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कलाम
जोश-ए-गुल से है ये अर्ज़ां निर्ख़-ए-बाज़ार ऐ 'अमीर'कौड़ी कौड़ी बिक रहे हैं माह-ए-कन'आन-ए-बहार
अमीर मीनाई
पद
सर पर टोपी गले में कफ़नी घर घर जाय सलाम किया
कौड़ी कौड़ी जमा किया और फ़क़्र के तईं बदनाम कियापूछो तो 'दिलदार' तुम उस को हक़ का भी कुछ काम किया
कवि दिलदार
नज़्म
ख़ुशामद
हक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी हैकौड़ी पैसे ओ टके ज़र की ख़ुशामद कीजे
नज़ीर अकबराबादी
कविता
काफ़ी - आवो सखी सहेलियो मिल मसलत गोईए
जेवर पैरीं पाय के मैं ठमक न चलीकूड़ी गलीं लग के मैं साह थो भुली
बाबा फ़रीद
शबद
चितावनी और उपदेश माया महा ठगनी हम जानी
काहू के हीरा होई बैठी काहू के कौड़ी कानीभक्तन के भक्तिन होय बैठी ब्रह्मा के ब्रह्मानी
कबीर
कलाम
ना मैं त्रीहो रोज़े रक्खे ना मैं पाक नमाज़ी हूबाझ विसाल अल्लाह दे 'बाहू' दुनिया कूड़ी बाज़ी हू