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काफी
साडे नाल सदा तूँ वस्स प्या
साडे नाल सदा तूँ वस्स प्यावस्स हस्स रस्स दिल खस्स प्या
ख़्वाजा ग़ुलाम फ़रीद
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क़िस्सा काव्य
हीर वारिस शाह
260. रांझाजोगी छड्ड जहान फ़कीर होए, एस जग्ग विच्च बहुत ख़वारियां ने ।
वारिस शाह
काफी
तौं बाझ थे सुंज वेढ़े वो यार
तौं बाझ थे सुंज वेढ़े वो यारवल वस्स वो सज्जन अनेड़े वो यार
ख़्वाजा ग़ुलाम फ़रीद
कविता
काफ़ी - आवो सखी सहेलियो मिल मसलत गोईए
होइ निमानी मैं चली कोई वस न चाराअम्बड़ बाबल त्रै भैने ते सभे सहियाँ
बाबा फ़रीद
काफी
वाह वाह रमज़ सजन दी होर
दाम ज़ुल्फ़ दे अंदर फाथे ओथे चल्ले वस्स ना ज़ोरवाह वाह रमज़ सजन दी होर
बुल्ले शाह
काफी
वत्त ना करसाँ मान रंझेटे यार दा वे अड़िआ
अज्ज अजोकड़ी रात मेरे घर वस्स खाँ वे अड़िआदिल दियाँ घुंढियां खोल्ह असाँ नाल हस्स खाँ वे अड़िआ
बुल्ले शाह
दोहरा
पल पल शौक़ ज़्यादा होवे
दोवें थोक नहीं वस मेरे इहो बनी लचार असाहाँकी सिर काज होवे कह 'हाशम' जिथे इक घर लाख सलाहाँ