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दोहा
तती बंधी कंजी, ज्यूं घन ओझल होय।
तती बंधी कंजी, ज्यूं घन ओझल होय।मूरख राखै नैन, मूंह के राखे होय।।
शेख़ अहमद खट्टू
पबेरा
भव कै बीज घोरि घन बरसैं। जन बाजीद बिरहनी तरसै।।
भव कै बीज घोरि घन बरसैं। जन बाजीद बिरहनी तरसै।।तन मन मैटि दैऊं दरेरा। आवै अंबुकि जाइ पबेरा।।
वाजिद जी दादूपंथी
दोहरा
केची होत पुन्नल कूं घन गए हाय तेज़ रफ़तार उठां दी ।
केची होत पुन्नल कूं घन गए हाय तेज़ रफ़तार उठां दी ।थी बेदार सस्सी सड्ड मारे वंजे कूंज वांग कुरलांदी ।
ख़्वाजा ग़ुलाम फ़रीद
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सवैया
चात्रिक मोर करें अति शोर उठी घन घोर है श्याम घटा।
चात्रिक मोर करें अति शोर उठी घन घोर है श्याम घटा।चमकै बिजरी अति जोर भरी अरु लागि झरी लिये ठाट ठटा।।
हफ़ीजुल्लाह ख़ान
दोहा
बिरह रूप घन तम भयो अवधि आस उद्योत
बिरह रूप घन तम भयो अवधि आस उद्योतज्यों रहीम भादों निसा चमकि जात खद्योत
रहीम
दोहा
एक सखी ऐसे कहियो वे आये घन लाल
एक सखी ऐसे कह्यो वे आये घन लालउझकि बाल झुकि कैं लखै अति दुख भयो 'जमाल'
जमाल
दोहा
विनय मलिका - स्याम घटा घन देखि कै बोलत गहगह मोर
स्याम घटा घन देखि कै बोलत गहगह मोरब्रजबासी तिमि जी उठैं चितवत हरि की ओर
दया बाई
पद
सुरत की प्रगति - आज घिर आये बादल कारे गरज गरज घन गगन पुकारे
आज घिर आये बादल कारे गरज गरज घन गगन पुकारेरिम-झिम बरसत बूँद अमी की बिजली चमक घट नैन निहारे
शालीग्राम
महाकाव्य
।। रसप्रबोध ।।
ज्यौं बिजुरी घन सेत की दुरै असित घन माँह।।157।।ललन मुकुत टूटत परे बाल हाथ कुच आइ।
रसलीन
सतसई
।। बिहारी सतसई ।।
सघन कुंज घन घन-तिमिरु अधिक अँधेरी राति।तऊ न दुरिहै स्याम वह दीप सिखा सी जाति।।299।।
बिहारी
कविता
पावस की मावस की निसि अँधियारी माँहि,
गरजत घरो घन चारों ओर जोर भरे,दमकत दामिनि विशेष दरसाति है ।।
