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पद
लोगों की भूल - सखी री मेरे बिच अचरज होय
सखी री मेरे बिच अचरज होय अचरच अचरज अचरज होयसाँचा मारग सुरत शब्द का सो नहिं माने कोय
शालीग्राम
पद
सुरत-विवेक - सुरतिया मनन करत सत गुरु के अचरज बोल
सुरतिया मनन करत सत गुरु के अचरज बोलजो जो बचन सुनत सतसंग में सब की करती तोल
शालीग्राम
होली
अचरज देख मोर पियरवा सदा रहत मोरे घर माहींहूँ अज्ञानी घर नाहीं खोजत भटकत जाहीं-ताहीं
शाह नियाज़ अहमद बरेलवी
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राग आधारित पद
दरबारी देशी टोड़ी - अनहद शब्द उपज्यौ मो घट में ताकौ ध्यान धरूँ अष्टयाम
अब प्रगटयौ नाद ब्रह्म सहस रूप आनंद-धामधन-धन जोति स्वरूप अचरज कर
तानसेन
पद
जो दीसै सो तो नाही है सो कहा न जाई
समझा होय तो शब्दै चीन्है अचरज होय अयानाकोई ध्याबै निकारा को कोई ध्यावै आकारा
कबीर
पद
सद्गुरू-महिमा के पद - गुंथ लावो ऐ सुरता सेवरो म्हारा साधो राँ जोग
गुंथ लावो ऐ सुरता सेवरो म्हारा साधो राँ जोगएक अचरज म्हाँ सुनियो इन सरवरिया री पाल
मीराबाई
भजन
हर-हर करे औ गुर को देखे उस को मिलता प्यारा है
क्या है अचरज देखो साधो बूँद में समुंद समाया हैजो उसको पहचाने मस्ता वोही गुरु हमारा है
अब्दुल समद
पद
अपनी बात - सतगुरु पूरे परम उदारा दया दृष्टि से मोहिं निहारा
अचरज लीला देखी सुन में मुरली धुन अब पड़ी श्रवन मेंपहुँची फिर सतगुरु दरबारा अलख अगम को जाय निहारा
शालीग्राम
पद
अपनी बात - जगत में खोज किया बहु भाँत न पाई मैं ने घट में शांत
सुनी मैं महिमा अचरज बोल करी मैं 'राधास्वामी' मत की तोलभरम और संशय उठ भागे विरह अनुराग हिये जागे