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ली हबीबुन ’अरबीयुन मदनीयुन क़ुरशी

जामी

ली हबीबुन ’अरबीयुन मदनीयुन क़ुरशी

जामी

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    ली हबीबुन 'अरबीयुन मदनीयुन क़ुरशी

    कि बुवद दर्द-ओ-ग़मश मायः-ए-शादी-ओ-ख़ुशी

    मेरा एक महबूब है वो अरबी है, मदनी है, और क़ुरैशी है। उसके इश्क़ का दर्द और ग़म मेरे लिए खुशी और सुकून का कारण है।

    फ़ह्म-ए-राज़श न-कुनी 'अरबी मन 'अजमी

    लाफ़-ए-मेह्रश चे ज़नम क़ुरशी मन हब्शी

    उसका भेद तुम नहीं समझ सकते। वो अरबी हैं और मैं अजमी हूँ, उनके इश्क़ में मैं कैसी शेख़ी बघारूँ? वो क़ुरैशी हैं और मैं हबशी हूँ ( यानी उनके ऊँचे नसब और उनके चमकते हुए हुस्न के सामने मैं बहुत ही छोटा और सियाह-रू हूँ)।

    गरचे सद मर्हलः दूरस्त ब-पेश-ए-नज़रम

    वज्हुहु फ़ी-नज़री कुल्ल-ग़दातों-ओ-'अशी

    अगरचे मेरे सामने (वो महबूब) सैकड़ों मंज़िलें दूर हैं, लेकिन तसव्वुर की नज़र और दिली क़ुर्बत की वजह से उनका रौशन चेहरा सुब्ह-ओ-शाम मेरी आँखों के सामने रहता है।

    सिफ़त-ए-बादः-ए-'इश्क़श ज़-मन-ए-मस्त म-पुर्स

    ज़ौक़-ए-ईं मय न-शनासी ब-ख़ुदा ता न-चशी

    उनकी इश्क़ की शराब की तारीफ़ मुझ मस्त से मत पूछो।

    ख़ुदा की क़सम! जब तक तुम उस शराब का मज़ा चखोगे नहीं,

    मस्लहत नीस्त मरा सेरी अज़ाँ आब-ए-हयात

    ज़ा'अफ़ल्लाहु बिहि कुल्लु ज़मानिन-'अतशी

    उस आब-ए-हयात यानी नबी के इश्क़ की शराब से पूरी तरह सैर हो जाना

    मेरे हक़ में अच्छा नहीं है। अल्लाह मेरी इस प्यास को और बढ़ाता रहे,

    'जामी' अरबाब-ए-वफ़ा जुज़ रह-ए-'इश्क़श रवंद

    सर मबादत गर अज़ीं राह क़दम बाज़ कशी

    जामी! याद रखो, अहल-ए-वफ़ा हमेशा उन्हीं के इश्क़ के रास्ते पर चलते रहते हैं। अगर तुमने इस राह से क़दम खींच लिया, तो तुम्हारा वुजूद भी बाक़ी नहीं रहेगा। क्योंकि उनका इश्क़ ही सच्चे आशिक़ों की असली ज़िंदगी है।

    स्रोत :
    • पुस्तक : नग़मातुल उंस फ़ी मजालिसिल क़ुदस (पृष्ठ 302)
    • रचनाकार :शाह हिलाल अहमद क़ादरी
    • प्रकाशन : दारुल एशा'अत ख़ानक़ाह मुजीबिया (2016)
    • संस्करण : First

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