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शबद
प्रेम का अंग - अब तो अफ़्सोस मिटा दिल का दिलदार दीद में आया है
उपदेश उग्र गहि सत्त नाम सोइ अष्ट जाम धुनि लाया हैमुर्शिद की मेहर हुई यों कर मज़बूत जोश उपजाया है
दूलनदास जी
शबद
उपदेश - ऐ साहब तुम दीनदयाला
ऐ साहब तुम दीनदयाला आयहु करत सदा प्रतिपालाकेतिक अधम तरे तुम चरनन करम तुम्हार कहा कहिं जाला
भीखा साहेब
शबद
उपदेश - मोहिं राखो जी अपनी सरण
मोहिं राखो जी अपनी सरण मोहिं राखो जी अपनी सरणअपरम्पार पार नहिं तेरो काह कहों का करन
भीखा साहेब
शबद
उपदेश - मन तुम छोड़हु सकल उदासी
मन तुम छोड़हु सकल उदासीराम को नाम तीर्थ घट ही में दिल द्वारिका औ काया कासी
भीखा साहेब
शबद
उपदेश - धुनि बजत गगन महँ बीना
धुनि बजत गगन महँ बीना जहँ आपु रास रस भीनाधुनि बजत गगन महँ बीना जहँ आपु रास रस भीना
भीखा साहेब
शबद
उपदेश - प्रभु जी नहिं आवत मोहिं होस
प्रभु जी नहिं आवत मोहिं होसराम नाम मन में नहिं आवत काकर करों भरोस
भीखा साहेब
पद
सत्संग-उपदेश का अंग - करम गति टारे नाहिं टरे
करम गति टारे नाहिं टरेसत-बादी हरीचंद से राजा नीच घर नीर भरे
मीराबाई
शबद
उपदेश का अंग - मनुआँ साँची प्रीति लगाव
मनुआँ साँची प्रीति लगावएकहिं तेंनी सदा राखु चित दुबिधा नहिं लै आव
जगजीवन साहेब
शबद
उपदेश का अंग - है मन धोवहु तन कै मैली
है मन धोवहु तन कै मैलीये संसार नहीं सूझत घट खोजत निसु दिन गैली
गुलाल साहब
शबद
उपदेश का अंग - मन में निर्गुन गति जो आवै
मन में निर्गुन गति जो आवैहानि न होय जीव कबहीं, गगन मँडल घर छावै
गुलाल साहब
पद
उपदेश - प्रेमी लीजे रे सुध घर की गुरुसंग शब्द कमाय
प्रेमी लीजे रे सुध घर की गुरुसंग शब्द कमायप्रेमी लीजे रे सुध घर की गुरुसंग शब्द कमाय