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कोट शरीफ है नूर खुदाई फ़खर रौशन जमीरे कामल पीरे ।
कोट शरीफ है नूर खुदाई फ़खर रौशन जमीरे कामल पीरे ।कसम खुदा दी मुरशद हादी नज़र जैंदी अकेरे कामल पीरे ।
ख़्वाजा ग़ुलाम फ़रीद
बैत
अ’हद-ए-रफ्ता की खुदाई किस क़दर महँगी पड़ी
अ’हद-ए-रफ्ता की खुदाई किस क़दर महँगी पड़ीजिस जगह ऊँची इ’मारत थी गढ़ा सा रह गया
मुज़फ़्फ़र वारसी
सूफ़ी लेख
कवि वृन्द के वंशजों की हिन्दी सेवा- मुनि कान्तिसागर - Ank-3, 1956
मुझकों हैरत है। आश्चर्य है यह खुदाई हैं क्या अथवा खुदाई कहर है ईश्वर की क्रूरता हैं
भारतीय साहित्य पत्रिका
दकनी सूफ़ी काव्य
इशारतुल ग़ाफ़िलीन
अहे यो बाता सुनाता है याखुदाई कू तेरे करूँ लेके क्या
सय्यद मोहम्मद आशिक़ बारह आल
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सूफ़ी लेख
कबीर के कुछ अप्रकाशित पद ओमप्रकाश सक्सेना
हिंदू बोले राम ही राम, तुरकी बोले खुदाई। हिंदू जाले मुसलमान गाडे, तो षाक मां षाक मलाई।
हिंदुस्तानी पत्रिका
राग आधारित पद
एक अलाह के मैं कुरबानी । दिल ओझल मेरा दिलजानी ।।
दूरि न भाई खसम खुदाई । है हाजिर पहिचानि न जाई ।।ढूँढ़ो अपना एही वजूदा । बैठा मालिक महल मजूदा ।।
धरनीदास जी
सूफ़ी लेख
शाह नियाज़ बरैलवी ब-हैसिय्यत-ए-एक शाइ’र
न ख़्याल-ए-बंदगी है तमन्नाई-ए-खुदाईन मक़ाम-ए-गुफ़्तुगू है न महल्ल-ए-जुस्तुजू है
मयकश अकबराबादी
सूफ़ी कहावत
ख़ुदी और ख़ुदाई में वैर है
ख़ुदी और ख़ुदाई में वैर हैअहंमन्यता और ईश्वर में वैर है
वाचिक परंपरा
शे'र
हर आँख की तिल में है ख़ुदाई का तमाशाहर ग़ुन्चा में गुलशन है हर इक ज़र्रा में सहरा
इम्दाद अ'ली उ'ल्वी
सूफ़ी उद्धरण
फ़िक्र-ओ-मा’रिफ़त - ख़ुदाई दरिया की लहरे हैं और दानशीलता व करम ऐसी प्रवृत्तियाँ हैं, जो ख़ुदा से मिलाती हैं।
सुल्तान बाहू
सूफ़ी उद्धरण
मैं, तुम, वो और हम- ख़ुदाई राज़ की चाहत के गुलिस्ताँ में ये सब पहचानें फ़रेब हैं।
मैं, तुम, वो और हम- ख़ुदाई राज़ की चाहत के गुलिस्ताँ में ये सब पहचानें फ़रेब हैं।
यह्या बिन मुआज़
सूफ़ी उद्धरण
ख़ौफ़ वह ख़ुदाई कोड़ा है, जिस से ख़ुदा उन लोगों को सज़ा देता है, जिन्होंने उस का दर छोड़ा है।
ख़ौफ़ वह ख़ुदाई कोड़ा है, जिस से ख़ुदा उन लोगों को सज़ा देता है, जिन्होंने उस का दर छोड़ा है।