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मुल्ला नसरुद्दीन- दूसरी दास्तान

लियोनिद सोलोवयेव

मुल्ला नसरुद्दीन- दूसरी दास्तान

लियोनिद सोलोवयेव

MORE BYलियोनिद सोलोवयेव

    "ये अ’जीब वाक़िआ’त हैं, इन में से कुछ तो मेरी मौजूदगी में हुए और कुछ मुझे मो’तबर लोगों ने सुनाये।" अस्मा इब्न मुन्क़िज़, "किताबुन नसाएह "

    ।। 1 ।।

    बहुत पुराने ज़माने से बुख़ारा के कुम्हार शहर के पूरब की तरफ़ के फाटकों के पास मिट्टी के बड़े ढूह के आस-पास बसे हुए थे। इस से बढ़िया जगह वह अपने लिए तलाश भी नहीं कर सकते थे। मिट्टी के पास में ही मिल जाती थी और शहरपनाह की दीवार के नीचे बहनेवाली सिंचाई की नहर से पानी मिल जाता था। कुम्हारों के दादों, परदादों और लकड़दादों ने मिट्टी लेते-लेते ढूह को आधा कर दिया था। वे अपने घर मिट्टी से बनाते, मिट्टी से बनाते और इसी मिट्टी में उनके रिश्तेदार एक दिन रोते-धोते उन्हें दफ़ना आते। अक्सर कुम्हार कोई घड़ा या सुराही बनाकर उसे धूप में सुखा कर और आग में पका कर उसकी साफ़ तेज़ ठनक पर अचम्भा करता होगा। लेकिन उसे इस का शक भी होगा कि उसके किसी परदादा ने अपने ख़ानदान के अज़ीज़ों की भलाई और उनके बर्तनों की बिक्री के ख़याल से, अपनी ख़ाक के ज़र्रों से इस मिट्टी को बढ़िया बनाया होगा, ता कि उस में से ख़ालिस चांदी जैसी खनक पैदा हो।

    यहीं, नहर के बिलकुल किनारे, क़दीमी सायेदार दरख़्तों के साये में नियाज़ कुम्हार का घर था। पत्तियां हवा में झूमती रहतीं, पानी गाता-गुनगुनाता बहता रहता और घर का छोटा-सा बाग़ीचा गुलजान नाम की दोशीज़ा के गानों से दिन-रात गूंजा करता।ख़ोजा नसरुद्दीन ने नियाज़ के घर डेरा डालने से इंकार कर दिया।

    उसने कहाः "नहीं नियाज़! तुम्हारे घर मैं पकड़ा जा सकता हूँ। रातें मैं पास ही एक जगह बिताया करूंगा। यह जगह मैं ने अपने लिए तलाश कर ली है। हां, दिन में कर मैं तुम्हारे काम में मदद किया करूंगा। और उस ने अपने कहे मुताबिक़ ही करना शुरु किया। हर सवेरे, सूरज निकलने से पहले, वह नियाज़ के घर आकर बूढ़े के पास बैठ जाता। दुनिया में ऐसा कोई काम नहीं था जिसकी बारीकियों से ख़ोजा नसरुद्दीन वाक़िफ़ हो। कुम्हारगीरी का काम उसे बख़ूबी आता था और जो बर्तन वह बनाता वे चिकने और खनकदार होते और उन में गर्म से गर्म मौसम में भी पानी बर्फ़-सा ठंडा रहता। बूढ़ा नियाज़, जिस की निगाह अब कमज़ोर होती जा रही थी, दिन भर में पहले मुश्किल से पांच-छः घड़े बना पाता था, जब कि अब बर्तनों की लम्बी क़तारें- तीस, चालीस और कभी कभी तो पचास घड़े- धूप में सूखा करतीं। बाज़ार के, दिन बूढ़ा नियाज़ घर लौटता तो उसकी थैली भरी होती और रात में उस के घर में पकते पुलाव की ख़ुशबू पूरे टोले में फैल जाती। पड़ोसी लोग इस बूढ़े के दिन फिरने पर ख़ुश थे और कहा करतेः

    "आख़िर नियाज़ की भी क़िस्मत पलटी। अलहमदुलिल्लाह (अल्लाह उस पर करम करे)! उसकी ग़रीबी हमेशा के लिए दूर हो गयी।"

    "सुना है कि अपनी मदद के लिए उसने कोई कारीगर रखा है ? लोग यहां तक कहते हैं कि यह कारीगर कुम्हारगीरी में बड़ों-बड़ों के कान काटता है।"

    "हां, मैं ने भी सुना है। एक दिन मैं नियाज़ के घर गया- उस का कारीगर देखने। लेकिन जैसे ही मैं बाग़ीचे के फाटक से दाख़िल हुआ, कारीगर उठा और वहां से रवाना हो गया और फिर पलट कर नहीं आया।"

    "भाई, बूढ़ा अपने कारीगर को छिपा कर रखता है। ज़रूर उसे डर होगा कि हम लोगों में से कोई उस के कारीगर को लालच देकर फुसला ले जाय। अ’जब इंसान है वह भी! जैसे कि हम कुम्हारों के ज़मीर ही नहीं। मानो हम लोग इस बूढ़े की क़िस्मत, जिसे अब ज़िन्दगी में खुशी मिली है, बिगाड़ने की कोशिश करेंगे।"

    इस तरह पड़ोसियों ने मसअले को निपटाया। उन में से किसी को शुबह तक हुआ कि बूढ़े नियाज़ का कारीगर कोई और नहीं, ख़ुद ख़ोजा नसरुद्दीन है। सब को पक्का यक़ीन था कि ख़ोजा नसरुद्दीन बहुत पहले ही बुख़ारा छोड़ कर चला गया है। यह अफ़्वाह ख़ुद उस ने फैलायी थी, ताकि जासूसों को परेशानी हो और उस की तलाश में जो जोश दिखाया जा रहा था, वह ठंडा पड़ जाय। अपने मक़्सद में उसे कामयाबी भी मिली। यह क़रीब दस दिन बाद साबित हो गया। शहर के सभी फाटकों पर से दोहरी पहरेदारी हटा ली गयी और हथियार खड़खड़ाते और रात में मशअलों' से चकाचौंध फैलाते सिपाहियों के गश्तों से बुख़ारा के बाशिन्दों को नजात मिली।

    एक दिन बहुत देर तक खांसने-खखारने के बाद बूढ़े नियाज़ ने ख़ोजा नसरुद्दीन को देखते हुए कहाः

    "ख़ोजा नसरुद्दीन तुम ने मुझ को ग़ुलामी से और मेरी बेटी को बेइज़्ज़ती से बचाया। तुम मेरे साथ काम करते हो और मुझसे दस गुने ज़ियादा घड़े तैयार कर डालते हो। जब से तुम ने मेरी मदद शुरू की, तब से अब तक मैं ख़ालिस नफ़े के तीन सौ पचास तंके कमा चुका हूं, जो ये हैं। इस रक़म पर तुम्हारा हक़ हैं, तुम इसे लो।"

    ख़ोजा नसरुद्दीन ने कुम्हारी का चाक रोक लिया और तअ’ज्जुब से बूढ़े को देखने लगा।

    "ऐ नेक रूह नियाज़ साहब! ज़रूर तुम्हारी तबीअ’त कुछ ख़राब है। तभी तुम ऐसी अजीब-अजीब बातें कर रहे हो। यहां तुम मालिक हो और मैं तुम्हारा नौकर। अगर तुम मुनाफ़े का एक छोटा-सा हिस्सा भी, यही कोई पैंतीस तंके, मुझे दे दो तो मुझे ज़रूरत से ज़ियादा तस्कीन हो जायेगी।"

    नियाज़ की फटी-पुरानी थैली से उस ने पैंतीस तंके निकाले और अपने पटके में रख लिये, बाक़ी वापस कर दिये। लेकिन बूढ़े ने रक़म वापस लेने की ज़िद पकड़ ली।

    "ऐसा करना ठीक नहीं है, ख़ोजा नसरुद्दीन। यह रक़म तुम्हारी है। अगर तुम पूरी रक़म नहीं लेते, तो कम से कम आधी तो लो ही।"

    ख़ोजा नसरुद्दीन को ताव गया।

    "ऐ भले नियाज़! अपनी थैली मेरे सामने से हटाओ। मेहरबानी कर के दुनिया का रेहन बिगाड़ो। अगर सभी मालिक अपने-अपने कारीगरों को मुनाफ़े का आधा हिस्सा देने लगे तो क्या होगा? तब तो इस दुनिया में मालिक रह जायेंगे, नौकर, रईस, ग़रीब, पहरेदार, अमीर। ज़रा सोचो तोः अल्लाह ऐसी बेइंसाफ़ी कैसे बरदाश्त करेगा!

    वह फ़ौरन तूफ़ान-ए-नूह (दूसरा बड़ा सैलाब) भेजेगा। अपनी थैली लो और अच्छी तरह छिपा कर रखो, नहीं तो कहीं तुम्हारे पाग़लत ख़यालात अल्लाह का क़हर बरपा करें और इंसानों की पूरी नस्ल ही नेस्त नाबूद कर दें!"

    इतना कह कर ख़ोजा नसरुद्दीन फिर अपना चाक चलाने लगा।

    "यह घड़ा बड़ा बांका बनेगा!" गीली मिट्टी को हाथों से थपथपाता हुआ वह बोलाः "यह हमारे अमीर के सिर की तरह बोलता है ! यह घड़ा मुझे महल तक ले जाना पड़ेगा, ता कि कहीं अमीर का सिर फिर जाय तो यह घड़ा काम सके।"

    "ख़ोजा नसरुद्दीन ! होशियार! ऐसी बातें कहने की ब-दौलत एक दिन कहीं तुम ख़ुद अपना सिर खो बैठो।"

    "आहा! ख़ोजा नसरुद्दीन का सिर उड़ा देना कोई हंसी-ठट्टा नहीं है।"

    मैं ख़ोजा नसरुद्दीन मियां!

    आज़ाद हमेशा रहा किया!

    यह झूठ कोई बकता है,

    मैं कभी नहीं मर सकता हूं!

    कह दो अमीर से, धारदार

    बनवा रक्खे कोई कटार,

    ऐलान करे, मैं हूं रहज़न

    मुझ से ख़तरे में पड़ा अमन!

    मैं ख़ोजा नसरुद्दीन मियां!

    आज़ाद हमेशा रहा किया!

    यह झूठ कोई बकता है,

    मैं कभी नहीं मर सकता हूं!

    जीऊं-गाऊंगा, चाहूंगा,

    मैं शम्सी ताब सराहूंगा!

    डंके की चोट सुनाऊंगा,

    मन की मुराद बतलाऊंगा,

    "यह बद अमीर मर जाये रे,

    मर कर दोज़ख़ में जाये रे!"

    हां सुल्तानी फ़रमान है य---

    मेरा सिर क़लम किया जाये!

    यह शाह के लिए फांसी है,

    ख़ीवा में इस पर बाज़ी है!

    मैं ख़ोजा नसरुद्दीन मियां!

    आज़ाद हमेशा रहा किया!

    यह झूठ कोई बकता है,

    मैं कभी नहीं मर सकता हूं!

    भूखा कंगाल हूं, नंगा हूं,

    परवाह नहीं है, चंगा हूं!

    मैं इन्सानों का प्यारा हूं,

    क़िस्मत का बड़ा दुलारा हूं,

    डर नहीं किसी सुलतां का है,

    डर नहीं अमीर कि खां का है!

    मैं ख़ोजा नसरुद्दीन मियां!

    आज़ाद हमेशा रहा किया!

    यह झूठ कोई बकता है,

    मैं कभी नहीं मर सकता हूं!

    नियाज़ की पीठ तरफ़ अंगूर की बेल के पीछे से गुलजान का हंसता हुआ चेहरा एक लम्हे को दिखायी दिया। ख़ोजा नसरुद्दीन ने अपना गीत बीच में ही रोक दिया और गुलजान से ख़ुशगवार और राज़ भरे इशारे करने लगा।

    "उधर क्या देख रहे हो?" नियाज़ ने पूछाः "क्या चीज़ है उधर?"

    "बहिश्त की चिड़िया, जो दुनिया में सबसे ज़ियादा ख़ूब-सूरत है!"

    बूढ़ा बड़ी मेहनत से पीछे को घूमा, लेकिन तब तक गुलजान फूल-पत्तों में ग़ायब हो चुकी थी और दूर से सिर्फ़ उसकी रुपहली हंसी सुनायी दे रही थी। धूप की चकाचौंध से बचने के लिए अपने हाथ की आड़ बनाये बूढ़ा बड़ी देर तक अपनी कमज़ोर आंखें उधर गड़ाये रहा, लेकिन उसे एक डार से दूसरी डाल पर फुदकती एक गौरेया के सिवा और कुछ दिखायी दिया।

    "ज़रा समझ से काम लो, ख़ोजा नसरुद्दीन! यह बहिश्त की चिड़िया कैसे हो गयी? यह तो मा’मूली गौरेया है।"

    ख़ोजा नसरुद्दीन ठहाका मार कर हंस पड़ा। बेचारा नियाज़ इस खुशी की कोई तुक सम झकर मायूसी से सिर हिलाता रह गया। रात के खाने के बाद, ख़ोजा नसरुद्दीन चला गया तो नियाज़ ऊपर छत पर पहुंचा और हल्की गर्म हवा के झोंकों में सने की तैयारियां करने लगा। थोड़ी ही देर में वह ख़र्राटे भरने लगा। तभी छोटे जंगले के पीछे से हल्की खांसी सुनायी दी। ख़ोजा नसरुद्दीन वापस पहुंचा था।

    "सो गये हैं।" गुलजान ने फुसफुसाकर कहा।

    एक ही छलांग में ख़ोजा नसरुद्दीन ने जंगला पार कर लिया।

    दोनों चनार के दरख़्तों के साये में गये। लम्बे हरे लिबास में लिपटे दरख़्त हौले-हौले ऊंघते रहे थे। साफ़ नीले आसमान में चाँद चमक रहा था। उसकी रौशनी हर चीज़ पर धुंधले नीले रंग की कूंची फेर रही थी। नहर का पानी हहर-हहर करता बह रहा था। यहां-वहां रौशनी में पानी चमकता और फिर परछाइयों में खो जाता। चांद की पूरी रौशनी में गुलजान ख़ोजा नसरुद्दीन के सामने खड़ी थी। ख़ुद भी वह पूरे चांद की तरह चमक रही थी। यह नाज़ुक और लचकीली हसीना लम्बी-लम्बी चोटियों में बड़ी ख़ूब-सूरत लग रही थी। ख़ोजा नसरुद्दीन ने बहुत धीमे से कहाः

    "ऐ मेरी रूह की मलिका! मैं तुझ पर जान देता हूं। ज़िन्दगी में मैं ने यह पहली और आख़िरी बार मुहब्बत की है। मैं तेरा ग़ुलाम हूं, तेरे छोटे से छोटे इशारे पर सब कुछ करने को तैयार हूं। मेरी पूरी ज़िन्दगी तेरा ही इन्तज़ार कर रही थी। अब मैं ने तुझे पा लिया है और तुझे कभी भूल सकूंगा। तेरे बिना मैं ज़िंदा नहीं रह सकता।"

    "मुझे पूरा यक़ीन है कि यह बात तुम पहली बार नहीं कह रहे हो!" हसद से गुलजान बोली।

    "मैं?" नाराज़गी से बौखलाकर ख़ोजा नसरुद्दीन बोला। "आह, गुलजान! तेरे मुंह से ऐसी बात निकली ही क्यों कर?"

    इस बात में ऐसी सच्चाई झलक रही थी कि गुलजान ने उस का यक़ीन कर लिया। अपने कहे पर अफ़्सोस करती हुई, उस के पास मिट्टी की तिपाई पर बैठी। उस का बोसा लेता हुआ ख़ोजा नसरुद्दीन अपने होंठ इतनी देर तक उस के होंठो से सटाये रहा कि बेचारी का दम घुटने लगा।

    "सुनो," ज़रा सुस्ताकर वह बोली। "हमारे यहां का रिवाज है कि जिस लड़की का बोसा लेते हैं उसे कोई कोई तोहफ़ा भेंट करते हैं। एक तुम हो कि एक हफ़्ते से ज़ियादा हो गया, रोज़ रात को तुम मेरा बोसा लेते हो लेकिन अभी तक तार का एक टुटा टुकड़ा तक नहीं दिया।"

    "सिर्फ़ इसलिए कि मेरे पास पैसा नहीं था," वह बोला। "लेकिन आज तुम्हारे अब्बा ने मुझे पैसे दिये हैं और कल ही, मेरी गुलजान, मैं तेरे लिए एक बढ़िया तोहफ़ा लाऊंगा। बोल, तू कौन सी चीज़ पसन्द करेगी? मोती या रूमाल?

    या बिल्लौर जड़ी अंगूठी?"

    "कुछ भी सही," फुसफुसा कर वह बोली, "ऐ मेरे प्यारे, मुझे इस की फ़िक्र नहीं कि चीज़ क्या है। सौग़ात तुम्हारी हो इस से ज़ियादा मुझे और कुछ नहीं चाहिए। मैं उसी वक़्त से तुम पर निछावर हो गया गयी जब तुम बाज़ार में हम लोगों के पास आये थे। जब से तुम ने उस बदमाश सूद-ख़ोर जाफ़र को भगाया, तब से तो मेरी मुहब्बत और भी बढ़ गयी।"

    गहरा नीला पानी हहर हहर करता अब भी बह रहा था। साफ़ आसमान में तारे चमक रहे थे। ख़ोजा नसरुद्दीन लड़की से और सटकर बैठ गया। अपना हाथ उसने आगे बढ़ाया और हथेली से उस का उभरा हुआ गर्म गुदगुदा सीना थाम लिया। एक लम्हे के लिए उसकी सांस रुक गयी। उस पर जादू सा छा गया। तभी यकायक उसे चिनगारियां उड़ती दिखायी दीं और एक गाल झनझना उठा। वह पीछे को हटा और कोहनी से अपना बचाव किया। फनफनाती हुई गुलजान उठ खड़ी हुई।

    "मुझे ऐसा लगा कि मैं ने कहीं चांटे की आवाज़ सुनी है।" आहिस्ते से ख़ोजा नसरुद्दीन बोला। "बातचीत का वक़्त क्या लगड़ने-झगड़ने में खाना चाहिए?"

    "बातचीत?" उसे टोक कर दिलजान बोली। "यही क्या कम बुरा है कि हया-शरम छोड़ कर मैं तुम्हारे सामने बिना बुर्क़ा डाले जाती हूं। तुम अपने लम्बे हाथ उधर क्यों बढ़ाते हो जिधर तुम्हें नहीं बढ़ाने चाहिए?"

    "मेहरबानी कर के यह भी बता दो कि किस ने तय किया है कि हाथ कहां बढ़ाने चाहिए, कहां नहीं?" ख़ोजा नसरुद्दीन ने जवाब दिया। "लो, अगर तुम ने सबसे बड़े आ'लिम इब्न तुफ़ैल की किताबें पढ़ी होतीं…"

    "ख़ुदा का शुक्र है कि ऐसी गन्दी किताबें मैं ने नहीं पढ़ी!" गर्म होती हुई वह फिर बीच में बोल पड़ी। "मैं अपनी इज़्ज़त की हिफ़ाज़त करती हूं जैसा हर शरीफ़ लड़की को करना चाहिए।"

    वह उस के पास से उठी और चली गयी। ज़ीने की सीढ़ियां उस के हलके क़दमों से चरमरायीं और फ़ौरन बाद बारजे की झिंझरीदार खिड़की से रौशनी दिखायी देने लगी।

    "मैं ने उसके जज़्बात को ठेस पहुंचायी है," ख़ोजा नसरुद्दीन ने सोचा, "मैं बड़ा बेवक़ूफ़ हूं। कोई परवाह नहीं। कम से कम पता तो लगा कि उस का मिज़ाज कैसा है। इस तरह वह मेरे तमाचा जड़ सकती है तो इस का मतलब है कि वह किसी और के भी तमाचा जड़ सकती है, जिस का मतलब यह है कि वह बड़ी वफ़ादार बीवी साबित होगी। शादी से पहले अगर वह मेरे दस बार दस-दस चांटे मार लेती है, लेकिन शादी के बाद ग़ौरों से भी चांटों में ऐसी ही सख़ी बनी रहे, तो मुझे पूरी तस्कीन होगी।"

    पंजों के बल चलकर वह बारजे तक पहुंचा और हल्के से आवाज़ दीः

    "गुलजान!"

    कोई जवाब नहीं।

    "गुलजान!"

    ख़ुशबू , अंधेरा, ख़ामोशी। ख़ोजा नसरुद्दीन ग़मगीन हो गया। धीमी आवाज़ में, ताकि बूढ़ा नियाज़ जाग जाय, उस ने गाना शुरु कियाः

    तेरी चितवन ने मेरी जां, मेरे दिल की चोरी की है

    भले तेरी जबां मुझ को करे रुस्वा, भेजे ला'नत

    मगर दिल को चुराने की तेरी नज़रों की है आ’दत!

    चुराने की मांगे क़ीमत, यह हद सीनाज़ोरी की है!

    ग़ज़ब की हैरानी है, यह कहीं देखा है दुनिया ने

    शिकारे-दुज़्दी चोरों को चुराने का हरजाना दे?

    नज़्र दो-चार बोसों की मुझे दे, क्या भली सी है!

    उहूं, दो चार बोसों की नज़्र काफ़ी नहीं होती।

    य' आब-ए-तल्ख़ हैं, जितना पियो तस्कीं नहीं होती!

    सितमगर, बंद करके आस्तां, यह क्या सज़ा दी है!

    कहीं इस से तो अच्छा था, हुआ होता हमारा खूं

    बता तो अब कहां तस्कीं, कहां ख़्वाब-ए-गिरां पाऊं?

    निगाह-ए-नाज़ के जिस तीर ने मुझ को किया बिस्मिल

    उसी क़ातिल को फिर से ढूंढता फिरता है मेरा दिल

    कहां वे मुश्क-बू गेसू, कहां बेताब यह जी है!

    इस तरह वह गाता रहा और हालांकि गुलजान ने तो उसे जवाब ही दिया और उसे दिखायी दी, तो भी उसे यक़ीन था कि वह कान लगा कर सुन रही है। उसे भरोसा था कि कोई भी लड़की ऐसे गीत को सुन कर बैठी नहीं रह सकती। उसका अंदाज़ा सही था। झिलमिली थोड़ी सी खुली।

    "आओ!" गुलजान ने फुसफुसाकर कहा। "लेकिन आहिस्ते से आना। अब्बाजान कहीं जाग जायं।"

    वह ज़ीना चढ़कर ऊपर पहुंचा और उस के क़रीब बैठ गया। भेड़ की चर्बीवाले चराग़ में बत्ती बिल्कुल सवेरे तक जलती रही। वे बातें करते रहे, बातें करते रहे, तब भी पूरी बातें कर पाये। मुख़्तसर में सब कुछ ठीक चलता रहा, गोया वैसे ही चलता रहा जैसे कि चलना चाहिए था, या'नी जैसा कि दानिशमन्द आ'लिम अबू मुहम्मद अ’ली इब्न-ए-हज़्म ने अपनी किताब "बत्तख़ का हार" में मुआ'मलात-ए-इश्क़ वाले सबक़ में लिखा हैः "मुहब्बत- अल्लाह उस में बरकत दे- एक खिलवाड़ की शक्ल में पैदा होती है और सब से अहम बात बन जाती है। सकी ख़ूबियाँ इतनी आ’ला है कि उन का बयान नहीं हो सकता और इस की हक़ीक़त मुश्किल से ही समझ में आती है। इस बात की वजह आसानी से समझ में जाती है कि ज़ियादातर हसीन सूरत से ही क्यों मुहब्बत होती है। चूंकि इंसान की रूह ख़ूब-सूरत है वह हर ख़ूब-सूरत चीज़ की तरफ़, ख़ास तौर से मुकम्मल हुस्न की तरफ़ झुकती है। ऐसी शक्ल देख कर रूह उसे जांचती है, और अगर सतह से नीचे अपनी तरह की कोई चीज़ पाती है, तो उस में मेल हो जाती है और सच्ची मुहब्बत पैदा हो जाती है... सच ही, बाहरी शक्ल में रूह के ज़र्रे बड़े तअ’ज्जुब-खेज़ ढंग से गुंथे रहते हैं।"

    ।। 2 ।।

    छत पर बूढ़ा नियाज़ खांसता, खरखर सांस लेता हुआ कुनमुमाया। नींद-भरी आवाज़ में गुलजान को पुकार कर उसने पानी मांगा। ख़ोजा नसरुद्दीन को गुलजान ने दरवाज़े की तरफ़ धकेला। वह ज़ीने से हलके पांव उतरा, मानो उस के पैर सीढ़ियों पर पड़ ही नहीं रहे थे और जंगला कूद कर पार हो गया। थोड़ी ही देर बाद, नहर से मुंह-हाथ धोकर और अपनी ख़िलअ’त के दामन से बदन पोंछ कर, वह फिर लौट आया और लकड़ी का फाटक खटखटाने लगा।

    "सलामोअलैकुम ख़ोजा नसरुद्दीन!" बूढ़े ने छत से ही उस का इस्तिक़बाल किया। "पिछले कई दिनों से तुम बड़े तड़के उठने लगे हो! सोने का वक़्त तुम्हें कब मिलता है? चलो, काम शुरू करने के पहले हम लोग चाय पी लें।"

    दोपहर में ख़ोजा नसरुद्दीन बूढ़े नियाज़ को छोड़ गुलजान के लिए सौग़ात खरीदने बाज़ार के लिए रवाना हुआ। उसने रंगीन बदख़्शाँ साफ़ा और नक़ली दाढ़ी लगाने की होशियारी बरती, जो वह आम तौर से किया करता था। इस तरह भेस बदलने से वह पहचाना नहीं जाता था और हिफ़ाज़त के साथ, जासूसों के डर के बिना, दूकानों और चायख़ानों में चला जाता था।

    उसने मूंगे की एक माला पसन्द की जिस का रंग उसे अपनी मा’शूका के होठों की याद दिलाता था। जौहरी ज़ियादा सख़्त और झगड़ालू साबित नहीं हुआ। सिर्फ़ घंटे भर के भाव-तोल और ज़ोर-ज़ोर की चख़चख़-झिकझिक में ही तीस तंके में हार ख़ोजा नसरुद्दीन का हो गया।

    वापस लौटते हुए ख़ोजा नसरुद्दीन ने बाज़ार की मस्जिद के पास एक भीड़ देखी। लोग ठसाठस, खिचपिच खड़े, गर्दनें उठाये, एक-दूसरे के कन्धों के पार कुछ देख रहे थे। पास आने पर ख़ोजा नसरुद्दीन को एक चिड़चिड़ी और ऊंची आवाज़ सुनायी दीः

    "ऐ मोमिनो! तुम अपनी आंखों से देख लो! इसे लक़वा मार गया है और दस साल से यह बिना हिले-डुले ऐसे ही लेटा है। इस के बदन के हिस्से ठंडे और बेजान हो गये हैं। देखों, यह अपनी आंखें भी नहीं खोल पाता। बहुत दूर से यह हमारे शहर में आया है। मेहरबान दोस्त और रिश्तेदार इसे यहां इसलिए ले आये कि अब जो सिर्फ़ एक इलाज बचा है, उसे भी आज़मा लें। आज से एक हफ़्ते बाद लासानी बहाउद्दीन पाक-वली के उर्स के दिन इसे क़ब्र की सीढ़ियों पर लिटा दिया जायगा। ऐसे ही अंधे, लंगड़े, बिस्तर से उठ सकने वाले मरीज़ अच्छे हुए हैं, हर बार अच्छे हुए हैं। इसलिए हम लोग दुआ करें, सच्चे मुसलमानों, कि पाक शैख़ हम पर करम करें और इस बदक़िस्मत शख़्स को चंगा कर दें।"

    वहां इकट्ठे लोगों ने दुआ’ की ओर इस के बाद फिर वही तर्रार आवाज़ सुनायी दीः

    "ऐ मोमिनो! अपनी आंखों से देख लो! यह शख़्स बिना हिले-डुले ऐसे ही दस साल से पड़ा हुआ है।"

    ख़ोजा नसरुद्दीन धक्का देता भीड़ में आगे बढ़ गया और पंजों के बल खड़े हो कर एक लम्बे दुबले मुल्ला को देखा जिस की आंखें छोटी और शरारत भरी थीं और जिस की दाढ़ी कच्ची थी। वह चिल्ला-चिल्लाकर अपनी उंगली से अपने पैरों के पास पड़ी एक खाट की तरफ़ इशारा कर रहा था जिस पर लक़वामारा शख़्स लेटा हुआ था।

    "ऐ मुसलमानो! देखो, किस क़दर बदक़िस्मत, किस क़दर क़ाबिल-ए-रहम है यह शख़्स! लेकिन एक हफ़्ते में बहाउद्दीन वली इसे चंगा कर देंगे और यह फिर अपनी ज़िंदगी पा जायगा!"

    बीमार आदमी वहीं लेटा हुआ था- आंखें बन्द किये, चेहरे पर उदास, पज़मुर्दा, रहम मांगता भाव लिये हुए! ख़ोजा नसरुद्दीन ने तअ’ज्जुब से सांस खींची। यह चेचक रू चेहरा और चपटी नाक वह हज़ारों के बीच पहचान सकता था। वह शख़्स शायद बहुत दिनों से लक़वे का शिकार था। नतीजा यह कि काहिली और आराम ने उस के चेहरे को बहुत मोटा कर दिया था।

    उस दिन के बाद, ख़ोजा नसरुद्दीन जब भी उस ख़ास मस्जिद के पास से गुज़रता, हमेशा उस दुबले मुल्ला और लक़वे के शिकार शख़्स को देखना भूलता जिस का दर्दनाक चेहरा हर दिन और मोटा चर्बीदार होता जाता था। आख़िर शैख़ साहब के उ’र्स का दिन गया। रवायत के मुताबिक़ रबी-उस-सानी (मई) के महीने में दोपहर को उनका इंतिक़ाल हुआ था और हालांकि आसमान में बादल नहीं थे और दिन साफ़ था, लेकिन उन की मौत के वक़्त सूरज धूंधला गया था, ज़मीन कांप उठी थी और बहुत से घर जिन में गुनहगार रहते थे गिर गये थे और गुनहगार उन्हीं के नीचे दब गये थे। मस्जिदों में यह कहानी सुनाकर मुल्ला लोग मुसलमानों को हिदायत करते थे कि वे शैख़ के मज़ार पर आयें और उनकी मज़ार की इज़्ज़त करना भूलें जिस से उनका शुमार दहरियों में हो और उनकी क़िस्मत भी गुनहगारों जैसी हो जाय।

    अभी अंधेरा ही था कि ज़ियारत करने वाले घरों से निकल पड़े और सूरज निकलते-निकलते मज़ार के आसपास की जगह लोगों से खचाखच भर गयी। सड़कों पर आने वालों का तांता लगा हुआ था। पुराने रिवाज के मुताबिक़ सब लोग नंगे पैर थे। यहां, और लोगों के अ’लावा ऐसे लोग भी थे जो बहुत दूर से आये थे और जो या तो ख़ास तौर पर मज़हबी ख़याल के थे या जिन्हों ने कोई बहुत भारी गुनाह किया था और यहां उस से तौबा करने आये थे। शौहर अपनी बांझ बीवियों को लाये थे, मां बीमार बच्चों को। बूढ़े बैसाखियों पर लंगड़ा रहे थे। कोढ़ी दूर पर इकट्ठे थे और मज़ार के सफ़ेद गुम्बद पर उमीद भरी निगाहें लगाये थे।

    इ’बादत बहुत देर में शुरू हुई। अमीर का इंतिज़ार था। सूरज की झुलसानेवाली गर्मी में ठसाठस भीड़ थी। लोगों को बैठने की हिम्मत नहीं हो रही थी। उनकी आंखों से लालच और भूख भरी लपट-सी निकल रही थी। इस दुनिया में सुख पाने की उमीद से महरूम वे आज किसी करिश्मे के इंतिज़ार में थे। ज़ोर से कहा कोई भी लफ़्ज़ सुनते ही वे चौंक पड़ते थे। उमीद का दबा हुआ जज़्बा अब बरदाश्त से बाहर होता जा रहा था। दो दरवेशों को हाल चुका था। ज़मीन में मुंह गाड़े वे मिट्टी खा रहे थे और उनके मुंह से फेन बह रहा था। भीड़ उफन रही थी। हर तरफ़ औरतें चीख़ रही थीं।

    यकायक हज़ारों गलों से दबी आवाज़ फूट पड़ीः

    "अमीर! अमीर!"

    महल के पहरेदारों ने लाठियां घुमा-घुमाकर भीड़े में रास्ता बनाया और इस चौड़े रास्ते पर अमीर जियारत के लिए बढ़े। नंगे पांव, सिर झुका हुआ, आसपास के शोर-ग़ुल से बेख़बर, पाक खयालों में डूबे हुए। नौकर-चाकरों की फ़ौज चुपचाप पीछे चल रही थी। नौकर कालीन बिछाने और अमीर के चल चुकने पर उसे लपेटकर आगे ले जाने के लिए इधर उधर दौड़ रहे थे।

    ऐसे पुर-असर जोश को देख कर बहुतों की आंखों में आंसू गये। अमीर चलकर मिट्टी के उस ढेर तक पहुंचे जो मज़ार के सामने था। सामने जानमाज़ बिछाया गया। दोनों तरफ़ खड़े वज़ीरों ने सहारा दिया और अमीर घुटनों के बल बैठ गये। सफ़ेद लिबास में ढंके मुल्ला आधा दायरा बना कर पीछे खड़े हुए और गर्म धुंध भरे आसमान की तरफ़ हाथ उठाकर ज़ोर-ज़ोर से आयतें पढ़ने लगे।

    इबादत का ख़त्म होनेवाला सिलसिला जारी रहा। बीच-बीच में नसीहत की तक़रीरें होती जातीं। ख़ोजा नसरुद्दीन आस-पास खड़े लोगों की नज़रें बचाता एक वीरान कोने में उस कोठरी के पास जा पहुंचा जहां अंधे, लंगड़े-लूले और बीमार रखे गये थे। इन्हें आज के दिन नजात मिलने की उम्मीद दिलायी गयी थी और वे अपनी बारी आने का इंतिज़ार कर रहे थे। कोठरी के दरवाज़े खुले हुए थे। लोग-बाग़ भीतर झांक-झांकर पूछ-ताछ कर रहे थे। जो मुल्ला यहां तअ’ईनात थे उनके हाथों में ख़ैरात लेने के लिए तांबे के बड़े बड़े थाल थे। बड़ा मुल्ला कह रहा थाः

    "...और तभी से शेख बहाउद्दीन पाक-वली की दुआ’ हमेशा-हमेशा के लिए बुख़ारा शरीफ़ और इसके सूरज के मानिन्द अमीरों पर है। और हर साल इसी दिन बहाउद्दीन, ख़ुदा के हम नाचीज़ बन्दों को करिश्मा कर दिखाने की ताकत बख्शते हैं। ये सभी अंधे, लंगडे-लूले, जिनों आसेव के मारे और बीमार लोग रोग-दुःख से नजात पाने का इंतिज़ार कर रहे हैं। हमें उम्मीद है कि बहाउद्दीन वली की मदद से हम उन्हें तकलीफों से नजात दिला भी देंगे।"

    मानो इस तक़रीर के जवाब में, छप्पर के भीतर से रोने, चिल्लाने और दांत किटकिटाने की आवाजें आने लगीं। अपनी आवाज़ और ऊंची करता हुआ मुल्ला बोलाः

    "ऐ ख़ुदा पर ईमान रखनेवाले मोमिनों! मस्जिदों की अराइश के लिए फ़य्याज़ी से ख़ैरात दो! अल्लाह तुम्हारी ख़ैरात को क़ुबूल करेगा!"

    ख़ोजा नसरुद्दीन ने छप्पर के भीतर झांका। दरवाज़े के पास दो मोटे, थलथल, चेचक रू चेहरेवाला नौकर खाट पर पड़ा था। उस से कुछ ही दूर अंधेरे में पट्टियों में लिपटे, खटोलों पर पड़े, बैसाखियों की मदद से चलनेवाले लोगों का भम्भड़ था। यकायक मज़ार की तरफ़ से उस बड़े मुल्ला की आवाज़ आयी, जिसने अभी-अभी नसीहत की थीः

    "अन्धे को! अन्धे आदमी को मेरे पास लाओ।"

    रास्ते से ख़ोजा नसरुद्दीन को अलग धकेलते हुए कई मुल्ला अंधेरे और हब्सवाले छप्पर में घुस गये और भिखमंगों जैसे फटे चीथड़ोंवाले अन्धे आदमी को निकाल लाये। हाथों को आगे बढ़ाये वह टटोलता हुआ पत्थरों से लड़खड़ाता गिरता-पड़ता आगे बढ़ रहा था। अन्धा बड़े मुल्ला के पास पहुंचा। उसके कदमों पर मुंह के बल गिर पड़ा और मज़ार की सीढ़ियों पर अपने होंठ चिपका दिये। बड़े मुल्ला ने उस के सिर पर हाथ फेरा और वह फ़ौरन चंगा हो गया।

    "मेरी नज़र लौट आयी! मैं देख सकता हूं! वाह वाह! मैं देख सकता हूं!" कांपती हुई आवाज़ में वह चिल्ला रहा था। "ऐ बहाउद्दीन वली! मुझे दिखायी देने लगा! मैं देख सकता हूं! वाह वाह! कैसा शानदार और तअ’ज्जुबखेज़ करिश्मा हुआ है!

    वाह वाह!"

    इबादतवालों की भीड़ उसके पास घिर आयी और तरह-तरह की आवाज़ों का शोर होने लगा। बहुत से लोग उस के पास आये और पूछने लगेः

    "बताओ तो, कौन सा हाथ उठाया है मैं ने- दाहिना या बांया।"

    उस ने ठीक जवाब दिये और सब को यक़ीन हो गया कि उस की नज़र सचमुच लौट आयी है। तभी मुल्लाओं की एक फ़ौज तांबे के थाल लिये हुए भीड़ में घुसी और चिल्ला-चिल्लाकर कहने लगीः

    "ऐ सच्चे मुसलमानो! अपनी आंखों से तुमने अभी एक मोजेजा देखा है। मोमिनो! मसजिदों की अराइश के लिए कुछ ख़ैरात दो।"

    थाल में मुट्ठी भर अशर्फ़ियाँ डालने में अमीर ने पहलक़दमी की। उनके बाद वज़ीरों और अफ़सरों ने ख़ैरात दी और थाल में एक-एक अशरफ़ी डाली। और तब भीड़ भी फ़य्याज़ी से चांदी और तांबे के सिक्के थालों में डालने लगी। थाल जल्दी-जल्दी भर रहे थे। मुल्लाओं को तीन बार उन्हें बदलना पड़ा। जैसे ही ख़ैरात में कुछ सुस्ती आयी, एक लंगड़े आदमी को छप्पर से निकाल कर लाया गया। और जैसे ही उसने क़ब्र की सीढ़ियों को छुआ वह चंगा हो गया और बैसाखियां फेंक टांगे उठा-उठाकर नाचने लगा। तभी फिर ख़ाली थाल लिये मुल्ला लोग की भीड़ में पहुंचे और चिल्ला-चिल्लाकर कहने लगेः

    "ऐ नेक इंसानो! सच्चे ईमानवालों! ख़ैरात करो! ख़ैरात करो!"

    सफ़ेद दाढ़ीवाला एक मुल्ला ख़ोजा नसरुद्दीन के पास आया। ख़ोजा नसरुद्दीन ख़यालों में डूबा हुआ था और टकटकी लगाये कोठरी की दीवालें देख रहा था।

    "ऐ मोमिन! तुम ने अभी-अभी एक करिश्मा देखा है। ख़ैरात करो और तुम्हारी ख़ैरात का अल्लाह फल देगा।"

    ख़ोजा नसरुद्दीन ने काफ़ी ज़ोर से, ताकि पास खड़े लोग सुन सके जवाब दियाः

    "तुम इसे करिश्मा कहते हो और मुझ से ख़ैरात मांगते हो? पहली तो यह कि मेरे पास ख़ैरात के लिए पैसा नहीं है। दूसरी बात यह कि मुल्ला, क्या तुम्हें नहीं मा’लूम है कि मैं ख़ुद एक पहूंचा हुआ फ़क़ीर हूं और इस से भी बड़ा करिश्मा दिखा सकता हूं?"

    "तू फ़क़ीर है?" मुल्ला ज़ोर से चिल्लाया। "ऐ मुसलमानों! इसकी बात पर यक़ीन लाओ! इस की ज़बान से शैतान बोल रहा है! ख़ोजा नसरुद्दीन भीड़ की तरफ़ मुड़ा।

    "मुल्ला को यक़ीन नहीं कि मैं करिश्में दिखा सकता हूं। मैं ने जो कहा है, मैं उस का सबूत दूंगा। इस छप्पर में अन्धें, लंगड़े, बीमार और बिस्तर पर पड़े लोग इकट्ठे हैं। मैं इन्हें बिना हाथ लगाये अच्छा कर देने का वा’दा करता हूं। मैं सिर्फ़ कुछ अल्फ़ाज़ कहूंगा और ये लगो अपने-अपने रोगों से नजात पा जायेंगे, उठ कर इधर-उधर बिखर जायेंगे और इतनी तेज़ी से भागेंगे कि तेज़ अ’रबी घोड़े भी इनको पकड़ पायेंगे।"

    कोठरी की मिट्टी की दीवारें पतली थीं और जगह जगह चटख़ रही थीं। ख़ोजा नसरुद्दीन ने एक ऐसी जगह तलाश की जहां बहुत सी दरारें थीं और वहीं अपने कन्धे से अन्दर को धक्का दिया। कुछ मिट्टी गिरी। मिट्टी के गिरने की हल्की सी मनहूस सरसराहट हुई। ख़ोजा नसरुद्दीन ने ज़ोर का धक्का दिया। इस बार मिट्टी का एक बड़ा-सा लोंदा ज़ोर की आवाज़ करता हुआ भीतर को गिरा। दीवार के इस बड़े छेद से अंधेरे की तरफ़ से गर्द उड़ती दिखाई दी। ख़ोजा नसरुद्दीन पागलों की तरह चिल्लायाः

    "ज़लज़ला! ज़लज़ला! भागो! दौड़ो! बचाओ! बचाओ!"

    दीवार में उस ने एक और धक्का मारा। भरभरती हुई मिट्टी गिरी। एक लम्हे के लिए तो कोठरी के भीतर सन्नाटा रहा। लेकिन, फ़ौरन बाद हंगामा मच गया। चेचक रू लक़वे का मरीज़ सब से पहले दरवाज़े की तरफ़ लपका। लेकिन उसकी खाट दरवाज़े से अड़ गयी और पीछेवालों का रास्ता रुक गया। अन्धें, लंगड़े, लूले, बीमार, अपाहिज, एक-दूसरे को धक्के देते चींख़-चिल्ला रहे थे। और ख़ोजा नसरुद्दीन ने जब दीवार में एक और धक्का मारकर तीसा ढोंका गिराया, तो एक ज़ोर के धक्के के साथ सब मरीज़ चेचक रू नौकर, दरवाज़े चूल-चौखट को बाहर ठेलकर, अपनी-अपनी बीमारियां भूल, इधर-उधर निकल भागे। भीड़ में हंसी पड़ गयी। लोग ता’ने कस रहे थे। सीटियां बजा रहे थे। शोर मचा कर बू-बू कर रहे थे। इस शोर-ग़ुल को भी दबाने वाली ऊंची आवाज़ में ख़ोजा नसरुद्दीन चिल्लायाः "देखा तुम ने मुसलमानों? मैं ने कहा था कि मेरे चन्द अल्फ़ाज़ ही इन्हें चंगा कर देंगे!"

    मुल्ला की नसीहत में लोगों की दिलचस्पी ख़त्म हो चुकी थी। हर तरफ़ से दौड़-दौड़ कर लोग इधर ही रहे थे। जब उन्हें इस वाक़िए का पता चलता तो वे ठहाका मा रकर हंस पड़ते और दूसरों को इस वाक़िए को सुनाते। जल्द ही दुआ 'करने वालों को पता लग चुका था कि कोठरी में क्या हुआ है और बड़े मुल्ला ने जब हाथ उठा कर लोगों को ख़ामोश होने की हिदायत दी तो भीड़ ने सीटियों, गालियों और बू-बू के शोर-शराबा से जवाब दिया।

    और फिर भीड़ में, "ख़ोजा नसरुद्दीन! ख़ोजा नसरुद्दीन! लौट आया ख़ोजा नसरुद्दीन! हमारा प्यारा ख़ोजा नसरुद्दीन!" की आवाज़ गूंज उठी। हर तरफ़ यही आवाज़ उठने लगी। एक शोर उठ खड़ा हुआ। चिढ़ाने-चिल्लाने वाली आवाज़ो से घबराकर मुल्ला लोग ख़ैरात के थाल छोड़-छोड़कर भीड़ से निकल भागे। ख़ोजा नसरुद्दीन अब तब बहुत दूर पहुंच चुका था। उस ने अपना रंगीन साफ़ा और नक़ली दाढ़ी ख़िलअ’त के नीचे छिपा ली थीं क्योंकि उसे अब जासूसों से मुठभेड़ का डर नहीं था। वे अभी मज़ार के आस-पास ही ख़ाक छान रहे थे। लेकिन ग़फ़लत में ख़ोजा नसरुद्दीन यह नहीं देख पाया कि सूद-ख़ोर जाफ़र उसका पीछा कर रहा है और मकानों के नुक्कड़ों और सड़क के दरख़्तों की आड़ में लुकता-छिपता उसके पीछे-पीछे रहा है। एक सुनसान गली में पहुंच कर ख़ोजा नसरुद्दीन एक दीवार के क़रीब आया, हाथों के सहारे दीवार पकड़ कर उछला और धीमे से खांसा। फ़ौरन ही हलके क़दमों की आहट और एक औ’रत की आवाज़ सुनाई दीः

    "आ गये मेरे दिलबर!"पेड़ के पीछे छिपे सूद-ख़ोर को इस दोशीज़ा की आवाज़ पहचानते देर लगी। फिर उसे फुसफुसाहट, दबी हंसी और बोसों की आवाज़ सुनायी दी।"अच्छा तो तू उसे मुझ से अपने लिए छीन ले गया!" हसद से तड़पते सूद-ख़ोर ने सोचा।

    गुलजान से रुख़्सत होकर ख़ोजा नसरुद्दीन ने ऐसे तेज़ क़दम बढ़ाये कि सूद-ख़ोर पीछा कर सका। जल्द ही तंग गलियों की भूल-भुलैयों में ख़ोजा नसरुद्दीन उसकी आंखों से ओझल हो गया।

    "हाय! अब मैं उसे गिरफ़्तार कराने का इनआ’म पाऊंगा!" अफ़्सोस करता हुआ सूद-ख़ोर जाफ़र सोचने लगा। "लेकिन कोई परवाह नहीं। होशियार ख़ोजा नसरुद्दीन! होशियार! मैं बदला लेकर छोडूंगा!"

    ।। 3 ।।

    अमीर के ख़ज़ाने को बहुत बड़ा घाटा हुआ था। बहाउद्दीन वली के मज़ार पर हर साल जितनी ख़ैरात होती थी, इस बार उसका दसवां हिस्सा भी हो पाया था। इस से भी बुरी बात यह थी कि लोगों के दिमाग़ में आज़ाद-ख़याली के बीज फिर बो दिये गये थे। जासूसों ने ख़बर दी थी कि मज़ार पर जो वाक़िआ’ हुआ था उसकी ख़बर सल्तनत के कोने-कोने में पहुंच गयी है और इसके नतीजे सामने रहे हैं। तीन गांवों की रईयत ने मस्जिदों की ता’मीर पूरी करने में मदद देने से इंकार कर दिया था। चौथे गांव से बेइज़्ज़ती से मुल्ला को मार भगाया था।

    अमीर ने वज़ीर-ए-आज़म बख़्तियार को दरबार लगाने का हुक्म दिया। महल के उस बाग़ में, जो दुनिया के सबसे ख़ूब-सूरत बाग़ों में से था, दरबार लगा। यहां, सायेदार दरख़्तों में ख़ूब-सूरत और नायाब फल-फूल लगे थे, कई तरह के आडू, इंजीर, खट्टी नारंगियां, पुलम और बहुत सी दूसरी क़िस्मों के फल, जिन को यहां गिना सकना नामुमकिन है।

    गुलाब, बनफ़शा, सोसन गुच्छों में लगे थे और हवा में बहिश्त जैसी ख़ुश्बू बिखेर रहे थे। नर्गिस रीझी हुई सी गुलबहार से ताक-झांक कर रही थीं। फ़व्वारे नाच रहे थे। संग़मरमर के हौज़ोँ में सुनहरी मछलियों के झुंड तैर रहे थे। जगह-जगह चांदी के पिंजरे लटक रहे थे। इन में दूर-दूर से लायी गयी चिड़ियां गा रही थीं, चहक रही थीं और सीटी बजा रही थीं।

    लेकिन वज़ीर, रईस और आ’लिम जादू जैसी इस ख़ूब-सूरती की तरफ़ से आंख-कान बन्द किये, बहरे और अन्धे बने, बे-ख़बर से चले जा रहे थे, क्योंकि उनके ख़याल उनके ज़ाती फ़ायदों पर, दुश्मनों के हमलों से बचने और उन पर अपने दांव चलाने में, लगे हुए थे और इसलिए उनके सूखे और सख़्त दिलों में और किसी चीज़ की गुंजाइश नहीं थी। अगर सारी दुनिया के फूल यकायक मुरझा जाते, अगर पूरे ख़ल्क़ की चिड़ियां यकायक गाना बन्द कर देतीं, तो भी वे इस सब से बेख़बर रहते, क्योंकि उनके दिमाग़ लालच और हवस की साज़िशों से भरपूर थे।

    वे आये तो उनकी आंखे बुझी हुई थीं, होंठ सफ़ेद थे। रेतीले रास्तें पर चमड़े के उनके सलीपर घिसटते चल रहे थे। वे ख़ुश्बूदार तुलसी की घनी पत्तियों के झुरमुट के पीछे ठंडे बंगले में घुस गये। यहां फ़िरोज़ की मूठवाली अपनी छड़ियां उन्होंने दीवार से टिकायीं और रेशमी गद्दों पर बैठ गये। भारी-भरकम सफ़ेद साफ़ों के बोझ से दबे अपने सिर झुकाये वे अमीर के आने का इंतिज़ार करने लगे।

    ग़मगीन ख़यालों में डूबे, माथे पर सिलवटें डाले, भारी क़दमों से अमीर जब दाख़िल हुए तो सभी उठ कर खड़े हो गये, ज़मीन तक झुक कर सलामी दी और तब तक खड़े रहे जब तक अमीर ने एक हलका सा इशारा नहीं किया। और तब अदबी क़ायदे के मुताबिक़ वे अपने घुटनों के बल दौज़ानू बैठ गये और बदन का बोझ एड़ियों पर डाल कर उंगलियों से क़ालीन छूने लगे। हर कोई इसी ख़याल में डूबा था कि आज अमीर का क़हर किस पर बरपा होगा और इस से मैं क्या फ़ायदा उठा सकता हूं।

    दरबारी शायर ब-दस्तूर अमीर के पीछे आधे चांद की गोलाई में खड़े हो गये और धीरे-धीरे खांस कर गले साफ़ करने लगे। इन में जो सब से आ’ला शायर था और जिन्हें शायर-ए-आज़म का ख़िताब मिला था मन ही मन उन शेरों को दोहरा रहा था जो उस ने सवेरे-सवेरे लिखे थे और जिन्हें अमीर के सामने वह इस ढंग से सुनाना चाहता था मानो उन्हें इल्हाम में कह डाला हो।चंवरकश और हुक़्क़ाबर्दार अपनी-अपनी जगह तअ’ईनात हो गये।

    "बुख़ारा पर किस की हुकूमत है?" धीमी आवाज़ में अमीर ने बोलना शुरू किया। सुनने वालों को कंपकंपी गयी।

    "मैं तुम लोगों से पूछता हूँ, बुख़ारा में कि सकी हुकुमत है? हमारी या उस कम-बख़्त काफ़िर ख़ोजा नसरुद्दीन की?"

    इतना कहते-कहते ग़ुस्से से उनका गला रुंध गया।

    ग़ुस्से पर काबू पाते हुए वह ग़ुर्रा कर बोलेः "हम तुम्हारा जवाब सुनना चाहते हैं। बोलो।"

    उस ने सिर पर घोड़े की दुम का चंवल डुलाया जा रहा था। दरबारी चुप थे। डर से वे अधमरे हो रहे थे। वज़ीर चोरी-चोरी एक-दूसरे को कोहनी मार रहे थे।

    "पूरी सल्तनत में उस ने क़हर मचा रखा है।" अमीर ने फिर कहना शुरु किया। "दारुल सल्तनत के अमन में उसने ख़लल डाला है। हमारा आराम और हमारी नींद उस ने हराम कर दी है और हमारे ख़ज़ाने की जायज़ आमदनी उड़ा ली है। खुले आ’म वह अ’वाम को बग़ावत और ग़दर के लिए ललकार रहा है। इस बदमाश से कैसे निपटा जाय।

    बोलो, मैं जवाब मांगता हूँ!"

    वज़ीर, रईस, अफ़सर, आ’लिम एक साथ एक सुर में बोल उठेः "ऐ ख़िल्क़त के मरकज! अमन के पासबां! बेशक उस को सख़्त से सख़्त सज़ा मिलनी चाहिए।"

    "तो फिर अभी तक वह ज़िंदा क्यों है?" अमीर ने पूछा। "या कि यह हमारा- तुम्हारे आक़ा, जिनका नाम भी तुम्हें इज़्ज़त और ख़ौफ़ के साथ लेना चाहिए, और ज़मीन पर लेटे बिना लेना चाहिए और मैं यहां यह कह दूं कि काहिली, गुस्ताख़ी और लापरवाही की वजह से तुम लोग यह नहीं करते- मैं फिर कहता हूं, क्या यह हमारा काम है कि ख़ुद बाज़ार में जा कर उसे पकड़ें और तुम लोग अपने-अपने हरम में अपनी हवस और भूख पूरी करने में मशग़ूल रहो, और सिर्फ़ तनख़्वाह मिलने के दिन ही अपने फ़र्ज़ याद किया करो? बख़्तियार! क्या जवाब है तुम्हारा?"

    बख़्तियार का नाम सुनते ही दूसरों ने आराम की सांस ली और अर्सलां बेग के होठों पर डाह-भरी मुस्कान खेल गयी। बख़्तियार से उसका बहुत पुराना झगड़ा चल रहा था। बख़्तियार अपने पेट पर हाथ बांध कर अमीर के सामने ज़मीन पर झुक गया। उसने कहना शुरू कियाः

    "मुसीबतों और परेशानियों से अल्लाह हमारे अज़ीज़ अमीर की हिफ़ाज़त करे! इस नाचीज़ ग़ुलाम की वफ़ादारी और ख़िदमतें अमीर को ख़ुद मा’लूम हैं- इस ग़ुलाम की वफ़ादारी, जो अमीर की अज़्मत के सामने ज़र्रे के मानिन्द है। मेरे वज़ीर-ए-आज़म के रुतबे पर होने से पहले सल्तनत का खज़ाना क़रीब-क़रीब खाली था। लेकिन मैं ने कई टैक्स जारी किये, मैं ने नौकरी पाने पर टैक्स लगाया, मैं ने हर उस चीज़ पर टैक्स लगाया जिस पर लगाया जा सकता था। और अब खज़ाने में रक़म जमा’ किये ब-ग़ैर कोई छींकने तक की जुरअत नहीं कर सकता।

    "इसके अ’लावा मैं ने सरकार के छोटे नौकरों और सिपाहियों की तनख्वाहें आधी कर दीं, बुख़ारा के लोगों से उन के खाने-कपड़े का ख़र्च दिलवाना शुरू किया। और इस तरह, मेरे मालिक, शाही खज़ाने की काफ़ी बड़ी रक़म बचने लगी। लेकिन मैं ने अब तक अपनी सारी ख़िदमतें बयान नहीं की हैं। मेरी ही कोशिशों से बहाउद्दीन वली के मज़ार पर फिर से करिश्मे होने लगे हैं और मज़ार पर हज़ारों लोग ज़ियारत के लिए आने लगे हैं। इस तरह हमारे शाहंशाह के खज़ाने में, जिनके मुक़ाबले दुनिया के और शाह धूल के मानिन्द है, हर साल इतना चन्दा आने लगा है कि खज़ाना लबालब भर जाता है और शाही आमदनी कई गुनी बढ़ गयी है…"

    अमीर ने टोकाः

    "कहां है वह आमदनी ? ख़ोजा नसरुद्दीन की वजह से वह हम से छिन गयी। हम तुम से तुम्हारी ख़िदमतों के बारे में नहीं पूछ रहे। उन्हें तो हम एक से ज़ियादा बार सुन चुके हैं। बेहतर यह हो कि तुम बताओ कि ख़ोजा नसरुद्दीन पकड़ा कैसे जाय।"

    बख़्तियार ने जवाब दियाः "मालिक! वज़ीर-ए-आज़म के फ़र्ज़ में मुजरिमों को पकड़ना शामिल नहीं है। हमारी सल्तनत में यह काम अर्सलां बेग साहब के सिपुर्द है जो फ़ौज और महल के पहरेदारों के आ’ला हाकिम है।"

    बोलने के बाद बख़्तियार ने अमीर के सामने कोर्निश की और अर्सलां बेग पर जीत और बैर भरी निगाह डाली।

    अमीर ने अर्सलां बेग को हुक्म दियाः "बोलो!"

    अर्सलां बेग, बख़्तियार को ग़ुस्से से देखता उठ खड़ा हुआ। उसने लम्बी सांस ली और उसकी काली दाढ़ी तोंद पर उठी और गिरी।

    "अल्लाह हमारे सूरज के मानिन्द जहांपनाह को हर आफ़त से बचाये! बीमारी और ग़म से उनकी हिफ़ाज़त करे! मेरी ख़िदमतें अमीर को बख़ूबी मा’लूम है। जब ख़ीवा के ख़ान ने बुख़ारा के ख़िलाफ़ जंग छेड़ी, ख़िल्क़त के मरकज़, ज़िलुल्लाह अमीर ने मुझे बुख़ारा की फ़ौज की कमान देने की मेहरबानी फ़रमायी। मैं दुश्मन को, बिना ख़ून-ख़राबी, खदेड़ने में कामयाब हुआ और पूरा मा’मला हमारे हक़ और फ़ायदे में रहा।

    "मैं ने किया यह कि ख़ीवा की सरहद से कई दिन के रास्ते तक, अपनी सल्तनत के सभी गांवों और क़स्बों को, फ़सलों, बाग़ों, सड़कों और पुलों को बर्बाद करने का हुक्म जारी किया। जब ख़ीवा के लोग हमारे इलाक़े में आये और उन्होंने बेजान रेगिस्तान ही देखा, जहां बाग़-बाग़ीचे नहीं थे, तो वे कहने लगेः हम बुख़ारा नहीं जायेंगे क्योंकि वहां तो लूटने को कुछ मिलेगा और खाने को ही। वे लौट पड़े। मेरी चाल में फंस कर बेइज़्ज़त हो वापस लौट गये। हमारे शाहंशाह अमीर ने तस्लीम फ़रमाया कि अपनी फ़ौज से ही मुल्क बर्बाद करवाना बहुत कारगर और दूरंदेशी का काम था। उन्हों ने हुक्म दिया कि जो कुछ उजाड़ दिया गया था वह फिर हरगिज़ बसाया जाय, शहर, गांव, खेल, सड़कें सभी बर्बाद हालत में छोड़ दी जायें ताकि आइन्दा मुख़ालिफ़ क़बीले हमारी सरज़मीन पर क़दम रखने की हिम्मत करें। इस के अ’लावा मैं ने बुख़ारा में हज़ारों जासूसों को ट्रेनिंग दी...

    "ख़ामोश ज़बांदराज़!" अमीर चिल्लाये। "तुम्हारे इन जासूसों ने ख़ोजा नसरुद्दीन को पकड़ा क्यों नहीं?"

    परेशानी और घबराहट में अर्सलां बेग बहुत देर तक ख़ामोश रहा। आख़िर उसे क़ुबूल करना पड़ाः "मालिक! मैं ने हर तरीक़ा आज़मा लिया है लेकिन इस बदमाश काफ़िर के मुक़ाबले मेरा दिमाग़ काम नहीं करता। मेरे आक़ा! मैं समझता हूं कि आ’लिमों की राय लेनी चाहिए।"

    ग़ुस्से से अमीर भड़क उठेः "बुज़ुर्गों की क़सम, तुम लोगों को तो शहरपनाह पर फांसी दे देनी चाहिए!"

    ग़ुस्से और खीज में उन्होंने हुक़्क़ा-बरदार के ज़ोर का झांपड़ मार दिया, ग़लत मौक़े पर उसने शाही हाथ के नज़दीक होने की कम-बख़्ती की थी। "बोलो!" उन्होंने सबसे बुज़ुर्ग आ’लिम को हुक्म दिया, जो अपनी उस लम्बी दाढ़ी की वजह से मशहूर था, जिसे वह दो बार अपनी कमर में लपेट सकता था। आ’लिम उठा, दुआ’ की और धीरे-धीरे बायें हाथ की उंगलियों में लेकर दाहिने हाथ से मशहूर दाढ़ी खींचने लगा। वह बोलाः "रिआ’या की बहबूदी और खुशी के लिए परवरदिगार हमारे बादशाह रौशन के ज़माने को दराज़ करे! चूंकि जिस बदकार बाग़ी ख़ोजा नसरुद्दीन का अभी ज़िक्र हुआ है, वह इन्सान ही है, इसलिए यह नतीजा निकाला जा सकता है कि उस का जिस्म भी इन्सानों की तरह का ही बना हुआ है, यानी उस के जिस्म में भी दो सौ चालीस हड्डियां और तीन सौ साठ मांसपेशियां हैं, जो फ़ेफ़ड़े, जिगर, दिल, पित्ते, तिल्ली वग़ैरह पर क़ाबू रखती है। जैसा कि आ’लिम हकीमों ने बताया है, बुनियादी पेशी दिल की होती है, जिस से और सारी पेशियां निकलती है और यह लाजवाब और हक़ की बात है और दहरिये अबू इसहाक़ की काफ़िर ता’लीम के ख़िलाफ़ है जो यह कहने की गुस्ताख़ी करता है कि इन्सान की ज़िन्दगी की बुनियाद फ़ेफ़ड़े की पेशी है।

    "हकीम आला अबूअ’ली सीना, यूयानी हकीम हिगोपरात और क़रतबे के अबुर्रास (इब्न-ए-रुश्द) के क़ौल के मुताबिक़, जिन की खोजों का हम आज भी फ़ायदा उठाते है और अलकिन्दी, अल फ़ाराबी और फख़्रराज़ी की हिदायतों के मुताबिक़ मैं कहता हूं और ताईद करता हूं कि अल्लाह ने आदम के चार अ’नासिर- पानी, मिट्टी, आग और हवा- को मिलाकर बनाया और तरकीब यह रखी कि पीले पित्ते में आग की तासीर हो जो हम देखते भी हैं क्योंकि यह गर्म और खुश्क होता है, काली तिल्ली में मिट्टी की तासीर हो क्योंकि वह ठंडी और खुश्क होती है, थूक की तासीर पानी की होती है क्योंकि वह नम और ठंडा होता है, और ख़ून की तासीर हवा की होती है क्योंकि वह गर्म और नम होता है। अगर किसी इन्सान के जिस्म में से इन में से एक भी रस निकाल दिया जाय तो वह आख़िरकार मर जायगा। इस से, मेरे आक़ा, मैं ने यह नतीजा निकाला है कि अमन में ख़लल डालने वाले इस नापाक ख़ोजा नसरुद्दीन को उस के ख़ून से महरूम कर दिया जाय, और बेहतर हो कि यह काम उस का सिर उसके जिस्म से जुदा कर के किया जाय, क्योंकि जिस्म से बहनेवाले ख़ून के साथ इन्सान की ज़िन्दगी भी बह जाती है और फिर कभी वापस लौट कर नहीं आती। शाहंशाह-ए-अज़ीम! जहांपनाह! मेरी यही राय है।"

    अमीर ने उस की बात ग़ौर से सुनी और बिना कुछ कहे, अपनी भवों से दूसरे आ’लिम को इशारा किया, जिस की दाढ़ी तो पहले आ’लिम के मुक़ाबले कुछ नहीं थी, लेकिन जिस का साफ़ा तड़क-भड़क और वज़न में बहुत बड़ा था। इतने दिनों तक वज़नी साफ़ा बांधते-बांधते उसकी गर्दन एक तरफ़ को झुक गयी थी, जिस से लगता था कि वह किसी पतली दराज़ से ऊपर की तरफ़ घूर रहा है। अमीर को कोर्निश बजा लाने के बाद वह बोलाः "ऐ सूरज के मानिन्द रौशन शाहंशाह-ए-अज़ीम! ख़ोजा नसरुद्दीन को ख़त्म करने के इस तरीक़े से मैं इत्तिफ़ाक़ नहीं रखता, क्योंकि यह ज़ाहिर है कि इन्सान को ज़िन्दगी के लिए सिर्फ़ ख़ून की ही नहीं बल्कि हवा की भी ज़रूरत है और अगर किसी का गला रस्से से दबा दिया जाय और इस तरह हवा को उस के फ़ेफ़ड़ों तक पहुंचने से रोक दिया जाय तो वह शख़्स मर जायगा और फिर उसे ज़िंदा नहीं किया जा सकता…"

    "अच्छा?" अमीर ने ख़तरे-भरी धीमी आवाज़ में कहा। "ऐ दानाओं में दाना हज़रत! आप बजा फ़रमाते हैं और आपकी राय हमारे लिए बड़ी बेशक़ीमती है। वाक़ई, अगर आप ने हमें यह बेशक़ीमत राय दी होती तो हम ख़ोजा नसरुद्दीन से पीछा कैसे छूड़ा पाते?"

    ग़ुस्से और ख़फ़गी पर क़ाबू पाने में मजबूर अमीर ख़ामोश हो गये। उनके गाल फड़कने लगे, नथुने फूल उठे, आंखों से चिनगारियां बरसने लगीं। लेकिन दरबारीं मुसाहिबों, शायरों, चापलूसों और फ़लसफ़ियों को, जो अमीर के पीछे आधे चांद की गोलाई में खड़े थे, अपने आक़ा का चेहरा दिखायी दिया और इसलिए उस ग़ज़बनाक तंज़ (व्यंग्य) को भांप सके जो अमीर ने आ’लिमों के लिए इस्तेमाल किया था। उनके जुमलों को सच मान कर उन्होंने सोचा कि आ’लिमों ने वाक़ई अमीर की रज़ा फ़य्याज़ी हासिल कर ली है और बख़ूबी काम अंजाम दिया हैं, इसलिए इन आ’लिमों की मेहरबानी फ़ौरन हासिल करनी चाहिए ता कि उससे फ़ायदा उठाया जा सके।

    उन्होंने गाना शुरू कियाः "ए दानाओं में दाना! हमारे शानदार शाहंशाह के ताज की सजावट के मोती! दानाई में ख़ुद दानाई को मात करने वाले दानिशमन्द! दानाओं के इल्म से रौशन दाना!"

    इसी तरह के क़सीदे कहते गये और उमंग शेरों की सफ़ाई में एक-दूसरे को मात देते गये। उन्हें मा’लूम तक हुआ कि अमीर घूमकर पीछे देख रहे थे और ग़ुस्से से बल खाते हुए उन्हें घूर रहे थे। एक भयानक ख़ामोशी छा गयी थी।

    "ऐ इल्म के तारो! अक़्ल के ख़ज़ानो!" इन्तसारी की उमंग में आंखें बन्द किये वे गाते रहे।

    यकायक शायर-ए-आज़म को अमीर की निगाह दिखायी पड़ी और वह ऐसे चौंक पड़ा मानो चापलूसी भरी अपनी ज़बान ही निगल गया हो। अपनी उमंग में ज़ियादती की ग़लती महसूस करते हुए बाक़ी शायर भी उस के बाद चुप हो गये और डर के मारे कांपने लगे।

    "जाहिलो! बदमाशो!!" ग़ुस्से से अमीर चिल्लाये। "क्या तुम समझते हो कि हमें यह भी नहीं मा’लूम कि किसी शख़्स का सिर काट लेने या रस्सी बांध कर उसका गला घोंट देने से वह ज़िंदा नहीं बच सकता? लेकिन ऐसा करने के लिए उस आदमी को पकड़ पाना तो ज़रुरी है! और तुम बदमाशों, बेवक़ूफ़ों, जाहिलों और काहिलों ने एक लफ़्ज़ भी इस बाबत नहीं कहा कि उसे पकड़ा कैसे जाय। यहां मौजूद सभी वज़ीरों, अफ़सरों, शायरों को तब तक तनख़्वाह नहीं मिलेगी, जब तक ख़ोजा नसरुद्दीन का पता नहीं लगता। यह ऐ’लान करवा दिया जाए कि उसे पकड़नेवाले को तीन हज़ार तंके इनआ’म में दिये जायेंगे। तुम लोगों को भी हम आगाह करते हैं कि तुम्हारी बे-वक़ूफ़ी, काहिली और लापरवाही देख कर हमने बग़दाद से एक नया आ'लिम बुलाकर नौकर रखा है। इस आ'लिम का नाम मौलाना हुसैन है और अभी तक वह अमीरुल मोमनीन, बग़दाद के ख़लीफ़ा की नौकरी में था। वह यहां के लिए रवाना हो चुका है और जल्द ही यहां पहुंचेगा। पड़े-पड़े खाट तोड़नेवालो! पेट्टुओ! बेपेंदी की अपनी जेबें भरनेवालों! ला’नत है तुम पर!

    निकालो इन को यहां से।" ग़ुस्से में अमीर चिल्लाये। "खदेड़ो यहां से इन सब को। निकाल दो बाहर!"

    सिपाही बौखलाये हुए दरबारियों पर टूट पड़े। उनकी इज़्ज़त या रुतबे का ख़याल किये बग़ैर पकड़कर उन्हें फाटक तक घसीट लाये और वहां से सीढ़ियों पर धकेल दिया। सीढ़ियों के नीचे दूसरे सिपाही थे। उन्होंने दरबारियों को मारा-पीटा और लतियाकर खदेड़ दिया। दरबारी एक-दूसरे से पहले निकल जाने की हड़बड़ी में भागे। सफ़ेद बालोंवाले से टकराया। वह भी गिरा। उसका सिर गुलाब की क्यारी में लगा। गिरने की चोट से वह वहीं सुन्न पड़ गया।

    उसकी टेढ़ी गर्दन से अब भी ऐसा लगता था कि वह किसी पतली दराज़ से ऊपर को घूर रहा हो।

    ।। 4 ।।

    अमीर दिन भर ग़ुस्से में भरे बैठे रहे। दूसरे दिन सवेरे भी ख़ौफ़-ज़दा दरबारियों ने उनके चेहरे पर ग़ुस्से की काली छाया देखी। उनकी दिलबस्तगी और मनबहलावे की सारी कोशिशें बेकार गयीं। तंबूरे लिये, इत्र की ख़ुश्बू के बादल उड़ातीं, पतली कमर लचकातीं, मोती से दांत चमकातीं और इत्तिफ़ाक़न ही अपने उभरे हुए बालाई जैसे सीने दिखातीं रक़्क़ासाएँ अमीर को ख़ुश करने की नाकाम कोशिश कर रही थीं। अमीर ने उन की तरफ़ आंख उठाकर देखा भी नहीं। उनका चेहरा ग़ुस्से से चढ़ा रहा जिस से दरबारियों को हौल-दिल होता रहा। दरबार के मस्ख़रों, क़लाबाज़ों, जादूगरों और हिन्दुस्तानी फ़क़ीरों के, जो महुअर बजाकर सांपों को बस में करते थे, खेल-तमाशे बेकार साबित हुए। दरबारी आपस में फुसफुसा रहे थेः "उफ़ यह कम-बख़्त ख़ोजा नसरुद्दीन! यह हराम-ज़ादा! हमारे ऊपर इसने कैसी- कैसी आफ़तें ढायी हैं।" और वे उमीद भरी निगाहों से अर्सलां बेग को ताकने लगे।

    अर्सलां बेग ने अपने सबसे होशियार जासूसों को, जिन में वह चेचक रू शख़्स भी शामिल था जिसे ख़ोजा नसरुद्दीन ने करिश्मा दिख़ाकर चंगा कर दिया था, सिपाहियों के कमरे में इकट्ठा किया और उनसे कहाः

    "तुम सब लोगों को मा’लूम हो कि जब तक यह बदमाश, ख़ोजा नसरुद्दीन, पकड़ा नहीं जाता तब तक ब-हुक्म-ए-अमीर-ए- आज़म तुम लोगों की तनख्वाहें बन्द रहेंगी। अगर उसका पता तुम लोग नहीं लगा पाये तो सिर्फ़ यह कि तुम लोग तनख़्वाह से हाथ धोओगे, बल्कि अपने सिरों से भी। मैं किसी को छोड़ूंगा। लेकिन, जो शख़्स ख़ोजा नसरुद्दीन को पकड़ने में सबसे ज़ियादा हौसला दिखायेगा और उसे पकड़ लेगा, उसे तरक़्क़ी मिलेगी और तीन हज़ार तंके का इनआ’म दिया जायेगा। उसे 'जासूस ख़ास' का रुतबा भी हासिल होगा।"

    जासूस फ़ौरन दरवेश, फ़क़ीर, भिश्ती, ताजिर बनकर रवाना हो गये। इस बीच चेचक रू जासूस, जो औरों से ज़ियादा कांइयां था, कमली, दाने, तस्बीह और कुछ पुरानी किताबों से लैस होकर जौहरियों और अ'त्तारों के टोले के नुक्कड़ पर बाज़ार में जा खड़ा हुआ। नजूमी के भेस में उसने औ'रतों से सुराग़ लगाने का इंतिज़ाम किया।

    घंटे भर बाद बाज़ार के चौराहों पर सैकड़ों नक़ीब पहुंचे। सभी मुसलमानों को सुनाते हुए उन्होंने अमीर के हुक्म का ऐ’लान कियाः

    "ख़ोजा नसरुद्दीन अमीर का दुश्मन और काफ़िर; ऐलान किया जाता है! उस से किसी तरह का तअ’ल्लुक़ रखने की, ख़ास तौर पर उसे पनाह देने की, मुमानअ’त की जाती है और इस की सज़ा मौत तय की गयी है! जो भी उसे पकड़ कर अमीर के सिपाहियों के सिर्पुद करेगा उसे तीन हज़ार तंके इनआ’म में दिये जायेंगे और दूसरी बख़्शिश भी मिलेगी!"

    चायख़ानों के मालिक, लुहार, भिश्ती, जुलाहे, ऊट-ख़च्चरवाले, तांबाग़र आपस में फुसफुसाने लगेः "इस के लिए अमीर को मुद्दत तक इंतिज़ार करना पड़ेगा।"

    "हमारा ख़ोजा नसरुद्दीन ऐसा नहीं जो ग़फ़लत में पकड़ लिया जाय।"

    "बुख़ारावाले पैसे के लालच में नसरुद्दीन को दग़ा नहीं दे सकते।"

    लेकिन सूद-ख़ोर जाफ़र रोज़ की तरह बाज़ार में उन लोगों को परेशान करते हुआ घूम रहा था जिन्हों ने उस से क़र्ज़ लिया था।

    "तीन हज़ार तंके!" बहुत अफ़्सोस के साथ उस ने सोचा। "कल यह रक़म क़रीब-क़रीब मेरी जेब में थी। ख़ोजा नसरुद्दीन उस लड़की से मिलने फिर जायेगा, लेकिन अकेला मैं उसे पकड़ नहीं सकता। यह राज़ अगर मैं किसी और को बताऊं तो इनआ’म मुझ से छिन जायेगा। नहीं, मुझे दूसरे ढंग से काम करना होगा।"

    वह महल की तरफ़ रवाना हुआ। बहुत देर तक फाटक खटखटाता रहा। दरवाज़े बन्द रहे। पहरेदारों ने सुना ही नहीं, क्योंकि वे ख़ोजा नसरुद्दीन को पकड़ने की तरकीबों पर गरमागरम बहस करने में मशग़ूल थे।

    नाउम्मीदी में सूद-ख़ोर चिल्लायाः "ऐ बहादुर सिपाहियों! क्या तुम सब नींद में ग़ाफ़िल हो?" उसने फाटक में लगा लोहे का कड़ा खटखटाया। काफ़ी देर बाद किसी के क़दमों की आहट सुनाई दी और सांकल खोलने की खनखनाहट हुई। लड़की का छोटा फाटक खुल गया।"

    सूद-ख़ोर की बात सुनकर अर्सलां बेग ने सिर हिलायाः "जाफ़र साहब! आज तुम्हें अमीर से मिलने की राय नही दूंगा। वह नाराज़ और ग़मगीन हैं।"

    "मेरे पास उनका ग़म दूर करने का इलाज मौजूद है," सूद-ख़ोर ने फ़ौरन जवाब दिया। "अर्सलां बेग साहब! सुतून-ए-सल्तनत! दुश्मनों को पस्त करनेवाले! मेरे काम में देर नहीं की जा सकती। जा कर अमीर से फ़रमायें कि मैं उन का ग़म दूर कनरे के लिए आया हूं।"

    अमीर ने उसे बुलाया तो, लेकिन नाराज़गी से "बोलो, जाफ़र! अगर तुम्हारी ख़बर से मेरे दिल को खुशी हुई, तो तुम्हें दो सौ बेंतों की सज़ा मिलेगी।"

    सूद-ख़ोर ने कहना शुरु कियाः "ऐ शाहंशाह-ए-अज़ीम! जिस की चमक से सभी शाहों, सभी पहले के, आज के आगे वाले सुल्तानों की रौशनी फीकी पड़ जाती है! आप के इस नाचीज़ ग़ुलाम को मा’लूम है कि हमारे इस शहर में एक ऐसी नाजनीन है जिसे मैं हसीनों का हुस्न कहने का हौसला करता हूं…"

    अमीर उठ कर बैठ गये। सिर उठा कर उसकी तरफ़ देखा।

    सूद-ख़ोर हिम्मत पाकर बोलाः "ऐ मेरे आक़ा! उसके हुस्न का बयान करने के क़ाबिल मेरे पास लफ़्ज़ नहीं है। वह लम्बी है, ख़ूब-सूरत है, नाज़ुक है। उस का जिस्म सुगढ़ है। उसकी पेशानी चमकदार है, दमिश्क़ी गाल है, आँखें हिरनी जैसी है, भवें दूज के चांद के मानिन्द हैं। उसके गाल हवाई फूल जैसे है। मुंह हज़रत सुलेमान की अंगूठी के मानिन्द है। होंठ याक़ूत की तरह हैं। दांत मोतियों जैसे हैं। उसका सीना…? है... जैसे संग़मरमर तराशकर उस पर दो लाल चेरी नक़्श कर दी गयी हों! उसके कन्धे…"

    अमीर ने उस के तेज़ बयान को रोक कर कहाः

    "अगर वह ऐसी ही है, जैसा तुम बयान कर रहे हो, तब वह हमारे हरम में आने के क़ाबिल है। कौन है वह?"

    "ऐ आक़ा! वह नीचे ख़ानदान की है। वह एक कुम्हार की बेटी है। डर से उस नाचीज़ कुम्हार का नाम लेने की भी जुरअत नहीं कर सकता कि कहीं मेरे शाहंशाह के कानों की बेइज़्ज़ती हो जाय। मैं बता सकता हूं कि वह रहती कहां है। लेकिन अमीर के इस वफ़ादार ग़ुलाम को क्या कोई इनआ’म मिलेगा?"

    अमीर ने बख़्तियार को इशारा किया। सूद-ख़ोर के पैरो के पास एक थैली गिरी। जाफ़र ने लालच भरी फुर्ती से उसे लपक लिया।

    अमीन ने कहाः "अगर वह वैसी ही साबित हुई जैसी कि तुम तारीफ़ कर रहे हो, तो तुम को इतनी ही रक़म और मिलेगी!"

    सूद-ख़ोर जल्दी से बोलाः "हमारे आक़ा हज़रत की फ़य्याज़ी की तारीफ़ हो! लेकिन हुज़ूर ज़रा जल्दी फ़रमायें क्योंकि मुझे मा’लूम है कि इस नाज़ुक हिरनी का पीछा किया जा रहा है।

    अमीर की भवें मिल गयीं। नाक के ऊपर गहरी सिलवटें पड़ गयी। पूछाः "कौन कर रहा है पीछा?"

    सूद-ख़ोर ने जवाब दियाः "ख़ोजा नसरुद्दीन।"

    "फिर ख़ोजा नसरुद्दीन?... इस में भी ख़ोजा नसरुद्दीन? हर जगह ख़ोजा नसरुद्दीन? जब कि तुम..." इतना कह कर अमीर इस तेज़ी से वज़ीरों की तरफ़ मुड़े कि तख़्त हिल उठा, "तुम लोग माबदौलत की बेइज़्ज़ती के सिवा कुछ नहीं करते। अर्सलां बेग! तुम जा कर देखो। वह लड़की फ़ौरन महल में जानी चाहिए। अगर तुम नाकामयाब हुए तो वापसी में तुम्हें जल्लाद मिलेगा।"

    कुछ ही मिनटों में सिपाहियों का एक बड़ा दस्ता महल के फाटक से रवाना हुआ। उनके हथियार खड़क रहे थे। ढालें सूरज की रोशमी में चमक रही थीं। आगे-आगे अर्सलां बेग चल रहा था। ज़र-बफ़्त की ख़िलअ’त पर, उसके ऊंचे ओहदे की पहचान के बतौर, सोने का तमग़ा लगा था। सिपाहियों के साथ-साथ बदनुमा ढंग से लंगड़ाता-घिसटता सूद-ख़ोर चला रहा था। बीच-बीच में वह पीछे छूट जाता था और उन तक पहुंचने के लिए रुक-रुक कर दौड़ लगाता था। लोग एक तरफ़ हटकर इस जुलूस को दुश्मनी की निगाहों से ताक रहे थे और क़यास लगा रहे थे कि वे अब कौन सी नयी बदमाशी करने वाले हैं।

    ।। 5 ।।

    ख़ोजा नसरुद्दीन ने नवां बर्तन बना कर ख़त्म कर दिया था। वह धूप में बैठा था। नांद में से दसवें बर्तन के लिए उसने मिट्टी का एक बड़ा लोंदा उठाया ही था कि...

    एकाएक दरवाज़े पर ज़ोरदार और हाकिमाना दस्तक पड़ी। वे पड़ोसी जो कभी नमक या प्याज़ मांगने नियाज़ के पास आते थे इस तरह दस्तक नहीं देते थे। ख़ोजा नसरुद्दीन और नियाज़ ने एक दूसरे को परेशान निगाहों से देखा। भारी मुक्कों की बौछार से फाटक खड़खड़ा रहा था। इस बार ख़ोजा नसरुद्दीन के तेज़ कानों में लोहे की खनक सुनायी दी।

    उसने नियाज़ से फुसफुसा कर कहाः "सिपाही!"

    बूढ़े नियाज़ ने ज़ोर देकर उस से कहाः

    "भागो!"

    ख़ोजा नसरुद्दीन बाग़वाली दीवार कूद गया। उसे दूर निकल जाने का मौक़ा देने के लिए नियाज़ ने दरवाज़ा खोलने में काफ़ी वक़्त लगाया। नियाज़ ने जैसे ही सांकल खोली, अंगूर की बेलों में बैठी कुछ चिड़यां फुर्र से उड़ कर तितर-बितर हो गयीं। लेकिन बूढ़े नियाज़ के तो पर थे नहीं। बेचारा उड़ नहीं सकता था। अर्सलां बेग के सामने पीला पड़ गया। झुक कर कांपने लगा।

    अर्रलां बेग बोलाः "ऐ कुम्हार! तुम्हारे ख़ानदान को बहुत बड़ी इज़्ज़त बख़्शी जा रही है। इस ज़मीन पर अल्लाह का अल्लाह का साया, इस ख़िल्क़त के मरकज़ हमारे आक़ा और मालिक, ख़ुदा उनकी उम्र दराज़ करे, अमीर-ए-आज़म ने तुम्हारा नाचीज़ नाम याद करने की इज़्ज़त तुम पर बख़्शी है। उन्हें पता चला है कि तुम्हारे बाग़ीचे में एक हसीन गुलाब खिला है। इस गुलाब से वह अपने महल को सज़ाना चाहते हैं। तुम्हारी बेटी कहां है?"

    सफ़ेद बालों से भरा बूढ़े का सिर हिला और उस की आंखों के सामने अंधेरा छा गया। सिपाही उस की बेटी को मकान से खींच कर सहन में लाने लगे, तो उसकी चीख़ बूढ़े के कानों ने सुनी। उस की टांगे लड़खड़ायीं। मुंह के बल ज़मीन पर गिर पड़ा। इस के आगे उसने कुछ देखा, सुना।अर्रसलां बेग ने सिपाहियों से कहाः "बेचारा, ख़ुशी की इंतिहा से बेहोश हो गया है। इसे छोड़ दो। जब इसे होश आयेगा, महल आकर अमीर की मेहरबानियों का शुक्रिया अदा करेगा। चलो, वापस चलो।"

    इसी बीच ख़ोजा नसरुद्दीन पीछे की गलियों से चक्कर काटता हुआ सड़के दूसरे सिरे पर पहुंचा। कुछ झाड़ियों के पीछे से उसे नियाज़ का फाटक, दो सिपाही और एक शख़्स दिखायी पड़ रहे थे। यह तीसरा शख़्स था सूद-ख़ोर जाफ़र और उसे ख़ोजा नसरुद्दीन ने पहचान लिया।

    "अच्छा? लंगड़े कुत्ते! तू लाया है इन सिपाहियों को! मुझे गिरफ़्तार करवाने के लिए!" असली मामला भांप पाकर, ख़ोजा नसरुद्दीन सोचने लगा। "बहुत अच्छा! ख़ूब होशियारी से तलाशी ले! लेकिन तुझे ख़ाली हाथ लौटना होगा।"

    लेकिन सिपाही ख़ाली हाथ नहीं लौटे। ख़ोजा नसरुद्दीन ने उन्हें फाटक से अपनी मा’शूका को ले जाते देखा। खौफ़ से उस का ख़ून जम गया। गुलजान छूटने के लिए लड़ रही थी और इस क़दर फूट-फूटकर रो रही थी कि सुननेवालों का दिल टूट रहा था। लेकिन, सिपाही उसे कस कर पकड़े हुए थे और ढालों की दोहरी क़तार से घेरे हुए थे। जून के गर्म महीने का दिन था, लेकिन ख़ोजा नसरुद्दीन के बदन में ठंडी लहर सी दौड़ गयी। जहां वह छिपा था, उधर से ही गुज़रने के लिए सिपाही क़रीब रहे थे। उसके दिमाग़ पर धुंधलापन छा गया था। उस ने एक बड़ा-सा खंजर मियान से निकाला और ज़मीन से सटकर दुबक गया। अर्सलां बेग अपना चमकता हुआ सोने का तमग़ा लटकाये उस गिरोह में आगे आगे चल रहा था। खंजर उसकी दाढ़ी के नीचे उसकी मोटी गर्दन में गहरा घंस गया होता, लेकिन तभी एकाएक एक भारी हाथ ख़ोजा नसरुद्दीन के कन्धे पर गिरा और उसे ज़मीन पर दबा दिया। ख़ोजा नसरुद्दीन चौंका। घूम कर हमला करने के लिए उसने हाथ उठाया, लेकिन युसूफ़ लुहार का कालिख भरा चेहरा पहचानकर हाथ

    रोक लिया।

    "चुपचाप लेटे रहो!" लुहार ने धीमे से कहा। "चुपचाप लेटे रहो। तुम पागल हो। वे बीस हैं, और हथियारों से लैस हैं। तुम अकेले हो और निहत्थे हो। उस बेचारी की मदद तो तुम कर नहीं पाओगे, हां, ख़ुद नेस्तनाबूद हो जाओगे। मैं तुम से कहता हूं, चुपचाप लेटे रहो!"

    जब तक सड़क के मोड़ पर गिरोह ओझल नहीं हो गया, वह ख़ोजा नसरुद्दीन को दबाये रहा।

    "तुम ने मुझे रोका क्यों?" ख़ोजा नसरुद्दीन चिल्लाया। "बेहतर होता कि मैं मर गया होता।"

    "शेर के मुक़ाबले हाथ उठाना या तलवार के मुक़ाबले मुक्का उठाना अक़्लमंदों का काम नहीं!" लुहार ने सख़्ती से जवाब दिया। "मैं बाज़ार से ही सिपाहियों का पीछा कर रहा था। तुम्हारी बे-वक़ूफ़ी रोकने के लिए मैं वक़्त पर पहुंचा।

    तुम्हें उस के लिए मरना नहीं है, बल्कि लड़ना और उसे बचाना है। यह ज़ियादा मुश्किल है, लेकिन ज़ियादा बेहतर भी है।

    ग़मगीन होकर सोच-विचार करने में वक़्त ज़ाया करो। जाओ और काम में लगो। उन के पास तलवारें हैं, ढालें हैं, भाले हैं। लेकिन अल्लाह ने तुम्हें भी ताक़तवर हथियार दिये हैं। तुम ज़हीन हो और चालबाज़ भी और इन दोनों में तुम्हारा कोई मुक़ाबला नहीं कर सकता।"

    लुहार इस तरह बोला। उसकी बातें मर्दों जैसी और उस लोहे की तरह सख़्त थीं, जिसे वह ज़िन्दगी भर ढालता रहा था। उसकी बातें सुनते-सुनते ख़ोजा नसरुद्दीन का डगमगाता हुआ दिल लोहे की तरह सख़्त हो गया।

    "शुक्रिया, लुहार भाई!" वह बोला। "इस से ज़ियादा नाउमीदी की घड़ियां मेरी ज़िन्दगी में कभी नहीं आयीं। लेकिन नाउमीद हो जाना ठीक नहीं। मैं जाता हूं और जाने से पहले तुम्हें यक़ीन दिलाता हूं कि अपने हथियारों का ठीक इस्तेमाल करूंगा।"

    झाड़ियों से निकल कर वह सड़क पर आया। तभी नज़दीक के एक मकान से सूद-ख़ोर निकला। एक कुम्हारे को क़र्ज़ की याद दिलाने के लिए वह ठहर गया था, जिस के अदा करने की तारीख़ आनेवाली थी। ख़ोजा नसरुद्दीन और उसका आमना-सामना हो गया। सूद-ख़ोर पीला पड़ गया। पीछे भागा, भड़ से दरवाज़ा बन्द किया और सांकल चढ़ा ली।

    ख़ोजा नसरुद्दीन चिल्लायाः "होशियार! सांप के बच्चे जाफ़र! मैं ने सब कुछ देख सुन लिया है और मैं सब कुछ जानता हूं।"

    एक लम्हे की ख़ामोशी के बाद सूद-ख़ोर बोलाः "ऐ मेरे दोस्त! चेरी सियार को मिली और बाज़ को। चेरी तो शेर के मुंह में पहुंच गयी।"

    ख़ोजा नसरुद्दीन ने जवाब दियाः "ख़ैर, देखा जायगा कि आख़िरकार चेरी मिली किसे। लेकिन मेरी बात याद रखना, जाफ़र! मैं ने तुझे पानी से निकाला था और मैं क़सम खाता हूं कि तुझे उसी तालाब में डुबोऊंगा! काई से तेरा बदन ढंका होगा और घास-करकुल में फंस कर तेरा दम टूटेगा।"

    जवाब का इंतिज़ार किये बिना ख़ोजा नसरुद्दीन आगे बढ़ चला। नियाज़ के घर के सामने रुके बिना वह आगे बढ़ गया कि कहीं सूद-ख़ोर छिपा देख रहा हो और बाद में बूढ़े नियाज़ के ख़िलाफ़ शिकायत करे। सड़क के सिरे पर जा कर उसने यक़ीन कर लिया कि उसका पीछा नहीं किया जा रहा और तब दौड़ कर एक परती मैदान पार किया जिस में घास-फूस उग रही थी। दीवार कूदकर वह फिर नियाज़ के घर में दाख़िल हो गया।

    बूढ़ा अब भी ज़मीन में सिर डाले पड़ा था। अर्सलां बेग के फेंके चांदी के कुछ सिक्के उसके पास पड़े चमक रहे थे। धूल और आंसुओं से सना अपना चेहरा बूढ़े ने उठाया। उस के होंठ हिले, पर वह बोल सका। तभी उसे वह रूमाल नज़र आया जो उस की बेटी का था और वहीं गिर गया था। बूढ़ा अपनी दाढ़ी नोचने और सख़्त ज़मीन पर अपना सिर पटकने लगा।

    उस को चुप करने में ख़ोजा नसरुद्दीन को कुछ वक़्त लगा। आख़िर वह उसे उठाने में कामयाब हुआ। बूढ़े को उसने एक तिपाई पर बैठा दिया। वह बोलाः "सुनिए बुज़ुर्गवार! यह ग़म अकेला आप का नहीं है। शायद आपको मा’लूम हो कि मैं उस से मुहब्बत करता था और वह मुझ से मुहब्बत करती थी। क्या आप को मा’लूम है कि हम लोगों ने शादी का फ़ैसला कर लिया था? मैं सिर्फ़ मौक़े इंतिज़ार में था कि काफ़ी रुपया इकट्ठा कर लूं जिस से आपको अच्छा सा जहेज़ दे सकूं।"

    बूढ़ा रोता हुआ बोलाः "मुझे जहेज़ की क्या परवाह! क्या मैं अपनी बच्ची की मरज़ी के ख़िलाफ़ कोई काम करता? अफ़्सोस! अब ये बातें बेवक़्त और बेसूद है। वह चली गयी, खो गयी। अब तक वह हरम में जा चुकी होगी... हाय, ला’नत

    है! तुफ़ है! मैं ख़ुद महल जाऊंगा। हां, मैं अमीर के पैरों पर गिर पडूंगा और रो-रोकर उस से भीख मांगूंगा। और, अगर उनका दिल पत्थर का बना हुआ तो…"वह उठ कर डग़मगाता हुआ फाटक की तरफ़ चल दिया।

    "ठहरिए!" ख़ोजा नसरुद्दीन बोला। "आप यह भूल जाते हैं कि अमीर और इंसानों की तरह नहीं होते। उनके दिल नहीं होता। उनसे इल्तिजा करना बेकार है। उनसे तो सिर्फ़ छीना जा सकता है। और मैं, ख़ोजा नसरुद्दीन, अमीर से गुलजान को छीन लाऊंगा।"

    "वह बहुत ताक़तवर है। उस के पास हज़ारों सिपाही, हज़ारों पहरेदार, हज़ारों जासूस हैं। तुम उस के ख़िलाफ़ कर क्या सकोगे?"

    "मैं क्या करूंगा यह मैं अभी नहीं सोच पाया हूं। लेकिन मैं जानता हूं कि अमीर गुलजान पर क़ाबू नहीं पा सकेगा। आज नहीं, कल नहीं, परसों नहीं- वह कभी उसे अपना सकेगा और कभी अपनी बना सकेगा। इस बात में ज़रा भी शक नहीं है, ठीक वैसे ही जैसे कि इस में शक नहीं कि बुख़ारा से बग़दाद तक मेरा नाम ख़ोजा नसरुद्दीन है। इसलिए बुज़ुर्गवार! आप अपने आंसू पोंछें और मेरे कानों तक आपका रोना पहुंचने पाये। आप मेरे सोचने में ख़लल डालिए!"

    ख़ोजा नसरुद्दीन थोड़ी देर तक सोचता रहा। फिर बोलाः "ज़रा बताइए बुज़ुर्गवार! आपने अपनी बीवी के पुरान कपड़े कहां रखे हैं। आपकी बेगम का इंतिक़ाल हो गया है। उनकी पोशाकें कहां हैं?"

    "वहां, उस बक्स में।"

    ख़ोजा नसरुद्दीन ने ताली ली और घर में घुसकर ग़ायब हो गया और थोड़ी देर बाद औरतों के लिबास में बाहर निकला।

    घोड़े के बालों से बुने नक़ाब में उस का चेहरा ढंका हुआ था।

    "मेरा इंतिज़ार कीजियेगा बुज़ुर्गवार, और अकेले कोई काम करने की कोशिश कीजियेगा।"

    अनाज-गोदाम से उसने अपना गधा निकाला, उस पर ज़ीन कसी और नियाज़ के घर से रवाना हो गया।

    ।। 6 ।।

    गुलजान को महल के बाग़ में ले जाकर अमीर के सामने पेश करने से पहले अर्सलां बेग ने हरम की बूढ़ी औरतों को बुलाया और उन्हें हुक्म दिया कि गुलजान को इस तरह ख़ूब-सूरती से सजाया जाय और ऐसी पोशाक पहिनायी जाय कि अमीर उनके मुकम्मल हुस्न के ख़याल में खुशी हासिल करें। बूढ़ी औ’रतों ने फ़ौरन अपना जाना-पहचाना काम शुरु कर दिया। उन्होंने गर्म पानी से गुलजान का आंसू-भरा चेहरा धोया। उसे महीन झीन रेशम के कपड़े पहिनाये, सुर्मा लगाया, भवें काली की, गालों पर सुर्ख़ी मली, बालों में गुलाब का इत्र डाला और नाख़ून लाल रंग से रंगे। तब उन्होंने हरम के अस्मत ख्वाजा सरा को बुलाया। एक ज़माने में यह शख़्स अपनी बदकारियों के लिए सारे बुख़ारा में बदनाम था। इस ऊंचे ओहदे पर उसके मुक़र्रर किये जाने की वजह ऐसे मुआमलों में उसका तजरबा और मा’लूमात थीं। दरबार के हकीम ने उसे इस काम के लिए तैयार किया था।

    उसका काम था अमीर की एक सौ साठ दाश्ताओं पर बराबर नज़र रखना और उन्हें इतना हसीन बनाये रखना कि वे अमीर की हवस जगा सकें।

    जैसे-जैसे साल गुज़रते जाते, उसका काम मुश्किल होता जाता क्योंकि अमीर की हवस कम हो रही थी और उम्र चढ़ रही थी। कई बार ख़्वाजा सरा का सवेरे का इनआ’म एक दर्जन कोड़े हो चुका था। लेकिन, उस के लिए यह सज़ा मा’मूली थी। बड़ी सज़ा तो उसे तब मिलती जब वह हसीन दाश्ताओं को अमीर से मिलने के लिए तैयार करता था- क्योंकि तब उसे बहुत ज़ियादा तकलीफ़ होती थी, वैसी तकलीफ़ जैसी ऐ’याशों को दोज़ख़ में होती है। सभी जानते है कि दोज़ख़ में ऐ’याशों को खम्भों से हमेशा के लिए बंधे रहना पड़ता है और उनके आसपास नंगी हूरों की जमाअ’त घूमा करती हैं।

    ख़्वाजा सरा ने गुलजान का हुस्न देखा तो चौंक पड़ा।

    "वाक़ई यह ख़ूब-सूरत है!" पिंपयाती हुई पतली आवाज़ में वह बोला। "इसे अमीर के पास ले जाओ! ले जाओ से यहां से! मेरी नज़रों के सामने से जल्दी हटा लो!"

    और वह दीवार से अपना सिर टकराता दांत किटकिटाता हुआ बिलख बिलख कर "हाय कमबख़्ती! उफ़ नाउमीदी!"

    कहता हुआ जल्दी से वहां से टल गया।

    बूढ़ी औरतों ने कहाः "यह नेक शुगुन है। इस का मतलब है कि हमारे आक़ा ख़ुश होंगे।"

    ख़ामोश और पीली पड़ी गुलजान महल के बाग़ीचे में ले जायी गयी। अमीर उठे, उस के पास पहुंचे और उसका नक़ाब उलट दिया।

    सभी वज़ीरों, अफ़सरों आ’लिमों ने ख़िलअ’तों की आस्तीनों से आँखें छिपा लीं।

    बहुत देर तक अमीर उसे देखते रहे। उसके हसीन चेहरे से अपनी निगाह वह नहीं हटा पाते थे।

    "सूद-ख़ोर हम से झूठ नहीं कहता था" बुलन्द आवाज़ में वह बोला, "जितने इनआ’म का उससे वा’दा किया गया था, उससे तिगुनी रक़म दी जाय!"

    गुलजान वहां से ले जायी गयी। ज़ाहिर था कि अमीर ख़ुश हो गये थे।

    दरबारी आपस में फुसफुसाने लगेः "अमीर को अब मन बहलाने का सामान मिल गया है। वह ख़ुश हैं, उन के दिल का बुलबुल उनके चेहरे के गुलाब पर झुक रहा है, कल सवेरे वह और ख़ुश होंगे। अलहमदुलिल्लाह! बिना हम किसी पर बिजली गिरे या पत्थर पड़े, तूफ़ान निकल गया।"

    हिम्मत पा कर दरबारी शायर आगे बढ़े और एक-एक कर अपनी नज़्मों में अमीर की ता’रीफ़ गाने लगे। उनके चेहरे को पूरे चांद से, उन के जिस्म को पतले दरख़्त की लचक से और उनके राज को क़िरानुस्सादैन (दो नक्षत्रों के योग) से मिलाने लगे।

    आख़िर, मानों उसे यकायक ही सूझ गयी हो, शायर-ए-आज़म ने वह नज़्म सुनाने का मौक़ा निकाल लिया जो पिछले दिन सवेरे से ही उस की ज़बान पर था। अमीर ने मुट्ठी भर सिक्के उसकी तरफ़ फेंक दिये और शायर-ए-आज़म क़ालीन पर गिर कर रेंग-रेंगकर उन्हें बटोरने लगा। इस मौक़े पर वह अमीर की जूतियां चूमना भूला। तब उन पर एहसान-सा करते हुए अमीर हंस कर बोलेः "माबदौलत ने भी एक नज़्म कही हैः

    "हम जब शाम को बाग़ीचे में पहुंचे,

    चांद अपने को नाचीज़ पा, शर्म से बादल के पीछे छिप गया,

    सारी चिड़ियां हो गयीं ख़ामोश, हवा भी थम गयी,

    हम खड़े थे, अज़ीमुश्शान, मशहूर, सूरज की तरह ताक़तवर।"

    सभी शायद घुटनों के बल गिर कर चिल्लाने लगेः

    "वाह वाह! क्या शायरी है। क्या अज़्मत है! वाह वाह! रूदकी को मात कर दिया!"

    कुछ ने तो तारीफ़ करते-करते क़ालीन पर सिर रख दिया, मानो बेहोश हो गये हों। रक़्क़ासाएँ आयीं। उनके पीछे मसख़रे, बाज़ीगर, फ़क़ीर आये। और अमीर ने उन सब को फ़य्याज़ी से इनआ’म दिये।

    वह बराबर कह रहे थेः "मेरा एक ग़म यह है कि सूरज पर मेरा हुक्म नहीं, वर्ना मैं आज उस से जल्दी ग़ुरूब (अस्त) होने को कहता।"

    और दरबारी इस मज़ाक़ पर फ़र्ज़ की हंसी हंसते रहे।

    ।। 7 ।।

    बाज़ार में जब ख़ूब चहल-पहल थी। ख़रीद- फ़रोख़्त का यह सबसे अहम वक़्त था। जैसे-जैसे सूरज आसमान पर चढ़ता जाता, ख़रीद, बिक्री और तबादले का व्यापार बढ़ता जाता। गर्मी की वजह से लोग छप्परदार क़तारों की घनी, महकती छांह में जा रहे थे। नरकुल के छप्परों के बीच सूराख़ों से सूरज की चमकीली किरनें छनतीं और ऐसा लगता कि धुएंदार चमकीले खम्भे गड़े हैं। अपनी हल्की चमक में ज़र-बफ़्त चमचमाती, चिकना रेशम चमकता और मख़मल से जैसे कोई हल्की रौशनी छिपकर उसे रौशन करती। हर तरफ़ साफ़े, ख़िलअ’तें और रंगी हुई दाढ़ियां चमकतीं। पालिशदार तांबा कौंधता-सा लगता और यह कौध सर्राफ़ों के चमड़े के क़ालीनों पर पड़े असली सोने की दमक के सामने फीकी पड़ जाती।

    ख़ोजा नसरुद्दीन ने उसी चायख़ाने के सामने गधा रोका जिस की बरसाती में खड़े हो कर महीने भर पहले उस ने बुख़ारा के बाशिन्दों से नियाज़ कुम्हार को अमीर से बचाने के लिए मदद की अपील की थी। इसी थोड़े अ’र्से में ख़ोजा नसरुद्दीन ने इस ख़ुशमिज़ाज, तुंदियल, सीधे और भरोसेलायक़ ईमानदार अली से गहरी दोस्ती कर ली थी।

    ठीक मौक़ा तलाशकर ख़ोजा नसरुद्दीन ने पुकाराः

    "अली!"

    चायख़ाने के मालिक ने चारों तरफ़ देखा। वह चकराया हुआ था। उसे पुकारा था मरदानी आवाज़ ने, लेकिन दिखायी दे रही थी एक औ’रत।

    अपनी नक़ाब हटाये बिना ख़ोजा नसरुद्दीन बोलाः "मैं हूं, अली! मुझे पहचान रहे हो न? अल्लाह के वास्ते, इस तरह घूरो मत। क्या तुम जासूसों की मौजूदगी भूल गये हो?"

    चारों तरफ़ होशियारी से नज़र दौड़ा कर अली उसे पिछवाड़े के एक कमरे में ले गया, जहां वह ईंधन और फ़ालतू केतलियां बर्तन इकट्ठे करता था। यहां ठंड और सीलन थी और बाज़ार का शोर-ग़ुल बहुत हलका-हलका सुनायी पड़ता था।

    ख़ोजा नसरुद्दीन ने कहाः "अली! मेरा गधा ले लो। इसे खिलाओ पिलाओ और तैयार रखो, क्योंकि किसी वक़्त भी मुझे इसकी ज़रूरत पड़ सकती है। किसी से भी एक लफ़्ज़ मेरे बारे में बताना।"

    "लेकिन ख़ोजा नसरुद्दीन, तुम औ’रतों की पोशाक में क्यों हो?" बहुत होशियारी से दरवाज़ा बन्द करते हुए अली ने पूछा।

    "मैं महल जा रहा हूं।"

    "पागल हो गये हो क्या?" चायख़ाने का मालिक चिल्लाया। "अपना सिर शेर के मुंह में देने जा रहे हो?"

    "अली, यह तो करना ही होगा। तुम्हें जल्दी पता लग जायगा कि यह क्यों ज़रुरी हैं। मैं बहुत ख़तरनाक मुहिम पर जा रहा हूं। आओ हम तुम गले मिल ले क्योंकि अगर मैं…"

    वे एक-दूसरे से गले मिले। चायख़ाने के मालिक के आंसू गये और उसके गोल, लाल-लाल गालों पर ढुलकने लगे। उसने ख़ोजा नसरुद्दीन को विदाअ' किया। फिर लम्बी सांसो को रोकता हुआ- जिन की वजह से उसकी तोंद ऊपर नीचे हिलती थी- वह अपने गाहकों के पास चला गया। उसका दिल भारी था और डर से वह परेशान था। वह खोया-खोया सा और उदास था। उसके गाहकों को अपनी प्यास की याद दिलाने के लिए केतली के ढक्कन को दुबारा, तिबारा बजाना पड़ता था। उसकी रूह अपने बेधड़क दोस्त के साथ महल में थी।

    पहरेदारों ने ख़ोजा नसरुद्दीन को रोका। होशियारी से अपनी आवाज़ छिपा औरतों की आवाज़ में बोलता हुआ, ख़ोजा नसरुद्दीन बार-बार कहताः

    "मैं बहुत बढ़िया, बहुत लासानी अम्बर, मुश्क गुलाब का इत्र लायी हूं। मुझे हरम में जाने दो बहादुर सिपाहियों! मैं माल बेचने के बाद मुनाफ़े में तुम्हें भी हिस्सा दूंगी।"

    "भाग बुढ़िया! जा और बाज़ार में अपना माल बेच!" पहरेदारों ने भारी आवाज़ में उसे जवाब दिया।

    अपने मक़्सद में इस तरह नाकामयाब हो, ख़ोजा नसरुद्दीन बहुत ग़मगीन और संजीदा हो गया। उस के पास वक़्त कम था, क्योंकि सूरज दोपहर के बाद ढलने लगा था। उसने महल की चहारदीवारी के चारों तरफ़ चक्कर लगाया।

    चीनी-चूने से दीवार के पत्थर इस मज़बूती से जमे थे कि ख़ोजा नसरुद्दीन को कहीं एक भी सूराख़ या छेद नहीं दिखायी दिया। जहां तक नालियों का तअ’ल्लुक़ था, उनके मुंह पर इस्पात की जालियां जड़ी थीं।

    ख़ोजा नसरुद्दीन अपने आपसे बोलाः "मुझे महल जाना ही है। मैं जाना चाहता हूं और जाऊंगा। तक़दीर के मुताबिक़ अमीर ने अगर मेरी मंगेतर को छीन लिया है, तो उसे वापस पाने की मेरी तक़दीर क्यों हो? मुझे तो लग रहा है कि मेरी बात पूरी होगी।"

    वह बाज़ार वापस लौट आया। उसका ख़याल था कि अगर कोई शख़्स पक्का इरादा कर ले और उसकी हिम्मत बराबर उसका साथ देती रहे तो तक़दीर भी उसकी मदद करती है। हज़ारों बैठकों, बातचीतों और झगड़ों में से एक ज़रूर ऐसा निकलेगा जिस से मक़्सद पूरा करने का मौक़ा मिलेगा और होशियारी से उस मौक़े का फ़ायदा उठाकर इंसान सभी मुसीबतों पर फ़तह पाकर अपनी मंज़िल पर जा पहुंचेगा और इस तरह उसके मुक़द्दर का लिखा ठीक साबित होगा। बाज़ार में कहीं-न-कहीं ऐसा ही कोई मौक़ा ख़ोजा नसरुद्दीन का इंतिज़ार कर रहा था। उसका यक़ीन पक्का था और वह इसी मौक़े की तलाश में रवाना हो गया। ख़ोजा नसरुद्दीन की नज़र से कुछ भी चूकता था- हज़ारों की भीड़ में एक चेहरा भी नहीं, एक लफ़्ज़ भी नहीं।

    उसके आंख-कान और दिमाग़ इस तरह से सधे हुए थे कि क़ुदरत ने उनके काम पर हद की जो पाबन्दी लगायी थी, वे उससे आगे पहुंच गये थे। ऐसे वक़्त उसकी फ़तह तय होती क्योंकि इस बीच उसके दुश्मनों के दिमाग़ उसी सतह पर काम करते होते, जो इंसानी पाबंदियों के मातहत होती है। जहां जौहरियों और अत्तारों के टोले मिलते थे, वहां ख़ोजा नसरुद्दीन को भीड़ के शोर-ग़ुल के बीच उकसाहट की आवाज़ सुनाई दीः

    "तुम कहती हो कि तुम्हारे खाविंद ने तुम से मुहब्बत करना छोड़ दिया है और तुम्हारे साथ सोता तक नहीं? तुम्हारी इस मुसीबत का एक इलाज है। लेकिन उसके लिए मुझे ख़ोजा नसरुद्दीन से मशविरा करना पड़ेगा। इस में शक नहीं कि तुम ने सुना होगा कि ख़ोजा नसरुद्दीन यहीं है? तुम पता लगाओ कि वह कहां है और मुझे ख़बर दो। हम और वह मिल कर तुम्हारे खाविंद को तुम्हारे पास वापस ले आयेंगे।"

    ख़ोजा नसरुद्दीन और नज़दीक पहुंचा तो उसे नजूमी जासूस का चेचक रू चेहरा दिखायी दिया। चांदी का एक सिक्का लिये एक औ’रत उस के सामने खड़ी थी। नजूमी नमदे पर मनके फैयाले एक बहुत पुरानी किताब के पन्ने पलट रहा था।

    "लेकिन, अगर तू ख़ोजा नसरुद्दीन को तलाश करने में कामयाब हुई," वह कह रहा था, "तो औरत! तुझ पर ला’नत बरसेगी, क्योंकि तेरा शौहर तुझे हमेशा के लिए छोड़ देगा।"

    "दूसरों की तक़दीर देखनेवाले दानिशमंद! मुझे मेरा मुक़द्दर बताओ।"

    जासूस ने मनके बिखेर दिये। फिर एकाएक बोला, मानो एकदम ख़ौफ़-ज़दा हो गया हो, "ऐ है! तुझ पर ख़ुदा की मार है औ’रत! मौत अपना काला हाथ तेरे सिर पर उठा चुकी है!"

    आसपास खड़े कई तमाशबीन नज़दीक गये।

    "हां, मौत का वार बचाने में मैं तेरी मदद कर सकता हूं," वह बोला, "लेकिन यह काम अकेले नहीं हो सकता। मुझे ख़ोजा नसरुद्दीन से मशविरा करना होगा। तू अगर उस की तलाश करे और मुझे बता सके कि वह कहां है, तेरी जान बच जायगी।"

    "अच्छी बात है। मैं ख़ोजा नसरुद्दीन को तुम्हारे पास ले आऊंगी।"

    खुशी से चौंकते हुए वह चिल्ला उठाः "तू उसे मेरे पास ले आयेगी? कब?"

    "मैं उसे अभी ला सकती हूं! फ़ौरन! बहुत नज़दीक है वह।"

    "कहां, कहां?"

    "यहीं, एकदम नज़दीक।"

    "लेकिन कहां, मैं तो उसे देख नहीं रहा।"

    "और तुम अपने को नजूमी कहते हो? क्या तुम हिसाब नहीं लगा सकते? सोच नहीं सकते? लो, यह रहा वह।"

    नजूमी के सामने बैठी औ’रत ने झटके से नक़ाब उतार दिया। ख़ोजा नसरुद्दीन का चेहरा देखते ही नजूमी घबरा कर पीछे हट गया।

    ख़ोजा नसरुद्दीन ने फिर दोहरायाः

    "यह रहा वह! बोल, मुझ से किस बारे में मशविरा करना चाहता था ? तू झूठा है। तू नजूमी नहीं। तू अमीर के जासूसों में से एक है। मुसलमानो! इस का यक़ीन करो! यह शख़्स तुम लोगों को धोका दे रहा है। यहां बैठा हुआ यह सिर्फ़ ख़ोजा नसरुद्दीन का पता लगाने की कोशिश कर रहा है।"

    जासूस ने इधर-उधर निगाहें दौड़ायीं, लेकिन कोई सिपाही नज़र नहीं आया। नाउमीदी से रोआसा होकर वह ख़ोजा नसरुद्दीन को जाते देखता रहा। उसके आसपास खड़ी भीड़ ग़ुस्से से भर उठी और पास सिमट आयी। हर तरफ़ से आवाजें उठने लगीः "जासूस! जासूस! अमीर का जासूस! गन्दा कुत्ता!!"

    नजूमी उठा और अपना नमदा लपेटने लगा। उस के हाथ कांप रहे थे। फिर, वह जितनी तेज़ी से दौड़ सकता था, दौड़ता हुआ महल की तरफ़ भाग गया।

    ।। 8 ।।

    धूल भरे, धुआं भरे, बदबूदार, गन्दे सिपाही-घर में पहरेदार एक घिसे हुए नमदे पर बैठे थे जो पिस्सुओं का अखाड़ा बना हुआ था। अपने जिस्मों को खुजलाते हुए वे ख़ोजा नसरुद्दीन को पकड़ने के इमकानों पर मशविरा कर रहे थे।

    "तीन हज़ार तंके!" वे कह रहे थे। "ज़रा सोचो तो! तीन हज़ार तंके और जासूस-ख़ास का ओ’हदा!"

    "कोई कोई तो क़िस्मतवाला होगा ही।"

    "काश, मैं ही वह कोई होता!" एक मोटा काहिल पहरेदार बोला। यह पहरेदार सबसे ज़ियादा बेवक़ूफ़ था। बरख़ास्तगी से वह सिर्फ़ इसलिए बच गया था कि उसने बिना छिलका उतारे, पूरे, कच्चे अंडे निगल जाने का हुनर सीख लिया था। अक्सर यह हुनर दिख़ाकर वह अमीर का मन बहलाया करता था और उनसे बख़्शिश पा जाता था- हालांकि, बाद में उसे सख़्त शिद्दत के दर्द का शिकार होना पड़ता था। चेचक रू जासूस तूफ़ान की तरह सिपाही-घर में घुसा।

    "ख़ोजा नसरुद्दीन! ख़ोजा नसरुद्दीन! यहीं है यहीं! बाज़ार में है! बाज़ार में! औ’रत की पोशाक पहने है! यहीं है यहीं! बाज़ार में!"

    सिपाही फाटक की तरफ़ लपके और रास्ते में अपने हथियार उठाते हुए बाहर निकल गये। वे कहते जा रहे थेः

    "इनआ’म मेरा है! सुन रहे हो न? मैं ने उसे पहले देखा। इनआ’म मुझ मिलना चाहिए!"

    सिपाहियों को देखते ही लोग तितर-बितर होने लगे। इस हड़बड़ी में बाज़ार में घबराहट भगदड़ मच गयी। सिपाही भीड़ में घुस गये। उन में जो सबसे ज़ियादा जोश में था और आगे-आगे दौड़ रहा था, उस ने एक औ’रत को पकड़ा और उसका नक़ाब फाड़ डाला। औ’रत का चेहरा भीड़ में खुल गया। औ’रत ज़ोर से चींख़ी। दूसरी तरफ़ से एक और चींख़ सुनायी दी। फिर तीसरी औरत की चींख़ सुनायी पड़ी जो सिपाहियों से जूझ रही थी। और तब चौथी...पाँचवी…! पूरा बाज़ार औरतों की चींख़ों, सुबकियों, रोने-चिल्लाने की आवाज़ों से भर उठा।

    हक्की-बक्की भीड़ चुपचाप खड़ी देखती रह गयी। बुख़ारा में पहले कभी ऐसी वहशियाना हर्कत देखी-सुनी नहीं गयी थी। कुछ लोग तो डर से पीले पड़ गये। कुछ ग़ुस्से से लाल हो उठे। हरेक के दिल में वलवला था। सिपाही औ’रतें पकड़ने, उन्हें इधर-उधर धकेलने, मारने-पीटने और उनके कपड़े फाड़ने की ज़ालिम हरकतें करते रहे।

    "बचाओ! बचाओ!!" औ’रतें चिल्ला रही थीं।

    यूसुफ़ लुहार ने भीड़ पर क़ाबू पाकर ऊंची आवाज़ में कहाः

    "मुसलमानों! तुम झिझक क्यों रहे हो? क्या यही काफ़ी नहीं कि सिपाही लूटते रहें! क्या दिन दहाड़े अब हम अपनी औ’रतों की बेइज़्ज़ती भी बर्दाश्त करें?"

    "बचाओ! बचाओ!!" औ’रतें चिल्लाती रहीं।

    अब तो भीड़ में ग़ुर्राहट सुनायी पड़ने लगी। एक बेचैनी-सी भर गयी। एक भिश्ती ने अपनी बीवी की आवाज़ पहचानी। उसे बाचाने दौड़ा। सिपाहियों ने उसको धकेल दिया। लेकिन दो जुलाहे और तीन तांबाग़र उसकी मदद के लिए दौड़ पड़े और सिपाहियों को खदेड़ दिया। झगड़ा छिड़ गया। धीरे-धीरे हर शख़्स इस में शामिल हो गया। इधर सिपाही तलवारें भांज रहे थे, उधर हर तरफ़ से उन पर बर्तनों, कश्तियों, घड़ी, केतलियों लकड़ी के टुकड़ों और नालों की मार हो रही थी। बेचारे इस हमले से बच नहीं पा रहे थे। लड़ाई पूरे बाज़ार में फैल गयी।

    अमीर सुकून के साथ महल में ऊंघ रहे थे। यकायक वह उछले और खिड़की की तरफ़ दौड़े। उसे खोला। फिर खौफ़ज़दा हो फटाक से उसे बन्द कर दिया।

    बख़्तियार दौड़ता हुआ आया। वह पीला पड़ रहा था। उस के होंठ कांप रहे थे।

    अमीर ने भिनभिनाकर पूछाः "क्या है? क्या हो रहा है वहां? तोपें कहां है? अर्सलां बेग कहां है?"

    अर्सलां बेग दौड़ता हुआ आया और मुंह के बल गिर पड़ा। "आक़ा! मेरे आक़ा! मेरा सिर धड़ से जुदा करने का हुक्म दें।"

    "क्या है? क्या है यह? हुआ क्या?"

    ज़मीन से बिना उठे ही अर्सलां बेग ने जवाब दियाः "ऐ सूरज के मानिन्द आक़ा! मेरे…"

    ग़ुस्से में भरे अमीर बेताबी से पैर पटक कर बोलेः "ख़ामोश! यह 'ऐ मेरे, मेरे...' तू फिर कर लेना! बता कि वहां हो क्या रहा है…?"

    "ख़ोजा नसरुद्दीन! मेरे आक़ा, ख़ोजा नसरुद्दीन!!... वह औ’रत का भेस रख कर आया है। सारी बद-मआ'शी उसी की है। यह सब उसी की वजह से है! मेरा सिर क़लम करवा दीजिए।"

    लेकिन अमीर को दूसरी परेशानियां थीं।

    ।। 9 ।।

    उस दिन ख़ोजा नसरुद्दीन अपने वक़्त की, मिनट-मिनट की, परवाह कर रहा था। बाज़ार में चहलक़दमी में वक़्त ख़राब करना उसने ठीक समझा। सो, एक सिपाही का जबड़ा, दूसरे के दांत और तीसरे की नाक तोड़ता हुआ वह बख़ैरियत अली के चायख़ाने में जा पहुंचा। वहां, पीछेवाले कमरे में उसने औ’रतों का लिबास उतारा। रंगीन बदख़्शां का साफ़ा और नक़ली दाढ़ी पहनी और इस तरह भेस बदलकर एक ऊंची जगह पर बैठ गया और लड़ाई के मैदान का नज़ारा देखने लगा।

    हर तरफ़ से भीड़ से घिरे और भीड़ के हमले से हर तरफ़ दबे सिपाहियों ने डटकर मुक़ाबला करना शुरु किया। ख़ोजा नसरुद्दीन के क़दमों के पास ही एक गुत्थमगुत्थी हो रही थी। एक सिपाही के ऊपर अपनी चाय उंडेलने के लालच को वह रोक सका और यह काम उस ने इतनी होशियारी से किया कि उबलती चाय अंडे निगलतने वाले सिपाही की गर्दन पर ही गिरी। ज़ोर से चिल्लाकर सिपाही पीठ के बल गिर पड़ा और हाथ-पैर हवा में फेंकने लगा। उसकी तरफ़ देखने तक की परवाह किये बग़ैर ख़ोजा नसरुद्दीन अपने ख़यालों में मशग़ूल हो गया। यकायक उसे एक बूढ़ी, कांपती हुई, आवाज़ सुनायी दी।

    "मुझे जाने दो! मुझे आगे बढ़ने दो! अल्लाह के नाम पर! यहां हो क्या रहा है?"

    चायख़ाने के पास ही, लड़ाई के बीचों बीच, झुकी-पतली नाक और सफ़ेद दाढ़ी वाला एक शख़्स ऊंट पर बैठा दिखायी दिया। शक्ल से वह अ’रब लगता था। उसकी पगड़ी का शमला टंका हुआ था, जिस से साबित था कि वह शख़्स आ’लिम है। डर के मारे वह ऊंट के कूबड़ से चिपका हुआ था। उसके चारों तरफ़ मारपीट जारी थी। एक शख़्स उस का पैर पकड़ कर उसे ऊंट से उतारने की कोशिश कर रहा था। बूढ़ा बुरी तरह छटपटा रहा था। चींख़-पुकार और शोर-ग़ुल से कान के पर्दे फटे जा रहे थे। हिफ़ाज़त की जगह पहुंचने की जी-तोड़ कोशिश के बाद बूढ़ा चायख़ाने तक पहुंचने में कामयाब हुआ। पीछे मुड़-मुड़ कर देखते हुए और लड़खड़ाते हुए उस ने अपना ऊंट ख़ोजा नसरुद्दीन के गधे के पास बांध दिया और बरसाती में चढ़ आया।

    "बिस्मिल्लाहिर्रहमनीर्रहीम! इस शहर में हो क्या रहा है?"

    "बाज़ार!" ख़ोजा नसरुद्दीन ने मुख़्तर-सा जवाब दिया।

    "क्या बुख़ारा में हमेशा ऐसा ही बाज़ार लगता है ? इस भीड़ में मैं महल तक कैसे पहुंच सकता हूं?"

    महल' लफ़्ज़ सुनते ही ख़ोजा नसरुद्दीन समझ गया कि बस इस बुज़ुर्ग शख़्स की मुलाक़ात में ही वह मौक़ा छिपा हुआ है, जिस का इतनी देर से वह इंतिज़ार कर रहा था और जिस से वह अमीर के हरम में घुस कर गुलजान को बचा सकता है।

    लेकिन, जैसा सभी जानते हैं, जल्दबाज़ी शैतान का काम होता है। शीराज़ के सब से बड़े आ’लिम शैख़ सा’दी ने कहीं कहा हैः "सब्र से ही काम बनता है, बे-सब्री से नाकामी।" इसलिए ख़ोजा नसरुद्दीन ने बे-ताबी का क़ालीन लपेट लिया और उसे उमीद के बक्स में बन्द कर दिया।

    बुज़ुर्ग कराहें और लम्बी सांसें लेकर बोलाः "ऐ पाक परवरदिगार! मोमिनों के सहारे! मैं महल तक पहुंचूंगा कैसे?"

    "कल तक इंतिज़ार कीजिए।" ख़ोजा नसरुद्दीन बोला।

    "मैं ठहर नहीं सकता।" बुज़ुर्ग ज़ोर से बोला। "महल में मेरा इंतिज़ार हो रहा है।"

    ख़ोजा नसरुद्दीन ज़ोर से हंस कर बोलाः "ऐ बाइज़्ज़त, आ'ला-हज़रत शैख़! मैं आप का काम जानता हूं, पेशा। लेकिन क्या आप को यक़ीन है कि महल में लोग कल तक आप का इंतिज़ार नहीं कर सकते? बुख़ारा में बहुत से लोग महल में दाख़िल होने के लिए हफ़्तों इंतिज़ार करते हैं। आप यह क्यों समझते हैं कि आप के लिए इस तरीक़े में फ़र्क़ किया जायगा।"

    ख़ोजा नसरुद्दीन की बात से तप कर, तेवर चढ़ाकर, बुज़ुर्ग बोलाः "तुम्हें मा’लूम होना चाहिए कि मैं बहुत मशहूर आ’लिम, नजूमी और हकीम हूं। अमीर की दा’वत पर मैं बग़दाद से आया हूं- सल्तनत का काम चलाने में उनकी मदद करने और उनकी ख़िदमत करने!"

    बहुत इज़्ज़त दिखाते हुए, झुक कर अदब से ख़ोजा नसरुद्दीन बोलाः "ओह! खुशामदीद, आ’लिम शैख़! एक बार मैं बग़दाद गया था और वहां के आ’लिमों को जानता हूं। आप का इस्म-ए-गरामी (शुम नाम)?"

    "अगर तुम कभी बग़दाद गये हो तो तुम्हें मेरी वे ख़िदमतें ज़रूर मा’लूम होंगी जो मैं ने वहां के ख़लीफ़ा के लिए अंजाम दी थीं। मैं ने उनके प्यारे बेटे की जान बचायी थी और इस बात का सारे मुल्क में ऐ’लान भी किया गया था। मेरा नाम मौलाना हुसैन है!"

    "मौलाना हुसैन?" तअ’ज्जुब भरे लहजे में ख़ोजा नसरुद्दीन बोला। "क्या आप ख़ुद मौलाना हुसैन है?"

    अपने वतन बग़दाद से बाहर इतनी दूर तक अपनी शोहरत फैली देख कर तस्कीन और ख़ुशी की मुस्कान छिपाने में नाकामयाब बुज़ुर्ग बोलाः "तुम्हें तअ’ज्जुब क्यों होता है? हां, दानाई में लासानी, इलाज करने और सितारों को पढ़ने के हुनर में माहिर, मशहूर आ’लिम मौलाना हुसैन मैं ही हूं। लेकिन मुझे ग़ुरूर और घमंड छू तक नहीं गया। देखो मैं तुम जैसे नाचीज़ इंसान से भी कितनी मिलनसारी से बातें कर रहा हूं।"

    बुज़ुर्ग ने हाथ बढ़ाकर मसनद उठायी और उस पर कोहनी टेक ली। वह अपने इस साथी को अपनी दानाई का हवाला देने की तैयारी कर रहे थे। उन्हें पूरी उमीद थी कि शैख़ी में यह शख़्स मशहूर आ’लिम मौलाना हुसैन से अपनी मुलाक़ात का ज़िक्र हरेक से करेगा और अपने मुल्क के लोगों में इस आ’लिम के लिए इज़्ज़त का जज़्बा पैदा करने के लिए हर बात बढ़ा-चढ़ाकर कहेगा। इसी तरह का बरताव तो वे लोग करते हैं, जिनकी बड़े आदमियों से मुलाक़ात होती है।

    मौलाना हुसैन सोच रहे थेः "ज़रूर, आ’म लोगों में मेरी शोहरत बढ़ाने में यह शख़्स मदद देगा। शोहरत नफ़रत करने की चीज़ तो है नहीं। आ’म लोगों में होनेवाला चर्चा भेदियों और जासूसों के ज़रिए अमीर के कानों तक पहुंचेगा

    और मेरी दानाई का सिक्का जम जायेगा। बाहर हुई ताईद बेशक सबसे बेहतर ताईद होती है और इस तरह आख़िर में मेरा ही फ़ायदा होगा।"

    अपने साथी पर अपने इल्म का सिक्का ज़माने के लिए बुज़ुर्ग ने पुराने आ’लिमों के बहुत सारे जुमले दोहराये और सितारों के क़ेरान (योग) और उनके आपसी रिश्ते बताने शुरु किये।

    ख़ोजा नसरुद्दीन बहुत ग़ैर से सुनता रहा और लफ़्ज़ याद करने की कोशिश करता रहा। आख़िर वह बोलाः "नहीं!

    मुझे अब यक़ीन नहीं रहा!आप क्या सचमुच ही मौलाना हुसैन है?"

    बुज़ुर्ग बोलेः "हां, हां, बेशक! इस में तअ’ज्जुब क्या है?"

    ख़ोजा नसरुद्दीन मानो सोच में पड़ गया। वह चुप रहा। फिर यकायक डर और तरस भरी आवाज़ में बोलाः "ऐ बदनसीब! अब तुम बरबाद हुए!"

    बुज़ुर्ग के हाथ से चाय का गिलास छूट पड़ा और उसका गला फंस गया। सारी शैख़ी और अहमियत ग़ायब हो गयी।

    "कौसे ? क्यों? क्या बात हुई?" उसने परेशानी से पूछा।

    बाज़ार की तरफ़ इशारा करते हुए, जहां मारपीट अब भी पूरी तरह ख़त्म नहीं हुई थी, ख़ोजा नसरुद्दीन ने कहाः

    "क्या आप को मा’लूम नहीं कि यह सारी गड़बड़ी आप की वजह से हो रही है? हमारे अमीर के कानों तक यह बात पहुंच गयी है कि बग़दाद से रवाना होने से पेश्तर आपने खुले आ’म यह ऐ’लान किया था कि आप अमीर के हरम में पहुंच जायेंगे और उनकी बेगमों को फंसा लेगे। ला’नत है आप पर, मौलाना हुसैन साहब!"

    बूढ़े का मुंह खुला का खुला रह गया। उस की आंखे फट-सी गयीं। डर के मारे उसे हिचकियां आने लगीं। हकलाकर बोलाः "मैं...?...मैं...हरम में?मैं...?"

    "आपने का’बे की क़सम खायी थी कि ऐसा करेंगे। यही तो आज नक़ीब ऐलान करते रहे थे। अमीर ने हुक्म जारी किया था कि जैसे ही आप बुख़ारा की सरज़मीन पर क़दम रखें, आपको पकड़ लिया जाय और फ़ौरन आपका सिर क़लम कर दिया जाय।"

    बूढ़ा घबड़ाकर कराहने लगा। वह सोच नहीं पा रहा था कि उस की बरबादी की यह चाल किस दुश्मन ने चली थी। उसे इस क़िस्से की सच्चाई पर शुबह तक नहीं था। ख़ुद उस ने कई बार दरबार की साज़िशों में अपने दुश्मनों को ख़त्म करने के लिए ऐसे ही तरीक़ों पर अ’मल किया था और अपने दुश्मनों को सूली पर लटकते देख बहुत इत्मीनान और चैन की सांस ली थीं।

    ख़ोजा नसरुद्दीन कहता गयाः "इसलिए जासूसों ने आज अमीर को ख़बर दी कि आप तशरीफ़ ले आये हैं। उन्होंने हुक्म दिया कि आप को गिरफ़्तार कर लिया जाय। सिपाही दौड़ कर बाज़ार आये और हर जगह आप को तलाश करने लगे। दूकानों के पीछे भी उन्होंने आप को ढूंढा। ख़रीद-फ़रोख़्त बन्द हो गयी। अ’मन में ख़लल पड़ गया। सिपाहियों ने ग़लती से एक शख़्स को पकड़ लिया जिस की शक्ल-सूरत आप से मिलती-जुलती थी और जल्दी में उस का सिर धड़ से जुदा कर दिया। लेकिन वह शख़्स था एक मुल्ला जो अपनी पाकीज़गी और क़ाबलियत के लिए मशहूर था। सो, उस की मस्जिद के लोग नाराज़ हो गये। अब देखिए कि यह जो कुछ हो रहा है, सब आप की बदौलत।"

    ख़ौफ़ और नाउमीदी से बूढ़ा कहने लगाः "तुफ़ है! ला’नत है मुझ पर!" इसी तरह वह रोता, चिल्लाता, कराहता रहा और यह साबित करता रहा कि ख़ोजा नसरुद्दीन की चाल काम कर गयी। इस बीच लड़ाई महल के फाटकों की तरफ़ बढ़ चुकी थी। बुरी तरह पिटे और घायल सिपाही महल में घुस रहे थे। अब तक उनके हथियार छिन चुके थे। बाज़ार में भी शोर-ग़ुल और बेचैनी थी। पर अब मोआ'मला ठंडा पड़ रहा था।

    "मुझे बग़दाद लौट जाना चाहिए!" आ’लिम रो रहा था। "मैं लौट जाऊंगा!"

    "आप शहर के फाटक पर धर लिये जायेंगे!" ख़ोजा नसरुद्दीन ने ख़बरदार किया।

    "हाय कमबख़्ती! यह क़हर मुझ पर क्यों गिरा। अल्लाह जानता है कि मैं बेक़ुसूर हूं। ऐसी गुस्ताख़ और नापाक क़सम मैं ने कभी खायी ही नहीं थी। मेरे दुश्मनों ने मुझे अमीर के सामने बदनाम किया। मेहरबान मुसलमान! मेरी मदद कर!"

    ख़ोजा नसरुद्दीन तो इस बात के इंतिज़ार में था ही। ख़ुद मदद करने की तज्वीज़ पेश करके वह आ'लिम में शुबह की गुंजाइश नहीं पैदा करना चाहता था।

    "मदद करूं?" ख़ोजा नसरुद्दीन बोला। "मैं कैसे मदद कर सकता हूं ? मुझे तो चाहिए कि अपने आक़ा का वफ़ादार और सच्चा ग़ुलाम होने के नाते आप को पकड़कर फ़ौरन सिपाहियों के हवाले कर दूं ताकि मुझ पर आपके साथ सांठ-गांठ करने का इल्ज़ाम लगे।"

    हिचकियां भरते और कांपते हुए आ’लिम ने ख़ोजा नसरुद्दीन की तरफ़ आजिज़ी से देखा। बूढ़े को तस्कीन दिलाने के लिए ख़ोजा नसरुद्दीन ने जल्दी से कहाः "तब भी, आप कहते हैं कि आप बेगुनाह हैं और लोगों ने झूठी अफ़्वाह उड़ाई है। मुझे आप की बात पर यक़ीन रहा हैं, क्योंकि मैं सोचता हूं कि इस बुज़ुर्गी में भला आप का हरम से क्या सरोकार!"

    "बिल्कुल सही बात है," बूढ़ा जल्दी से बोला, "लेकिन मेरे लिए नजात का रास्ता क्या है?"

    "है! ज़रूर एक रास्ता है!" ख़ोजा नसरुद्दीन ने जवाब दिया। वह बूढ़े को पीछेवाले अंधेरे कमरे में ले गया और औ’रतों की पोशाक का बंडल देकर बोलाः

    "मैं ने अपनी बीवी के लिए आज ही ये कपड़े ख़रीदे थे। अगर आप चाहें तो आप की पोशाक और साफ़े से मैं इन्हें बदल सकता हूं। औ’रत का नक़ाब डालकर आप सिपाहियों और जासूसों से बच सकते हैं।"

    एहसानमंदी और ख़ुशी से बूढ़े ने वे कपड़े पहन लिए। ख़ोजा नसरुद्दीन ने उस की पोशाक पहनी, शमला टंका साफ़ा सिर पर रखा, सितारे जड़ा चौड़ा पटका कमर में बांधा। फिर, बूढे को ऊंट पर बैठाते हुए बोलाः "ख़ुदा हाफ़िज! आ’लिम, औ’रतों की तरह ऊंची पतली आवाज़ में बोलना भूलना!"

    बूढ़ा अपनी सवारी पर भाग निकला।

    ख़ोजा नसरुद्दीन की आंखें चमकने लगीं। महल का रास्ता उस के लिए साफ़ था।

    ।। 10 ।।

    संजीदा अमीर को जब एक बार तस्कीन हो गयी और उन्होंने अपने को यक़ीन दिला लिया कि बाज़ार की जंग ठंड़ी पड़ गयी है, तो उन्होंने दरबार- ए-आ’म में जा कर मुसाहिबों से मिलना तय किया। अपने चेहरे पर वह ऐसा भाव लाने की कोशिश कर रहे थे जिस से सुकून और साथ ही कुछ तकलीफ़ भी ज़ाहिर हो और जिस से दरबारियों को यह सोचने की मजाल हो कि शाही दिल में खौफ़ भी सकता है।

    जैसे ही अमीर पहुंचे, सभी दरबारी ख़ामोश हो गये। उन्हें डर था कि उनकी आंखों या चेहरों से कहीं यह बात ज़ाहिर हो जाय कि वे अमीर के जज़्बों की सही हालत जानते हैं। अमीर ख़ामोश थे। दरबारी भी ख़ामोश थे। आख़िरकार, यह डरावनी ख़ामोशी ख़ुद अमीर ने ख़त्म की और कहाः "तुम लोगों को हम से क्या कहना है? तुम्हारी क्या सलाह है? यह पहला मौक़ा’ नहीं, जब हम तुम से ये सवाल कर रहे हैं।"

    किसी ने जवाब नहीं दिया, सिर उपर नहीं उठाया। यकायक बिजली की तरह आयी एक ऐंठन से अमीर का चेहरा बिगड़ गया। इस वक़्त कितने ही सिर जल्लाद के काठ पर रखे होते, चापलूसी करनेवाली कितनी ही ज़ुबानें हमेशा के लिए ख़ामोश हो चुकी होतीं- झूठी और पूरी होने वाली उमीदों, हवसों और कोशिशों, धोखे की रियासतों की उनकी ज़िन्दगी की याद दिलानेवाली जुबानें- जो सफ़ेद पड़े होठों से मौत की तकलीफ़ में बाहर निकल आयी होतीं? लेकिन कंधों पर सिर बदस्तूर क़ायम रहे और फ़ौरन चालपूसी करने के लिए ज़ुबानें तैयार रहीं, क्योंकि उसी वक़्त महल के गुमाश्ते ने आकर इत्तिला दीः "अलहमदुलिल्लाह! ख़िल्क़त के मरकज़ की ख़ुदा ख़ैर करे! एक अजनबी महल के फाटक पर आया हुआ है और अपने को बग़दाद का आ’लिम मौलाना हुसैन बताता है। वह कहता है कि उसे बहुत ज़रुरी काम है और जहांपनाह की रौशन नज़र के सामने उसे फ़ौरन पेश किया जाय।"

    उतावली में अमीर चिल्ला पड़ेः "मौलाना हुसैन? उन्हें आने दो! आने दो! उन्हें यहां ले आओ!"

    आ’लिम आये नहीं, बल्कि दौड़ते हुए एकदम धंस पड़े और अपने धूल भरे जूते भी उतारना भूल गये। तख़्त के सामने उन्होंने झुक कर कोर्निश की।

    "मशहूर आ’लिम! इस जहान के चांद और सूरज ! दुनिया के जमाल और जलाल! अमीर-ए-आज़म! यह ग़ुलाम आप के लिए दुआ’ करता है। मैं दिन रात लगातार चल कर अमीर को एक बड़े ख़तरे से आगाह करने के लिए भागता रहा हूं।

    अमीर मुझे बतायें कि आज वह किसी औ’रत से तो नहीं मिले? मेरे आक़ा अमीर, इस नाचीज़ ग़ुलाम को जवाब देने की मेहरबानी करें...मेरी इल्तिजा है…"

    अमीर ने परेशानी भरी आवाज़ में पूछाः "औ’रत?...आज? नहीं। हमारा इरादा ज़रूर था, पर हमने ऐसा किया नहीं…"

    आ’लिम उठ खड़े हुए। उनका चेहरा पीला पड़ रहा था। उन्हों ने इस जवाब का इंतिज़ार बहुत बेताबी से किया था। एक लम्बी सांस उनके होठों से निकल गयी। धीरे-धीरे उनके गालों पर रंग गया। वह ज़ोर से बोलेः "अलहमदुलिल्लाह!

    अल्लाह ने दानाई और संजीदगी के सितारे को डूबने से बचा लिया! अमीर-ए-आज़म को मा’लूम हो कि कल रात सितारों और सैयारों का ऐसा जमाव था जो उनके लिए बहुत नुक़सानदेह साबित होता। और मैं, नाचीज़ ग़ुलाम, जो अमीर के क़दमों की ख़ाक चूमने क़ाबिल भी नहीं सैयारों का हिसाब लगाता हूं और जानता हूं कि जब तक सितारे मुबारक घरों में पहुंचें अमीर को किसी औ’रत से मिलना चाहिए, नहीं तो उनकी बर्बादी बिलकुल यक़ीनी है। अल्लाह का शुक्र है कि मैं उन्हें वक़्त पर आगाह कर सका!"

    अमीर ने टोकाः "ख़ामोश, मौलाना हुसैन! तुम समझ में आनेवाली बातें कह रहे हो..."

    लेकिन आ’लिम कहते रहेः "अलहमदुलिल्लाह! मै वक़्त पर पहुंचा! ताउम्र मुझे इस बात का फ़ख़्र रहेगा कि आज के दिन मैं ने अमीर को औ’रत छूने से रोक लिया। इस तरह मैं ने सारी ख़िल्क़त को ग़मज़दा होने से बचा लिया है।"

    वह इस ख़ुशी और जोश से बोल रहे थे कि अमीर को उनका यक़ीन करना पड़ा।

    "जब मुझ हक़ीर और नाचीज़ पर इस आ’लम के परवरदीगार का यह पयाम ज़ुहूर हुआ कि मैं बुख़ारा जाऊं और अमीर की ख़िदमत में हाज़िर हो कर उन्हें आगाह करूं, तो मुझे लगा कि मैं ख़ुशी के समुन्दर में ग़ोते लगा रहा हूं। कहना फ़ुज़ूल है कि मैं ने फ़ौरन पाक परवरदिगार के इस