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गूजरी सूफ़ी काव्य
तेरा इश्क़ मुझ कूँ है आब-ए-हयात,
तेरा इश्क़ मुझ कूँ है आब-ए-हयात,न आवे मुझे मौत तेरे सँगात
पीर सय्यद मोहम्मद अक़दस
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ग़ज़ल
शो'ला है आब-ए-हयात-ए-दिल-ए-मुश्ताक़ 'सिराज'इस समुंदर सीं बड़ा फ़र्क़ है परवाने में
सिराज औरंगाबादी
शे'र
निकल कर ज़ुल्फ़ से पहुँचूँगा क्यूँकर मुसहफ़-ए-रुख़ परअकेला हूँ अँधेरी रात है और दूर मंज़िल है
अकबर वारसी मेरठी
ना'त-ओ-मनक़बत
तिश्ना-लब आमदः-अम बरदरत ऐ आब-ए-हयातबहर-ए-बख़्शिश मददे क़ासिम-ए-कौसर मददे
डाॅ. ज़ुहूरुल हसन शारिब
ना'त-ओ-मनक़बत
है मुझे ख़ाक-ए-मदीना चश्मा-ए-आब-ए-हयातख़िज़्र ख़ुश हों चश्मा-ए-आब-ए-बक़ा को देख कर


