, "मैं जा कर ज़रा नज़दीक से देखूं तो कि बात क्या है।"

    डूबता हुआ आदमी तब तक फिर पानी के भीतर पहुंच चुका था। इस बार वह इतनी देर तक पानी में रहा कि किनारे पर खड़े लोग उसे मरा हुआ समझ कर उसके लिए दुआ मांगने लगे।

    यकायक वह फिर दिखाई दिया।

    "यहां! इधर!" लोग चिल्लाये। "अपना हाथ दो हमें, हाथ" और उन लोगों ने उस की ओर अपने हाथ बढ़ाये। पर वह उनकी ओर सूनी आंखों से देखता रहा और फिर चुपचाप पानी के भीतर समा गया।

    "अरे बेवक़ूफ़ों!" ख़ोजा नसरुद्दीन चिल्लाया! "उसके रेशमी साफ़े और क़ीमती ख़िलअ’त को देख कर तुम्हें समझ लेना चाहिए कि वह कोई मुल्ला या अफ़सर है! मुल्लों और अफ़सरों के तौर-तरीक़ो से क्या तुम लोग इतने भी वाक़िफ़ नहीं किजान सको कि उन्हें किस तरह पानी से निकालना चाहिए?"

    भीड़ में से आवाज़ें उठी- "तुम तरकीब जानते हो तो निकालो उसे बाहर। और हां, ज़रा जल्दी करो। जाओ, उसे बचाओ।वह पानी के ऊपर गया है! जाओ उसे बाहर खींच लो!"

    "ठहरो!" ख़ोजा नसरुद्दीन ने जवाब दिया , "मैं ने अपनी तक़रीर अभी ख़त्म नहीं की है। मैं पूछता हूः तुमने कब किसी मुल्ला या अफ़सर को किसी को कुछ देते देखा है? अरे जाहिलो! याद रखो कि मुल्ला या अफ़सर कभी कोई चीज़ देते नहीं हैं, सिर्फ़ लेते हैं। उनको बचाने के लिए साइंस के उसूलों पर चलना चाहिए। मतलब यह कि उन लोगों की अ’जब तबीअ’त का ख़याल कर के ही उन्हें बचाने की कोशिश करनी चाहिए। अच्छा, अब मुझे देखो!"

    "अरे अब तक तो बहुत देर हो चुकी है," भीड़ से आवाज़ें आयीं, "वह अब फिर पानी के ऊपर नहीं आयेगा।"

    "क्या तुम समझते हो कि पानी की रूहें इतनी आसानी से मुल्ला या अफ़सर को क़ुबूल कर लेंगी? तुम ग़लती पर हो। पानी की रूहें उस से बचने की पूरी कोशिश करेंगी।"

    ख़ोजा नसरुद्दीन बैठ गया और इत्मीनान से इंतिज़ार करने लगा। वह तालाब के तले से उठते बुलबुलों को हलकी हवा से किनारे की और तैरते देखता रहा।

    आख़िरकार पानी की गहराइयों से गहरे रंग की एक शक्ल धीरे-धीरे बाहर आयी। डूबता आदमी फिर पानी की सतह पर दिखायी दिया। अगर ख़ोजा नसरुद्दीन वहां होता तो वह आख़िरी बार ऊपर आया होता है।

    "यहां! यह लीजिए! यह लीजिए!" ख़ोजा नसरुद्दीन चिल्लाया।

    डूबते आदमी ने अकड़ के साथ उस आगे बढ़े हाथ को थाम लिया। उसकी पकड़ के दर्द से ख़ोजा नसरुद्दीन कराह उठा।

    उस आदमी के ज़बरदस्त चंगुल से छूटने और उसकी उंगलियों को खोलने में बहुत देर लगी।

    कुछ देर वह बिना हिले-डुले चुपचाप पड़ा रहा। घास, काई, चिकनी बदबूदार मिट्टी उस पर पुती हुई थी और उसका चेहरा छिप गया था। उस के मुंह और नाक-कानों से पानी निकल रहा था।

    "मेरा बटुआ! हाय, मेरा बटुआ! अरे, मेरा बटुआ कहां है?" वह कराहा। तब तक उसने चैन ली, जब तक कमर में खुसा बटुआ उसने टटोल लिया। फिर धीरे-धीरे उसने घास हटायी और ख़िलअ’त के दामन से अपना मुंह पोंछा। ख़ोजा नसरुद्दीन झटके से पीछे हट गया। टूटी चपटी नाक, चौड़े नथुने, एक फूटी आंख- इस आदमी का चेहरा बहुत बदनुमा था। आदमी कुबड़ा भी था।

    अपनी एक आंख से भीड़े को देखते हुए खरखराती आवाज़ में उसने पूछाः "मुझे बचानेवाला कौन है?"

    "यह रहा तुम्हें बचाने वाला।" भीड़ ने चिल्लाकर ख़ोजा नसरुद्दीन को आगे ठेलते हुए कहा।

    "इधर आओ। मैं तुम्हें इनआ’म दूंगा।" पानी से पिचपिचाते बटुए में हाथ डालकर उसने मुट्ठी भर चांदी के गीले सिक्के निकाले। "मुझे बाहर खींच लेने में कोई ग़ैर-मा’मूली या अ’जीब बात नहीं हुई। मैं तो आप ही निकल आता, फिर भी…"

    शिकायत के लहजे में वह बोला।

    वह बोल ही रहा था कि कमज़ोरी या किसी और वजह से उसका हाथ धीरे से खुल गया और सिक्के उसकी उंगलियों के बीच से खनखनाते हुए फिर बटुए में पहुंच गये। बस, उसके हाथ में सिर्फ़ एक सिक्का बचा- आधे तंके का सिक्का।

    लम्बी सांस भरते हुए उसने सिक्का ख़ोजा नसरुद्दीन की ओर बढ़ा दिया।

    "लो। रुपया लो और जा कर बाज़ार में एक प्याला पुलाव ख़रीद लो।"

    "पुलाव का प्याला ख़रीदने को यह सिक्का काफ़ी नहीं है।" ख़ोजा नसरुद्दीन बोला।

    "परवाह नहीं। बिना गोश्तवाला भात ख़रीद लेना।"

    पास खड़े लोगों से ख़ोजा नसरुद्दीन बोला- "देखा तुम लोगों ने कि कैसे मैं ने इसे साइंस के उसूलों से बचाया।"

    और वह अपने गधे की तरफ़ बढ़ चला।

    रास्ते में वह एक आदमी के पास रुका। यह आदमी लम्बा, दुबला, कड़ियल और चिड़चिड़ी शक्ल का था और उस पर दोस्ती की छाप नहीं दिखायी पड़ती थी। उस के हाथ और बाहें कोयले और कालिख से काले हो रहे थे। उसके हाथ में

    लुहार का हथौड़ा था।

    "कहो, लुहार भाई! क्या बात है?" ख़ोजा नसरुद्दीन ने कहा।

    बैर-भरी निगाहों से उसे ऊपर से नीचे तक घूरता हुआ लुहार बोला- "क्या तुम जानते हो कि तुम ने किसे बचाया है? हां, और उस आख़िरी वक़्त बचाया है जिस के बाद फिर कोई उसे बचा नहीं सकता था? क्या तुम जानते हो तुम ने जो कुछ किया है, उसकी वजह से कितने लगों को कितने आंसू बहाने पड़ेंगे? क्या तुम जानते हो कितने लोगों को अपने घरों, खेतों और अंगूर के बाग़ों से हाथ धोना पड़ेगा, कितने लोगों को ग़ुलामों के बाज़ार में बिकना होगा और फिर वहां से खीवा की सड़क पकड़नी होगी?"

    नसरुद्दीन उसकी ओर तअ’ज्जुब से देखता रह गया।

    "तुम्हारी बात मैं समझ नहीं पा रहा हूं , लुहार भाई! क्या यह किसी इंसान और मुसलमान को ज़ेब देता है कि वह एक डूबते इंसान के पास से गुज़र जाय और उसकी मदद के लिए हाथ बढ़ाये?"

    "तो तुम समझते हो कि सभी सांपो, लकड़बग्घों और ज़हरीले जानवरों को बचा लेना चाहिए?" लुहार चिल्लाया। फिर यकायक कोई बात उसके दिमाग़ में चमकी, क्योंकि उसने पूछाः "क्या तुम यहीं के रहने वाले हो?"

    "नहीं, मैं बहुत दूर से आया हूं।"

    "तब तुम नहीं जानते कि जिस शख़्स को तुमने बचाया है, वह बदी करने वाला और ख़ून चूसनेवाला इंसान है। बुख़ारा में रहने वाला हर तीसरा शख़्स उस की वजह से कराहता और रोता है।"

    एक बहुत ख़ौफ़नाक ख़याल ख़ोजा नसरुद्दीन के दिमाग़ में कौंध गया।

    "लुहार भाई ! मुझे उस शख़्स का नाम तो बताओ।" उसने हकला कर पूछा, क्योंकि उसे डर था कि कहीं उसका अन्दाज़ा सही निकले।

    लुहार ने जवाब दियाः "तुम ने सूदख़ोर जाफ़र को बचाया है। ख़ुदा करे उस की यह ज़िन्दगी और आक़िबत बिगड़े, उसकी चौदह पुश्तें ज़ख़्मों से सड़ें और उसके ज़ख़्मों में कीड़े पड़ें!"

    "क्या कहा ?" नसरुद्दीन चिल्लाया। "तुम कह क्या रहे हो लुहार भाई? हाय, हाय कम-बख़्ती! उफ़! ला’नत है मुझ पर! क्या मेरे ही इन दोनों हाथों ने उस सांप को पानी से बाहर निकाला है? वाक़ई, इस गुनाह की तौबा नहीं! हाय कम-बख़्ती! ला’नत है मुझ पर! उफ़, क्या क़यामत है!"

    उस के ग़म का असर लुहार पर पड़ा और वह कुछ नर्म होकर बोलाः "सब्र करो मुसाफ़िर, अब कुछ नहीं हो सकता। तुम गधे पर सवार हो कर उस वक़्त उधर से गुज़रे ही क्यों? तुम्हारा गधा सड़क पर अड़ क्यों गया? रुक क्यों गया? तब तो सूदख़ोर को डूबने का पूरा-पूरा मौक़ा मिल जाता।"

    "यह गया?" ख़ोजा नसरुद्दीन बोला, "अगर यह सड़क पर अड़ता भी है तो सिर्फ़ इसलिए कि ज़ीन से लगे थैलों से रूपया निकल जाय। जब वे भरे होते हैं, तो इस के लिए बहुत भारी साबित होते हैं। लेकिन अगर सूदख़ोर को बचाकर अपने ऊपर ला’नत बुलाने की बात हो, तब तुम यक़ीन मानो, यह गधा मुझे वक़्त से पहले ही वहां पहुंचा देगा।"

    "हा, यह सही है," लुहार उस की बात मानते हुए बोला, "पर जो हो चुका वह अब बदला नहीं जा सकता। कोई उस सूदख़ोर को फिर से तो पानी में धकेल नहीं सकता।"ख़ोजा नसरुद्दीन को जोश गया।

    "मैं ने बुरा काम किया। पर मैं उसे ठीक कर दूंगा। सुनो, लुहार भाई ! मैं क़सम खाता हूं कि मैं सूदख़ोर जाफ़र को डूबाकर दम लूंगा। मैं अपने वालिद की क़सम खाता हूं। मैं उसे डूबा कर रहूंगा, हां! और इसी तालाब में डुबाऊंगा! लुहार भाई!

    मेरा क़ौल याद रखना, क्योंकि मैं ने कभी फ़ुज़ूल बकवास नहीं की। सूदख़ोर को डूबना ही होगा! और जब तुम बाज़ार में यह ख़बर सुनो, तो समझ लेना कि बुख़ारा अज़ीम के शहरियों का मैं ने जो क़ुसूर किया था, उसका मैं ने बदला चुका दिया है!"

    ।। 9 ।।

    ख़ोजा नसरुद्दीन बाज़ार पहुंचा तो शहर पर ठंडे, ख़ुशबूदार कोहरे की तरह शफ़क़ छा रही थी। चायख़ानों में ख़ुशगवार आग जल रही थी और थोड़ी ही देर में पूरे बाज़ार में रौशनी होने लगी। अगले दिन बड़ा बाज़ार लगनेवाला था। एक-एक कर के ऊंटों के काफ़िले रहे थे। काफ़िले अंधेरे में ग़ायब हो जाते पर घंटियों की उदास, साफ़, लयदार आवाज़ हवा में गूंजती रहती। जब यह गूंज दूर जा कर ख़त्म हो जाती, तो बाज़ार में आनेवाले दूसरे काफ़िले की घंटियां उदास टिनटिनाहट करने लगतीं। यह सिलसिला बराबर जारी रहता, मानो ख़ुद रात आवाज़ कर रही हो, कांप रही हो और धीरे-धीरे कराह रही हो- दुनिया के कोने-कोने से आयी आवाज़ोँ से भर रही हो। हिन्दुस्तान, ईरान, अ’रब, अफ़्ग़ानिस्तान और मिस्र से आयी, ये दिखायी पड़नेवाली घंटियां, कोई ललक भरा गीत गाती लग रही थीं। ख़ोजा नसरुद्दीन यह सब सुनता रहा। उसे लग रहा था कि वह हमेशा-हमेशा यह संगीत सुनता रह सकता है। पड़ोस के एक चायख़ाने से तंबूरे की आवाज़ रही थी और एक दुतारा मानो उस के जावब में बज रहा था। कहीं कोई गवैया (जो दिखायी नहीं दे रहा था) अपनी तेज़, साफ़ आवाज़ ऊंची कर के सितारों तक पहुंचा रहा था। अपनी माशूक़ा के बारे में वह गीत गा रहा था, उस की बेवफ़ाई की शिकायत कर रहा था। इस गाने को सुनता हुआ ख़ोजा नसरुद्दीन रात में सोने की जगह तलाश करने के लिए चल पड़ा।

    एक चायख़ाने के मालिक से वह बोलाः "मेरे पास अपने और अपने गधे के लिए कुल आधा तंका है।"

    "आधे तंके में तुम यहां रात बिता सकते हो, लेकिन तुम्हें कम्बल नहीं मिलेगा।" उसने जवाब दिया।

    "तो मैं अपना गधा कहां बांधू?"

    "तुम्हारे गधे के बारे में मैं क्यों सिरदर्द मोल लूं?"

    चायख़ाने में कहीं खूंटा नहीं था। ऊंचे फ़र्शवाली बरसाती से निकला एक कुंडा ख़ोजा नसरुद्दीन को दिखाई दिया। यह देखे बिना कि यह कुंडा किस चीज़ में लगा है, उसने गधे को बांध दिया। चायख़ाने में पहुंचते ही वह फ़ौरन लेट गया, क्योंकि वह बहुत थका हुआ था। उसे झपकी रही थी कि यकायक उसे अपना नाम सुनायी दिया। उसने आधी आंख खोली।

    पास ही, बाज़ार में आये कुछ लोग घेरा बनाये चाय पी रहे थे। उन में एक ऊंटवान था, एक चारवाहा और दो दस्तकार। कोई धीमी आवाज़ में कह रहा थाः "ख़ोजा नसरुद्दीन के बारे में यह भी कहा जाता है। एक दिन जब वह बग़दाद में था, तो बाज़ार के बीच हो कर गुज़र रहा था। एकाएक उसे एक सराय में शोर-गुल सुनायी दिया। तुम तो जानते ही हो, हमारा ख़ोजा नसरुद्दीन ऐसी बातें जानने के लिए कितना उतावला रहता है! वह सराय के भीतर जा पहुंचा। वहां मोटा लाल मुंहवाला सराय का मालिक एक भिखमंगे की गर्दन पकड़े उसे झकझोर रहा था। वह दाम मांग रहा था और फ़क़ीर देने से इनकार कर रहा था। 'यह शोर-ग़ुल क्यों हो रहा है?' ख़ोजा नसरुद्दीन बोला- 'यह आवारा, यह कमीना, यह दग़ाबाज़ भिखमंगा, ख़ुदा करे इस की आंतों में कीड़े पड़े, यह मेरी दूकान में घुस आया। अपनी ख़िलअ’त के दामन से इसने रोटी का एक टुकड़ा निकाला और देर तक उसे वहीं अंगीठी के ऊपर किये खड़ा रहा जब तक इस की रोटी में भुने गोश्त की ख़ुश्बू भर गयी और रोटी दुगनी मुलायम और ज़ाइक़ादार बन गयी। फिर यह रोटी को निगल गया।

    अब यह उस की क़ीमत अदा करने से इनकार करता है। ख़ुदा करे इस के दांत गिर जायें, इस की खाल उधड़ कर अलग जा गिरे!' 'क्या यह सच है?' ख़ोजा नसरुद्दीन ने सख़्ती से पूछा। भिखमंगे के मुंह से डर के मारे बात निकली। ख़ोजा नसरुद्दीन ने कहा- 'तुम जानते हो कि दूसरे की चीज़ अदा किये बिना उसे इस्तेमाल कर लेना ग़लत बात है?' बहुत ख़ुश होकर सराय का मालिक बोला-'सुना तूने बद-मआ’श? तूने इस क़ाबिल और बा-इज़्ज़त शख़्स की बात सुनी?' ख़ोजा नसरुद्दीन ने भिखारी से पूछा- 'तुम्हारे पास पैसा है?' भिखमंगे ने अपनी जेब से आख़िरी पैसे निकाले और उन्हें ख़ोजा नसरुद्दीन के सिपुर्द कर दिया। सराय के मालिक ने अपना चर्बीदार पंजा पैसे लेने के लिए आगे बढ़ाया। ख़ोजा नसरुद्दीन बोला- 'ठहरिये हज़रत! पहले अपना कान मेरे पास लाइए।' काफ़ी देर तक वह सराय के मालिक के कानों के पास पैसे खनखनाता रहा। फिर उसने पैसे भिखारी को लौटाते हुए कहा- सलामुअलैकुम, मेरे ग़रीब दोस्त! अब तुम जा सकते हो।' सराय का मालिक चिल्लाया- 'क्या कहा? लेकिन मुझे तो क़ीमत मिली नहीं!' ख़ोजा नसरुद्दीन ने जवाब दिया- 'उस ने पूरी क़ीमत चुका दी है। तुम लोगों का हिसाब साफ़ हो गया है। उसने तुम्हारा सीख़ कबाबा सूंघा, तुमने उस के पैसों की खनखनाहट सुन ली।'"

    सुननेवाले लोग ज़ोर से हंस पड़े। उन में से ने औरों को होशियार किया- "इतनी ज़ोर से नहीं। नहीं तो, लोग समझेंगे कि हम लोग ख़ोजा नसरुद्दीन की बात कर रहे हैं।"

    ख़ोजा नसरुद्दीन चुपचाप मुस्कुराता हुआ सोचना लगाः "इन्हें कैसे पता? यह सच है कि यह बात बग़दाद नहीं इस्ताम्बूल में हुई थी। तो भी, इन्हें ख़बर कैसे लगी?"

    तभी चरवाहे की पोशाक पहने और रंगीन साफ़ा बांधे दूसरे आदमी ने, जो बदख़्शाँ का लग रहा था, धीमी आवाज़ में यह क़िस्सा सुनाना शुरु कियाः

    "लोग कहते हैं कि एक दिन ख़ोजा नसरुद्दीन एक मुल्ला के बाग़ीचे के पास से गुज़र रहा था। मुल्ला एक बोरे में कददू भर रहा था। लालच ही लालच में उसने बोरा इतना भर लिया कि ढोने की कौन कहे, वह उसे उठा भी नहीं पा रहा था। सो, वह वहीं खड़ा सोचता रहा कि बोरे को घर तक कैसे पहुंचाऊं। तभी उसे एक राहगीर दिखायी दिया। मुल्ला ख़ुश हो गया। 'सुनो बेटे! क्या यह बोरा तुम मेरे घर तक पहुंचा सकते हो?' ख़ोजा नसरुद्दीन के पास उस वक़्त पैसे नहीं थे। मुल्ला से पूछाः 'मुझे क्या दोगे?' अरे बेटे, तुम पैसे क्यों मांगते हो? तुम बोरा लेकर चल रहे हो गे, तभी मैं तुम्हें दानिशमन्दी की तीन बातें बताऊंगा जिन्हें सुन कर तुम्हारी ज़िन्दगी में ख़ुशी छा जायेगी।' ख़ोजा नसरुद्दीन ने सोचा- 'क्यों जान लिया जाय कि दानिशमन्दी की ये तीन बातें क्या है?'

    "उस की जानने की ख़्वाहिश बढ़ी। उस ने बोरा उठाकर कंधों पर रखा और चल पड़ा। रास्ता ऊंचाई पर था और उस के एक तरफ़ ग़ार था। दम लेने के लिए ख़ोजा नसरुद्दीन रुका। मुल्ला ने बड़ी अहमियत और राज़ भरे अंदाज़ में कहाः 'दानिशमन्दी की पहली बात सुन! क्योंकि इससे बड़ी अक़्लमन्दी की बात आदम के वक़्त से आज तक दुनिया में नहीं हुई। अगर तू इस के मा'नी पूरी गहरायी में जा कर समझे तो यह उन अलिफ़, लाम, मीम हर्फ़ों का हक़ीक़ी मतलब समझने के बराबर होगा, जिन से हमारे पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद ने क़ुरआन का दूसरा सूरा शुरु किया है।'

    " 'ग़ौर से सुन! अगर कोई तुझ से कहे कि सवारी करने से पैदल चना ज़्यादा अच्छा है, तो उसका यक़ीन करना।मेरी बात याद रखना बेटे। इस पर दिन-रात ग़ौर करना। तब तू इन अल्फ़ाज़ में छिपी दानाई समझ सकेगा। पर यह बात अक़्ल की उस दूसरी बात के मुक़ाबले कुछ भी नहीं है जो मैं तुझे उस पेड़ के नीचे सुनाऊंगा। वह देख, वह आगेवाला पेड़।' ख़ोजा नसरुद्दीन ने सोचाः 'अच्छी बात है, मुल्ला साहब! आप ज़रा ठहरें तो!' 'पसीने से तर वह बोरा लिए पेड़ तक पहुंचा।

    "मुल्ला ने उंगली उठाकर कहाः 'कान खोल कर सुन, क्योंकि दानाई की इस दूसरी बात में पूरा क़ुरआन, आधी शरीअ’त और चौथाई तरीक़त भी भरी है। जो इस बात को समझ लेगा वह कभी नेकी के रास्ते से नहीं डिगेगा, हमेशा सच्चाई के रास्ते पर चलेगा। इसलिए, मेरे बेटे! अक़्ल की इस बात को समझने की कोशिश कर और ख़ुशी मना कि यह बात तुझे मुफ़्त ही बतायी जा रही है। दानिशमन्दी की दूसरी बात यह है कि अगर तुझ से कोई कहे कि ग़रीब इंसान की ज़िन्दगी अमीर के मुक़ाबले में ज़्यादा आसान और आरामदेह है, तो उसका यक़ीन करना। लेकिन यह दूसरी बात भी उस तीसरी बात के मुक़ाबले कुछ नहीं है, जिस की तेज़ चमक सूरज को अंधा बना देनेवाली रौशनी की तरह है और जिस की गहराई सिर्फ़ समुंदर की गहराई से मिलाई जा सकती है। यह तीसरी बात में तुझे अपने घर के फाटक पर पहुंच कर बताऊंगा। अब जल्दी चल- क्योंकि मैं सुस्ता चुका हूं।'

    "ख़ोजा नसरुद्दीन बोला- 'ठहरिए, मुल्ला साहब! मुझे आपकी दानिशमन्दी की तीसरी बात पहले से ही मा’लूम है।

    अपने घर के दरवाज़े पर पहुंच कर मुझे बतायेंगे कि चालाक आदमी बेवक़ूफ़ इंसान से कद्दुओं का बोरा हमेशा मुफ़्त ढुलवा सकता है।' मुल्ला अचम्भे में गया और थम गया। ख़ोजा नसरुद्दीन का क़यास ठीक था।

    " 'अब जनाब मुल्ला साहब! आप दानिशमन्दी की मेरी भी एक बात सुनिये। यह अकेली बात आपकी सभी बातों के बराबर है।' ख़ोजा नसरुद्दीन कहता गया। 'मैं पाक पैग़म्बर की क़सम खाकर कहता हूं कि मेरी दानाई की बात इतनी गहरी और ऐसी चकाचौंध कर देने वाली है कि इसमें क़ुरआन, शरीअ’त, तरीक़त मय दूसरी किताबों के पूरा इस्लाम, बौद्ध फ़ल्सफ़ा, ईसाई और यहूदी मज़हबों की तमाम बातें शामिल है। मुल्ला साहब! मुझे सच्चा ईमान बतानेवाले मेरे उस्ताद! इस बात से, जो मैं आपको बताने जा रहा हूं, ज़्यादा दानिशमन्दी की बात कोई कभी हुई ही नहीं। लेकिन, इसे सुनने के लिए आप पहले अपने को तैयार कर लीजिए। क्योंकि यह इतनी वसीअ’, अज़ीमुश्शान और अचम्भे में डाल देनेवाली है कि इस से आसानी से किसी इंसान का दिमाग़ फिर सकता है। मुल्ला साहब!

    अपने दिमाग़ को फ़ौलाद की तरह कड़ा कर लीजिए और सुनिएः अगर आपसे कोई कहे कि ये कद्दू फूटे नहीं हैं, तो उस के मुंह पर थूक दीजिएगा, उसे झूठा क़रार दे दीजिएगा और उसे अपने घर से निकाल बाहर कीजिएगा!'

    "यह कहक ख़ोजा नसरुद्दीन ने बोरा उठाया और उसे पासवाले गहरे खड़ में फेंक दिया। कद्दू बोरे से निकल पड़े और पत्थरों पर टकराते, आवाज़ करते हुए नीचे गिरकर चकनाचूर हो गये। मुल्ला, 'हाय, हाय!' कहता, अफ़्सोस करता हुआ रोने-धोने लगा। 'हाय कितना नुक़सान हो गया! कैसी बर्बादी हो गयी!' कहा हुआ वह चीख़ता-चिल्लाता, रोता-धोता, अपना मुंह नोचता, पागलों जैसा घर की तरफ़ चल पड़ा।

    "उस के चलते-चलते नसरुद्दीन ने कहाः 'देखा आपने! मैं ने आपको ख़बरदार कर दिया था! मैं ने आपको पहले ही बताया था कि दानाई की मेरी बात से आप पागल हो सकते है!'"सुनने वाले हंसी से दोहरे हो गये।

    धूल और खटमल भरे नमदे पर एक कोने में पड़ा ख़ोजा नसरुद्दीन सोचने लगा-

    "तो उन्होंने इस वाक़िए की भी ख़बर पा ली? लेकिन कैसे? उस सड़क पर उस वक़्त सिर्फ़ दो ही शख़्स थे- मुल्ला और मैं! और मैं ने किसी से इस बारे मं कभी कुछ कहा नहीं। शायद मुल्ला को जब पता लगा हो कि उस के कद्दू कौन ढो रहा था, तो उसने यह क़िस्सा ख़ुद सुनाया हो।"

    तीसरे शख़्स ने अपना क़िस्सा शुरु कर दियाः "एक दिन तुर्की के एक शहर से ख़ोजा नसरुद्दीन उस गांव को लौट रहा था, जहां उन दिनों वह रहता था। थककर वह एक नदी के किनारे लेट गया और बिना जाने ही पानी की ख़ुशगवार आवाज़ और बहार की ख़ुश्बूदार हवा के झोकों में सो गया। सोते-सोते उसने सपना देखा कि वह मर गया है। उस ने सोचाः 'अगर मैं मर गया हूं, तो मुझे तो हिलना चाहिए और आंखें खोलनी चाहिएं।' सो, वह चुपचाप मुलायम घास पर बिना हिले डुले पड़ा रहा।

    उसे लगा, आख़िर मरना इतनी बुरी चीज़ तो है नहीं। जब तक यह ज़िन्दगी है, तब तक झंझट और परेशानियां बुरी तरह पीछे लगी रहती हैं। मौत आने पर उनके बिना बस आराम से पड़े रहना होता है।

    "उधर से गुज़र रहे थे कुछ मुसाफ़िर। उनकी नज़र ख़ोजा नसरुद्दीन पर पड़ी। मुसाफ़िरों में से एक बोलाः 'देखो! वह कोई मुसलमान है।' दूसरा बोला, 'मरा हुआ है! चलो उठाकर पास के गांव ले चलें।'

    "पास का गांव वही था, जहां ख़ोजा नसरुद्दीन को जाना था। लोगों ने पेड़ों से कई शाखें काटीं। उनकी चारपाई बनाकर उस पर ख़ोजा नसरुद्दीन को लिटाया और लेकर चल पड़े। काफ़ी देर तक वे उसे लेकर चलते रहे। वह आंखें बन्द किये, बिना हिले-डुले, चुपचाप लेटा रहा- ठीक वैसे ही जैसा कि उस शख़्स को ज़ेब देता है जो मर चुका है या’नी जिसकी रूह बहिश्त के फाटक खटखटाती होती है।

    "यकायक चारपाई रुकी। मुसाफ़िर लोग नदी को पार करने के बारे में बातचीत कर रहे थे। एक कह रहा था कि दाहिनी तरफ़ मुड़ना है, दूसरा कह रहा था, बाई तरफ़। तीसरा कहता सीधे यहीं से नदी पार कर लेनी चाहिए। ख़ोजा नसरुद्दीन ने एक आंख खोली तो देखा कि वे लोग उस जगह खड़े हैं जहां नदीं सबसे ज़्यादा गहरी है, धार सबसे तेज़ और ख़तरनाक है, जहां बहुत से लापरवाह लोग डूब चुके हैं। ख़ोजा नसरुद्दीन ने सोचा- 'मेरी तो कोई बात नहीं!

    अपनी परवाह मुझे है नहीं, क्योंकि मैं मर चुका हूं! चाहे क़ब्र में लेटूं, चाहे नदी की गोद में, मेरे लिए कोई फ़र्क़ पड़ता नहीं। लेकिन इन मुसाफ़िरों को आगाह कर देना चाहिए, नहीं तो मेरे ऊपर मेहरबानी करते-करते कहीं ये लोग अपनी जान से ही हाथ धो बैठें। उन्हें आगाह करना, मेरा नाशुक्रापन होगा।'

    "चारपाई पर वह थोड़ा सा उठा और नदीं की तरफ़ इशारा करता हुआ कमज़ोर आवाज़ में बोलाः "मुसाफ़िरों! मैं जब ज़िंदा था, तो हमेशा इस नदी को चनार के उन दरख़्तों के पास से पार किया करता था।' इतना कह कर उसने फिर आंखें बन्द कर लीं। मुसाफ़िरों ने ख़ोजा नसरुद्दीन का शुक्रिया अदा किया और ज़ोर-ज़ोर से उस की रुह के लिए दुआ मांगते हुए, चारपाई लेकर आगे बढ़ चले।"

    कहानी कहनेवाला और कहानी सुननेवाले एक-दूसरे को कोहनी मार कर हंस रहे थे। ख़ोजा नसरुद्दीन कराहाः "पूरा वाक़िआ’ ही उन्होंने ग़लत सुना। पहली बात तो यह कि मै ने ख़्वाब देखा ही नहीं कि मैं मर चुका हूं। मैं इतना बेवक़ूफ़ नहीं कि अपनी मौत और ज़िन्दगी में फ़र्क़ कर सकूं। अरे, मुझे तो यह भी याद है कि उसी वक़्त मुझे पिस्सू काट रहे थे और मुझे बड़ी ख़्वाहिश हो रही थी कि अपना बदन खुजा लूं। ज़िन्दा होने का यह सबसे सा